Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly
इस प्रकार श्रीमह्या भारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नगरप्रवेशके लिये अस्त्रस्थापनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदाशिवाम् | तान् वै तारयसे पापात् पड़के गामिव दुर्बलाम् 'पृथ्वीका भार उतारनेवाली पुण्यमयी देवि! तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो। जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं, निश्चय ही तुम उन्हें पाप और उसके फलस्वरूप होनेवाले दुःखसे उबार लेती हो; ठीक उसी तरह, जैसे कोई पुरुष कीचड़में फँसी हुई दुर्बल गायका उद्धार कर देता है"
bhārāvataraṇe puṇye ye smaranti sadāśivām | tān vai tārayase pāpāt paṅke gām iva durbalām ||
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବିରାଟପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ପାଣ୍ଡବପ୍ରବେଶପର୍ବରେ ନଗରପ୍ରବେଶାର୍ଥ ଅସ୍ତ୍ରସ୍ଥାପନବିଷୟକ ପଞ୍ଚମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ହେ ପୁଣ୍ୟମୟୀ ଦେବୀ, ପୃଥିବୀର ଭାର ହରଣକାରିଣୀ, ସଦା ଶିବା ଓ ସର୍ବହିତକାରିଣୀ! ଯେମାନେ ତୁମକୁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ପାପ ଓ ପାପଫଳଜନିତ ଦୁଃଖରୁ ଉଦ୍ଧାର କର—ଯେପରି କାଦୁଆରେ ଫସିଥିବା ଦୁର୍ବଳ ଗାଈକୁ ଜଣେ ପୁରୁଷ ବାହାର କରି ଦେଉଥାଏ।
वैशम्पायन उवाच