आस्तीक-वरप्रदानम् (Āstīka’s Boon and the Interruption of the Sarpa-satra)
प्रभूतधनधान्याब्यमृत्विग्भि: सुनिषेवितम् । निर्माय चापि विधिवद् यज्ञायतनमीप्सितम्,वे सभी ऋत्विज् वेदोंके यथावत् विद्वान् तथा परम बुद्धिमान थे। उन्होंने विधिपूर्वक मनके अनुरूप एक यज्ञ-मण्डप बनाया, जो परम समृद्धिसे सम्पन्न, उत्तम द्विजोंके समुदायसे सुशोभित, प्रचुर धनधान्यसे परिपूर्ण तथा ऋत्विजोंसे सुसेवित था। उस यज्ञमण्डपका निर्माण कराकर ऋत्विजोंने सर्पयज्ञकी सिद्धिके लिये उस समय राजा जनमेजयको दीक्षा दी। इसी समय जब कि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होनेवाला था, वहाँ पहले ही यह घटना घटित हुई
prabhūtadhana-dhānyābhyām ṛtvigbhiḥ su-niṣevitam | nirmāya cāpi vidhivad yajñāyatanam īpsitam ||
Janamejaya disse: “Eles construíram, na devida ordem ritual, o recinto sacrificial desejado—abundante em riquezas e grãos e bem assistido pelos sacerdotes oficiantes.”
जनमेजय उवाच