अध्याय ५८ — वानरध्वजस्य महेन्द्रास्त्रप्रयोगः
Chapter 58: Arjuna’s Deployment of the Indra-Weapon
ततो नागा रथाश्रैव वाजिनश्न विशाम्पते । शोणिताक्ता व्यदृश्यन्त पुष्पिता इव किंशुका:,जनमेजय! उस समय हाथीसवार, रथी और घुड़सवार लोहूलुहान होकर फूले हुए पलाश वृक्षके समान दिखायी देते थे
tato nāgā rathāś caiva vājināś ca viśāmpate | śoṇitāktā vyadṛśyanta puṣpitā iva kiṃśukāḥ, janamejaya |
ତାପରେ, ହେ ଜନମେଜୟ! ହାତୀସୱାର, ରଥୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନେ ରକ୍ତରେ ଲେପିତ ହୋଇ, ପୁଷ୍ପିତ କିଂଶୁକ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ପରି ଦିଶୁଥିଲେ।
वैशम्पायन उवाच