
Śraddhā–Guṇa–Vibhāga Yoga (Faith and the Three Guṇas) — Mahābhārata Book 6, Chapter 39
Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-upākhyāna within Bhīṣma Parva)
Arjuna asks how to understand the faith (śraddhā) of those who engage in worship while setting aside scriptural procedure, and whether their orientation is sāttvika, rājasa, or tāmasa (1). Kṛṣṇa replies that embodied beings exhibit a threefold faith arising from disposition (svabhāva), and that a person is effectively constituted by faith (2–3). He then classifies worship-objects: sāttvika practitioners orient toward devas, rājasa toward yakṣa/rākṣasa-type powers, and tāmasa toward pretas and bhūta-groups (4). He critiques severe, non-scriptural austerities driven by ostentation, ego, desire, and coercive force, describing them as harmful to the embodied aggregate and as misconstruing the indwelling divine principle (5–6). The discourse then systematizes threefold typologies: foods (āhāra) that support vitality and clarity versus those that inflame distress or foster dullness (7–10); sacrifices (yajña) performed as duty without reward-seeking versus those motivated by display or lacking method and faith (11–13); austerities (tapas) of body, speech, and mind, and their sāttvika/rājasa/tāmasa variants by motivation and stability (14–19); and gifts (dāna) given appropriately without expectation versus transactional or contemptuous giving (20–22). Finally, Kṛṣṇa explains “oṃ tat sat” as a threefold designation connected with Brahman, used to frame disciplined acts (23–27), and concludes that actions done without faith are termed “asat” and yield no enduring benefit in this life or the next (28).
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-परिवेश में अर्जुन का प्रश्न भीतर की ओर मुड़ता है—‘क्षेत्र’ (देह-प्रकृति) और ‘क्षेत्रज्ञ’ (चेतना) का यथार्थ क्या है, और ज्ञानी पुरुष सुख-दुःख को कैसे देखता है। → भगवान् श्रीकृष्ण देह में रोग-पीड़ा के अनुभव और मन के शोक-हर्ष के भेद को स्पष्ट करते हैं; फिर लोक-जीवन के साधारण कर्मों (दूध दुहना, धान कूटना, दही बिलोना, आँगन लीपना, बच्चों को झुलाना/लोरी देना) के बीच भी ज्ञान की कसौटी रखकर दिखाते हैं कि बंधन कर्म से नहीं, आसक्ति-अविद्या से है। → ‘जानने वाला होकर भी इन्द्रियों से रहित, निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता; ज्योतियों का भी ज्योति, तमस से परे, सबके हृदय में स्थित’—इस परब्रह्म/परमात्मा का घोष अध्याय का शिखर बनता है, जहाँ ज्ञेय का स्वरूप एक साथ निराकार-व्यापक और अंतर्यामी रूप में प्रकट होता है। → क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में समाहार कर श्रीकृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि जो भक्त इस तत्त्व को जान लेता है, वह ‘मद्भाव’—भगवद्स्वरूप/परमगति—को प्राप्त होता है; क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का पूर्ण ज्ञान संसार-भ्रम का नाश करता है। → अगले प्रसंग के लिए संकेत रहता है कि अब ‘क्षेत्रज्ञ’ के व्यापकत्व, प्रकृति-पुरुष के संबंध और ज्ञान के फल की सूक्ष्म व्याख्या आगे और गहरी होगी।
Verse 1
१२), अर्थात् 'ज्ञानी पुरुष हर्ष-शोकोंको सर्वथा त्याग देता है।' प्रारब्ध-भोगके अनुसार शरीरमें रोग हो जानेपर उनको पीड़ारूप दुःखका बोध तो होता है और शरीर स्वस्थ रहनेसे उसमें पीड़ाके अभावका बोधरूप सुख भी होता है, किंतु राग-द्वेघका अभाव होनेके कारण हर्ष और शोक उन्हें नहीं होते। इसी तरह किसी भी अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थ या घटनाके संयोग-वियोगमें किसी प्रकारसे भी उनको हर्ष-शोक नहीं होते। यही उनका सुख-दुःखमें सम रहना है। 3. अपना अपकार करनेवालेको किसी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे अभय देनेवालेको “क्षमावान् कहते हैं। भगवानके ज्ञानी भक्तोंमें क्षमाभाव भी असीम रहता है। क्षमाकी व्याख्या गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें विस्तारसे की गयी है। ४. भक्तियोगके द्वारा भगवानको प्राप्त हुए ज्ञानी भक्तको यहाँ “योगी” कहा गया है; ऐसा भक्त परमानन्दके अक्षय और अनन्त भण्डार श्रीभगवानको प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण वह सदा ही संतुष्ट रहता है। उसे किसी समय, किसी भी अवस्थामें, किसी भी घटनामें संसारकी किसी भी वस्तुके अभावमें असंतोषका अनुभव नहीं होता; क्योंकि वह पूर्णकाम है, यही उसका निरन्तर संतुष्ट रहना है। ५. इससे यह भाव दिखलाया है कि भगवानके ज्ञानी भक्तोंका मन और इन्द्रियोंसहित शरीर सदा ही उनके वशमें रहता है। वे कभी मन और इन्द्रियोंके वशमें नहीं हो सकते, इसीसे उनमें किसी प्रकारके दुर्गुण और दुराचारकी सम्भावना नहीं होती। ६. जिसने बुद्धिके द्वारा परमेश्वरके स्वरूपका भलीभाँति निश्चय कर लिया है, जिसे सर्वत्र भगवानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा जिसकी बुद्धि गुण, कर्म और दुःख आदिके कारण परमात्माके स्वरूपसे कभी किसी प्रकार विचलित नहीं हो सकती, उसको “दृढनिश्चय” कहते हैं। ७. नित्य-निरन्तर मनसे भगवान्के स्वरूपका चिन्तन और बुद्धिसे उसका निश्चय करते-करते मन और बुद्धिका भगवानके स्वरूपमें सदाके लिये तन््मय हो जाना ही उनको “भगवानमें अर्पण करना' है। ८. जो उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न है; जिसका भगवान्में अहैतुक और अनन्य प्रेम है, जिसकी भगवानके स्वरूपमें अटल स्थिति है, जिसका कभी भगवानसे वियोग नहीं होता, जिसके मन-बुद्धि भगवानके अर्पित हैं, भगवान् ही जिसके जीवन, धन, प्राण एवं सर्वस्व हैं, जो भगवानके ही हाथकी कठपुतली है--ऐसे सिद्ध भक्तको भगवान् अपना प्रिय बतलाते हैं। ९. पूर्वाद्धमें केवल दूसरे प्राणीसे उसे उद्वेग नहीं होता, इतना ही कहा गया है। इससे परेच्छाजनित उद्वेगकी निवृत्ति तो हुई; किंतु अनिच्छा और स्वेच्छासे प्राप्त घटना और पदार्थमें भी तो मनुष्यको उद्वेग होता है, इसलिये उत्तरार्धमें पुनः उद्वेगसे मुक्त होनेकी बात कहकर भगवान् यह सिद्ध कर रहे हैं कि भक्तको कभी किसी प्रकार भी उद्वेग नहीं होता। ३०. सर्वत्र भगवद्बुद्धि होनेके कारण भक्त जान-बूझकर तो किसीको दुःख, संताप, भय और क्षोभ पहुँचा ही नहीं सकता, बल्कि उसके द्वारा तो स्वाभाविक ही सबकी सेवा और परम हित ही होते हैं। अतएव उसकी ओरसे किसीको कभी उद्वेग नहीं होना चाहिये। यदि भूलसे किसी व्यक्तिको उद्वेग होता है तो उसमें उस व्यक्तिके अपने अज्ञानजनित राग, द्वेष और ईर्ष्यादि दोष ही प्रधान कारण हैं, भगवद्धक्त नहीं; क्योंकि जो दया और प्रेमकी मूर्ति है एवं दूसरोंका हित करना ही जिसका स्वभाव है, वह परम दयालु प्रेमी भगवत्प्राप्त भक्त तो किसीके उद्वेगका कारण हो ही नहीं सकता। ३. ज्ञानी भक्तको भी प्रारब्धके अनुसार परेच्छासे दुःखके निमित्त तो प्राप्त हो सकते हैं, परंतु उसमें राग-द्वेषका सर्वथा अभाव हो जानेके कारण बड़े-से-बड़े दु:खकी प्राप्तिमें भी वह विचलित नहीं होता (गीता ६२२); इसीलिये ज्ञानी भक्तको किसी भी प्राणीसे उद्धेग नहीं होता। २. अभिप्राय यह है कि वास्तवमें मनुष्यको अपने अभिलषित मान, बड़ाई और धन आदि वस्तुओंकी प्राप्ति होनेपर जिस तरह हर्ष होता है, उसी तरह अपने ही समान या अपनेसे अधिक दूसरोंको भी उन वस्तुओंकी प्राप्ति होते देखकर प्रसन्नता होनी चाहिये; किंतु प्रायः ऐसा न होकर अज्ञानके कारण लोगोंको उलटा अमर्ष होता है और यह अमर्ष विवेकशील पुरुषोंके चित्तमें भी देखा जाता है। वैसे ही इच्छा, नीति और धर्मके विरुद्ध पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर उद्वेग तथा नीति और धर्मके अनुकूल भी दु:ःखप्रद पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर या उसकी आशंकासे भय होता देखा जाता है। दूसरोंकी तो बात ही क्या, मृत्युका भय तो विवेकियोंको भी होता है; किंतु भगवानके ज्ञानी भक्तकी सर्वत्र भगवदबुद्धि हो जाती है और वह सम्पूर्ण क्रियाओंको भगवान्की लीला समझता है; इस कारण ज्ञानी भक्तको न अमर्ष होता है, न उद्धेग होता है और न भय ही होता है--यह भाव दिखलानेके लिये ऐसा कहा गया है। ३. परमात्माको प्राप्त भक्तका किसी भी वस्तुसे किंचित् भी प्रयोजन नहीं रहता; अतएव उसे किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी इच्छा, स्पृहा अथवा वासना नहीं रहती। वह पूर्णकाम हो जाता है। यह भाव दिखलानेके लिये उसे आकांक्षासे रहित कहा है। ४. भगवानके भक्तमें पवित्रताकी पराकाष्ठा होती है। उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय, उसके आचरण और शरीर आदि इतने पवित्र हो जाते हैं कि उसके साथ वार्तालाप होनेपर तो कहना ही क्या है--उसके दर्शन और स्पर्शमात्रसे ही दूसरे लोग पवित्र हो जाते हैं। ऐसा भक्त जहाँ निवास करता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है और उसके संगसे वहाँका वायुमण्डल, जल, स्थल आदि सब पवित्र हो जाते हैं। ५. जिस उद्देश्यकी सफलताके लिये मनुष्यशरीरकी प्राप्ति हुई है, उस उद्देश्यको पूरा कर लेना ही यथार्थ चतुरता है। ६. शरीरमें रोग आदिका होना, स्त्री-पुत्र आदिका वियोग होना और धन-गृह आदिकी हानि होना--इत्यादि दुःखके हेतु तो प्रारब्धके अनुसार उसे प्राप्त होते हैं, परंतु इन सबके होते हुए भी उसके अन्त:करणमें किसी प्रकारका शोक नहीं होता। ७, संसारमें जो कुछ भी हो रहा है--सब भगवानकी लीला है, सब उनकी मायाशक्तिका खेल है; वे जिससे जब जैसा करवाना चाहते हैं, वैसा ही करवा लेते हैं। मनुष्य मिथ्या ही ऐसा अभिमान कर लेता है कि अमुक कर्म मैं करता हूँ, मेरी ऐसी सामर्थ्य है, इत्यादि। पर भगवान्का भक्त इस रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, इससे वह सदा भगवान्के हाथकी कठपुतली बना रहता है। भगवान् उसको जब जैसा नचाते हैं, वह प्रसन्नतापूर्वक वैसे ही नाचता है। अपना तनिक भी अभिमान नहीं रखता और अपनी ओरसे कुछ भी नहीं करता, इसलिये वह लोकदृष्टिमें सब कुछ करता हुआ भी वास्तवमें कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण 'सब आरम्भोंका त्यागी” ही है। ८. भक्तके लिये सर्वशक्तिमान्ू, सर्वाधार, परम दयालु भगवान् ही परम प्रिय वस्तु हैं और वह उन्हें सदाके लिये प्राप्त है। अतएव वह सदा-सर्वदा परमानन्दमें स्थित रहता है। संसारकी किसी वस्तुमें उसका किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष नहीं होता। इस कारण लोकदृष्टिसे होनेवाले किसी प्रिय वस्तुके संयोगसे या अप्रियके वियोगसे उसके अन्त:करणमें कभी किंचिन्मात्र भी हर्षका विकार नहीं होता। ९, भगवानका भक्त सम्पूर्ण जगत्को भगवानका स्वरूप समझता है, इसलिये उसका किसी भी वस्तु या प्राणीमें कभी किसी भी कारणसे द्वेष नहीं हो सकता। उसके अन्त:करणमें द्वेषभावका सदाके लिये सर्वथा अभाव हो जाता है। १०. अनिष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें और इष्टके वियोगमें प्राणियोंको शोक हुआ करता है। भगवद्धक्तको लीलामय परम दयालु परमेश्वरकी दयासे भरे हुए किसी भी विधानमें कभी प्रतिकूलता प्रतीत ही नहीं होती। अतः उसे शोक कैसे हो सकता है? ३. भक्तको साक्षात् भगवानकी प्राप्ति हो जानेके कारण वह सदाके लिये परमानन्द और परम शान्तिमें स्थित होकर पूर्णकाम हो जाता है, उसके मनमें कभी किसी वस्तुके अभावका अनुभव होता ही नहीं, इसलिये उसके अन्तःकरणमें सांसारिक वस्तुओंकी आकांक्षा होनेका कोई कारण ही नहीं रह जाता। २. यज्ञ, दान, तप और वर्णाश्रमके अनुसार जीविका तथा शरीर-निर्वाहके लिये किये जानेवाले शास्त्रविहित कर्मोंका वाचक यहाँ “शुभ” शब्द है और झूठ, कपट, चोरी, हिंसा, व्यभिचार आदि पापकर्मका वाचक “अशुभ” शब्द है। भगवानका ज्ञानी भक्त इन दोनों प्रकारके कर्मोंका त्यागी होता है; क्योंकि उसके शरीर, इन्द्रिय और मनके द्वारा किये जानेवाले समस्त शुभ कर्मोंको वह भगवान्के समर्पण कर देता है। उनमें उसकी किंचिन्मात्र भी ममता, आसक्ति या फलेच्छा नहीं रहती; इसीलिये ऐसे कर्म कर्म ही नहीं माने जाते (गीता ४।२०) और राग-द्वेषका अभाव हो जानेके कारण पापकर्म उसके द्वारा होते ही नहीं, इसलिये उसे 'शुभ और अशुभकर्मोंका त्यागी” कहा गया है। 3. संसारमें मनुष्यकी जो आसक्ति (स्नेह) है, वही समस्त अनर्थोंका मूल है; बाहरसे मनुष्य संसारका संसर्ग छोड़ भी दे, किंतु मनमें आसक्ति बनी रहे तो ऐसे त्यागसे विशेष लाभ नहीं हो सकता। पक्षान्तरमें मनकी आसक्ति नष्ट हो चुकनेपर बाहरसे राजा जनक आदिकी तरह सबसे ममता और आसक्तिरहित संसर्ग रहनेपर भी कोई हानि नहीं है। ऐसा आसक्तिका त्यागी ही वस्तुतः सच्चा 'संगविवर्जित' है। ४. यद्यपि भक्तकी दृष्टिमें उसका कोई शत्रु-मित्र नहीं होता, तो भी लोग अपनी-अपनी भावनाके अनुसार मूर्खतावश भक्तके द्वारा अपना अनिष्ट होता हुआ समझकर या उसका स्वभाव अपने अनुकूल न दीखनेके कारण अथवा ईर्ष्यावश उसमें शत्रुभावका भी आरोप कर लेते हैं, ऐसे ही दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसमें मित्रभावका आरोप कर लेते हैं; परंतु सम्पूर्ण जगतमें सर्वत्र भगवानके दर्शन करनेवाले भक्तका सबमें समभाव ही रहता है। उसकी दृष्टिमें शत्रु-मित्रका किंचित् भी भेद नहीं रहता, वह तो सदा-सर्वदा सबके साथ परम प्रेमका ही व्यवहार करता रहता है। सबको भगवान्का स्वरूप समझकर समभावसे सबकी सेवा करना ही उसका स्वभाव बन जाता है। जैसे वृक्ष अपनेको काटनेवाले और जल सींचनेवाले दोनोंकी ही छाया, फल और फूल आदिके द्वारा सेवा करनेमें किसी प्रकारका भेद नहीं करता, वैसे ही भक्तमें भी किसी तरहका भेदभाव नहीं रहता। भक्तका समत्व वृक्षकी अपेक्षा भी अधिक महत्त्वका होता है। उसकी दृष्टिमें परमेश्वरसे भिन्न कुछ भी न रहनेके कारण उसमें भेदभावकी आशंका ही नहीं रहती। इसलिये उसे शत्रु-मित्रमें सम कहा गया है। ५. मान-अपमान, सरदी-गरमी, सुख-दुःख आदि अनुकूल और प्रतिकूल द्वद्धोंका मन, इन्द्रिय और शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे उनका अनुभव होते हुए भी भगवद्धक्तके अन्त:करणमें राग-द्वेष या हर्ष-शोक आदि किसी तरहका किंचिन्मात्र भी विकार नहीं होता। वह सदा सम रहता है। &. जो भक्त अपना सर्वस्व भगवान्के अर्पण कर चुके हैं, जिनके घर-द्वार, शरीर, विद्या-बुद्धि आदि सभी कुछ भगवानके हो चुके हैं--फिर वे चाहे ब्रह्मचारी हों या गृहस्थ, अथवा वानप्रस्थ हों, वे भी 'अनिकेत” ही हैं। जैसे शरीरमें अहंता, ममता और आसक्ति न होनेपर शरीर रहते हुए भी ज्ञानीको विदेह कहा जाता है--वैसे ही जिसकी घरमें ममता और आसक्ति नहीं है, वह घरमें रहते हुए भी बिना घरवाला--“अनिकेत' ही है। ७. भगवानके भक्तका अपने नाम और शरीरमें किंचिन्मात्र भी अभिमान या ममत्व नहीं रहता। इसलिये न तो उसको स्तुतिसे हर्ष होता है और न निन्दासे किसी प्रकारका शोक ही होता है। उसका दोनोंमें ही समभाव रहता है। सर्वत्र भगवदबुद्धि हो जानेके कारण स्तुति करनेवालों और निन्दा करनेवालोंमें भी उसकी जरा भी भेद-बुद्धि नहीं होती। यही उसका निन्दा-स्तुतिको समान समझना है। ८. मनुष्य केवल वाणीसे ही नहीं बोलता, मनसे भी बोलता रहता है। विषयोंका अनवरत चिन्तन ही मनका निरन्तर बोलना है। भक्तका चित्त भगवान्में इतना संलग्न हो जाता है कि उसमें भगवानके सिवा दूसरेकी स्मृति ही नहीं होती, वह सदा-सर्वदा भगवानके ही मननमें लगा रहता है; यही वास्तविक मौन है। बोलना बंद कर दिया जाय और मनसे विषयोंका चिन्तन होता रहे--ऐसा मौन बाह्य मौन है। मनको निर्विषय करने तथा वाणीको परिशुद्ध और संयत बनानेके उद्देश्यसे किया जानेवाला बाह्म मौन भी लाभदायक होता है; परंतु यहाँ भगवान्के प्रिय भक्तके लक्षणोंका वर्णन है, उसकी वाणी तो स्वाभाविक ही परिशुद्ध और संयत है। इससे ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसमें केवल वाणीका ही मौन है; बल्कि उस भक्तकी वाणीसे तो प्राय: निरन्तर भगवान्के नाम और गुणोंका कीर्तन ही हुआ करता है, जिससे जगत्का परम उपकार होता है। इसके सिवा भगवान् अपनी भक्तिका प्रचार भी भक्तोंद्वारा ही करवाया करते हैं। अतः वाणीसे मौन रहनेवाला भगवानका प्रिय भक्त होता है और बोलनेवाला नहीं होता, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। गीताके अठारहवें अध्यायके अड़सठवें और उनहत्तरवें श्लोकोंमें भगवानने गीताके प्रचार करनेवालेको अपना सबसे प्रिय कार्य करनेवाला कहा है, यह महत्कार्य वाणीके मौनीसे नहीं हो सकता। इसके सिवा गीताके सत्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें मानसिक तपके लक्षणोंमें भी 'मौन” शब्द आया है। यदि भगवान्को “मौन” शब्दका अर्थ वाणीका मौन अभीष्ट होता तो वे उसे वाणीके तपके प्रसंगमें कहते; परंतु ऐसा नहीं किया, इससे भी यही सिद्ध है कि मुनिभावका नाम ही मौन है और यह मुनिभाव जिसमें होता है, वह मौनी या मननशील है। वाणीका मौन मनुष्य हठसे भी कर सकता है, इसलिये यह कोई विशेष महत्त्वकी बात भी नहीं है। अतः यहाँ “मौन” शब्दका अर्थ वाणीका मौन न मानकर मनकी मननशीलता ही मानना उचित है। वाणीका संयम तो इसके अन्तर्गत आप ही आ जाता है। ३. भक्त अपने परम इष्ट भगवान्को पाकर सदा ही संतुष्ट रहता है। बाहरी वस्तुओंके आने-जानेसे उसकी तुष्टिमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं पड़ता। प्रारब्धानुसार सुख-दुःखादिके हेतुभूत जो कुछ भी पदार्थ उसे प्राप्त होते हैं, वह उन्हींमें संतुष्ट रहता है। २. भक्तको भगवानके प्रत्यक्ष दर्शन हो जानेके कारण उसके सम्पूर्ण संशय समूल नष्ट हो जाते हैं, उसका निश्चय अटल और निश्चल होता है। अत: वह साधारण मनुष्योंकी भाँति काम, क्रोध, लोभ, मोह या भय आदि विकारोंके वशमें होकर धर्मसे या भगवानके स्वरूपसे कभी विचलित नहीं होता। 3. उपर्युक्त सभी लक्षण भगवद्धक्तोंके हैं तथा सभी शास्त्रानुकूल और श्रेष्ठ हैं, परंतु स्वभाव आदिके भेदसे भक्तोंके भी गुण और आचरणोंमें थोड़ा-बहुत अन्तर रह जाना स्वाभाविक है। सबमें सभी लक्षण एक-से नहीं मिलते। इतना अवश्य है कि समता और शान्ति सभीमें होती हैं तथा राग-द्वेष और हर्ष-शोक आदि विकार किसीमें भी नहीं रहते। इसीलिये इन श्लोकोंमें पुनरक्ति पायी जाती है। विचार कर देखिये तो इन पाँचों विभागोंमें कहीं भावसे और कहीं शब्दोंसे राग-द्वेष और हर्ष'-शोकका अभाव सभीमें मिलता है। पहले विभागमें “अद्वेष्टा' से द्वेषका, “निर्मम: से रागका और 'समदुःखसुख:' से हर्ष'-शोकका अभाव बतलाया गया है। दूसरेमें हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगका अभाव बतलाया है; इससे राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव अपने-आप सिद्ध हो जाता है। तीसरेमें 'अनपेक्ष:” से रागका, “उदासीन:' से द्वेषका और “गतव्यथः' से हर्ष-शोकका अभाव बतलाया है। चौथेमें “न काड्क्षति” से रागका, “न द्वेष्टि' से द्वेषका, “न हृष्यति” तथा “न शोचति' से हर्ष'-शोकका अभाव बतलाया है। इसी प्रकार पाँचवें विभागमें “संगविवर्जित:” तथा “संतुष्ट: से राग-द्वेषका और 'शीतोष्णसुखदु:खेषु समः:” से हर्षशोकका अभाव दिखलाया है। “संतुष्ट: पद भी इस प्रकरणमें दो बार आया है। इससे सिद्ध है कि राग-द्वेष तथा हर्ष-शोकादि विकारोंका अभाव और समता तथा शान्ति तो सभीमें आवश्यक हैं। अन्यान्य लक्षणोंमें स्वभाव-भेदसे कुछ भेद भी रह सकता है। इसी भेदके कारण भगवानने भिन्न-भिन्न श्रेणियोंमें विभक्त करके भक्तोंके लक्षणोंकों यहाँ पाँच बार पृथक्ू-पृथक् बतलाया है; इनमेंसे किसी एक विभागके अनुसार भी सब लक्षण जिसमें पूर्ण हों, वही भगवानका प्रिय भक्त है। इसके सिवा कर्मयोग, भक्तियोग अथवा ज्ञानयोग आदि किसी भी मार्गसे परम सिद्धिको प्राप्त कर लेनेके पश्चात् भी उनकी वास्तविक स्थितिमें या प्राप्त किये हुए परम तत्त्वमें तो कोई अन्तर नहीं रहता; किंतु स्वभावकी भिन्नताके कारण आचरणोंमें कुछ भेद रह सकता है। “सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेज्ञानवानपि” (गीता ३।३३) इस कथनसे भी यही सिद्ध होता है कि सब ज्ञानवानोंके आचरण और स्वभावमें ज्ञानोत्तरकालमें भी भेद रहता है। अहंता, ममता और राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोध आदि अज्ञानजनित विकारोंका अभाव तथा समता और परम शान्ति--ये लक्षण तो सभीमें समानभावसे पाये जाते हैं; किंतु मैत्री और करुणा, ये भक्तिमार्गसे भगवान्को प्राप्त हुए महापुरुषमें विशेषरूपसे रहते हैं। संसार, शरीर और कर्मोंमें उपरामता--यह ज्ञानमार्गसे परम पदको प्राप्त महात्माओंमें विशेषरूपसे रहती है। इसी प्रकार मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए अनासक्तभावसे कर्मोमें तत्पर रहना, यह लक्षण विशेषरूपसे कर्मयोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषोंमें रहता है। गीताके दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे बहत्तरवें श"्लोकतक कितने ही श्लोकोंमें कर्मयोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके तथा चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक ज्ञानयोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त हुए गुणातीत पुरुषके लक्षण बतलाये गये हैं और यहाँ तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक भक्तियोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण हैं। ३. सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् भगवान्के अवतारोंमें, वचनोंमें एवं उनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और चरित्रादिमें जो प्रत्यक्षेके सदृश सम्मानपूर्वक विश्वास रखता हो, वह श्रद्धावान् है। परम प्रेमी और परम दयालु भगवान्को ही परम गति, परम आश्रय एवं अपने प्राणोंके आधार, सर्वस्व मानकर उन्हींपर निर्भर और उनके किये हुए विधानमें प्रसन्न रहनेवालेको भगवत्परायण पुरुष कहते हैं। २. भगवद्धक्तोंके उपर्युक्त लक्षण ही वस्तुत: मानवधर्मका सच्चा स्वरूप है। इन्हींके पालनमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है, क्योंकि इनके पालनसे साधक सदाके लिये मृत्युके पंजेसे छूट जाता है और उसे अमृतस्वरूप भगवानकी प्राप्ति हो जाती है। इसी भावको स्पष्ट समझानेके लिये यहाँ इस लक्षण-समुदायका नाम “धर्ममय अमृत” रखा गया है। 3. जिन सिद्ध भक्तोंको भगवानकी प्राप्ति हो चुकी है, उनमें तो उपर्युक्त लक्षण स्वाभाविक ही रहते हैं; इसलिये उनमें इन गुणोंका होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है; परंतु जिन साधक भक्तोंको भगवानके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हुए हैं, तो भी वे भगवानपर विश्वास करके परम श्रद्धाके साथ तन, मन, धन, सर्वस्व भगवानके अर्पण करके उन्हींके परायण हो जाते हैं तथा भगवानके दर्शनोंके लिये निरन्तर उन्हींका निष्कामभावसे प्रेमपूर्वक चिन्तन करते रहते हैं और सतत चेष्टा करके उपर्युक्त लक्षणोंके अनुसार ही अपना जीवन बिताना चाहते हैं--बिना प्रत्यक्ष दर्शन हुए भी केवल विश्वासपर उनका इतना निर्भर हो जाना विशेष महत्त्वकी बात है। ऐसे प्रेमी भक्तोंको सिद्ध भक्तोंकी अपेक्षा भी 'अतिशय प्रिय” कहना उचित ही है। सप्तत्रिशोड्ध्याय: (श्रीमद्धगवद्गीतायां त्रयोदशो< ध्याय:) ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ष और प्रकृति-पुरुषका वर्णन सम्बन्ध--गीताके बारहवें अध्यायके आरम्भगें अजुनने सगुण और निर्गुणके उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न किया था; उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे *लोकमें संक्षेपमें सगुण उपासकोंकी श्रेष्ताका प्रतिपादन करके तीसरेसे पाँचवें श*लोकतक निर्गुण उपासनाका स्वरूप, उसका फल और देहाभिगानियोंके लिये उसके अनुष्ठानमें कठिनताका निरूपण किया। तदनन्तर छठेसे बीसवें *लोकतक सगुण उपासनाका गहत्त्व, फल; प्रकार और भगवद्धक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते-करते ही अध्यायकी समाप्ति हो गयी; निर्गुणका तत्व. महिमा और उसकी प्राप्तिके साधनोंको विस्तारपूर्वक नहीं समझाया गया। अतएव निर्गुण-नियाकारका तत्त्व अर्थात् ज्ञानयोगका विषय भलीभाँति समझानेके लिये तेरहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले भगवान क्षेत्र (शरीर) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा)- के लक्षण बतलाते हैं-- श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद् यो वेत्ति त॑ प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद:,श्रीभगवान् बोले--हे अर्जुन! यह शरीर “क्षेत्र'* इस नामसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको कक्षेत्रज्ञ* इस नामसे उनके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन कहते हैं
Disse o Senhor Bem-aventurado: “Ó filho de Kuntī, este corpo é chamado o ‘campo’ (kṣetra). Aquele que conhece este campo—o conhecedor consciente no íntimo—é chamado o ‘conhecedor do campo’ (kṣetrajña), dizem os que compreendem a realidade.”
Verse 2
१५) “जो गौओंका दूध दुहते समय
“E sabe também, ó Bhārata, que Eu sou o ‘conhecedor do campo’ (kṣetrajña) em todos os campos. O verdadeiro conhecimento é o discernimento claro do Campo e do Conhecedor do Campo—assim é o Meu ensinamento estabelecido.”
Verse 3
सम्बन्ध--क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर संसारभ्रमका नाश हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति होती है
Disse Arjuna: “Dize-me, em resumo, o que é o ‘campo’ (kṣetra)—o que ele é e como é; que transformações sofre; de que causa surge; e também quem é o ‘conhecedor do campo’ (kṣetrajña) e que poder ou influência pertence a esse conhecedor.”
Verse 4
सम्बन्ध-- तीसरे शलोकमें क्षेत्र" और क#क्षेत्रज्ञ” के जिस तत्त्वको संक्षेपर्में सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनये कहा है--अब उसके विषयमें ऋषि
Disse Arjuna: “Esta verdade foi cantada de muitas maneiras pelos rishis, exposta separadamente em diversos metros védicos, e também estabelecida pelos aforismos dos Brahma-sūtras—bem fundamentados e firmemente concluídos.”
Verse 5
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वाराः बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्रारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है ।।
Disse Arjuna: “Os constituintes da existência encarnada devem ser compreendidos assim: os cinco grandes elementos; o senso de ego (ahaṃkāra); o intelecto (buddhi); e a fonte não manifesta (avyakta, a natureza primordial). Junto a isso estão os dez sentidos, a mente una, e os cinco campos da experiência sensorial—som, tato, forma, sabor e cheiro.”
Verse 6
इच्छा द्वेष: सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृति: । एतत् क्षेत्र समासेन सविकारमुदाह्तम्
Disse Arjuna: “Desejo e aversão, prazer e dor, o corpo composto, a consciência (chetanā) e a firmeza (dhṛti)—isto, em resumo, é declarado ser o ‘campo’ (kṣetra), juntamente com as suas modificações.”
Verse 7
सम्बन्ध-- इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है
Disse Arjuna: “O serviço reverente ao mestre (ācārya-upāsana), a pureza (externa e interna), a firmeza da mente e o autodomínio—juntamente com a humildade (livre de autoimportância), a ausência de fingimento, a não violência para com qualquer ser, a paciência e a retidão—essas são as disciplinas que conduzem ao verdadeiro conhecimento.”
Verse 8
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार4“5 एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदु:ःखदोषानुदर्शनम्
Arjuna disse: O desapego aos objetos dos sentidos e a liberdade do egoísmo; e a contemplação clara e constante dos defeitos inerentes ao sofrimento — nascimento, morte, velhice e doença. Essas disposições são apresentadas como sinais do verdadeiro discernimento, afastando a mente do prazer fugaz e voltando-a para o que é duradouro e eticamente elevado.
Verse 9
इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव
A ausência de apego a todos os gozos deste mundo e do outro, e a ausência também de egoísmo; a reflexão repetida sobre a dor e os defeitos no nascimento, na morte, na velhice e na doença. Não se prender nem se apegar possessivamente a filhos, cônjuge, casa e bens; e manter sempre a mente equânime quando surgem resultados agradáveis ou desagradáveis — isto é tido como sinal de disciplina interior. Eticamente, aponta para viver no mundo sem ser governado pela posse, pela preferência ou pela aversão, para que o dever seja cumprido sem perturbação íntima.
Verse 10
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदिरें ५
Arjuna disse: “Devoção inabalável a mim por meio do yoga exclusivo; inclinação a habitar lugares retirados e puros; e falta de apreço pela companhia e pelas assembleias de pessoas absorvidas em objetos mundanos — estes são os sinais de uma mente voltada para o Supremo.”
Verse 11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतऊउज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोडन्यथा
Arjuna disse: “A constância firme no conhecimento espiritual e a visão que percebe a Realidade Suprema como o próprio sentido e objetivo do verdadeiro conhecimento — isto é declarado ‘conhecimento’. O que for contrário a isso é chamado ‘ignorância’.”
Verse 12
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या और योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्
Arjuna disse: “Agora declararei com clareza aquilo que deve ser conhecido — conhecendo-o, a pessoa alcança a imortalidade. É o Brahman supremo, sem começo; é descrito como nem ‘ser’ (sat) nem ‘não-ser’ (asat).”
Verse 13
सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतो$क्षिशिरोमुखम् । सर्वतः:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति
Arjuna disse: Esse Ser tem mãos e pés por todos os lados; olhos, cabeças e faces por todos os lados; e ouvidos em toda parte. Envolvendo tudo no mundo, Ele permanece, pervadindo todas as coisas.
Verse 14
सर्वेन्द्रियगुणा भासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त्ू च
Arjuna disse: Ele parece possuir as qualidades de todos os sentidos, e contudo, em verdade, está desprovido de todos os sentidos. Embora desapegado, sustenta e ampara todos os seres; embora além dos guṇas, é também o experimentador dos guṇas.
Verse 15
बहिरन्तश्न भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्
Arjuna disse: Ele permeia todos os seres, por fora e por dentro; é o imóvel e também o móvel. Por ser extremamente sutil, é difícil de apreender pela percepção comum; e, no entanto, essa mesma Realidade parece estar distante e também ser a presença mais próxima.
Verse 16
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्त च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च
Arjuna disse: Essa Realidade deve ser conhecida como una e indivisa, e contudo parece como se estivesse dividida entre todos os seres. Ela é a sustentadora das criaturas; e é também o poder que as reabsorve em si e o poder que as faz surgir.
Verse 17
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस:* परमुच्यते । ज्ञान॑ ज्ञेयं? ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विछ्ठितम्
Arjuna disse: Essa Realidade é chamada a Luz até mesmo de todas as luzes, e é declarada além das trevas. Ela é o próprio conhecimento, o que deve ser conhecido, e aquilo que é alcançado pelo verdadeiro conhecimento; ela habita, de modo especial, no coração de todo ser.
Verse 18
इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्ते समासत: । मद्धभधक्त एतद् विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते
Assim, em resumo, foram explicados o campo (a condição encarnada), o conhecimento e a Realidade Suprema a ser conhecida. Aquele que me é devoto, discernindo verdadeiramente este ensinamento, alcança o meu próprio estado — união com o meu Ser.
Verse 19
सम्बन्ध--इस अध्यायके तीसरे शलोकमें भगवानने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रञके विषयमें दो बातें संक्षेपें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था
Disse Arjuna: Sabe que tanto Prakriti (a natureza material) quanto Purusha (o princípio consciente) são ambos sem começo. E sabe também que todas as modificações e as três qualidades (gunas) surgem de Prakriti. No quadro ético do ensinamento da Gītā, essa distinção esclarece o que pertence à natureza mutável e o que diz respeito ao eu testemunha—guiando para a responsabilidade sem confusão e para a libertação sem escapismo.
Verse 36
भीष्मपर्वमें छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Assim termina o trigésimo sexto capítulo no Bhīṣma Parva.
Verse 44
ऑपन--माजल बछ। अि--छकऋाझ ३. 'त्वाम” पद यद्यपि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णका वाचक है
Disse Arjuna: Mas aqueles que, dedicando todas as ações a Mim e tendo-Me como objetivo supremo, Me adoram—meditando em Mim com yoga de mente única, sem outro objeto—qual é a sua condição?
He asks how to classify the commitment (niṣṭhā/śraddhā) of practitioners who worship with sincerity while disregarding prescribed scriptural method, and whether that commitment corresponds to sattva, rajas, or tamas.
Human practice is best evaluated by inner orientation shaped by the guṇas: disciplined action aligned with clarity and non-reward-seeking is distinguished from action driven by display, craving, or inertia, even when outwardly similar.
Yes: it states that offerings, gifts, austerities, and deeds performed without śraddhā are designated “asat” and are described as lacking enduring efficacy both in immediate terms and in posthumous valuation.
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