त्रिगर्त-मात्स्य-संग्रामः
The Trigarta–Matsya Engagement at Twilight
एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिन: । कवचानि च चित्राणि दृढानि च मृदूनि च,“अतः इनके लिये भी ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित रथ दो। ये भी अपने अंगोंमें ऊपरसे दृढ़, किंतु भीतरसे कोमल और विचित्र कवच धारण कर लें। फिर इन्हें भी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र अर्पित करो। इनके अंग और स्वरूप वीरोचित जान पड़ते हैं। इन वीर पुरुषोंकी भुजाएँ गजराजकी सूँड़दण्डकी भाँति शोभा पाती हैं
eteṣām api dīyantāṃ rathā dhvajapatākinaḥ | kavacāni ca citrāṇi dṛḍhāni ca mṛdūni ca ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଧ୍ୱଜ ଓ ପତାକାରେ ଶୋଭିତ ରଥ ଦିଆଯାଉ। ଏମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ସୁନ୍ଦର କବଚ ଦିଆଯାଉ—ବାହାରେ ଦୃଢ, ଭିତରେ ମୃଦୁ—ଯେପରି ସେମାନେ ଭଲଭାବେ ସନ୍ନଦ୍ଧ ହୋଇପାରିବେ।”
वैशम्पायन उवाच