Jarā-Mṛtyu-anatikrama: Janaka–Pañcaśikha-saṃvāda
Aging and Death Cannot Be Overstepped
अड---#क्र-ज > जैसे घड़ेमें जल भरा जाता है, उसी प्रकार पादांगुष्ठसे लेकर मूर्धातक सम्पूर्ण शरीरमें नासिकाके छिद्रोंद्वारा वायुको खींचकर भर ले। फिर ब्रह्मरन्ध्र (मूर्धथा) से वायुको हटाकर ललाटमें स्थापित करे। यह प्राणवायुके प्रत्याहारका पहला स्थान है। इसी प्रकार उत्तरोत्तर हटाते और रोकते हुए क्रमश: भ्रूमध्य, नेत्र, नासिकामूल, जिह्वामूल, कण्ठकूप, हृदयमध्य, नाभिमध्य, मेद्र (उपस्थका मूलभाग), उदर, गुदा, ऊरुमूल, ऊरुमध्य, जानु, चितिमूल, जंघामध्य, गुल्फ और पादांगुष्ठ-- इन स्थानोंमें वायुको ले जाकर स्थापित करे। इन अट्ठारह स्थानोंमें किये हुए प्रत्याहारोंको अठारह प्रकारकी प्रेरणा समझना चाहिये। इनके सिवा ध्यान, धारणा, समाधि तथा “सत्त्वपुरुषान्यता ख्याति” (बुद्धि और पुरुष इन दोनोंकी भिन्नताका बोध)--ये चार प्रेरणाएँ और हैं। ये ही सब मिलकर बाईस प्रकारकी प्रेरणाएँ कही गयी हैं। - यहाँ 'ज्ञान' शब्दसे बुद्धिवृत्तिको समझना चाहिये। सप्ताधिकांत्रेशततमो< ध्याय: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्गारका वर्णन वसिष्ठ उवाच सांख्यदर्शनमेतावदुक्त ते नृपसत्तम । विद्याविद्ये विदानीं मे त्वं निबोधानुपूर्वश:,वसिष्ठजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ) यहाँतक मैंने तुम्हें सांख्यदर्शनकी बात बतायी है। अब इस समय तुम मुझसे विद्या और अविद्याका वर्णन क्रमसे सुनो
Vasiṣṭha uvāca—Sāṅkhyadarśanam etāvad uktaṁ te nṛpasattama | vidyāvidye idānīṁ me tvaṁ nibodhānupūrvaśaḥ ||
Disse Vasiṣṭha: “Ó melhor dos reis, até aqui te expus o ensinamento do Sāṅkhya. Agora, ouve de mim, na devida ordem, o relato sobre vidyā e avidyā: o verdadeiro conhecimento e a ignorância.”
वसिष्ठ उवाच