द्रोण–सात्यकि-युद्धम्
Droṇa–Sātyaki Engagement
विशेषयिष्यन्नाचार्य सर्वास्त्रविदुषां वर: । मुमोच षट्शतान् बाणान् गृहीत्वैकमिव द्रुतम्,इतना ही नहीं, वीर द्रोणाचार्यने मुसकराकर अर्जुनको अपने बाणोंकी वर्षसे आच्छादित कर दिया। इसी बीचमें सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने विशाल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और आचार्यसे बढ़कर पराक्रम दिखानेकी इच्छासे तुरंत छ: सौ बाण छोड़े। उन बाणोंको उन्होंने इस प्रकार हाथमें ले लिया था, मानो एक ही बाण हो
viśeṣayiṣyann ācāryaḥ sarvāstraviduṣāṃ varaḥ | mumoca ṣaṭ-śatān bāṇān gṛhītvā ekam iva drutam ||
ਸੰਜਯ ਬੋਲਿਆ—ਆਚਾਰਯ ਨੂੰ ਮਾਤ ਦੇਣ ਦੀ ਇੱਛਾ ਨਾਲ, ਅਸਤ੍ਰ-ਵਿਦਿਆ ਵਿੱਚ ਸਰਵੋਤਮ ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਤੁਰੰਤ ਛੇ ਸੌ ਬਾਣ ਛੱਡੇ—ਮਾਨੋ ਉਹ ਇਕੋ ਬਾਣ ਹੋਵੇ।
संजय उवाच