
Chapter Arc: स्वर्गारोहण-विषयक पूर्व अध्याय के समापन के बाद कथा-धारा एक विराम-रेखा पर आती है—मानो महाप्रस्थान की यात्रा अब शब्दों से परे, मौन की ओर बढ़ रही हो। → यह अध्याय कथानक-घटना से अधिक ‘समापन-घोष’ का रूप लेता है: महाप्रस्थानिकपर्व की पूर्णता का संकेत, छन्द-गणना/पाठ-परंपरा का उल्लेख, और ग्रंथ-समाप्ति का औपचारिक उद्घोष—इनसे पाठक के भीतर ‘अब कुछ शेष नहीं’ का भारीपन बढ़ता है। → ‘महाप्रस्थानिकपर्व सम्पूर्ण’—यह वाक्य ही चरम है: पाण्डव-यात्रा का लौकिक अंत, और महाभारत के उत्तर-प्रवाह का एक द्वार बंद होना। → अध्याय का समाधान कथा में नहीं, ग्रंथ-परंपरा में है—पर्व-समाप्ति की मुहर, छन्द/अनुष्टुप्-गणना का संकेत, और पाठ-सम्पादन की सूचना के साथ समापन।
Verse 3
इस प्रकार श्रीमह्या भारत महाप्रस्थानिकपर्वनें युधिष्ठिरका स्वर्गायोह्णविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ
Assim, no venerando Mahābhārata, dentro do Mahāprasthānika Parva, chega ao fim o terceiro capítulo—relativo à ascensão de Yudhiṣṭhira ao céu.
Verse 114
>> 32 बछ। रस अ ।। महाप्रस्थानिकपर्व सम्पूर्ण ।। भीस्न्म+ज (2) असमना अनुष्ट्प् ( अच्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके कुल योग अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये १०९ (१०) १३
A linha fornecida não é um śloka legível do Mahābhārata; parece tratar-se de colofão e notas de contagem métrica/paginação da edição da Gītā Press (aviso de conclusão e observações sobre chandas), não do sânscrito de Mahāprasthānika-parvan 4.114. Sem o texto do verso, não é possível produzir uma tradução fiel de 4.114.