सोपान-शिखर का ‘लोक-धर्म-परिक्षण’ चरण: राम-राज्य के आदर्श के बाद कलियुग-स्वभाव का निदान, और उससे भी ऊपर ‘नाम-आश्रय’ द्वारा सहज निस्तार। उत्तरकाण्ड यहाँ ‘समाज-व्यवस्था’ का वर्णन मात्र नहीं, बल्कि साधक के भीतर उठने वाले दम्भ, पाखण्ड, गुरु-द्रोह, और वर्णाश्रम-विकृति के सूक्ष्म रोगों का शल्य-चिकित्सात्मक पाठ है—जहाँ अंतिम द्वार ‘हरिनाम’ को एकमात्र अवलम्ब बनाकर खुलता है।
ଏହି ଖଣ୍ଡାଂଶର ପ୍ରଧାନ ରସ ‘ଶାନ୍ତ’, କିନ୍ତୁ ତାହାର ଭୂମି ‘କରୁଣ’ ଓ ‘ବୀଭତ୍ସ’ର ସ୍ପର୍ଶରେ ଗଢ଼ା: କଳିଯୁଗର ନୈତିକ ବିଘଟନ (ବର୍ଣ୍ଣସଙ୍କର, ପାଖଣ୍ଡ, ଲୋଭ, ଦମ୍ଭ)ର ତୀକ୍ଷ୍ଣ ନିଦର୍ଶନ ସାଧକରେ ବୈରାଗ୍ୟ ଜଗାଏ। କାକଭୁଶୁଣ୍ଡିଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିକୋଣ ସାମାଜିକ ସମାଲୋଚନା ନୁହେଁ, ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ନିଦାନ—ଶ୍ରୁତି-ସମ୍ମତ ହରିଭକ୍ତି-ପଥରୁ ହଟି ଅନେକ କଳ୍ପିତ ପନ୍ଥର ପ୍ରବୃତ୍ତିକୁ ‘ମୋହ’ର ଫଳ ବୋଲି କହି ସେ “କେବଳ ହରିନାମ”କୁ କଳିଯୁଗର ସହଜ-ଉପାୟ ଘୋଷଣା କରନ୍ତି। ଏହି ପ୍ରବାହରେ କଥା-ରଚନା ଏକ ଅନ୍ତଃକରଣ-ନାଟକ ହୋଇଯାଏ: ଗୁରୁଦ୍ରୋହରୁ ପତନ, ଶିବ-ଶାପ, ପୁଣି ଶିବ-କରୁଣା ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣ-ସେବାର ମର୍ଯ୍ୟାଦା। ଉତ୍ତରକାଣ୍ଡର ଏହି ଅବସ୍ଥା ସମଗ୍ର ମାନସ-ତତ୍ତ୍ୱରେ ‘ସମାପନ-ସିଦ୍ଧାନ୍ତ’ର କାମ କରେ—ରାମ-ଲୀଳାର ଐତିହାସିକତାରୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ନାମ, ଗୁରୁ, ଓ ସାଧୁ-ସମାଜ ମାଧ୍ୟମରେ ମୁକ୍ତିର ବ୍ୟବହାରିକ ସିଢ଼ି ରଖେ।
Verse 209 (चौपाई)
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।। आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।। जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।। नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।। ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।। बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।। सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।। सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
para triy lampaṭ kapaṭ sayāne | moha droha mamatā lapaṭāne || tei abhedabādī gyānī nara | dekhā meṁ caritra kalijuga kara || āpu gae aru tinhahū ghālahĩ | je kahuṁ sata māraga pratipālahĩ || kalpa kalpa bhari eka eka narakā | parahiṁ je dūṣahiṁ śruti kari tarakā || je baranādhama teli kumhārā | svapaca kirāta kola kalavārā || nāri muī gṛha saṁpati nāsī | mūṛ muṛāi hohiṁ sanyāsī || te bipranha sana āpu pujāvahiṁ | ubhaya loka nija hātha nasāvahiṁ || bipra niracchara lolupa kāmī | nirācāra saṭha bṛṣalī svāmī || sūḍra karahiṁ japa tapa brata nānā | baiṭhi barāsana kahahiṁ purānā || saba nara kalpita karahiṁ acārā | jāi na barani anīti apārā ||
ପରସ୍ତ୍ରୀଲୋଲୁପ, ଛଳରେ ଚତୁର, ମୋହ-ମାୟା, ଦ୍ୱେଷ ଓ ମମତାରେ ଜଡ଼ିତ—ଏହି ଯୁଗର ଲୋକ; ଏମାନେ ନିଜକୁ ‘ଜ୍ଞାନୀ’ ଓ ଅଦ୍ୱୈତର ପ୍ରବଚକ ଭାବେ ଦେଖାନ୍ତି। ସେମାନେ ନିଜକୁ ନଷ୍ଟ କରନ୍ତି, ଏବଂ ଯେମାନେ ଏଯାଁ ସତ୍ପଥ ଧରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତି ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଗଡ଼ାଇଦିଅନ୍ତି। ତର୍କ-କୁତର୍କରେ ବେଦକୁ ଦୋଷ ଦେଉଥିବା ଲୋକ ଯୁଗଯୁଗ ନରକରେ ପଡ଼ନ୍ତି। ନୀଚ ଓ ଅଯୋଗ୍ୟ ଲୋକ ଅନ୍ୟର ପଦ-ଚିହ୍ନ ଧରନ୍ତି; ସ୍ତ୍ରୀ ମରିଲେ ଓ ଗୃହଧନ ନଷ୍ଟ ହେଲେ ମୂର୍ଖ ମୁଣ୍ଡ ମୁଣ୍ଡାଇ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ ହୋଇଯାନ୍ତି। ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜା ନେଇ ଦୁଇ ଲୋକ ନଷ୍ଟ କରନ୍ତି। ବ୍ରାହ୍ମଣ ଅନପଢ଼, କାମୀ, ଲୋଭୀ, ଆଚରଣହୀନ ହୁଅନ୍ତି; ନୀଚ ଲୋକ ଗୁରୁ ହୋଇ ବସନ୍ତି। ଶୂଦ୍ର ନାନା ଜପ-ତପ-ବ୍ରତ କରି, ଉଚ୍ଚ ଆସନରେ ବସି ପୁରାଣ ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରନ୍ତି। ସମସ୍ତେ ନିଜେ ନିଜେ ଆଚାର ଗଢ଼ନ୍ତି—ଅପାର ଅନ୍ୟାୟ, ଯାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କହିହେବ ନାହିଁ।
Verse 210 (दोहा/सोरठा)
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग।।100(क)।। श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।100(ख)।।
bhae barana saṅkara kali bhinnasetu saba loga | karahiṁ pāpa pāvahiṁ dukha bhaya ruja soka biyoga ||100(ka)|| śruti saṁmata hari bhakti patha saṁjuta birati bibeka | tehi na calahiṁ nara moha basa kalpahiṁ pantha aneka ||100(kha)||
କଳିରେ ଆଶ୍ରମ-ବର୍ଣ୍ଣର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଗୋଲମାଳ; ସଂଯମର ବନ୍ଧ ସବୁଙ୍କ ପାଇଁ ଭାଙ୍ଗିଗଲା। ଲୋକ ପାପ କରନ୍ତି ଓ ଦୁଃଖ ଫଳ ଭୋଗନ୍ତି—ଭୟ, ରୋଗ, ଶୋକ ଓ ବିୟୋଗ। ବେଦସମ୍ମତ ହରିଭକ୍ତିର ପଥ—ବୈରାଗ୍ୟ ଓ ବିବେକ ସହିତ—ଲୋକ ଚାଲନ୍ତି ନାହିଁ; ମୋହରେ ପଡ଼ି ଅସଂଖ୍ୟ ପଥ ଗଢ଼ିନେଉଛନ୍ତି।
Verse 211 (छंद)
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।। कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।। सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।। ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।। नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।। धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।। नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।। कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।। कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।
bahu dāma sãvārahiṁ dhāma jatī | biṣayā hari līnhi na rahi biratī || tapasī dhanavaṁta daridra gṛhī | kali kautuka tāta na jāta kahī || kulavaṁti nikārahiṁ nāri satī | gṛha ānihiṁ cerī nibēri gatī || suta mānahiṁ mātu pitā taba laũ | abalānana dīkha nahīṁ jaba laũ || sasurāri piāri lagī jaba teṁ | riparūpa kuṭuṁba bhae taba teṁ || nṛpa pāpa parāyana dharma nahīṁ | kari daṇḍa biḍaṁba prajā nitahīṁ || dhanavaṁta kulīna malīna apī | dvija cinha janeu ughāra tapī || nahiṁ māna purāna na bedahi jo | hari sevaka saṁta sahī kali so || kabi bṛṁda udāra dunī na sunī | guna dūṣaka brāta na kopi gunī || kali bārahiṁ bāra dukāla parai | binu anna dukhī saba loga marai ||
ସନ୍ନ୍ୟାସୀମାନେ ଧନ-ସମ୍ପଦରେ ଆଶ୍ରମ ସଜାନ୍ତି; ଭୋଗବାସନା ଧରିନେଇଛି, ବୈରାଗ୍ୟ ରହିଲା ନାହିଁ। ତପସ୍ବୀ ଧନୀ, ଗୃହସ୍ଥ ଦରିଦ୍ର—କଳିର ଏହି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ, କହି କହି ଶେଷ ହୁଏନି। ସୁକୁଳଜାତ ସତୀକୁ ଘରୁ ବାହାର କରାଯାଏ, ଦାସୀକୁ ଘରେ ଆଣାଯାଏ। ସନ୍ତାନ ମାତା-ପିତାକୁ ସେତେଦିନ ମାନେ, ଯେତେଦିନ ଭୋଗର ମୁହଁ ଦେଖେ। ଶ୍ୱଶୁରଘର ପ୍ରିୟ ହୁଏ, ନିଜ କୁଳବନ୍ଧୁ ଶତ୍ରୁ ସମ ଲାଗନ୍ତି। ରାଜାମାନେ ପାପରେ ଲିପ୍ତ, ଧର୍ମହୀନ; ଦଣ୍ଡ ଓ ଉତ୍ପୀଡ଼ନରେ ପ୍ରଜାକୁ ଦିନେଦିନେ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦିଅନ୍ତି। ଧନୀ ଓ ଉଚ୍ଚଜାତ ମନରେ କଳୁଷିତ; ଯଜ୍ଞୋପବୀତ କେବଳ ଚିହ୍ନ ମାତ୍ର ହୋଇ ରହେ। ଯେ ପୁରାଣ-ବେଦକୁ ମାନେନି, ସେ କଳିରେ ‘ସନ୍ତ’, ‘ହରିଦାସ’ ଗଣାଯାଏ। କବିଙ୍କ କଥା କେହି ଶୁଣେନି, ଏବଂ ଦୋଷଦର୍ଶୀଙ୍କ ଉପରେ ସଜ୍ଜନ ରୋଷ କରନ୍ତି ନାହିଁ। କଳିରେ ପୁନଃପୁନଃ ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ପଡ଼େ; ଧାନ୍ୟ ନଥିଲେ ସମସ୍ତେ ଦୁଃଖେ ମରନ୍ତି।
Verse 212 (दोहा/सोरठा)
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड।।101(क)।। तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान।।101(ख)।।
sunu khagesa kali kapaṭ haṭha daṁbha dveṣa pāṣaṇḍa | māna moha mārādi mada byāpi rahe brahmaṁḍa ||101(ka)|| tāmasa dharma karahiṁ nara japa tapa brata makha dāna | deva na baraṣahiṁ dharaṇīṁ bae na jāmahiṁ dhāna ||101(kha)||
ଶୁଣ, ଗରୁଡ଼! କଳିରେ ଛଳ, ହଠ, କପଟ, ଦ୍ୱେଷ ଓ ଧୋଖା—ଅହଙ୍କାର, ମୋହ, ଏବଂ କାମାଦି ମଦ—ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ଢାକିଦିଏ। ଲୋକ ତାମସ ଭାବରେ କର୍ମ କରନ୍ତି—ଜପ, ତପ, ବ୍ରତ, ଯଜ୍ଞ ଓ ଦାନ; ତଥାପି ଦେବତା ବର୍ଷା ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ, ପୃଥିବୀ ଶକ୍ତି ଦିଏନି, ଧାନ୍ୟ ହୁଏନି।
Verse 213 (छंद)
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।। नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।। कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।। इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।। दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
abalā kaca bhūṣana bhūri chudhā | dhanahīna dukhī mamatā bahudhā || sukha cāhahĩ mūṛha na dharma-ratā | mati thori kaṭhori na komalatā ||1|| nara pīṛita roga na bhoga kahĩ | abhimāna birodha akāranahĩ || laghu jīvana saṃbatu pañca dasā | kalapānta na nāsa gumānu asā ||2|| kalikāla bihāla kiē manujā | nahĩ mānata kvau anujā tanujā | nahĩ toṣa bicāra na sītalatā | saba jāti kujāti bhae magatā ||3|| iriṣā paruṣācchara lolupatā | bhari pūri rahī samatā bigatā || saba loga biyoga bisoka huē | baranāśrama dharma acāra gaē ||4|| dama dāna dayā nahĩ jānapanī | jaṛatā parabañcanatāti ghanī || tanu-poṣaka nāri narā sagare | paranindaka je jaga mo bagare ||5||
ଏହି ଯୁଗରେ ଅସହାୟ ଲୋକ ନିଜ କେଶକୁ ମଧ୍ୟ ଭୂଷଣ ଭାବେ ଗଣନ୍ତି; ଭୁଖ ଅଧିକ, ଦରିଦ୍ର ଦୁଃଖୀ, ଆସକ୍ତିର ତୃଷ୍ଣା ନାନା ରୂପ ଧରେ। ମୂର୍ଖ ଲୋକ ସୁଖ ଚାହନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ଧର୍ମରେ ଭକ୍ତି ନାହିଁ; ବୁଦ୍ଧି ଅଳ୍ପ, ହୃଦୟ କଠୋର, କୋମଳତା ନାହିଁ। (1) ରୋଗରେ ଲୋକ ପୀଡ଼ିତ, ସତ୍ୟ ଆନନ୍ଦ ମିଳେନି; କାରଣ ବିନା ଅହଙ୍କାର ଓ ବିରୋଧ ଜାଗେ। ଆୟୁ ଅଳ୍ପ—ମାତ୍ର ପଚାଶ ବର୍ଷ ପରି—ତଥାପି ଏମିତି ଗର୍ବ ଧରନ୍ତି ଯେନ ଯୁଗାନ୍ତ କେବେ ଆସିବ ନାହିଁ। (2) କଳି ମନୁଷ୍ୟକୁ ଦୁଃଖୀ କରିଛି: ଛୋଟ ଭାଇକୁ ମଧ୍ୟ ସମ୍ମାନ ନାହିଁ, ନିଜ ସନ୍ତାନକୁ ମଧ୍ୟ ମାନେନି। ସନ୍ତୋଷ ନାହିଁ, ବିଚାର ନାହିଁ, ମନର ଶୀତଳତା ନାହିଁ; ସବୁ ବର୍ଣ୍ଣ ନୀଚ ଆଚରଣ ଓ ଭିକ୍ଷାବୃତ୍ତିର ଆଶ୍ରୟକୁ ଗଡ଼ିଯାଏ। (3) ଇର୍ଷ୍ୟା, କଠୋର ବାଣୀ, ଲୋଭ—ସବୁ ଠସେଇ ଭରିଛି; ସମଦୃଷ୍ଟି ହାରାଇଗଲା। ସବୁଠାରେ ଲୋକ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ହୋଇ ଶୋକାକୁଳ; ବର୍ଣ୍ଣାଶ୍ରମର ନିୟମ, ଧର୍ମ ଓ ସଦାଚାର ଲୁପ୍ତ ହୋଇଗଲା। (4) ଆତ୍ମସଂଯମ, ଦାନ, ଦୟା—ଏହାର ଅର୍ଥ ମଧ୍ୟ ଲୋକ ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ; ଜଡତା ଓ ଘନ ଛଳର ଢେର ପ୍ରବଳ। ନାରୀ-ପୁରୁଷ ଦୁହେଁ ଦେହପୋଷଣରେ ଲଗ୍ନ; ନିନ୍ଦକ ଲୋକ ସାରା ଜଗତରେ ଛିଟିଯାଇ ଘୁରନ୍ତି। (5)
Verse 214 (दोहा/सोरठा)
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।।102(क)।।
sunu byālārī kāla kali mala avaguna āgāra | gunaü̃ bahuta kalijuga kara binu prayāsa nistāra ||102(ka)||
ହେ ଗରୁଡ଼, ସର୍ପଶତ୍ରୁ, ଶୁଣ—କଳିଯୁଗ ଅପବିତ୍ରତାର ଢେର, ଦୋଷର ମହାଭଣ୍ଡାର। ତଥାପି ମୁଁ କଳିଯୁଗର ଅନେକ ଗୁଣ କହିବି; କାରଣ ଏଥିରେ ଅତି ପ୍ରୟାସ ବିନା ମୋକ୍ଷ ଲଭ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 215 (चौपाई)
कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।।102(ख)।।
kṛtajuga tretā dvāpara pūjā makha aru joga | jo gati hoi so kali hari nāma te pāvahĩ loga ||102(kha)||
କୃତ, ତ୍ରେତା ଓ ଦ୍ୱାପରେ ଉପାୟ ଥିଲା—ପୂଜା, ଯଜ୍ଞ ଓ ଯୋଗ। ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପରମ ପଦକୁ କଳିରେ ଲୋକେ ହରିନାମ ଦ୍ୱାରା ପାଆନ୍ତି।
Verse 216 (दोहा/सोरठा)
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।। सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।। सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।
kṛtajuga saba jogī bigyānī | kari hari dhyāna tarahĩ bhava prānī || tretā̃ bibidha jagya nara karahĩ | prabhuhĩ samarpi karma bhava tarahĩ || dvāpara kari raghupati pada pūjā | nara bhava tarahĩ upāya na dūjā || kalijuga kevala hari guna gāhā | gāvata nara pāvahĩ bhava thāhā || kalijuga joga na jagya na gyānā | eka adhāra rāma guna gānā || saba bharosa taji jo bhaja rāmahi | prema sameta gāva guna grāmahi || soi bhava tara kachu saṃsaya nāhĩ | nāma pratāpa pragaṭa kali māhĩ || kali kara eka punīta pratāpā | mānasa punya hohĩ nahĩ pāpā ||
କୃତଯୁଗେ ସବୁ ଯୋଗୀ ଓ ବିବେକୀ ଥିଲେ; ହରିଧ୍ୟାନ କରି ପ୍ରାଣୀମାନେ ଭବସାଗର ତରିଗଲେ। ତ୍ରେତାରେ ଲୋକେ ନାନା ଯଜ୍ଞ କଲେ; କର୍ମକୁ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ଅର୍ପି ଜଗତ ତରିଗଲେ। ଦ୍ୱାପରେ ରଘୁପତିଙ୍କ ଚରଣ ପୂଜି ଲୋକେ ପାର ହେଲେ—ଅନ୍ୟ ଉପାୟ ନଥିଲା। କଳିଯୁଗେ କେବଳ ହରିଗୁଣଗାନ ରହିଛି; ନାମ ଜପି ଲୋକେ ଭବପାର ପାଆନ୍ତି। କଳିରେ ନ ଯୋଗ, ନ ଯଜ୍ଞ, ନ ଗୁହ୍ୟ ଜ୍ଞାନ; ଏକମାତ୍ର ଆଶ୍ରୟ—ରାମଗୁଣଗାନ। ଯେ ସମସ୍ତ ଅନ୍ୟ ଭରସା ଛାଡ଼ି ରାମଙ୍କୁ ଭଜେ, ପ୍ରେମରେ ଗୁଣସମୂହ ଗାଏ— ସେ ନିଶ୍ଚୟ ପାର ହୁଏ; ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ—କଳିରେ ନାମମହିମା ପ୍ରକାଶିତ। କଳିର ଏକ ପବିତ୍ର, ମହାଶକ୍ତି ଅଛି—ମନ ପୁଣ୍ୟମୟ ହୁଏ, ପାପ ଟିକି ରହେ ନାହିଁ।
Verse 217 (चौपाई)
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास।।103(क)।।
kalijuga sama juga āna nahĩ jau nara kara bisvāsa | gāi rāma guna gana bimalã bhava tara binahĩ prayāsa ||103(ka)||
କଳିଯୁଗ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଯୁଗ ନାହିଁ—ଯଦି ମଣିଷର ଶ୍ରଦ୍ଧା ଥାଏ। ରାମଙ୍କ ପବିତ୍ର ଗୁଣର ନିର୍ମଳ ସମୂହ ଗାଇ, ଅଳ୍ପ ପ୍ରୟାସରେ ଜଗତ ତରିଯାଏ।
Verse 218 (दोहा/सोरठा)
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं।।104(क)।। तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस।।104(ख)।।
hari māyā kṛta doṣa guna binu hari bhajana na jāhiṃ | bhaji-a rāma taji kāma saba asa bicāri mana māhiṃ ||104(ka)|| tahi kali-kāla baraṣ bahu baseuṁ avadha bihageśa | pareu dukāla bipati basa taba maiṃ gayauṁ bidesa ||104(kha)||
ହରିଙ୍କ ମାୟା ଜନିତ ଦୋଷ ଓ ଗୁଣ ବିନା ହରିଭକ୍ତି ଜାଗେ ନାହିଁ। ତେଣୁ ମନେ ଏହା ଭାବ—ସମସ୍ତ କାମନା ତ୍ୟାଗ କରି ରାମଙ୍କୁ ଭଜ। ହେ ପକ୍ଷୀରାଜ, ସେ କଳିଯୁଗରେ ମୁଁ ଅୟୋଧ୍ୟାରେ ବହୁ ବର୍ଷ ରହିଲି। ଯେତେବେଳେ ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ଆସିଲା ଓ ବିପତ୍ତି ଭାରି ହେଲା, ତେବେ ମୁଁ ପରଦେଶକୁ ଗଲି।
Verse 219 (चौपाई)
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।। गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।। बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।। परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।। तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।। बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।। संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।। जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।
gayauṁ ujenī sunu uragārī | dīna malīna daridra dukhārī || gaeṁ kāla kachu sampati pāī | tahaṁ puni karauṁ sambhu sevakāī || bipra eka baidika siva pūjā | karai sadā tehi kāju na dūjā || param sādhū paramāratha bindaka | sambhu upāsaka nahiṃ hari nindaka || tehi sevauṁ maiṃ kapaṭa sametā | dvija dayāla ati nīti niketā || bāhija namra dekhi mohi sāīṃ | bipra paṛhāva putra kī nāīṃ || sambhu mantra mohi dvijabara dīnhā | subha upadesa bibidha bidhi kīnhā || japauṁ mantra siva mandira jāī | hṛdayaṁ dambha ahamiti adhikāī ||
ମୁଁ ଉଜ୍ଜୟିନୀକୁ ଗଲି—ହେ ଗରୁଡ଼, ଶୁଣ—ଦୁଃଖୀ, ମଲିନ, ଦରିଦ୍ର ଓ ପୀଡ଼ିତ। କିଛି ସମୟ ପରେ ସେଠାରେ ଅଳ୍ପ ଧନ ମିଳିଲା, ଏବଂ ପୁଣି ମୁଁ ଶମ୍ଭୁଙ୍କ ସେବାରେ ଲାଗିଲି। ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବେଦପାରଙ୍ଗତ, ଶିବପୂଜକ ଥିଲେ; ସେ ସଦା ସେଇ କାମ ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କିଛି କରୁନଥିଲେ। ଅତ୍ୟନ୍ତ ପବିତ୍ର, ପରମ ହିତରେ ନିମଗ୍ନ—ଶିବଭକ୍ତ, ତଥାପି ହରିନିନ୍ଦକ ନୁହେଁ। ମୁଁ ଭିତରେ କପଟ ଧରି ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସେବା କଲି। ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦୟାଳୁ, ନୀତିର ଆଶ୍ରୟ। ମୋର ବାହ୍ୟ ନମ୍ରତା ଦେଖି, ନିଜ ପୁଅ ପରି ମୋତେ ଶିଖାଇଲେ। ସେ ଉତ୍ତମ ବ୍ରାହ୍ମଣ ମୋତେ ଏକ ଶିବମନ୍ତ୍ର ଦେଲେ ଓ ଅନେକ ପ୍ରକାରେ ଭଲଭାବେ ଉପଦେଶ କଲେ; କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଶିବମନ୍ଦିରକୁ ଯାଇ ମନ୍ତ୍ରଜପ କଲି, ମୋ ହୃଦୟରେ କେବଳ ଢୋଙ୍ଗ ଓ ଅହଂକାର ବଢ଼ିଲା।
Verse 220 (दोहा/सोरठा)
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।।105(क)।। गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई।।105(ख)।।
maiṃ khala mala saṅkula mati nīca jāti basa moha | hari jana dvija dekheṃ jarauṁ karauṁ biṣṇu kara droha ||105(ka)|| gura nita mohi prabodha dukhita dekhi ācarana mama | mohi upajai ati krodha dambhihi nīti ki bhāvaī ||105(kha)||
ମୁଁ ଦୁଷ୍ଟ ଥିଲି, ମନ ମଲିନତାରେ ଅଟକିଥିଲା; ନୀଚଜାତ, ମୋହରେ ବଶ। ହରିଭକ୍ତ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ମୁଁ ଜଳୁଥିଲି, ଏବଂ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ ଧରୁଥିଲି। ଗୁରୁ ମୋ ଆଚରଣ ଦେଖି ଦୁଃଖିତ ହୋଇ ପ୍ରତିଦିନ ଶିଖାଉଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ମୋ ଭିତରେ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧ ଉଠୁଥିଲା—କପଟୀର ହୃଦୟରେ ସଦୁପଦେଶ ପ୍ରତି ପ୍ରେମ କେଉଁଠି?
Verse 221 (चौपाई)
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।। सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।। रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।। जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।। हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।। अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।। मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।। अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।। जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।। धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।। रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।। मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।। सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।। कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।। उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।। मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।
eka bāra gura līnha bolāī | mohi nīti bahu bhā̃ti sikhāī || siva sevā kara phala suta soī | abirala bhagati rāma pada hoī || rāmahi bhajahiṃ tāta siva dhātā | nara pāvãra kai ketika bātā || jāsu carana aja siva anurāgī | tātu drohã sukha cahasi abhāgī || hara kahũ hari sevaka gura kaheū | suni khaganātha hṛdaya mama daheū || adhama jāti maiṃ bidyā pāẽ | bhayau jathā ahi dūdha piāẽ || mānī kuṭila kubhāgya kujātī | gura kara droha karaũ dinu rātī || ati dayāla gura swalpa na krodhā | puni puni mohi sikhāva subodhā || jehi te nīca baṛāī pāvā | so prathamahiṃ hati tāhi nasāvā || dhūma anala sambhava sunu bhāī | tehi bujhāva ghana padavī pāī || raja maga parī nirādara rahī | saba kara pada prahāra nita sahī || maruta uḍāva prathama tehi bharī | puni nṛpa nayana kirīṭanha parī || sunu khagapati asa samujhi prasaṅgā | budha nahiṃ karahiṃ adhama kara saṅgā || kabi kobida gāvahiṃ asi nītī | khala sana kalah na bhala nahiṃ prītī || udāsīna nita rahia gosāīṃ | khala pariharia swāna kī nāīṃ || maiṃ khala hṛdayaṁ kapaṭa kuṭilāī | gura hita kahai na mohi sohāī ||
ଏକଦିନ ଗୁରୁ ମୋତେ ଡାକି ଅନେକ ପ୍ରକାରେ ସଦାଚାର ଶିଖାଇଲେ: ‘ପୁଅ, ଶିବସେବାର ଫଳ ଏହି—ରାମଚରଣରେ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ଭକ୍ତି। ଶିବ, ଯିଏ ସଂସାରର ନିୟନ୍ତା, ସେ ନିଜେ ରାମଙ୍କୁ ଭଜନ୍ତି; ତେବେ ନୀଚ ଲୋକଙ୍କ କଥା କ’ଣ? ଯାହାଙ୍କ ଚରଣକୁ ବ୍ରହ୍ମା ଓ ଶିବ ମଧ୍ୟ ପ୍ରେମ କରନ୍ତି—ହେ ଦୁର୍ଭାଗା, ତୁମେ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ ଧରି ସୁଖ ଖୋଜୁଛ! ’ ‘ସମସ୍ତ ଭାବରେ,’ ଗୁରୁ କହିଲେ, ‘ଶିବ ହରିଙ୍କ ଦାସ।’ ଏହା ଶୁଣି, ହେ ପକ୍ଷୀରାଜ, ମୋ ହୃଦୟ ଜଳିଉଠିଲା। ନୀଚ ଅବସ୍ଥାର ମୁଁ, ଅଳ୍ପ ଶିକ୍ଷା ପାଇ ଦୁଧ ଖାଇଥିବା ସାପ ପରି ହୋଇଗଲି। ଗର୍ବିତ, କୁଟିଳ, ଦୁର୍ଭାଗ୍ୟବାନ, ନୀଚ ସ୍ୱଭାବର—ଦିନରାତି ଗୁରୁଙ୍କୁ ଠକେଇଲି। ଗୁରୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୟାଳୁ, କ୍ରୋଧ ଅଳ୍ପ; ପୁନଃପୁନଃ ସେ ମୋତେ ବୁଦ୍ଧିମତାରେ ଉପଦେଶ ଦେଲେ। ଯାହା ଦ୍ୱାରା ନୀଚ ଲୋକ ମହାନ ହୁଏ—ସେ ପ୍ରଥମେ ତାକୁ ନାଶ କରେ। ଅଗ୍ନିରୁ ଧୂଆଁ ଜନ୍ମେ, ଭାଇ; ତଥାପି ସେ ଅଗ୍ନିକୁ ଢାଙ୍କି ନିଭାଇ ମେଘର ପଦ ଲଭେ। ରାସ୍ତାର ଧୂଳି ଅବହେଳିତ, ସବୁଙ୍କ ଲାତ ସହେ; କିନ୍ତୁ ପବନ ପ୍ରଥମେ ସେଇ ଧୂଳିକୁ ଉଠାଇ ନିଜେ ଭରିନେଇ, ପରେ ରାଜାଙ୍କ ଆଖି ଓ ମୁକୁଟ ଉପରେ ପକାଇଦିଏ। ଏହିପରି ବୁଝ, ହେ ପକ୍ଷୀରାଜ: ବୁଦ୍ଧିମାନ ଲୋକ ଦୁଷ୍ଟଙ୍କ ସଙ୍ଗ ରଖନ୍ତି ନାହିଁ। କବି ଓ ପଣ୍ଡିତମାନେ ଏହି ନୀତି ଗାନ୍ତି—ନୀଚ ସହ ନ ଝଗଡ଼ା ଭଲ, ନ ମିତ୍ରତା। ହେ ମହାଶୟ, ସଦା ବିରକ୍ତ ରୁହ; କୁକୁରକୁ ଯେପରି ଏଡ଼ାଯାଏ, ଦୁଷ୍ଟକୁ ସେପରି ଏଡ଼ା। କିନ୍ତୁ ମୁଁ ହୃଦୟରେ ଦୁଷ୍ଟ, ଛଳ ଓ କୁଟିଳତାରେ ଡୁବିଥିଲି—ଗୁରୁଙ୍କ ହିତକର ବାକ୍ୟ ମୋତେ ଭଲ ଲାଗିଲା ନାହିଁ।
Verse 222 (दोहा/सोरठा)
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।106(क)।। सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस।।106(ख)।।
eka bāra hara mandira japata raheuṁ siva nāma | gura āyu abhimāna teṃ uṭhi nahiṃ kīnha pranāma ||106(ka)|| so dayāla nahiṃ kaheu kachu ura na roṣa lavalesa | ati agha gura apamānatā sahi nahiṃ sake mahesa ||106(kha)||
ଏକଦିନ ଶିବମନ୍ଦିରରେ ମୁଁ ଶିବନାମ ଜପ କରି ବସିଥିଲି। ଗୁରୁ ଆସିଲେ; ଅହଂକାରରେ ମୁଁ ଉଠିଲି ନାହିଁ, ନ ପ୍ରଣାମ କଲି। ସେ ଦୟାମୟ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ—ତାଙ୍କ ଭିତରେ ରତିମାତ୍ର କ୍ରୋଧ ନଥିଲା। କିନ୍ତୁ ଗୁରୁଅପମାନର ଭୟଙ୍କର ପାପକୁ ମହେଶ ମଧ୍ୟ ସହିପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 223 (चौपाई)
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।। जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।। तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।। जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।। जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।। त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।। बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।। महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।
mandira mājha bhaī nabha-bānī | re hatabhāgya agya abhimānī || yadyapi tava gura keṁ nahiṁ krodhā | ati kṛpāla cita samyaka bodhā || tadapi sāpa saṭha daihauṁ tohī | nīti birodha sohāi na mohī || jauṁ nahiṁ daṇḍa karauṁ khala torā | bhraṣṭa hoi śruti-māraga morā || je saṭha gura sana iriṣā karahīṁ | raurava naraka koṭi juga parahīṁ || tri-jaga joni puni dharahīṁ sarīrā | ayuta janma bhari pāvahīṁ pīrā || baiṭha rahesi ajagara iva pāpī | sarpa hohi khala mala mati byāpī || mahā biṭapa koṭara mahuṁ jāī | rahu adhamādham adha-gati pāī ||
ମନ୍ଦିର ଭିତରେ ଆକାଶରୁ ଏକ ବାଣୀ ଗୁଞ୍ଜିଲା: ‘ହେ ଦୁର୍ଭାଗା, ଅଜ୍ଞାନୀ ଓ ଅହଂକାରୀ! ତୁମ ଗୁରୁ କ୍ରୋଧୀ ନୁହେଁ—ତାଙ୍କ ହୃଦୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୟାମୟ ଓ ଧର୍ମଜ୍ଞ— ତଥାପି, ହେ ଜିଦ୍ଧୀ ମୂର୍ଖ, ମୋତେ ତୁମ ଉପରେ ଶାପ ଦେବାକୁ ହେବ; ନହେଲେ ନୀତିକୁ ଶୋଭା ଦେବ ନାହିଁ। ମୁଁ ଯଦି ତୁମ ଦୁଷ୍ଟତାକୁ ଦଣ୍ଡ ନଦେଉ, ମୋ ‘ବେଦମାର୍ଗ’ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯିବ। ଯେ ଦୁର୍ଜନ ଗୁରୁଙ୍କ ପ୍ରତି ଈର୍ଷ୍ୟା ଧରେ, ସେ ଅନେକ ଯୁଗ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରୌରବ ନରକରେ ପଡ଼େ; ତା’ପରେ ତିନି ଲୋକରେ ପୁନଃପୁନଃ ଦେହ ଧରି, ଅସଂଖ୍ୟ ଜନ୍ମରେ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଭୋଗେ। ତୁମେ ପାପୀ ଅଜଗର ପରି ପଡ଼ି ରହିବ; ସର୍ପ ହେବ, ନୀଚତାରେ ଭରିଥିବା ମଲିନ ମନ ତୁମକୁ ଆବରିବ। କୌଣସି ବଡ଼ ଗଛର କୋଟରରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେଠାରେ ରହ—ନୀଚରୁ ନୀଚ—ଅଧମ ଅବସ୍ଥା ପାଇ।’
Verse 224 (दोहा/सोरठा)
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप।।107(क)।। करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।107(ख)।।
hāhākāra kīnha gura dāruna suni siva sāpa | kaṁpita mohi biloki ati ura upajā paritāpa ||107(ka)|| kari daṇḍavata saprema dvija siva sanmukha kara jori | binaya karata gadagada svara samujhi ghora gati mori ||107(kha)||
ଶିବଙ୍କ ଭୟଙ୍କର ଶାପ ଶୁଣି ଗୁରୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିହ୍ୱଳ ହୋଇ କାନ୍ଦି ଉଠିଲେ; ମୋତେ ଦେଖି ସେ ଭାରି କମ୍ପିଲେ, ହୃଦୟରେ ଦାହକ ଶୋକ ଜାଗି ଉଠିଲା। ତାପରେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପ୍ରେମରେ, ହାତ ଯୋଡ଼ି, ଶିବଙ୍କ ଆଗରେ ସାଷ୍ଟାଙ୍ଗ ପ୍ରଣାମ କଲେ; ଭାବରେ ଗଳା ଅଟକି ଯାଇ, ମୋର ଭୟଙ୍କର ଭାଗ୍ୟ ବୁଝି, ବିନତି କରିଲେ।
Verse 225 (छंद)
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।। निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।। चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।। प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।। त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।। चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।। न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।
namāmīśam īśāna nirvāṇarūpaṁ | vibhuṁ vyāpakaṁ brahma veda-svarūpaṁ | nijaṁ nirguṇaṁ nirvikalpaṁ nirīhaṁ | cidākāśam ākāśavāsaṁ bhaje’ham || nirākāram oṁkāramūlaṁ turīyaṁ | girā jñāna gotītam īśaṁ girīśaṁ || karālaṁ mahākāla kālaṁ kṛpālaṁ | guṇāgāra saṁsārapāraṁ nato’ham || tuṣārādri saṅkāśa gauraṁ gabhīraṁ | manobhūta koṭi prabhā śrīśarīraṁ || sphuranmauli kallolinī cāru gaṅgā | lasadbhāla bālendu kaṇṭhe bhujaṅgā || calatkuṇḍalaṁ bhrū sunetraṁ viśālaṁ | prasannānanaṁ nīlakaṇṭhaṁ dayālaṁ || mṛgādhīśacarmāmbaraṁ muṇḍamālaṁ | priyaṁ śaṅkaraṁ sarvanāthaṁ bhajāmi || pracaṇḍaṁ prakṛṣṭaṁ pragalbhaṁ pareśaṁ | akhaṇḍaṁ ajaṁ bhānukoṭiprakāśaṁ || trayaḥśūla nirmūlanaṁ śūlapāṇiṁ | bhaje’haṁ bhavānīpatiṁ bhāvagamyaṁ || kalātīta kalyāṇa kalpāntakārī | sadā sajjanānandadātā purārī || cidānandasaṁdoha mohāpahārī | prasīda prasīda prabho manmathārī || na yāvad umānātha pādāravindaṁ | bhajantīha loke pare vā narāṇāṁ || na tāvatsukhaṁ śānti santāpanāśaṁ | prasīda prabho sarvabhūtādhivāsaṁ || na jānāmi yogaṁ japaṁ naiva pūjāṁ | nato’haṁ sadā sarvadā śambhu tubhyaṁ || jarā janma duḥkhaugha tātapyamānaṁ | prabho pāhi āpannam āmīśa śambho ||
ମୁଁ ପ୍ରଣାମ କରେ ସେଇ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ—ପରମ ଶାସକଙ୍କୁ—ଯାହାଙ୍କ ସ୍ୱଭାବ ମୋକ୍ଷସ୍ୱରୂପ; ସର୍ବଶକ୍ତିମାନ, ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ପରବ୍ରହ୍ମ, ବେଦର ଜୀବନ୍ତ ମୂର୍ତ୍ତି। ମୁଁ ସେଇ ଏକଙ୍କୁ ଭଜେ, ଯିଏ ସତ୍ୟରେ ଗୁଣାତୀତ, ମନୋକଳ୍ପନାରୁ ମୁକ୍ତ, ନିଷ୍କାମ; ଚେତନାର ଆକାଶ, ଅସୀମ ଆକାଶତତ୍ତ୍ୱରେ ନିବାସୀ। ନିରାକାର, ଓଁକାର-ମୂଳ, ତିନି ଅବସ୍ଥାର ପରେ ଥିବା ତୁରୀୟ; ବାଣୀ ଓ ଜ୍ଞାନର ପାର, ପର୍ବତାଧିପତି ପ୍ରଭୁ। ଭୟଙ୍କର ତଥା କରୁଣାମୟ—ମହାକାଳ, କାଳଙ୍କର କାଳ; ଗୁଣର ଭଣ୍ଡାର, ଭବସାଗର ପାର କରାଇବାଳା—ତାଙ୍କୁ ମୁଁ ପ୍ରଣାମ କରେ। ହିମଶିଖର ପରି ଶୁଭ୍ର, ଗଭୀର; ଯାହାଙ୍କ ମଙ୍ଗଳମୟ ଦେହ କୋଟି କାମଦେବଙ୍କ ତେଜକୁ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କରେ; ଯାହାଙ୍କ ଦୀପ୍ତ ଜଟାମୁକୁଟରେ ସୁନ୍ଦର ଗଙ୍ଗା ଉଛଳେ; ଲଳାଟରେ ଚନ୍ଦ୍ରକଳା ଶୋଭେ; କଣ୍ଠରେ ସର୍ପ; ଚଳନଶୀଳ କୁଣ୍ଡଳ, ବିଶାଳ ସୁନ୍ଦର ନୟନ; ଶାନ୍ତ ମୁଖ; ନୀଳକଣ୍ଠ, କରୁଣାମୟ; ବାଘଛାଲ ପିନ୍ଧିଥିବା, ମୁଣ୍ଡମାଳାଧାରୀ—ପ୍ରିୟ ଶଙ୍କର, ସର୍ବେଶ୍ୱର, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଆରାଧନା କରେ। ଉଗ୍ର, ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଧୀର, ପରମ; ଅଖଣ୍ଡ, ଅଜ, କୋଟି ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତ; ତ୍ରିଶୂଳଧାରୀ, ତ୍ରିତାପ ଉଚ୍ଛେଦକ—ଭବାନୀପତିଙ୍କୁ ମୁଁ ଭଜେ, ଯିଏ ଭକ୍ତିଦ୍ୱାରା ପ୍ରାପ୍ୟ। ମାପର ପାର, ମଙ୍ଗଳମୟ; କଳ୍ପାନ୍ତକାରୀ; ସଦା ସଜ୍ଜନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦଦାତା, ତ୍ରିପୁରାନ୍ତକ; ଚିଦାନନ୍ଦ-ଘନ, ମୋହନାଶକ—କୃପା କର, କୃପା କର, ହେ କାମଶତ୍ରୁ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମନୁଷ୍ୟ ଏଠି କିମ୍ବା ପରଲୋକରେ ଉମାପତିଙ୍କ ପଦପଦ୍ମକୁ ଭଜନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସୁଖ ନାହିଁ, ଶାନ୍ତି ନାହିଁ, ଦାହକ ଦୁଃଖରୁ ମୁକ୍ତି ନାହିଁ—ହେ ସର୍ବଭୂତାନ୍ତର୍ଯାମୀ, କୃପା କର! ମୁଁ ଯୋଗ ଜାଣେ ନାହିଁ, ଜପ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ, ପୂଜା ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ହେ ଶମ୍ଭୁ, ସଦା ସର୍ବଦା ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରେ। ବୃଦ୍ଧାବସ୍ଥା, ଜନ୍ମ ଓ ଦୁଃଖର ପ୍ରବାହରେ ପୀଡ଼ିତ—ହେ ପ୍ରଭୁ, ମୋତେ ରକ୍ଷା କର; ମୁଁ ଶରଣ ନେଇଛି, ହେ ଶିବ!
Verse 226 (श्लोक)
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।
rudrāṣṭakam idaṁ proktaṁ vipreṇa haratoṣaye | ye paṭhanti narā bhaktyā teṣāṁ śambhuḥ prasīdati ||9||
ହରଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରିବା ପାଇଁ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଏହି ରୁଦ୍ରାଷ୍ଟକ କହିଥିଲେ। ଯେମାନେ ଭକ୍ତିରେ ଏହା ପାଠ କରନ୍ତି, ଶମ୍ଭୁ ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ କୃପା କରନ୍ତି।
Verse 227 (दोहा/सोरठा)
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।। जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।। तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।। संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।
suni binatī sarabagya siva dekhi bripra anurāgu | phuni mandira nabha-bānī bhaī dvijabara bara māgu ||108(ka)|| jauṁ prasanna prabhu mo para nātha dīna para nehu | nija pada bhagati dei prabhu phuni dūsara bara dehu ||108(kha)|| tava māyā basa jīva jaṛa santata phirai bhulāna | tehi para krodha na kari-a prabhu kṛpā siṁdhu bhagavāna ||108(ga)|| saṅkara dīnadayāla aba ehi para hohu kṛpāla | sāpa anugraha hoi jehiṁ nātha thorehīṁ kāla ||108(gha)||
ବିନତି ଶୁଣି, ସର୍ବଜ୍ଞ ଶିବ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ପ୍ରେମଭକ୍ତି ଦେଖି, ମନ୍ଦିର ଭିତରୁ ପୁଣି ଏକ ବାଣୀ ଉଠିଲା—‘ହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବର ମାଗ।’ ‘ହେ ନାଥ, ଯଦି ପ୍ରଭୁ ମୋପରେ ପ୍ରସନ୍ନ, ଦୀନଙ୍କ ଉପରେ ପ୍ରେମ କରି, ଆପଣଙ୍କ ପଦରେ ଭକ୍ତି ଦିଅନ୍ତୁ, ହେ ପ୍ରଭୁ—ଏବଂ ଦ୍ୱିତୀୟ ଏକ ବର ମଧ୍ୟ ଦିଅନ୍ତୁ। ଆପଣଙ୍କ ମାୟାର ବଶରେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଜୀବ ସଦା ମୋହିତ ହୋଇ ଭ୍ରମେ; ହେ ପ୍ରଭୁ, ଦୟାସାଗର, ତାଙ୍କ ଉପରେ କ୍ରୋଧ କରିବେ ନାହିଁ, ହେ ଦେବ। ହେ ଶଙ୍କର, ଦୀନଦୟାଳୁ, ଏହି ଜଣକୁ ଏବେ କୃପା କରନ୍ତୁ: ଶାପଟି ଉପକାର ହେଉ, ହେ ସ୍ୱାମୀ, ଏବଂ ସେହି ମଧ୍ୟ ଅତି ଶୀଘ୍ର।’
Verse 228 (दोहा/सोरठा)
-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान।।111(क)।। क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।।111(ख)।।
bāraṃbāra sakopa muni karai nirūpana gyāna | maiṁ apaneṁ mana baiṭha taba karauṁ bibidha anumāna ||111(ka)|| krodha ki dvaita-buddhi binu dvaita ki binu agyāna | māyābasa parichinna jaṛa jīva ki īsa samāna ||111(kha)||
ପୁଣି ପୁଣି ଋଷି କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ଞାନର ଉପଦେଶ ଦେଲେ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ମନ ଭିତରେ ବସି ନାନା ତର୍କ-କଳ୍ପନା ଗଢ଼ୁଥିଲି। ଦ୍ୱୈତବୁଦ୍ଧି ବିନା କ୍ରୋଧ କିପରି? ଅଜ୍ଞାନ ବିନା ଦ୍ୱୈତ କିପରି? ମାୟାବଦ୍ଧ, ସୀମିତ ଓ ମନ୍ଦ ଜୀବ—ସେ କିପରି ପ୍ରଭୁ ସମାନ ହେବ?
Verse 229 (चौपाई)
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।। काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।। भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।। पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।। हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।। एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।। सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
kabahuṁ ki dukha saba kara hita tākeṁ | tehi ki daridra parasa mani jākeṁ || paradrohī kī hohiṁ nisaṅkā | kāmī puni ki rahahiṁ akalaṅkā || baṃsa ki raha dvija anahita kīnhẽ | karma ki hohiṁ svarūpahi cīnhẽ || kāhū sumati ki khala saṅga jāmī | subha gati pāva ki paratriya gāmī || bhava ki parahiṁ paramātmā biṃdaka | sukhī ki hohiṁ kabahuṁ hariniṃdaka || rāju ki rahai nīti binu jānẽ | agha ki rahahiṁ haricarita bakhānẽ || pāvana jasa ki puṇya binu hoī | binu agha ajasa ki pāvai koī || lābhu ki kichu hari bhagati samānā | jehi gāvahiṁ śruti santa purānā || hāni ki jaga ehi sama kichu bhāī | bhaji-a na rāmahi nara tanu pāī || agha ki pisunatā sama kachu ānā | dharma ki dayā sarisa harijānā || ehi bidhi amiti juguti mana gunūṁ | muni upadesa na sādara sunūṁ || puni puni saguna pachcha maiṁ ropā | taba muni boleu bacana sakopā || mūṛha parama sikha deuṁ na mānasī | uttara pratiuttara bahu ānasī || satya bacana bisvāsa na karahī | bāyasa iva sabahī te ḍarahī || saṭha svapachcha taba hṛdayaṁ bisālā | sapadi hohi pachchī caṇḍālā || līnh śrāpa maiṁ sīsa caṛhāī | nahiṁ kachu bhaya na dīnatā āī ||
ସମସ୍ତଙ୍କ ଭଲ ପାଇଁ ଦୁଃଖ କେବେ ହୋଇପାରେ? ପାରସପଥର ଥାଇ ଦରିଦ୍ର କିଏ ହେବ? ଅନ୍ୟଙ୍କୁ ଦ୍ରୋହ କରୁଥିବା ଭୟହୀନ କିପରି? କାମାନ୍ଧ ନିର୍ମଳ କିପରି ରହିବ? ପୁରୋହିତ ଅନର୍ଥ କଲେ ବଂଶ କିପରି ଟିକିବ? କର୍ମର ସତ୍ୟ ରୂପ ଅପରିଚିତ ରହିପାରେ କି? ଦୁଷ୍ଟ ସଙ୍ଗ ରଖିଲେ ସୁବୁଦ୍ଧି କିପରି ଜାଗିବ? ପରସ୍ତ୍ରୀଗାମୀର ଶୁଭ ଗତି କିପରି? ପରମାତ୍ମାଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରୁଥିବାକୁ ଜଗତ କିପରି ସହିବ? ହରିନିନ୍ଦକ କେବେ ସୁଖୀ ହେବ? ନୀତି-ଧର୍ମ ନ ଜାଣି ରାଜ୍ୟ କିପରି ଟିକିବ? ହରିଲୀଳା ଗାଇଲେ ପାପ କିପରି ରହିବ? ପୁଣ୍ୟ ବିନା ସୁଯଶ କିପରି? ଅପକର୍ମ ବିନା ଅପଯଶ କିପରି ମିଳିବ? ବେଦ, ସନ୍ତ ଓ ପୁରାଣ ଯେ ହରିଭକ୍ତିକୁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି, ସେପରି ଲାଭ ଆଉ କଣ? ମନୁଷ୍ୟଦେହ ପାଇ ମଧ୍ୟ ଯଦି ରାମଙ୍କୁ ଭଜେ ନାହିଁ—ଏପରି ହାନି ପୃଥିବୀରେ ଆଉ କଣ? ପରନିନ୍ଦା ପରି ପାପ କିଛି ଅଛି କି? ହରିଜ୍ଞାନୀମାନେ କହନ୍ତି—ଦୟା ପରି ଧର୍ମ ଆଉ କଣ? ଏଭଳି ମୁଁ ମନରେ ଅନନ୍ତ ତର୍କ ଗଣୁଥିଲି, ଏବଂ ଋଷିଙ୍କ ଉପଦେଶକୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଶୁଣିଲି ନାହିଁ। ପୁଣି ପୁଣି ‘ମୋ ପକ୍ଷ’ ବୋଲି ସଗୁଣର ଦଳୀୟ ଜିଦ ରୋପିଲି; ତେବେ ଋଷି କ୍ରୋଧରେ କହିଲେ— ‘ହେ ମହାମୂର୍ଖ! ଯେ କେବଳ ଉତ୍ତର ଉପରେ ଉତ୍ତର ଗଢ଼େ, ମୁଁ ତାକୁ ଶିଖାଏ ନାହିଁ। ତୁ ଶୁଦ୍ଧ ବାଣୀରେ ବିଶ୍ୱାସ କରୁନାହୁଁ; କାଉ ପରି ସମସ୍ତେ ତୋତେ ଭୟ କରନ୍ତି। ଦୁର୍ଭାଗା! ତୋ ହୃଦୟ ନିଜପକ୍ଷପାତରେ ଫୁଲିଯାଇଛି; ଏମୁହୂର୍ତ୍ତେ ତୁ ଅପବିତ୍ର ପକ୍ଷୀ ହେବୁ।’ ମୁଁ ଶାପକୁ ମସ୍ତକରେ ଧରିଲି; ମୋ ମନରେ ନ ଭୟ ଜାଗିଲା, ନ ନମ୍ରତା।
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