कर्णसेनापत्यारम्भः — Karṇa’s Appointment and the Report to Dhṛtarāṣṭra
Chapter 1
भरतनन्दन! प्रतिदिनके आवश्यक कार्य सम्पन्न करके आश्वस्त हो उन्होंने सैनिकोंको कवच आदि धारण करके तैयार हो जानेकी आज्ञा दी तथा कौतुक एवं मांगलिक कृत्य पूर्ण करके कर्णको सेनापति बनाकर वे सब-के-सब दही, पात्र, घृत, अक्षत, गौ, अश्व, कण्ठभूषण तथा बहुमूल्य वस्त्रोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्यणोंका आदर-सत्कार करके सूत, मागध और वन्दीजनोंद्वारा विजय-सूचक आशीर्वादोंसे अभिवन्दित हो युद्धके लिये निकले || १०-- १२ || तथैव पाण्डवा राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रिया: । शिबिरान्निर्ययुस्तूर्ण युद्धाय कृतनिश्चया:,राजन! इसी प्रकार पाण्डव भी पूर्वाह्ञमें किये जानेवाले नित्य कर्मोका अनुष्ठान करके तुरंत ही शिविरसे बाहर निकले। उन्होंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था
tathaiva pāṇḍavā rājan kṛtapūrvāhṇikakriyāḥ | śibirān niryayus tūrṇaṃ yuddhāya kṛtaniścayāḥ ||
ਹੇ ਰਾਜਨ! ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪਾਂਡਵਾਂ ਨੇ ਵੀ ਪੂਰਵਾਹਨ ਦੇ ਨਿੱਤ ਕਰਮ ਨਿਭਾ ਕੇ ਤੁਰੰਤ ਹੀ ਛਾਵਣੀ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਕੂਚ ਕੀਤਾ; ਯੁੱਧ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਨਿਸ਼ਚਯ ਅਡੋਲ ਸੀ।
वैशम्पायन उवाच