अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
ह सम्बन्ध-- पहले शलोकमें भगवान्ने कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्म करनेवालेको संन्यासी और योगी बतलाया। उसपर यह शंका हो सकती है कि यदि संन्यास” और 'योग' दोनों भिन्न-भिन्न स्थिति हैं तो उपर्युक्त साधक दोनोंसे सम्पन्न कैसे हो सकता है। अतः इस शंकाका निराकरण करनेके लिये दूसरे *्लोकमें 'संन्न्याय” और 'योग” की एकताका प्रतिपादन करते हैं-- यं संन्यासमिति प्राहुयोंगं तं विद्धि पाण्डव । न हासंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्षन,हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसीको तू योग जान; क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
yaṁ saṁnyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava | na hy asaṁnyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaścana ||
ਹੇ ਪਾਂਡਵ! ਜਿਸ ਨੂੰ ਗਿਆਨੀ ‘ਸੰਨਿਆਸ’ ਆਖਦੇ ਹਨ, ਉਸੇ ਨੂੰ ਤੂੰ ‘ਯੋਗ’ ਜਾਣ; ਕਿਉਂਕਿ ਜੋ ਸੰਕਲਪਾਂ ਦਾ ਤਿਆਗ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਉਹ ਕੋਈ ਵੀ ਮਨੁੱਖ ਯੋਗੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ।
अर्जुन उवाच