खाण्डवदाहे देवविमुखता तथा मयदानवाभयदानम् | Khāṇḍava Burning: Devas Withdraw; Maya Granted Protection
तत्र जाम्बूनदाड्नि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च । मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च,उस सभामें सैकड़ों सिंहासन रखे गये भै, जिनमें सुवर्ण जड़ा गया था। उन सिंहासनोंपर बहुमूल्य बिछौने पड़े थे। वे सभी आसन मणि और मूँगोंसे चित्रित होनेके कारण प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषसिंह महारथी वीर उन्हीं सिंहासनोंपर आकर बैठे, मानो यज्ञकी वेदियोंपर प्रज्वलित अग्निदेव शोभा पा रहे हों
tatra jāmbūnadāḍhni spardhyāstaraṇavanti ca | maṇividrumacitrāṇi jvalitāgniprabhāṇi ca ||
ਉੱਥੇ ਜਾਮਬੂਨਦ ਸੋਨੇ ਨਾਲ ਸਮ੍ਰਿੱਧ, ਮੁਕਾਬਲੇਯੋਗ ਵਿਛੌਣਿਆਂ ਵਾਲੇ ਆਸਨ ਸਜੇ ਸਨ; ਮਣੀਆਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰਵਾਲ ਨਾਲ ਜੜੇ ਹੋਏ ਉਹ ਜਲਦੀ ਅੱਗ ਦੀ ਚਮਕ ਵਾਂਗ ਦਿਪਦਿਪਾ ਰਹੇ ਸਨ।
वैशम्पायन उवाच