Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly
नमोस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि । बालार्कसदृशाकारे पूर्णचन्द्रनिभानने,तत्पश्चात् भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने देवीके दर्शनकी अभिलाषा रखकर नाना प्रकारके स्तुतिपरक नामोंद्वारा उन्हें सम्बोधित करके पुनः उनकी स्तुति प्रारम्भ की --इच्छानुसार उत्तम वर देनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। सच्चिदानन्दमयी कृष्णे! तुम कुमारी और ब्रह्मचारिणी हो। तुम्हारी अंगकान्ति प्रभातकालीन सूर्यके सदृश लाल है । तुम्हारा मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्वाद प्रदान करनेवाला है
namo'stu varade kṛṣṇe kumāri brahmacāriṇi | bālārka-sadṛśākāre pūrṇa-candra-nibhānane ||
ਹੇ ਵਰਦਾਇਨੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣੇ, ਹੇ ਕੁਮਾਰੀ ਬ੍ਰਹਮਚਾਰিণੀ! ਤੈਨੂੰ ਨਮਸਕਾਰ ਹੈ। ਤੇਰਾ ਰੂਪ ਉਗਦੇ ਨੌਜਵਾਨ ਸੂਰਜ ਵਾਂਗ ਚਮਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਤੇਰਾ ਮੁਖ ਪੂਰਨਿਮਾ ਦੇ ਚੰਦ ਵਾਂਗ ਸ਼ਾਂਤ ਸੁਖ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਹੈ।
वैशम्पायन उवाच