उत्तरो भयविषण्णः — बृहन्नडेन धैर्योपदेशः
Uttara’s Panic and Bṛhannadā’s Stabilizing Counsel
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटप्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी गौओंके अपहरणके प्रसंगमें गोपवचनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३५ ॥। हि >> न () है आय षट्त्रिशो5ध्याय: उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना उत्तर उवाच अद्याहमनुगच्छेयं दृढ्धन्वा गवां पदम् | यदि मे सारथि: कश्रनिद् भवेदश्वेषु कोविद:,उत्तर बोला--गोपप्रवर! मेरा धनुष तो बहुत मजबूत है। यदि मेरे पास घोड़े हाँकनेकी कलामें कुशल कोई सारथि होता, तो आज मैं अवश्य ही उन गौओंके पदचिह्लोंका अनुसरण करता
uttara uvāca | adyāham anugaccheyaṁ dṛḍhadhanvā gavāṁ padam | yadi me sārathiḥ kaścid bhaved aśveṣu kovidaḥ ||
ଉତ୍ତର କହିଲେ—ହେ ଗୋପଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋର ଧନୁ ଦୃଢ଼। ଯଦି ଘୋଡ଼ା ଚାଳନାରେ କୁଶଳ କୌଣସି ସାରଥି ମୋ ପାଖରେ ଥାଆନ୍ତା, ତେବେ ଆଜି ନିଶ୍ଚୟ ମୁଁ ସେଇ ଗାଈମାନଙ୍କ ପଦଚିହ୍ନ ଅନୁସରଣ କରିଥାଆନ୍ତି।
उत्तर उवाच