Adhyāya 14: Sudēṣṇā Sends Sairandhrī to Kīcaka’s House (सुदेष्णा–सैरन्ध्री–कीचक संवादः)
भोगोपचारान् विविधान् सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम् । पान पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमै: शुभै:,“महाभागे! नाना प्रकारकी भोग-सामग्री तथा सर्वोत्तम सौभाग्य पाकर उत्तमोत्तम शुभ भोगोंके साथ पीने योग्य रसोंका आस्वादन करो। अनचघे! तुम्हारा यह सर्वोत्कृष्ट रूप-सौन्दर्य आजकी परिस्थितिमें केवल व्यर्थ जा रहा है। भामिनि! जैसे उत्तम हारको यदि किसीने गलेमें धारण नहीं किया, तो उसकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार सुन्दरि! तुम शुभस्वरूपा और शोभामयी होकर भी किसीके गलेका हार न बन सकनेके कारण सुशोभित नहीं होती हो
bhogopacārān vividhān saubhāgyaṃ cāpy anuttamam | pānaṃ piba mahābhāge bhogaiś cānuttamaiḥ śubhaiḥ ||
ਮਹਾਭਾਗੇ! ਅਨੇਕਾਂ ਕਿਸਮਾਂ ਦੀਆਂ ਭੋਗ-ਸਮੱਗਰੀਆਂ ਅਤੇ ਅਤੁੱਲ ਸੁਭਾਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ, ਉੱਤਮ ਤੇ ਸ਼ੁਭ ਭੋਗਾਂ ਨਾਲ ਪੀਣਯੋਗ ਰਸਾਂ ਦਾ ਆਨੰਦ ਲੈ।
वैशम्पायन उवाच