Nakula’s Engagement with Citra-sena and Karṇa’s Sons; Śalya Re-stabilizes the Kaurava Host
भुजनक्रा धनु:स्रोता हस्तिशैला हयोपला । मेदोमज्जाकर्दमिनी छत्रहंसा गदोडुपा,उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षेके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे
bhujanakrā dhanuḥsrotā hastiśailā hayopalā | medomajjākardaminī chatrahaṃsā gadodupā ||
ਉਸ ਨਦੀ ਵਿੱਚ ਕੱਟੀਆਂ ਭੁਜਾਂ ਮਗਰਮੱਛ ਸਨ, ਧਨੁਸ਼ ਉਸ ਦੇ ਸ੍ਰੋਤ; ਹਾਥੀ ਕੰਢਿਆਂ ਦੇ ਪਹਾੜ ਅਤੇ ਘੋੜੇ ਪੱਥਰਾਂ ਦੇ ਟੁਕੜੇ। ਚਰਬੀ ਤੇ ਮੱਜਾ ਉਸ ਦੀ ਚਿਕੜ ਸੀ, ਛਤਰ ਹੰਸ ਸਨ ਅਤੇ ਗਦਾਵਾਂ ਨੌਕਾਵਾਂ ਵਾਂਗ ਦਿਸਦੀਆਂ ਸਨ।
संजय उवाच