अध्याय ८८ — घटोत्कच-दुर्योधनयुद्धवर्णनम्
Ghaṭotkaca–Duryodhana Engagement
(जयद्रथो भग्नवाहो रथं तं त्यक्त्वा ययौ यत्र राजा कुरूणाम् | स सौबल: सानुगः सानुजश्न दृष्टवा भीम॑ मूढचेता भयार्त: ।। घोड़ोंके मारे जानेपर जयद्रथ उस रथको छोड़कर जहाँ शकुनि, सेवकवृन्द तथा छोटे भाइयोंसहित कुरुराज दुर्योधन था, वहीं चला गया। भीमसेनको देखकर जयद्रथका मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था। वह भयसे पीड़ित हो रहा था। भीमो5प्यथैनं सहसा विनद्य प्रत्युद्ययौं गदया हन्तुकाम: । स सौबलं तव पुत्र निरीक्ष्य दुर्योधनं सानुजं रोषयुक्तः ।।) भीमसेन भी शकुनि और भाइयोंसहित आपके पुत्र दुर्योधनको देखकर रोषमें भर गये और सहसा गर्जना करके गदाद्वारा जयद्रथको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़े। समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां दृष्टवा गदां ते कुरव: समन्तात् । विहाय सर्वे तव पुत्रमुग्रं पातं गदाया: परिहर्तुकामा:,यमदण्डके समान भयंकर उस गदाको उठी हुई देख समस्त कौरव आपके पुत्रको वहीं छोड़कर गदाके उग्र आघातसे बचनेके लिये चारों ओर भाग गये। भारत! मोहमें डालनेवाले उस अत्यन्त दारुण एवं भयंकर जनसंहारमें उस महागदाको आती देख केवल चित्रसेनका चित्त किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हुआ था
jayadratho bhagnavāho rathaṁ taṁ tyaktvā yayau yatra rājā kurūṇām | sa saubalaḥ sānugaḥ sānujaś ca dṛṣṭvā bhīmaṁ mūḍhacetā bhayārtaḥ ||
Sañjaya disse: Quando seus cavalos foram mortos, Jayadratha abandonou aquele carro e foi para onde estava o rei dos Kurus (Duryodhana), junto de Śakuni, seus assistentes e seus irmãos mais novos. Ao ver Bhīma, a mente de Jayadratha ficou confusa, sem saber o que fazer; ele foi tomado pelo medo. A cena ressalta que, no caos da guerra, quando o apoio se rompe e se enfrenta uma força superior, a coragem pode ruir, cedendo lugar ao temor e à indecisão.
संजय उवाच