शमीवृक्षस्थायुधप्रकाशनम् / Revelation and Identification of the Weapons on the Śamī Tree
छन्न तथा त॑ सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत । वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! इस प्रकार सभी कौरव अलग-अलग विचार-विमर्श करते थे, किंतु छद्गमावेषमें छिपे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा उत्तरको देखकर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते थे ।। (दुर्योधन उवाचेदं सैनिकान् रथसत्तमान् ।। अर्जुनो वासुदेवो वा राम: प्रद्युम्न एव वा । ते हि नः प्रतिसंयातुं संग्रामे न च शक््नुयु: ।। अन्यो वा क्लीबरूपेण यद्यागच्छेद् गवां पदम् । अर्पयित्वा शरैस्ती&3्षणै: पातयिष्यामि भूतले ।। कथमेकतरस्तेषां समस्तान् योधयेत् कुरून् । अर्जुनो नेति चेत्येनं न व्यवस्यन्ति ते पुनः । इति सम कुरव: सर्वे मन्त्रयन्तो महारथा: ।। दृढवेधी महासत्त्व: शक्रतुल्यपराक्रम: । अद्यागच्छति ये योद्धुं सर्व संशयितं बलम् ।। न चाप्यन्यं नरं तत्र व्यवस्यन्ति धनंजयात् ।) उस समय दुर्योधनने रथियोंमें श्रेष्ठ समस्त सैनिकोंसे इस प्रकार कहा--“अर्जुन, श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न भी संग्रामभूमिमें हमलोगोंका सामना नहीं कर सकते। यदि कोई दूसरा मनुष्य ही हीजड़ेका रूप धारण करके इन गौओंके स्थानपर आयेगा, तो मैं उसे अपने तीखे बाणोंसे घायल करके धरतीपर सुला दूँगा। यह उपर्युक्त वीरोंमेंसे ही कोई एक हो, तो भी अकेला समस्त कौरवोंके साथ कैसे युद्ध कर सकता है?” उधर “यह अर्जुन ही तो नहीं है? नहीं, वे नहीं जान पड़ते।” इस प्रकार आपसमें मन्त्रणा करते हुए समस्त कौरव महारथी अर्जुनके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाते थे। कई एक कहने लगे कि “अर्जुनकी शक्ति महान् है। उनका पराक्रम इन्द्रके समान है। वे दृढ़तापूर्वक शत्रुओंका वेधन करनेवाले हैं। यदि वे ही आज युद्ध करनेके लिये आ रहे हैं, तब तो समस्त सैनिकोंका जीवन संशयमें पड़ गया।” वे इस मनुष्यको वहाँ अर्जुनसे भिन्न भी नहीं निश्चित कर पाते थे ।। उत्तरं तु प्रधावन्तमभिद्रुत्य धनंजय: । गत्वा पदशतं तूर्ण केशपक्षे परामृशत्,उधर अर्जुनने भागते हुए उत्तरका पीछा करके सौ कदम दूर जाते-जाते उसके केश पकड़ लिये
channaḥ tathā te satreṇa pāṇḍavaṁ prekṣya bhārata | (duryodhana uvācedaṁ sainikān rathasattamān) arjuno vāsudevo vā rāmaḥ pradyumna eva vā | te hi naḥ pratisaṁyātuṁ saṅgrāme na ca śaknuyuḥ || anyo vā klībarūpeṇa yadyāgacched gavāṁ padam | arpayitvā śarais tīkṣṇaiḥ pātayiṣyāmi bhūtale || katham ekataraḥ teṣāṁ samastān yodhayet kurūn | arjuno neti cety enaṁ na vyavasyanti te punaḥ || iti sma kuravaḥ sarve mantrayanto mahārathāḥ | dṛḍhavedhī mahāsattvaḥ śakratulyaparākramaḥ | adyāgacchati ye yoddhuṁ sarvaṁ saṁśayitaṁ balam || na cāpy anyaṁ naraṁ tatra vyavasyanti dhanañjayāt ||
ହେ ଭାରତ! ଏଭଳି କୌରବମାନେ ନିଜ ନିଜ ଯୁକ୍ତିରେ ଆବୃତ ହୋଇ, ଆଖି ସାମ୍ନାରେ ପାଣ୍ଡବକୁ ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଦୃଢ଼ ନିଷ୍କର୍ଷକୁ ପହଞ୍ଚିପାରିଲେ ନାହିଁ।
(दुर्योधन उवाचेदं सैनिकान् रथसत्तमान् ।।