Virāṭa-parva Adhyāya 22 — Draupadī’s Abduction Attempt and Bhīma’s Suppression of the Kīcakas
प्रापितं ते मया वित्त बहुरूपमनन्तकम् | यत् कृतं धनरत्नाब्यं दासीशतपरिच्छदम्,'सुभ्रु! मैंने अनेक प्रकारका जो अनन्त धन संचित किया है, वह सब तुम्हें भेंट कर दिया तथा मेरा जो धन-रत्नादिसे सम्पन्न, सैकड़ों दासी आदि उपकरणोंसे युक्त, रूप- लावण्यवती युवतियोंसे अलंकृत तथा क्रीडा-विलाससे सुशोभित गृह एवं अन्तःपुर है, वह सब तुम्हारे लिये ही निछावर करके मैं सहसा तुम्हारे पास चला आया हूँ
vaiśampāyana uvāca | prāpitaṃ te mayā vittaṃ bahurūpam anantakam | yat kṛtaṃ dhana-ratnāḍhyaṃ dāsī-śata-paricchadam ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ନାନାପ୍ରକାରର, ଯେନ ଅନନ୍ତ ଧନ ସଞ୍ଚୟ କରିଥିଲି, ସେ ସବୁ ତୁମକୁ ପହଞ୍ଚାଇଦେଲି; ଏବଂ ଯାହା କିଛି ମୁଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଇଛି—ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ରତ୍ନରେ ସମୃଦ୍ଧ, ଶତଶତ ଦାସୀ ଓ ଗୃହୋପକରଣରେ ଯୁକ୍ତ—ସେ ସବୁ ମଧ୍ୟ ତୁମ ପାଇଁ ଅର୍ପିତ।
वैशम्पायन उवाच