अन्धकार-रजःसंमूढे रणाङ्गणे प्रदीपप्रकाशः | Illumination of the Army in Darkness and Dust
व्याप्राविव नरव्याप्रौ दृष्टाभिरितरेतरम् । शरधारासूजौ वीरौ मेघाविव ववर्षतु:,बाणोंद्वारा उन दोनोंके कवच कट गये थे और सारे अंग रक्तसे भींग गये थे। उस दशामें वे कर्ण और भीमसेन केंचुल छोड़कर निकले हुए दो सर्पोके समान शोभा पाने लगे। जैसे दो व्याप्र अपनी दाढ़ोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों पुरुषव्याप्र योद्धा परस्पर प्रहार कर रहे थे। वे दोनों वीर दो मेघोंके समान बाणधाराकी वर्षा कर रहे थे
vyāghrāv iva naravyāghrau dṛṣṭābhir itaretaram | śaradhārāsṛjau vīrau meghāv iva vavarṣatuḥ ||
ਸੰਜਯ ਬੋਲਿਆ—ਦੋ ਬਾਘਾਂ ਵਾਂਗ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਨਰ-ਬਾਘ ਇਕ ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਤੱਕ ਕੇ ਆਘਾਤ-ਪ੍ਰਤਿਆਘਾਤ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ; ਅਤੇ ਤੀਰਾਂ ਦੀਆਂ ਧਾਰਾਂ ਛੱਡਦੇ ਹੋਏ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਵੀਰ ਦੋ ਬੱਦਲਾਂ ਵਾਂਗ ਵਰ੍ਹ ਰਹੇ ਸਨ।
संजय उवाच