धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः
Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue
द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धीमते । पाण्डवान् कौरवांश्वैव ददौ शिष्यान् नरर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कृपाचार्यके द्वारा पूर्णतः शिक्षा मिल जानेपर पितामह भीष्मने अपने पौत्रोंमें विशिष्ट योग्यता लानेके लिये उन्हें और अधिक शिक्षा देनेकी इच्छासे ऐसे आचार्योकी खोज प्रारम्भ की, जो बाण-संचालनकी कलामें निपुण और अपने पराक्रमके लिये सम्मानित हों। उन्होंने सोचा--'जिसकी बुद्धि थोड़ी है, जो महान् भाग्यशाली नहीं है, जिसने नाना प्रकारकी अस्त्र-विद्यामें निपुणता नहीं प्राप्त की है तथा जो देवताओंके समान शक्तिशाली नहीं है, वह इन महाबली कौरवोंको अस्त्र-विद्याकी शिक्षा नहीं दे सकता।” नरश्रेष्ठ) यों विचारकर भरतश्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मने भरद्वाजवंशी, वेदवेत्ता तथा बुद्धिमान द्रोणको आचार्यके पदपर प्रतिष्ठित करके उनको शिष्यरूपमें पाण्डवों तथा कौरवोंको समर्पित कर दिया
vaiśampāyana uvāca |
droṇāya vedaviduṣe bhāradvājāya dhīmate |
pāṇḍavān kauravāṃś caiva dadau śiṣyān nararṣabha ||
ਵੈਸ਼ੰਪਾਯਨ ਨੇ ਆਖਿਆ—ਹੇ ਨਰਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ! ਭੀਸ਼ਮ ਨੇ ਵੇਦ-ਵਿਦਵਾਨ ਅਤੇ ਧੀਮਾਨ ਭਾਰਦਵਾਜ-ਪੁੱਤਰ ਦ੍ਰੋਣ ਨੂੰ ਆਚਾਰਯ ਬਣਾਕੇ ਪਾਂਡਵਾਂ ਅਤੇ ਕੌਰਵਾਂ—ਸਭ ਨੂੰ ਸ਼ਿਸ਼੍ਯ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਉਸ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।
वैशम्पायन उवाच