Adhyāya 14: Sudēṣṇā Sends Sairandhrī to Kīcaka’s House (सुदेष्णा–सैरन्ध्री–कीचक संवादः)
का देवरूपा हृदयड्भमा शुभे ह्याचक्ष्व मे कस्य कुतो5त्र शोभने । चित्त हि निर्मथ्य करोति मां वशे न चान्यदत्रौषधमस्ति मे मतम्,'शुभे! यह कौन है? इसका रूप देवांगनाके समान है। यह मेरे हृदयमें समा गयी है। शोभने! मुझे बताओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे आयी है? यह मेरे मनको मथकर मुझे वशमें किये लेती है। मेरे इस रोगकी ओषधि इसकी प्राप्तिके सिवा दूसरी कोई नहीं जान पड़ती
kā devarūpā hṛdayaṅgamā śubhe hy ācakṣva me kasya kuto ’tra śobhane | cittaṃ hi nirmathya karoti māṃ vaśe na cānyad atrauṣadham asti me matam ||
“ଶୁଭେ! ଦେବରୂପା ଏହି ନାରୀ କିଏ, ଯେ ମୋ ହୃଦୟରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛି? ହେ ଶୋଭନେ, କୁହ—ସେ କାହାର ସ୍ତ୍ରୀ, ଏବଂ କେଉଁଠୁ ଏଠାକୁ ଆସିଛି? ସେ ମୋ ଚିତ୍ତକୁ ମଥି ମୋତେ ବଶ କରୁଛି; ଏହି ରୋଗର ଔଷଧ ତାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବା ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କିଛି ମୋତେ ଦିଶୁନାହିଁ।”
वैशम्पायन उवाच