द्रौपद्याः भीमसेन-प्रबोधनम्
Draupadī Awakens Bhīmasena
आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च । मैं दासियोंको आज्ञा देता हूँ; वे तुम्हारे लिये सोनेके हार, शंखकी चूड़ियाँ, विभिन्न नगरोंमें बने हुए शुभ्र सुवर्णमय कर्णफूलके जोड़े, सुन्दर मणि-रत्नमय आभूषण, रेशमी साड़ियाँ तथा मृगचर्म आदि ले आवें |। अस्ति मे शयन दिव्यं त्वदर्थमुपकल्पितम् । एहि तत्र मया सार्ध पिबस्व मधुमाधवीम्,मैंने तुम्हारे लिये पहलेसे ही यह दिव्य शय्या बिछा रखी है। आओ, यहाँ मेरे साथ बैठकर मधुर माध्वीरसका पान करो
āharantu ca vastrāṇi kauśikāny ajināni ca | asti me śayanaṁ divyaṁ tvad-artham upakalpitam | ehi tatra mayā sārdhaṁ pibasva madhu-mādhavīm ||
ଦାସୀମାନେ ରେଶମୀ ବସ୍ତ୍ର ଓ ମୃଗଚର୍ମ ଆଦି ମଧ୍ୟ ଆଣନ୍ତୁ। ତୁମ ପାଇଁ ମୁଁ ଦିବ୍ୟ ଶୟନ ପୂର୍ବରୁ ସଜାଇ ରଖିଛି। ଆସ, ସେଠାରେ ମୋ ସହ ବସି ମଧୁର ମାଧ୍ୱୀ ମଦ୍ୟ ପିଅ।
कीचक उवाच