Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka
Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable
अपने-आप बछ। अर 3. संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं, उन सबमें समग्ररूप भगवान् पुरुषोत्तमके तत्त्व, प्रेम, गुण, प्रभाव, विभूति और महत्त्व आदिके साथ उनकी शरणागतिका स्वरूप सबसे बढ़कर गुप्त रखनेयोग्य है, यही भाव दिखलानेके लिये इसे “गुह्तम” कहा गया है। ४. गुणवानोंके गुणोंको न मानना, गुणोंमें दोष देखना, उनकी निन््दा करना एवं उनपर मिथ्या दोषोंका आरोपण करना 'असूया' है। जिसमें स्वभावसे ही यह “असूया' दोष बिलकुल ही नहीं होता, उसे “अनसूयु” कहते हैं। ३. इस श्लोकमें “अशुभ” शब्द समस्त दु:खोंका, उनके हेतुभूत कर्मोंका, दुर्गुणोंका, जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनका और इन सबके कारणरूप अज्ञानका वाचक है। इन सबसे सदाके लिये सम्पूर्णतया छूट जाना और परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाना ही “अशुभसे मुक्त' होना है। २. संसारमें जितनी भी ज्ञात और अज्ञात विद्याएँ हैं, यह उन सबमें बढ़कर है; जिसने इस विद्याका यथार्थ अनुभव कर लिया है उसके लिये फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसे “राजविद्या” कहा गया है। ३. इसमें भगवान्के सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार स्वरूपके तत्त्वका, उनके गुण, प्रभाव और महत्त्वका, उनकी उपासना-विधिका और उसके फलका भलीभाँति निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवानने अपना समस्त रहस्य खोलकर यह तत्त्व समझा दिया है कि मैं जो श्रीकृष्णरूपमें तुम्हारे सामने विराजित हूँ, इस समस्त जगत्का कर्ता, हर्ता, सबका आधार, सर्वशक्तिमान्, परब्रह्म परमेश्वर और साक्षात् पुरुषोत्तम हूँ। तुम सब प्रकारसे मेरी शरण आ जाओ। इस प्रकारके परम गोपनीय रहस्यकी बात अर्जुन-जैसे दोषदृष्टिहीन परम श्रद्धावान् भक्तके सामने ही कही जा सकती है, हरेकके सामने नहीं। इसीलिये इसे “राजगुह्' बतलाया गया है। ४. यह उपदेश इतना पावन करनेवाला है कि जो कोई भी इसका श्रद्धापूर्वक श्रवण-मनन और इसके अनुसार आचरण करता है, यह उसके समस्त पापों और अवगुणोंका समूल नाश करके उसे सदाके लिये परम विशुद्ध बना देता है। इसीलिये इसे “पवित्र' कहा गया है। ५, विज्ञानसहित इस ज्ञानका फल श्राद्धादि कर्मोंकी भाँति अदृष्ट नहीं है। साधक ज्यों-ज्यों इसकी ओर आगे बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसके दुर्गुणों, दुराचारों और दु:ःखोंका नाश होकर, उसे परम शान्ति और परम सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है; जिसको इसकी पूर्णरूपसे उपलब्धि हो जाती है, वह तो तुरंत ही परम सुख और परम शान्तिके समुद्र, परम प्रेमी, परम दयालु और सबके सुहृद, साक्षात् भगवान्को ही प्राप्त हो जाता है। इसीलिये यह 'प्रत्यक्षावगम” है। ६. जैसे सकामकर्म अपना फल देकर समाप्त हो जाता है और जैसे सांसारिक विद्या एक बार पढ़ लेनेके बाद, यदि उसका बार-बार अभ्यास न किया जाय तो नष्ट हो जाती है--भगवान्का यह ज्ञान-विज्ञान वैसे नष्ट नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त इसका फल भी अविनाशी है; इसलिये इसे “अव्यय' कहा गया है। ७. इसमें न तो किसी प्रकारके बाहरी आयोजनकी आवश्यकता है और न कोई आयास ही करना पड़ता है। सिद्ध होनेके बादकी बात तो दूर रही, साधनके आरम्भसे ही इसमें साधकोंको शान्ति और सुखका अनुभव होने लगता है। इसलिये इसे साधन करनेमें बड़ा सुगम बतलाया है। ८. पिछले श्लोकमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानका माहात्म्य बतलाया गया है और इसके आगे पूरे अध्यायमें जिसका वर्णन है, उसीका वाचक यहाँ “अस्य” विशेषणके सहित *धर्मस्य” पद है। इस प्रसंगमें वर्णन किये हुए भगवान्के स्वरूप, प्रभाव, गुण और महत्त्वको, उनकी प्राप्तिके उपायको और उसके फलको सत्य न मानकर उसमें असम्भावना और विपरीत भावना करना और उसे केवल रोचक उक्ति समझना आदि जो विश्वासविरोधिनी भावनाएँ हैं--ये जिनमें हों, वे ही श्रद्धारहित पुरुष हैं। ३. गीताके आठवें अध्यायके चौथे श्लोकमें जिसे “अधियज्ञ', आठवें और दसवें श्लोकोंमें “परम दिव्यपुरुष', नवें श्लोकमें “कवि” “पुराण” आदि, बीसवें और इक्कीसवें श्लोकोंमें “अव्यक्त अक्षर” और बाईसवें श्लोकमें भक्तिद्वारा प्राप्त होनेयोग्य “परम पुरुष” बतलाया है, उसी सर्वव्यापी सगुण-निराकार स्वरूपके लक्ष्यसे यहाँ “अव्यक्तमूर्तिना' पदका प्रयोग हुआ है। २, “यह सब जगत' से यहाँ सम्पूर्ण जड-चेतन पदार्थोंके सहित समस्त ब्रह्माण्ड समझना चाहिये। ३. जैसे आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, सुवर्णसे गहने और मिट्टीसे उसके बने हुए बर्तन व्याप्त रहते हैं, उसी प्रकार यह सारा विश्व इसकी रचना करनेवाले सगुण परमेश्वरके निराकाररूपसे व्याप्त है। श्रुति कहती है-- ईशावास्यमिद सर्व यत्किज्च जगत्यां जगत् । . (ईशोपनिषद् १) “इस संसारमें जो कुछ जड-चेतन पदार्थसमुदाय है, वह सब ईश्वरसे व्याप्त है।' ४. 'यहाँ सब भूत” से समस्त शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा उनके विषय और वासस्थानोंके सहित समस्त चराचर प्राणियोंको कहा गया है। भगवान् ही अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके समस्त जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते हैं; उन्होंने ही इस समस्त जगतको अपने किसी अंशमें धारण कर रखा है (गीता १०।४२) और एकमात्र वे ही सबके गति भर्ता, निवासस्थान, आश्रय, प्रभव, प्रलय, स्थान और निधान हैं (गीता ९।१८)। इस प्रकार सबकी स्थिति भगवानके अधीन है। इसीलिये सब भूतोंको भगवान्में स्थित बतलाया गया है। ५. बादलोंमें आकाशकी भाँति समस्त जगत्के अंदर अणु-अणुमें व्याप्त होनेपर भी भगवान् उससे सर्वथा अतीत और सम्बन्धरहित हैं। समस्त जगत्का नाश होनेपर भी, बादलोंके नाश होनेपर आकाशकी भाँति, भगवान् ज्यों-के-त्यों रहते हैं। जगतके नाशसे भगवानका नाश नहीं होता तथा जिस जगह इस जगत्की गन्ध भी नहीं है, वहाँ भी भगवान् अपनी महिमामें स्थित ही हैं। यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने यह बात कही है कि वास्तवमें मैं उन भूतोंमें स्थित नहीं हूँ। अर्थात्र मैं अपने-आपमें ही नित्य स्थित हूँ। ६. सबके उत्पादक और सबमें व्याप्त रहते हुए तथा सबका धारण-पोषण करते हुए भी सबसे सर्वथा निर्लिप्त रहनेकी जो अद्भुत प्रभावमयी शक्ति है, जो ईश्वरके अतिरिक्त अन्य किसीमें हो ही नहीं सकती, उसीका यहाँ 'ऐश्वरम, योगम्” इन पदोंद्वारा प्रतिपादन किया गया है। इन दो श्लोकोंमें कही हुई सभी बातोंको लक्ष्यमें रखकर भगवानने अर्जुनको अपना “ईश्वरीय योग” देखनेके लिये कहा है। ७. यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि “अर्जुन! तुम मेरी असाधारण योगशक्तिका चमत्कार देखो! यह कैसा आश्चर्य है कि आकाशमें बादलोंकी भाँति समस्त जगत् मुझमें स्थित भी है और नहीं भी है। बादलोंका आधार आकाश है, परंतु बादल उसमें सदा नहीं रहते। वस्तुत: अनित्य होनेके कारण उनकी स्थिर सत्ता भी नहीं है। अतः वे आकाशमें नहीं हैं। इसी प्रकार यह सारा जगत् मेरी ही योगशक्तिसे उत्पन्न है और मैं ही इसका आधार हूँ, इसलिये तो सब भूत मुझमें स्थित हैं; परंतु ऐसा होते हुए भी मैं इनसे सर्वथा अतीत हूँ, ये मुझमें सदा नहीं रहते, इसलिये ये मुझमें स्थित नहीं हैं। अतएव जबतक मनुष्यकी दृष्टिमें जगत् है, तबतक सब कुछ मुझमें ही है; मेरे सिवा इस जगत्का कोई दूसरा आधार है ही नहीं। जब मेरा साक्षात् हो जाता है, तब उसकी दृष्टिमें मुझसे भिन्न कोई वस्तु रह नहीं जाती, उस समय मुझमें यह जगत् नहीं है।' ८. वास्तवमें भगवान् इस समस्त जगत््से अतीत हैं, यही भाव दिखलानेके लिये “वह भूतोंमें स्थित नहीं है” ऐसा कहा गया है। ३. आकाशकी भाँति भगवान्को सम, निराकार, अकर्ता, अनन्त, असंग और निर्विकार तथा वायुकी भाँति समस्त चराचर भूतोंकों भगवानसे ही उत्पन्न, उन्हींमें स्थित और उन्हींमें लीन होनेवाले बतलानेके लिये ऐसा कहा गया है। जैसे वायुकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आकाशमें ही होनेके कारण वह कभी किसी भी अवस्थामें आकाशसे अलग नहीं रह सकता, सदा ही आकाशमें स्थित रहता है एवं ऐसा होनेपर भी आकाशका वायुसे और उसके गमनादि विकारोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, वह सदा ही उससे अतीत है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और लय भगवानके संकल्पके आधार होनेके कारण समस्त भूतसमुदाय सदा भगवानू्में ही स्थित रहता है; तथापि भगवान् उन भूतोंसे सर्वथा अतीत हैं और भगवानमें सदा ही, सब प्रकारके विकारोंका सर्वथा अभाव है। २. शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, समस्त भोगवस्तु और वासस्थानके सहित चराचर प्राणियोंका वाचक 'सर्वभूतानि” पद है। 3. ब्रह्माके एक दिनको “कल्प” कहते हैं और उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। इस अहोरात्रके हिसाबसे जब ब्रह्माके सौ वर्ष पूरे होकर ब्रह्माकी आयु समाप्त हो जाती है, उस कालका वाचक यहाँ “कल्पक्षय' है; वही कल्पोंका अन्त है। इसीको “महाप्रलय” भी कहते हैं। ४. समस्त जगत्की कारणभूता जो मूल-प्रकृति है, जिसे गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें “महदद्ह्म' कहा है तथा जिसे अव्याकृत और प्रधान भी कहते हैं, उसका वाचक यहाँ “प्रकृति” शब्द है। वह प्रकृति भगवान्की शक्ति है, इसी बातको दिखलानेके लिये भगवानने उसको अपनी प्रकृति बतलाया है। कल्पोंके अन्तमें समस्त शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, भोगसामग्री और लोकोंके सहित समस्त प्राणियोंका प्रकृतिमें लय हो जाना--अर्थात् उनके गुणकर्मोंके संस्कारसमुदायरूप कारणशरीरसहित उनका मूल-प्रकृतिमें विलीन हो जाना ही “सब भूतोंका प्रकृतिको प्राप्त होना” है। ५. कल्पोंका अन्त होनेके बाद यानी ब्रह्माके सौ वर्षके बराबर समय पूरा होनेपर जब पुनः जीवोंके कर्मोंका फल भुगतानेके लिये जगत्का विस्तार करनेकी भगवान्में स्फुरणा होती है, उस कालका वाचक “कल्पादि' शब्द है। इसे महासर्गका आदि भी कहते हैं। उस समय जो भगवान्का सब भूतोंकी उत्पत्तिके लिये अपने संकल्पके द्वारा हिरण्यगर्भ ब्रह्माको उनके लोकसहित उत्पन्न कर देना है, यही उनका सब भूतोंको रचना है। ६. सृष्टिरचनादि कार्यके लिये भगवानका जो शक्तिरूपसे अपने अंदर स्थित प्रकृतिको स्मरण करना है, वही उसे अंगीकार करना है। ७. भिन्न-भिन्न प्राणियोंका जो अपने-अपने गुण और कर्मोंके अनुसार बना हुआ स्वभाव है, वही उनकी प्रकृति है। भगवानकी प्रकृति समष्टि-प्रकृति है और जीवोंकी प्रकृति उसीकी एक अंशभूता व्यष्टि-प्रकृति है। उस व्यष्टि-प्रकृतिके बन्धनमें पड़े रहना ही उसके बलसे परतन्त्र होना है। यहाँ भगवानने उनको बार-बार रचनेकी बात कहकर यह बात दिखलायी है कि जबतक जीव अपनी उस प्रकृतिके वशमें रहते हैं, तबतक मैं उनको बार-बार इसी प्रकार प्रत्येक कल्पके आदिदमें उनके भिन्न-भिन्न गुणकर्मोंके अनुसार नाना योनियोंमें उत्पन्न करता रहता हूँ। ३. सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार आदिके निमित्त भगवानके द्वारा जितने भी कर्म होते हैं, उन कर्मोंमें या उनके फलमें भगवान्का किसी प्रकार भी आसक्त न होना--'आसक्तिरहित रहना' है और केवल अध्यक्षता-मात्रसे प्रकृतिद्वारा प्राणियोंके गुण-कर्मानुसार उनकी उत्पत्ति आदिके लिये की जानेवाली चेष्टामें कर्तृत्वाभिमानसे तथा पक्षपातसे रहित होकर निर्लिप्त रहना--“उन कर्मोंमें उदासीनके सदृश स्थित रहना” है। इसी कारण वे कर्म भगवान्को नहीं बाँधते। २. जिस प्रकार किसान अपनी अध्यक्षतामें पृथ्वीके साथ स्वयं बीजका सम्बन्ध कर देता है, फिर पृथ्वी उन बीजोंके अनुसार भिन्न-भिन्न पौधोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार भगवान् अपनी अध्यक्षतामें चेतनसमूहरूप बीचका प्रकृतिरूपी भूमिके साथ सम्बन्ध कर देते हैं (गीता १४॥३)। इस प्रकार जड-चेतनका संयोग कर दिये जानेपर यह प्रकृति समस्त चराचर जगत्को कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न कर देती है। जहाँ भगवानने अपनेको जगत्का रचयिता बतलाया है, वहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि वस्तुतः भगवान् स्वयं कुछ नहीं करते, वे अपनी शक्ति प्रकृतिको स्वीकार करके उसीके द्वारा जगत्॒की रचना करते हैं और जहाँ प्रकृतिको सृष्टि-रचनादि कार्य करनेवाली कहा गया है, वहाँ उसीके साथ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि भगवान्की अध्यक्षतामें उनसे सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति सब कुछ करती है। जबतक उसे भगवान्का सहारा नहीं मिलता, तबतक वह जड- प्रकृति कुछ भी नहीं कर सकती। इसीलिये भगवानने आठवें श्लोकमें यह कहा है कि “मैं अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके जगतकी रचना करता हूँ” और इस श्लोकमें यह कहते हैं कि “मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति जगत्की रचना करती है।” वस्तुतः दो तरहकी युक्तियोंसे एक ही तत्त्व समझाया गया है। 3. गीताके सोलहवें अध्यायके चौथे तथा सातवेंसे बीसवें श्लोकतक जिनके विविध लक्षण बतलाये गये हैं, ऐसे ही आसुरी सम्पदावाले मनुष्योंके लिये “मूढा:” पदका प्रयोग हुआ है। ४. चौथेसे छठे श्लोकतक भगवान्के जिस 'सर्वव्यापकत्व” आदि प्रभावका वर्णन किया गया है, जिसको 'ऐश्वर योग” कहा है तथा गीताके सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जिस “परमभाव” को न जाननेकी बात कही है, भगवानके उस सर्वोतम प्रभावका ही वाचक यहाँ “परम” विशेषणके सहित “भाव” शब्द है। सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सबके हर्ता-कर्ता परमेश्वर ही सब जीवोंपर अनुग्रह करके सबको अपनी शरण प्रदान करने और धर्म-संस्थापन, भक्त- उद्धार आदि अनेकों लीला-कार्य करनेके लिये अपनी योगमायासे मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं (गीता ४।६, ७, ८)--इस रहस्यको न समझना और इसपर विश्वास न करना ही उस परम भावको न जानना है। ३. महाभारतमें भीष्मपर्वके छाछठवें अध्यायमें बतलाया है-- “सब लोकोंके महान् ईश्वर भगवान् वासुदेव सबके पूजनीय हैं। उन महान् वीर्यवान् शंख-चक्र-गदाधारी वासुदेवको मनुष्य समझकर कभी उनकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये। वे ही परम गुह्यू, परम पद, परम ब्रह्म और परम यश:स्वरूप हैं। वे ही अक्षर हैं, अव्यक्त हैं, सनातन हैं, परम तेज हैं, परम सुख हैं और परम सत्य हैं। देवता, इन्द्र और मनुष्य, किसीको भी उन अमित-पराक्रमी प्रभु वासुदेवको मनुष्य मानकर उनका अनादर नहीं करना चाहिये। जो मूढमति लोग उन हृषीकेशको मनुष्य बतलाते हैं, वे नराधम हैं। जो मनुष्य इन महात्मा योगेश्वरको मनुष्यदेहधारी मानकर इनका अनादर करते हैं और जो इन चराचरके आत्मा श्रीवत्सके चिह्नवाले महान् तेजस्वी पद्मनाथ भगवान्को नहीं पहचानते वे तामसी प्रकृतिसे युक्त हैं। जो इन कौस्तुभ-किरीटधारी और मित्रोंकोी अभय करनेवाले भगवान्का अपमान करता है, वह अत्यन्त भयानक नरकमें पड़ता है।' २. भगवानके प्रभावको न जाननेवाले आसुर मनुष्य ऐसी निरर्थक आशाएँ करते रहते हैं, जो कभी पूर्ण नहीं होतीं (गीता १६।१० से १२); इसीलिये उनको “मोघाशा:” कहते हैं। ३. भगवान् और शास्त्रोंपर विश्वास न करनेवाले विषयी पामर लोग शास्त्रविधिका त्याग करके अअश्रद्धापूर्वक जो मनमाने यज्ञादि कर्म करते हैं, उन कर्मोंका उन्हें इस लोक या परलोकमें कुछ भी फल नहीं मिलता (गीता १६।१७, २३; १७।२८)। इसीलिये उनको “मोघकर्माण:” कहा गया है। ५. राक्षसोंकी भाँति बिना ही कारण द्वेष करके जो दूसरोंके अनिष्ट करनेका और उन्हें कष्ट पहुँचानेका स्वभाव है, उसे 'राक्षसी प्रकृति” कहते हैं। काम और लोभके वश होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये दूसरोंको क्लेश पहुँचाने और उनके स्वत्वहरण करनेका जो स्वभाव है, उसे “आसुरी प्रकृति” कहते हैं और प्रमाद या मोहके कारण किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेका जो स्वभाव है, उसे “मोहिनी प्रकृति” कहते हैं। ऐसे दुष्ट स्वभावका त्याग करनेके लिये चेष्टा न करना, वरं उसीको उत्तम समझकर पकड़े रहना ही 'उसे धारण करना” है। भगवानके प्रभावको न जाननेवाले मनुष्य प्राय: ऐसा ही करते हैं, इसीलिये उनको उक्त प्रकृतियोंके आश्रित बतलाया है। ६. यहाँ “महात्मान:” पदका प्रयोग उन निष्काम अनन्यप्रेमी भगवद्धक्तोंक लिये किया गया है, जो भगवत्सेममें सदा सराबोर रहते हैं और भगवत्प्राप्तिके सर्वथा योग्य हैं। ७, देव अर्थात् भगवानसे सम्बन्ध रखनेवाले और उनकी प्राप्ति करा देनेवाले जो सात््विक गुण और आचरण हैं, गीताके सोलहवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे "्लोकतक जिनका अभय आदि छब्बीस नामोंसे वर्णन किया गया है, उन सबको भलीभाँति धारण कर लेना ही *दैवी प्रकृतिके आश्रित होना' है। ८. 'माम” पद यहाँ भगवानके सगुण पुरुषोत्तमरूपका वाचक है। उस सगुण परमेश्वरसे ही शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, भोगसामग्री और सम्पूर्ण लोकोंके सहित समस्त चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार होता है (गीता ७६; ९। १८; १०।२, ४, ५, ६, ८)--इस तत्त्वको सम्यक् प्रकारसे समझ लेना ही भगवान्को “सब भूतोंका आदि” समझना है और वे भगवान् अजन्मा तथा अविनाशी हैं, केवल लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही लीलासे मनुष्य आदि रूपमें प्रकट और अन्तर्धान होते हैं; उन््हींको अक्षर, अविनाशी परब्रह्म परमात्मा कहते हैं और समस्त भूतोंका नाश होनेपर भी भगवान्का नाश नहीं होता (गीता ८।२०)--इस बातको यथार्थतः समझना ही “भगवान्को अविनाशी समझना है। ९, जिनका मन भगवान्के सिवा अन्य किसी भी वस्तुमें नहीं रमता और क्षणमात्रका भी भगवान्का वियोग जिनको असहा प्रतीत होता है, ऐसे भगवानके अनन्यप्रेमी भक्त निरन्तर भगवानको भजते रहते हैं। ३. 'सततम” पद यहाँ “नित्य-निरन्तरर समयका वाचक है और इसका खास सम्बन्ध उपासनाके साथ है। कीर्तन- नमस्कारादि सब उपासनाके ही अंग होनेके कारण प्रकारान्तरसे उन सबके साथ भी इसका सम्बन्ध है। अभिप्राय यह है कि भगवानके प्रेमी भक्त कभी कीर्तन करते हुए, कभी नमस्कार करते हुए, कभी सेवा आदि प्रयत्न करते हुए तथा सदा- सर्वदा भगवान्का चिन्तन करते हुए निरन्तर उनकी उपासना करते रहते हैं। २. 'यतन्तः:” पदका यह भाव है कि वे प्रेमी भक्त भगवान्की पूजा सबको भगवान्का स्वरूप समझकर उनकी सेवा और भगवानके भक्तोंद्वारा भगवानके गुण, प्रभाव और चरित्र आदिका श्रवण आदि उत्साह और तत्परताके साथ करते रहते हैं। 3. भगवानके प्रेमी भक्तोंका निश्चय, उनकी श्रद्धा, उनके विचार और नियम--सभी अत्यन्त दृढ़ होते हैं। बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों और प्रबल विघ्नोंके समूह भी उन्हें अपने साधन और विचारसे विचलित नहीं कर सकते। इसीलिये उनको “दृढव्रता:' (दृढ निश्चयवाले) कहा गया है। ४. जो चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते और सब कुछ करते समय तथा एकान्तमें ध्यान करते समय नित्य- निरन्तर भगवानका चिन्तन करते रहते हैं, उन्हें 'नित्ययुक्ता:' कहते हैं। ५. कथा, व्याख्यान आदिके द्वारा भक्तोंके सामने भगवानके गुण, प्रभाव, महिमा और चरित्र आदिका वर्णन करना; अकेले अथवा दूसरे बहुत-से लोगोंके साथ मिलकर, भगवान्कों अपने सम्मुख समझते हुए उनके पवित्र नामोंका जप अथवा उच्चस्वरसे कीर्तन करना और दिव्य स्तोत्र तथा सुन्दर पदोंके द्वारा भगवान्की स्तुति-प्रार्थाा करना आदि भगवन्नाम गुणगानसम्बन्धी सभी चेष्टाएँ कीर्तनके अन्तर्गत हैं। ६. भगवानके मन्दिरोंमें जाकर अर्चा-विग्रहरूप भगवान्को, अपने घरमें भगवान्की प्रतिमा या चित्रपटको, भगवानके नामोंको, भगवानके चरण और चरण-पादुकाओंको एवं सबको भगवान्का स्वरूप समझकर या सबके हृदयमें भगवान् विराजित हैं--ऐसा जानकर सम्पूर्ण प्राणियोंको यथायोग्य विनयपूर्वक श्रद्धा-भक्तिके साथ गदगद होकर मन, वाणी और शरीरके द्वारा नमस्कार करना--यही “भगवानको प्रणाम करना' है। ७, श्रद्धा और अनन्यप्रेमके साथ उपर्युक्त साधनोंको निरन्तर करते रहना ही अनन्यप्रेमसे भगवान्की उपासना करना है। ८. गीताके तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिस 'ज्ञानयोग” का वर्णन है, यहाँ भी 'ज्ञानयज्ञ" का वही स्वरूप है। उसके अनुसार शरीर, इन्द्रिय और मनद्वारा होनेवाले समस्त कर्मोंमें, मायामय गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं--ऐसा समझकर कर्तापनके अभिमानसे रहित रहना; सम्पूर्ण दृश्यवर्गको मृगतृष्णाके जलके सदृश या स्वप्नके संसारके समान अनित्य समझना तथा एक सच्चिदानन्दघन निर्गुण-निराकार परब्रह्म परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसीकी भी सत्ता न मानकर निरन्तर उसीका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करते हुए उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें नित्य अभिन्नभावसे स्थित रहनेका अभ्यास करते रहना--यही 'ज्ञानयज्ञके द्वारा पूजन करते हुए उसकी उपासना करना है। ९, समस्त विश्व उस भगवानूसे ही उत्पन्न हुआ है और भगवान् ही इसमें व्याप्त हैं। अतः भगवान् स्वयं ही विश्वरूपमें स्थित हैं। इसलिये चन्द्र, सूर्य, अग्नि, इन्द्र और वरुण आदि विभिन्न देवता तथा और भी समस्त प्राणी भगवानके ही स्वरूप हैं--ऐसा समझकर जो उन सबकी अपने कर्मोंद्वारा यथायोग्य निष्कामभावसे सेवा-पूजा करना है (गीता १८।४६) --यही “बहुत प्रकारसे स्थित भगवान्के विराट्स्वरूपकी पृथग्भावसे उपासना करना है। ३. श्रौत कर्मको “क्रतु” कहते हैं। २. पंचमहायज्ञादि स्मार्त कर्म “यज्ञ" कहलाते हैं। 3. पितरोंके निमित्त प्रदान किया जानेवाला अन्न 'स्वधा' कहलाता है। ४. “अग्नि! से यहाँ गार्हपत्य आहवनीय और दक्षिणाग्नि आदि सभी प्रकारके अग्नि समझने चाहिये। ५. अभिप्राय यह कि यज्ञ, श्राद्ध आदि शास्त्रीय शुभकर्ममें प्रयोजनीय समस्त वस्तुएँ, तत्सम्बन्धी मन्त्र, जिनमें यज्ञादि किये जाते हैं, वे अधिष्ठान तथा मन, वाणी, शरीरसे होनेवाली तद्विषयक समस्त चेष्टाएँ--से सब भगवान्के ही स्वरूप हैं। ६. यह चराचर प्राणियोंके सहित समस्त विश्व भगवान्से ही उत्पन्न हुआ है, भगवान् ही इसके महाकारण हैं। इसलिये भगवानने अपनेको इसका पिता-माता कहा है। ७. जिन ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंसे सृष्टिकी रचना होती है, उनको भी उत्पन्न करनेवाले भगवान् ही हैं; इसीलिये उन्होंने अपनेको इसका 'पितामह” बतलाया है। ८. जो स्वयं विशुद्ध हो और सहज ही दूसरोंके पापोंका नाश करके उन्हें भी विशुद्ध बना दे, उसे “पवित्र” कहते हैं। भगवान् परम पवित्र हैं तथा भगवानके दर्शन, भाषण और स्मरणसे मनुष्य परम पवित्र हो जाते हैं। ९. “३०” भगवानका नाम है, इसीको प्रणव भी कहते हैं। गीताके आठवें अध्यायके तेरहवें श्लोकमें इसे ब्रह्म बतलाया है तथा इसीका उच्चारण करनेके लिये कहा गया है। यहाँ नाम तथा नामीका अभेद प्रतिपादन करनेके लिये ही भगवानने अपनेको ओंकार बतलाया है। ३०. “ऋक्', 'साम” और “यजु:'--ये तीनों पद तीनों वेदोंके वाचक हैं। वेदोंका प्राकट्य भगवानसे हुआ है तथा सारे वेदोंसे भगवानका ज्ञान होता है, इसलिये सब वेदोंको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३३. प्राप्त करनेकी वस्तुका नाम “गति” है। सबसे बढ़कर प्राप्त करनेकी वस्तु एकमात्र भगवान् ही हैं, इसीलिये उन्होंने अपनेको “गति” कहा है। “परा गति”, “परमा गति', “अविनाशी पद" आदि नाम भी इसीके हैं। ३१२. जिसकी शरण ली जाय उसे “'शरणम्” कहते हैं। भगवान्के समान शरणागतवत्सल, प्रणतपाल और शरणागतके दुःखोंका नाश करनेवाला अन्य कोई भी नहीं है। वाल्मीकीय रामायणमें कहा है-- सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रत मम ।। (६
Desculpe: o texto sob “Bhishma Parva.34.18” não é um śloka sânscrito curto, mas um comentário longo (ṭīkā/bhāṣya) em hindi sobre “Rājavidyā–Rājaguhya” e ensinamentos da Bhagavad Gītā. Para traduzir com precisão e manter o tom épico, preciso do śloka sânscrito original de 34.18 (ou do trecho exato que você deseja traduzir).
अजुन उवाच