
द्रोणेन सात्यकिपीडनम् — Yudhiṣṭhira’s Charge to Sātyaki amid Droṇa’s Onslaught
Upa-parva: Droṇa–Sātyaki Saṅgrāma (Episode: Sātyaki pressed by Droṇa; Pāṇḍava mobilization; counsel to aid Arjuna)
Chapter 85 opens with Dhṛtarāṣṭra asking how Yuyudhāna (Sātyaki) restrained Bhāradvāja Droṇa in battle. Saṃjaya describes an intense exchange: Droṇa, seeing his forces being struck down by Sātyaki, advances personally; Sātyaki meets him with rapid volleys, and both trade disabling arrow-storms. The Kaurava side exults as Sātyaki becomes pressured; Yudhiṣṭhira, hearing the ominous roar and recognizing the danger, orders allied chariots to rush toward Sātyaki’s sector and urges Dhṛṣṭadyumna to move decisively against Droṇa. The narrative then widens to depict Droṇa’s overwhelming performance against multiple allied contingents, using hospitality metaphors for his effortless reception of attackers and solar imagery for his arrows’ heat. Amid the broader crisis, Yudhiṣṭhira turns to Sātyaki with an ethical-strategic appeal: as a steadfast ally comparable in valor to the foremost heroes, Sātyaki must undertake the urgent task of reaching and protecting Arjuna, who is isolated within dense enemy screens. The chapter concludes with the directive to penetrate the hostile formation and demonstrate appropriate martial conduct in engagement with major chariot-warriors.
Chapter Arc: प्रातःकाल की शांति में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं—“मधुसूदन! क्या आपकी रात्रि सुख से बीती? क्या आपका ज्ञान-मन प्रसन्न है?”—और सभा का ध्यान युद्ध से पहले के इस क्षणिक विराम पर टिक जाता है। → श्रीकृष्ण भी युधिष्ठिर का कुशल-क्षेम पूछते हैं; क्षत्ता (विदुर/धर्मराज के मंत्री-स्वरूप) राज्य-प्रकृतियों/व्यवस्थाओं के उपस्थित होने की सूचना देता है। अनेक क्षत्रिय-श्रेष्ठ युधिष्ठिर की सेवा में आते हैं। एक ही आसन पर श्रीकृष्ण और सात्यकि का बैठना संकेत देता है कि आज का दिन केवल शस्त्र का नहीं, नीति और प्रतिज्ञा का भी है—क्योंकि अर्जुन की प्रतिज्ञा (जयद्रथ-वध) का भार पूरे शिविर के हृदय पर है। → सभा में युधिष्ठिर के कथन पर श्रीकृष्ण मेघ-गर्जन-सी वाणी में निर्णायक आश्वासन देते हैं: देवता-इन्द्र सहित भी यदि रक्षा को उतर आएँ, तब भी जयद्रथ आज संकुल रण में यम-राजधानी को प्राप्त होगा; और अर्जुन उसे मारकर ही लौटेगा—राजा, शोक-रहित और भय-रहित रहो। → कृष्ण-वाक्य से युधिष्ठिर की डगमगाती आशंका स्थिर होती है; शिविर का मनोबल प्रतिज्ञा की सिद्धि पर टिक जाता है और नेतृत्व-विश्वास पुनः स्थापित होता है। → अब प्रश्न केवल ‘क्या’ नहीं, ‘कैसे’ है—द्रोण की चक्रव्यूह-सी रचना और कौरव-रक्षा-घेरा भेदकर अर्जुन जयद्रथ तक पहुँचेगा या नहीं, यह अगले प्रसंग में रणभूमि तय करेगी।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें युधिष्ठिरके सुसज्जित होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८२ ॥ अपना छा | अत-४-#क+ तग्रय्शीतितमो<ध्याय: अर्जुनकी प्रतिज्ञाको सफल बनानेके लिये युधिष्ठिरकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना और श्रीकृष्णका उन्हें आश्वासन देना संजय उवाच ततो युधिष्छिरो राजा प्रतिनन्द्य जनार्दनम् । उवाच परमप्रीत: कौन्तेयो देवकीसुतम्
Sañjaya disse: Então o rei Yudhiṣṭhira, filho de Kuntī, com o coração tomado de alegria, saudou respeitosamente Janārdana—Kṛṣṇa, filho de Devakī—e falou-lhe.
Verse 2
सुखेन रजनी व्युष्टा कच्चित् ते मधुसूदन । कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत,“मधुसूदन! क्या आपकी रात सुखपूर्वक बीती है? अच्युत! क्या आपकी सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हैं?”
«Ó Madhusūdana, tua noite transcorreu em conforto? Ó Acyuta, estão claras e serenas todas as tuas faculdades?»
Verse 3
वासुदेवो5पि तद्युक्त पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरम् । ततश्न प्रकृती: क्षत्ता न्यवेदयदुपस्थिता:
Sañjaya disse: Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa) também, agindo conforme o momento pedia, interrogou Yudhiṣṭhira. Então o camareiro veio e informou que os principais oficiais do rei—ministros, o comandante e outros dignitários—estavam presentes e aguardavam audiência.
Verse 4
अनुज्ञातश्व राज्ञा स प्रावेशयत तं जनम् । विराटं भीमसेनं च धृष्टद्युम्नं च सात्यकिम्
Sañjaya disse: Tendo obtido a permissão do rei, o porteiro fez entrar aquelas pessoas—Virāṭa, Bhīmasena, Dhṛṣṭadyumna e Sātyaki—bem como os demais líderes aliados e os filhos de Draupadī.
Verse 5
चेदिपं धृष्टकेतुं च द्रुपदं च महारथम् | शिखण्डिनं यमौ चैव चेकितानं सकेकयम्
Sañjaya disse: Com a permissão do rei, o porteiro fez entrar o soberano de Cedi, Dhṛṣṭaketu, o grande guerreiro de carro Drupada, Śikhaṇḍin, os gêmeos (Nakula e Sahadeva), Cekitāna e o príncipe de Kekaya—junto com os demais heróis aliados que haviam vindo para ser recebidos.
Verse 6
युयुत्सुं चैव कौरव्यं पाञ्चाल्यं चोत्तमौजसम् । युधामन्युं सुबाहुं च द्रौपदेयांश्व॒ सर्वश:
Sañjaya disse: “E Yuyutsu, da linhagem dos Kuru, e Uttamaujas, o herói dos Pāñcāla; e Yudhāmanyu e Subāhu; e também todos os filhos de Draupadī—tendo obtido a permissão do rei, o porteiro conduziu todos esses guerreiros para dentro.”
Verse 7
एते चान्ये च बहव: क्षत्रिया: क्षत्रियर्षभम् । उपतस्थुर्महात्मानं विविशुश्चासने शुभे,ये तथा और भी बहुत-से क्षत्रियशिरोमणि महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए और सुन्दर आसनपर बैठे
Sañjaya disse: “Estes, e muitos outros kṣatriyas também, aproximaram-se para servir o grande-souled, o ‘touro’ entre os kṣatriyas (Yudhiṣṭhira), e entraram e tomaram assento no trono auspicioso.”
Verse 8
एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महाबलौ । कृष्णश्न युयुधानश्व महात्मानौ महाद्युती,महाबली और महातेजस्वी महात्मा श्रीकृष्ण और सात्यकि ये दोनों वीर एक ही आसनपर बैठे थे
Sañjaya disse: “Num só assento estavam sentados dois heróis de grande força—Kṛṣṇa e Yuyudhāna (Sātyaki)—ambos magnânimos e radiantes de poder.”
Verse 9
ततो युधिष्ठिरस्तेषां शृण्वतां मधुसूदनम् | अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षमाभाष्य मधुरं वच:,तब युधिष्ठिरने उन सब लोगोंके सुनते हुए कमलनयन भगवान् मधुसूदनको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें कहा--
Então Yudhiṣṭhira, enquanto todos os presentes escutavam, dirigiu-se a Madhusūdana—Kṛṣṇa de olhos de lótus—e falou-lhe com palavras suaves e doces.
Verse 10
एकं॑ त्वां वयमाश्रित्य सहस्राक्षमिवामरा: । प्रार्थयामो जयं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च
Sañjaya disse: “Apoiando-nos somente em ti—assim como os deuses se abrigam em Indra, o de mil olhos—rogamos alcançar a vitória nesta guerra e também felicidade duradoura.”
Verse 11
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्धिश्न निराक्रियाम् क्लेशांश्व विविधान् कृष्ण सर्वास्तानपि वेद न:
Sañjaya disse: “Ó Krishna, tu bem conheces tudo o que nos sucedeu — como nossos inimigos arruinaram o nosso reino, nos submeteram à humilhação e nos infligiram muitas espécies de sofrimento.”
Verse 12
त्वयि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल | सुखमायत्तमत्यर्थ यात्रा च मधुसूदन,“भक्तवत्सल सर्वेश्वर! मधुसूदन! हम सब लोगोंका सुख और जीवन-निर्वाह पूर्णरूपसे आपके ही अधीन है
Sañjaya disse: “Ó Senhor de todos, terno para com os teus devotos! Ó Madhusūdana! O bem-estar de todos nós — nossa felicidade e até a própria continuidade da vida — depende inteiramente de ti.”
Verse 13
स तथा कुरु वार्ष्णेय यथा त्वयि मनो मम । अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्थाच्चिकीर्षिता,4वार्ष्णेय! हमारा मन आपमें ही लगा हुआ है। अतः आप ऐसा करें, जिससे अर्जुनकी अभीष्ट प्रतिज्ञा सत्य होकर रहे
Sañjaya disse: “Ó Vārṣṇeya (Krishna), age de tal modo que minha mente permaneça fixa em ti, e que o voto pretendido por Arjuna se mantenha firme e se cumpra em verdade.”
Verse 14
स भवांस्तारयत्वस्माद् दुःखामर्षमहार्णवात् । पार तितीर्षतामद्य प्लवो नो भव माधव
Sañjaya implora a Mādhava: “Que nos faças atravessar este vasto oceano de dor e de ressentimento ardente. Para todos nós, que hoje ansiamos alcançar a outra margem, torna-te o nosso barco. Só tu deves livrar-nos deste perigo.”
Verse 15
न हि तत् कुरुते संख्ये रथी रिपुवधोद्यत: । यथा वै कुरुते कृष्ण सारथिर्यत्नमास्थित:,'श्रीकृष्ण! संग्राममें शत्रुवधके लिये उद्यत हुआ रथी भी वैसा कार्य नहीं कर पाता, जैसा कि प्रयत्नशील सारथि कर दिखाता है
Sañjaya disse: “Ó Krishna, no aperto da batalha, nem mesmo um guerreiro de carro, decidido a matar o inimigo, consegue fazer o que Krishna, o cocheiro, realiza quando se empenha com esforço vigilante.”
Verse 16
यथैव सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीन् जनार्दन । तथैवास्मान् महाबाहो वृजिनात् त्रातुमहसि
Sañjaya disse: “Ó Janārdana, assim como proteges os Vṛṣṇis em toda calamidade, assim também, ó de braços poderosos, deves resgatar-nos deste perigo.”
Verse 17
त्वमगाधे5प्लवे मग्नान् पाण्डवान् कुरुसागरे । समुद्धर प्लवो भूत्वा शड्खचक्रगदाधर
Sañjaya disse: “Ó Senhor que empunhas a concha, o disco e a maça! Os Pāṇḍavas afundaram no oceano dos Kurus, profundo e sem margens, onde não há barco. Torna-te tu mesmo a sua jangada e ergue-os—livra-os deste perigo.”
Verse 18
नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन । विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम,'शत्रुनाशक! सनातन देवदेवेश्वर! विष्णो! जिष्णो! हरे! कृष्ण! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है
Salve a ti, ó Deus dos deuses, o Eterno, destruidor do mal! Ó Viṣṇu, Jishṇu, Hari, Kṛṣṇa, Vaikuṇṭha, Puruṣottama—recebe a minha reverente saudação.
Verse 19
नारदस्त्वां समाचख्यौ पुराणमृषिसत्तमम् | वरदं शार््रिणं श्रेष्ठ तत् सत्यं कुरू माधव
Sañjaya disse: “Ó Mādhava, o sábio divino Nārada proclamou-te como o Nārāyaṇa primordial, o melhor entre os ṛṣis—supremo, doador de dádivas, portador do arco Śārṅga. Ó Mādhava, faze verdadeira a sua declaração.”
Verse 20
इत्युक्त: पुण्डरीकाक्षो धर्मराजेन संसदि । तोयमेघस्वनो वागम्मी प्रत्युवाच युधिछ्िरम्
Sañjaya disse: Quando Dharma-rāja Yudhiṣṭhira falou assim na assembleia real, Kṛṣṇa, o de olhos de lótus (Puṇḍarīkākṣa), célebre pela excelência de sua fala, respondeu a Yudhiṣṭhira com voz profunda, ressoante como nuvem carregada de chuva.
Verse 21
वायुदेव उवाच सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविध: । शरासनधर: कश्चिद् यथा पार्थो धनञज्जय:
Vāyudeva disse: “Ó rei, mesmo através de todos os mundos—sim, até no meio da batalha—não se encontra arqueiro de tal espécie; ninguém empunha o arco com tamanha mestria como Pārtha Dhanañjaya (Arjuna), filho de Kuntī.”
Verse 22
वीर्यवानस्त्रसम्पन्न: पराक्रान्तो महाबल: । युद्धशौण्ड: सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम्,वे शक्तिशाली, अस्त्रज्ञानसम्पन्न, पराक्रमी, महाबली, युद्धकुशल, सदा अमर्षशील और मनुष्योंमें परम तेजस्वी हैं
Vāyu disse: “Ele é dotado de vigor heroico e plenamente munido do domínio das armas; é valente e de grande força. Hábil e ardente na batalha, jamais tolera afronta, e entre os homens é o primeiro em esplendor.”
Verse 23
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घबाहुर्महाबल: । सिंहर्षभगति: श्रीमान् द्विषतस्ते हनिष्यति
Ele é um jovem de ombros como os de um touro, de longos braços e grande força. Seu porte é nobre como o do leão; é pleno de esplendor; por isso, sem falta, abaterá os teus inimigos.
Verse 24
अहं च तत् करिष्यामि यथा कुन्तीसुतो<र्जुन: । धार्तराष्ट्रस्य सैन्यानि धक्ष्यत्यग्निरिवेन्धनम्
Vāyudeva disse: “Eu também agirei de tal modo que Arjuna, filho de Kuntī, queime os exércitos da linhagem de Dhṛtarāṣṭra—como o fogo consome o combustível.”
Verse 25
अद्य तं॑ पापकर्माणि क्षुद्रें सौ भद्रघातिनम् । अपुनर्दर्शनं मार्गमिषुशि: क्षेप्स्यतेडर्जुन:
Hoje Arjuna, com suas flechas, lançará Jayadratha—esse vil praticante de atos pecaminosos, assassino de Abhimanyu, filho de Subhadrā—ao caminho sem retorno, onde, uma vez ido, não mais se torna a ver este mundo.
Verse 26
तस्याद्य गृध्रा: श्येनाश्न चण्डगोमायवस्तथा । भक्षयिष्यन्ति मांसानि ये चान्ये पुरुषादका:,आज गीध, बाज, क्रोधमें भरे हुए गीदड़ तथा अन्य नरभक्षी जीव-जन्तु जयद्रथका मांस खायेंगे
Vāyu disse: “Hoje, abutres e falcões, bem como chacais ferozes, junto de outras criaturas devoradoras de homens, hão de comer a sua carne.” A fala enquadra o horror moral do campo de batalha: a violência injusta não culmina em honra, mas na degradação de tornar-se carniça—um severo aviso sobre as consequências do adharma na guerra.
Verse 27
यद्यस्य देवा गोप्तार: सेन्द्रा: सर्वे तथाप्यसौ । राजधानीं यमस्याद्य हत: प्राप्स्यति संकुले
Ainda que todos os deuses—Indra incluído—viessem como seus protetores, mesmo assim ele será morto hoje no aperto da batalha e, sem falta, alcançará a cidade régia de Yama. A afirmação ressalta a inevitabilidade de uma morte destinada quando o ímpeto moral e kármico da guerra já amadureceu.
Verse 28
निहत्य सैन्धवं जिष्णुरद्य त्वामुपयास्यति । विशोको विज्वरो राजन् भव भूतिपुरस्कृत:,राजन! आज विजयशील अर्जुन जयद्रथको मारकर ही आपके पास आयेंगे, आप ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहकर शोक और चिन्ताको त्याग दीजिये
Vāyu disse: “Tendo abatido o Saindhava (Jayadratha), Jishnu (Arjuna) virá a ti hoje. Ó Rei, livra-te do luto e da ansiedade febril; permanece firme, com a prosperidade à tua frente.”
Verse 83
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये ऋ%यशीतितमो<ध्याय: ।। ८३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
Assim, no Śrī Mahābhārata, dentro do Droṇa Parva, na seção chamada Pratijñā Parva, chega ao fim o octogésimo quinto capítulo, centrado nas palavras de Śrī Kṛṣṇa. (Este é o colofão que assinala a conclusão do adhyāya.)
The dilemma is triage under dharma: whether to remain engaged against an overpowering commander (Droṇa) to stabilize the line, or to accept immediate risk and redirect effort toward the higher-priority obligation of protecting Arjuna.
The chapter frames dharmic action as role-appropriate and time-sensitive: when duties conflict, one must choose the task with the greatest collective consequence and entrust it to the most dependable agent, guided by loyalty, competence, and clarity of purpose.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is operational and ethical—demonstrating how narrative praise, reputation, and duty-language are used to authorize decisive action within the broader teleology of protecting righteous aims.
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