द्रौपदी-भीमसेनसंवादः
Draupadī–Bhīmasena Dialogue on Suffering, Kāla, and Daiva
ह्वीनिषेवो मधुरवाग्धार्मिकश्न प्रियश्न मे । स ते<रण्येषु वोढव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि,मुझे स्मरण है, जब सहदेव महान् वनमें आने लगे, उस समय पुत्रवत्सला माता कुन्ती उन्हें हृदयसे लगाकर खड़ी हो गयीं और रोती हुई मुझसे यों कहने लगीं--“याज्ञसेनी! सहदेव बड़ा लज्जाशील, मधुरभाषी और धार्मिक है। यह मुझे अत्यन्त प्रिय है। इसे वनमें रात्रिके समय तुम स्वयं सँभालकर (हाथ पकड़कर) ले जाना, क्योंकि यह सुकुमार है (सम्भव है, थकावटके कारण चल न सके)। मेरा सहदेव शूरवीर, राजा युधिष्ठिरका भक्त, अपने बड़े भाईका पुजारी और वीर है। पाञज्चालराजकुमारी! तुम इसे अपने हाथों भोजन कराना
vaishampāyana uvāca | hrī-niṣevaḥ madhura-vāk dhārmikaś ca priyaś ca me | sa te 'raṇyeṣu voḍhavyo yājñaseni kṣapāsv api ||
ਸਹਦੇਵ ਲੱਜਾਸ਼ੀਲ, ਮਿੱਠਾ ਬੋਲਣ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਧਰਮਨਿਸ਼ਠ ਹੈ; ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪਿਆਰਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਯਾਜ्ञਸੇਨੀ! ਜੰਗਲ ਵਿੱਚ ਰਾਤਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਤੂੰ ਆਪ ਉਸ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲ ਕੇ (ਹੱਥ ਫੜ ਕੇ) ਲੈ ਜਾਈਂ।
वैशम्पायन उवाच