तत्रातिष्ठन्महाराजो रूपमिन्द्रस्य धारयन् । स््नुषां तां प्रतिजग्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,वहाँ इन्द्रके समान रूप धारण किये कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर भी खड़े थे। उन्होंने भी उत्तराको पुत्रवधूके रूपमें अंगीकार किया
tatrātiṣṭhan mahārājo rūpam indrasya dhārayan | snuṣāṃ tāṃ pratijagrāha kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ ||
ସେଠାରେ ଇନ୍ଦ୍ରସଦୃଶ ରୂପ ଧାରଣ କରି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ; ସେ ମଧ୍ୟ ଉତ୍ତରାଙ୍କୁ ପୁତ୍ରବଧୂ ଭାବେ ବିଧିବତ୍ ଗ୍ରହଣ କଲେ।
वैशम्पायन उवाच