Book 3, Āraṇyaka-parva — Adhyāya 19: Pradyumna’s Reproach of Withdrawal and the Ethics of Kṣātra Reputation
ततो बाणान् बहुविधान् पुनरेव स सौभराट् । मुमोच तनये वीर मम रुक्मिणिनन्दने,महाबाहो! परंतु दारुककुमारने वहाँ बाणोंके वेगपूर्वक प्रहारकी कोई चिन्ता न करते हुए शाल्वकी सेनाको अपसव्य (दाहिने) करते हुए ही रथको आगे बढ़ाया। वीरवर! तब सौभराज शाल्वने पुनः मेरे पुत्र रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्मपर अनेक प्रकारके बाण चलाये। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्म अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शाल्वके बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही तीक्ष्ण बाणोंसे मुसकराकर काट देते थे। प्रद्युम्नके द्वारा अपने बाणोंको छिन्न-भिन्न होते देख सौभराजने भयंकर आसुरी मायाका सहारा लेकर बहुत-से बाण बरसाये
tato bāṇān bahuvidhān punar eva sa saubharāṭ | mumoca tanaye vīra mama rukmiṇīnandane mahābāho ||
ਤਦੋਂ ਸੌਭਰਾਜ ਸ਼ਾਲਵ ਨੇ ਫਿਰ ਮੇਰੇ ਵੀਰ ਪੁੱਤਰ—ਰੁਕਮਿਣੀ-ਨੰਦਨ ਪ੍ਰਦ੍ਯੁਮਨ—ਉੱਤੇ ਅਨੇਕਾਂ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਬਾਣ ਛੱਡੇ।
वायुदेव उवाच