रामस्य पम्पातीरगमनम्, सुग्रीवसख्यं, वालिवधः, सीतारक्षणवृत्तान्तश्च
Rāma at Pampā; alliance with Sugrīva; Vālin’s fall; Sītā’s guarded captivity
दुर्वाससमभिप्रेक्ष्य ते सर्वे मुनयोब्रुवन् । राज्ञा हि कारयित्वान्नं वयं स्नातुं समागता:,वे मुनिलोग उस समय जलमें उतरकर अघमर्षण मन्त्रका जप कर रहे थे। सहसा उन्हें पूर्ण तृप्तिका अनुभव हुआ; बार-बार अन्नरससे युक्त डकारें आने लगीं। यह देखकर वे जलसे बाहर निकले और आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। (सबकी एक-सी अवस्था हो रही थी।) वे सभी मुनि दुर्वालाकी ओर देखकर बोले--“ब्रह्मर्ष! हमलोग राजा युधिष्ठिरको रसोई बनवानेकी आज्ञा देकर स्नान करनेके लिये आये थे, परंतु इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कण्ठतक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है। अब हम कैसे भोजन करेंगे? हमने जो रसोई तैयार करवायी है, वह व्यर्थ होगी। उसके लिये हमें क्या करना चाहिये”
vaiśaṃpāyana uvāca |
durvāsasam abhiprekṣya te sarve munayo 'bruvan |
rājñā hi kārayitvānnaṃ vayaṃ snātuṃ samāgatāḥ ||
ਦੁਰਵਾਸਾ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਉਹ ਸਾਰੇ ਮੁਨੀ ਬੋਲੇ—“ਅਸੀਂ ਰਾਜੇ ਕੋਲੋਂ ਭੋਜਨ ਤਿਆਰ ਕਰਵਾ ਕੇ ਸਨਾਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਆਏ ਹਾਂ।”
वैशग्पायन उवाच