जनक–ब्राह्मणसंवादः
Viṣaya, Mamatva, and Self-Mastery
ततः प्रहस्य जनकं ब्राह्मण: पुनरब्रवीत् । त्वज्जिज्ञासार्थमद्येह विद्धि मां धर्ममागतम्,जनककी ये बातें सुनकर वह ब्राह्मण हँसा और फिर कहने लगा--“महाराज! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धर्म हूँ और आपकी परीक्षा लेनेके लिये ब्राह्मणका रूप धारण करके यहाँ आया हूँ
Então o brâmane, sorrindo, tornou a dizer a Janaka: “Ó grande rei, sabe que eu sou o Dharma. Hoje vim aqui assumindo a forma de um brâmane para te pôr à prova.”
जनक उवाच