Arjuna Restores a Brāhmaṇa’s Cattle and Accepts Forest Exile
Satya-vrata at Khaṇḍavaprastha
पप्रच्छानामयं राजंस्ततस्तान् पाण्डुनन्दनान् । प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च,उन्होंने भी अमित-बुद्धिमान् विदुरजीका क्रमशः: आदर-सत्कार किया। तदनन्तर विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अनुसार बारंबार स्नेहपूर्वक युधिष्ठिर आदि पाण्डुपुत्रोंसे कुशल-मंगल एवं स्वास्थ्यविषयक प्रश्न किया। जनमेजय! फिर विदुरजीने कौरवोंकी ओरसे जैसे दिये गये थे, उसीके अनुसार पाण्डवों, कुन्ती, द्रौपदी तथा ट्रुपदके पुत्रोंक लिये नाना प्रकारके रत्न और धन भेंट किये
vaiśampāyana uvāca |
papracchānāmayaṃ rājan tatas tān pāṇḍunandanān |
pradadau cāpi ratnāni vividhāni vasūni ca ||
ਫਿਰ, ਹੇ ਰਾਜਨ, ਉਸ ਨੇ ਉਹਨਾਂ ਪਾਂਡੁਨੰਦਨਾਂ ਦੀ ਖੈਰ-ਖ਼ਬਰ ਤੇ ਸਿਹਤ ਵਾਰੰਵਾਰ ਪੁੱਛੀ ਅਤੇ ਨਾਨਾ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਰਤਨ ਤੇ ਹੋਰ ਧਨ-ਦੌਲਤ ਵੀ ਭੇਟ ਕੀਤੀ।
वैशम्पायन उवाच