Adhyaya 91
Udyoga ParvaAdhyaya 9132 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; शान्ति-प्रयास विफल होने की ओर झुकता हुआ, कौरव-पक्ष का हठ बढ़ता प्रतीत होता है।

Adhyaya 91

कृष्णेन विदुरं प्रति आगमन-हेतु-निवेदनम् / Krishna explains the purpose of his coming to Vidura

Upa-parva: Vidurāgamana / Kṛṣṇa–Vidura Saṃvāda (Udyoga-parva sub-episode; Chapter 91 context)

This chapter presents a compact ethical-political monologue in which Kṛṣṇa, addressed in the text as “Bhagavān,” acknowledges Vidura’s discerning counsel and requests attentive hearing. He states that he knows the moral disorder (daurātmya) surrounding the Dhārtarāṣṭra party and the hostile alignment among kṣatriyas, yet he has come to the Kauravas with a pacific intent. Kṛṣṇa frames mediation as dharma: one who attempts, to the best of capacity, to perform a righteous task gains merit even if success is not achieved. He distinguishes between merely contemplating wrongdoing and actually performing it, asserting that moral consequence adheres to enacted choices rather than idle thought. He declares his aim to prevent the mutual destruction of Kurus and Sṛñjayas and identifies the crisis as arising from Duryodhana and Karṇa’s agency and influence. The chapter further defines the ethical profile of friendship: a true friend exerts effort—even forcibly if necessary—to restrain a companion from harmful conduct; failure to intervene in a kin-splitting conflict is censured. Kṛṣṇa anticipates possible suspicion from Duryodhana yet maintains that his duty is to speak beneficial, dharma-artha grounded words to Dhṛtarāṣṭra and his ministers for the welfare of all stakeholders. The narration closes with Vaiśaṃpāyana describing Kṛṣṇa resting after speaking.

Chapter Arc: रात्रि-विश्राम के समय, भोजन के बाद, श्रीकृष्ण के समीप विदुर का आना—और उनके मन में उठती आशंका कि यह दूत-यात्रा धर्म की रक्षा है या विनाश की ओर एक कदम। → विदुर श्रीकृष्ण को दुर्योधन की मानसिकता का कठोर चित्र दिखाते हैं—मोह, लोभ और अधर्म की जड़ें; वह सज्जन को भी दुष्ट समझने की भ्रान्ति में है, पराये धन की लालसा में जलता है, और शान्ति-प्रयास को कमजोरी मानता है। विदुर बताते हैं कि दुर्योधन भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, जयद्रथ जैसे महारथियों के सहारे उन्मत्त है और पाण्डवों को तुच्छ समझकर युद्ध को ही नीति मान बैठा है। → विदुर का निर्णायक प्रतिरोध: ‘जहाँ बहुसंख्यक दुष्ट-चित्त शत्रु बैठे हों, वहाँ आप कैसे जाएंगे?’—यह प्रश्न श्रीकृष्ण की दूत-यात्रा को सीधे संकट के केंद्र में रख देता है, मानो धर्म स्वयं अग्नि-परीक्षा मांग रहा हो। → अध्याय का निष्कर्ष इस चेतावनी में है कि धृतराष्ट्र-पुत्रों ने शान्ति के प्रति मन बंद कर लिया है; श्रीकृष्ण का जाना केवल समझौते का प्रयास नहीं, बल्कि अधर्म के सामने धर्म की अंतिम वाणी बनकर खड़ा होना है। → अगले प्रसंग की देहरी पर भाव-उछाल: श्रीकृष्ण के दर्शन से उमड़ता प्रेम और उनकी अन्तर्यामी सत्ता का स्मरण—अब प्रश्न यह है कि यह दिव्य दूत-यात्रा दुर्योधन के हृदय को बदलेगी या युद्ध को अपरिहार्य कर देगी।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ “लोक हैं।] ३. जो दुष्ट नहीं है, उसे भी दुष्ट समझना मोह है। २. दूसरेके धनको हर लेनेकी इच्छाका नाम लोभ है। द्विनवतितमो< ध्याय: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना वैशम्पायन उवाच त॑ भुक्तवन्तमाश्वस्तं निशायां विदुरोड5ब्रवीत्‌ । नेदं सम्यग्‌ व्यवसितं केशवागमनं तव

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାତିରେ ସେ ଭୋଜନ କରି ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ହେବା ପରେ, ବିଦୁର ତାଙ୍କୁ କହିଲେ—“କେଶବ! ଆପଣଙ୍କ ଏଠାକୁ ଆସିବାର ଏହି ନିଶ୍ଚୟ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ବିଚାରିତ ଲାଗୁନାହିଁ।”

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! रातमें जब भगवान्‌ श्रीकृष्ण भोजन करके विश्राम कर रहे थे, उस समय विदुरजीने उनसे कहा--“केशव! आपने जो यहाँ आनेका विचार किया, यह मेरी समझमें अच्छा नहीं हुआ ।। अर्थधर्मातिगो मन्द: संरम्भी च जनार्दन । मानघ्नो मानकामश्न वृद्धानां शासनातिग:,“जनार्दन! मन्दमति दुर्योधन धर्म और अर्थ दोनोंका उल्लंघन कर चुका है। वह क्रोधी, दूसरोंके सम्मानको नष्ट करनेवाला और स्वयं सम्मान चाहनेवाला है। उसने बड़े-बूढ़े गुरुजनोंके आदेशको भी ठुकरा दिया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ରାତିରେ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଭୋଜନ କରି ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିବାବେଳେ ବିଦୁର ତାଙ୍କୁ କହିଲେ—“କେଶବ! ଆପଣଙ୍କ ଏଠାକୁ ଆସିବାର ଭାବନା ମୋ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଭଲ ନୁହେଁ। ଜନାର୍ଦନ! ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମ—ଦୁହିଁକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିଛି। ସେ କ୍ରୋଧୀ; ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମାନ ନଷ୍ଟ କରେ, ନିଜେ ମାନ ଚାହେ; ଏବଂ ବୃଦ୍ଧ ଓ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ଆଦେଶକୁ ମଧ୍ୟ ଲଂଘନ କରିଛି।”

Verse 3

धर्मशास्त्रातिगो मूढो दुरात्मा प्रग्रह॑ गत: । अनेय: श्रेयसां मन्दो धार्तराष्ट्रो जनार्दन,'प्रभो! मूढ़ धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन धर्मशास्त्रोंकी भी आज्ञा नहीं मानता; सदा अपना ही हठ रखता है। उस दुरात्माको सन्मार्गपर ले आना असम्भव है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମୂଢ଼ ଓ ଦୁରାତ୍ମା; ଧର୍ମଶାସ୍ତ୍ରର ସୀମା ଅତିକ୍ରମ କରି ନିଜ ହଠର ଗ୍ରହଣରେ ପଡ଼ିଛି। ଯାହା ସତ୍ୟ ଶ୍ରେୟସ୍କର, ତାହା ଗ୍ରହଣରେ ସେ ମନ୍ଦ; ତାକୁ କଲ୍ୟାଣମାର୍ଗକୁ ଆଣିବା ଅସମ୍ଭବ।

Verse 4

कामात्मा प्राज्ञमानी च मित्रध्रुक्‌ सर्वशड्कितः । अकर्ता चाकृतज्ञश्न त्यक्तधर्मा प्रियानृत:,“उसका मन भोगोंमें आसक्त है, वह अपनेको पण्डित मानता, मित्रोंके साथ द्रोह करता और सबको संदेहकी दृष्टिसे देखता है। वह स्वयं तो किसीका उपकार करता ही नहीं, दूसरोंके किये हुए उपकारको भी नहीं मानता। वह धर्मको त्यागकर असत्यसे ही प्रेम करने लगा है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ କାମଭୋଗର ଅଧୀନ, ନିଜକୁ ପ୍ରାଜ୍ଞ ବୋଲି ମାନେ। ସେ ମିତ୍ରଦ୍ରୋହୀ ଓ ସର୍ବଦା ସନ୍ଦେହପରାୟଣ। ସେ କାହାରି ଉପକାର କରେନାହିଁ, ନିଜ ପ୍ରତି ହୋଇଥିବା ଉପକାରକୁ ମଧ୍ୟ ମାନେନାହିଁ। ଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରି ସେ ଅସତ୍ୟକୁ ହିଁ ପ୍ରିୟ କରିଛି।

Verse 5

मूठढश्वाकृतबुद्धिश्व इन्द्रियाणामनी श्वर: । कामानुसारी कृत्येषु सर्वेष्वकृतनिश्चय:,“उसमें विवेकका सर्वथा अभाव है, उसकी बुद्धि किसी एक निश्चयपर नहीं रहती तथा वह अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखनेमें असमर्थ है। वह अपनी इच्छाओंका अनुसरण करनेवाला तथा सभी कार्योंमें अनिश्चित विचार रखनेवाला है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ମୂଢ଼, ବିବେକବୁଦ୍ଧିହୀନ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କ ଉପରେ ଅଧିକାର ନାହିଁ। ସେ କାମନାକୁ ଅନୁସରେ; ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ତାହାର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ନଥାଏ।

Verse 6

एतैश्वान्यैश्व बहुभिदोषैरेव समन्वित: । त्वयोच्यमान: श्रेयोडपि संरम्भान्न ग्रहीष्यति,'ये तथा और भी बहुत-से दोष उसमें भरे हुए हैं। आप उसे हितकी बात बतायेंगे, तो भी वह क्रोधवश उसे स्वीकार नहीं करेगा

ଏହିପରି ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଦୋଷରେ ସେ ପୂର୍ଣ୍ଣ। ଆପଣ ତାକୁ ଶ୍ରେୟସ୍କର କଥା କହିଲେ ମଧ୍ୟ, ଆବେଗ ଓ କ୍ରୋଧବଶେ ସେ ତାହା ଗ୍ରହଣ କରିବ ନାହିଁ।

Verse 7

भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे जयद्रथे । भूयसी वर्तते वृत्ति न शमे कुरुते मन:,“वह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा तथा जयद्रथयर अधिक भरोसा रखता है, अतः उसके मनमें संधि करनेका विचार ही नहीं होता है

ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ, କର୍ଣ୍ଣ, ଦ୍ରୋଣପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଓ ଜୟଦ୍ରଥ— ଏମାନଙ୍କ ଉପରେ ତାହାର ଅଧିକ ଭରସା ରହିଛି। ତେଣୁ ତାହାର ମନ ଶାନ୍ତି ପାଖକୁ ଫେରେ ନାହିଁ, ସନ୍ଧିର ନିଶ୍ଚୟ ମଧ୍ୟ କରେ ନାହିଁ।

Verse 8

निश्चितं धार्तराष्ट्राणां सकर्णानां जनार्दन । भीष्मद्रोणमुखान्‌ पार्था न शक्ता: प्रतिवीक्षितुम्‌,“'जनार्दन! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रों तथा कर्णकी यह निश्चित धारणा है कि कुन्तीके पुत्र भीष्म एवं द्रोणाचार्य आदि वीरोंकी ओर देखनेमें भी समर्थ नहीं हैं

ଜନାର୍ଦନ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ କର୍ଣ୍ଣ ସହିତ ଏହି ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ କରିଛନ୍ତି—କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନେ ଭୀଷ୍ମ-ଦ୍ରୋଣ ଆଦି ପ୍ରମୁଖ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ମଧ୍ୟ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ।

Verse 9

सेनासमुदयं कृत्वा पार्थिवं मधुसूदन । कृतार्थ मन्‍्यते बाल आत्मानमविचक्षण:

ମଧୁସୂଦନ! ରାଜମାନଙ୍କ ସେନାସମୂହ ଏକତ୍ର କରି, ସେଇ ଶିଶୁସଦୃଶ ଅବିବେକୀ ନିଜକୁ କୃତାର୍ଥ ଭାବେ ମନେ କରେ।

Verse 10

“मधुसूदन! मूर्ख एवं बुद्धिहीन दुर्योधन राजाओंकी सेना एकत्र करके अपने-आपको कृतकृत्य मानता है ।। एक: कर्ण: पराज्जेतुं समर्थ इति निश्चितम्‌ । धार्रराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः स शमं नोपयास्यति,“दुर्बुद्धि दुर्योधनको तो इस बातका भी दृढ़ विश्वास है कि अकेला कर्ण ही शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ है; इसलिये वह कदापि संधि नहीं करेगा

ମଧୁସୂଦନ! ମୂର୍ଖ ଓ ଅବିବେକୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ରାଜମାନଙ୍କ ସେନା ଏକତ୍ର କରି ନିଜକୁ କୃତକୃତ୍ୟ ଭାବେ ମନେ କରୁଛି। ‘ଏକା କର୍ଣ୍ଣ ହିଁ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିପାରିବ’ ବୋଲି ତାହାର ଦୃଢ଼ ବିଶ୍ୱାସ; ତେଣୁ ସେଇ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଶାନ୍ତି-ସନ୍ଧିକୁ ଆସିବ ନାହିଁ।

Verse 11

संविच्च धार्तराष्ट्राणां सर्वेषामेव केशव । शमे प्रयतमानस्य तव सौ श्रात्रकाड्क्षिण:,“केशव! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंने यह पक्का विचार कर लिया है कि हमें पाण्डवोंको उनका यथोचित राज्यभाग नहीं देना चाहिये। यही उनका दृढ़ निश्चय है। इधर आप संधिके लिये प्रयत्न करते हुए उनमें उत्तम भ्रातृभाव जगाना चाहते हैं; परंतु उन दुष्टोंके प्रति आप जो कुछ भी कहेंगे, वह सब व्यर्थ ही होगा

କେଶବ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ନିଜ ନିଷ୍ପତ୍ତି ଦୃଢ଼ କରିସାରିଛନ୍ତି। ଆପଣ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରୟତ୍ନ କରି ସେମାନଙ୍କ ମନେ ଭ୍ରାତୃଭାବ ଜାଗ୍ରତ କରିବାକୁ ଚାହିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେମାନେ ସନ୍ଧିକୁ ଆସିବେ ନାହିଁ।

Verse 12

न पाण्डवानामस्माभि: प्रतिदेयं यथोचितम्‌ । इति व्यवसितास्तेषु वचन स्यान्निरर्थकम्‌,“केशव! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंने यह पक्का विचार कर लिया है कि हमें पाण्डवोंको उनका यथोचित राज्यभाग नहीं देना चाहिये। यही उनका दृढ़ निश्चय है। इधर आप संधिके लिये प्रयत्न करते हुए उनमें उत्तम भ्रातृभाव जगाना चाहते हैं; परंतु उन दुष्टोंके प्रति आप जो कुछ भी कहेंगे, वह सब व्यर्थ ही होगा

କେଶବ! ସେମାନେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରିଛନ୍ତି—‘ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ଯଥୋଚିତ ଭାଗ ଆମେ ଦେବୁ ନାହିଁ।’ ଏହି ନିଷ୍ପତ୍ତିରେ ଅଟୁଟ ଥିବାରୁ, ସେମାନଙ୍କୁ କୁହାଯାଇଥିବା କଥା ନିରର୍ଥକ ହେବ।

Verse 13

यत्र सूक्त दुरुक्ते च सम॑ स्यान्मधुसूदन । न तत्र प्रलपेत्‌ प्राज्ञो बधिरेष्विव गायन:,“मधुसूदन! जहाँ अच्छी और बुरी बातोंका एक-सा ही परिणाम हो, वहाँ विद्वान्‌ पुरुषको कुछ नहीं कहना चाहिये। वहाँ कोई बात कहना बहरोंके आगे राग अलापनेके समान व्यर्थ ही है

ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଯେଉଁଠାରେ ସୁବଚନ ଓ ଦୁର୍ବଚନ—ଦୁହିଁର ଫଳ ଏକେ ହୁଏ, ସେଠାରେ ପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ଅନାବଶ୍ୟକ କଥା କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ସେଠାରେ କହିବା ବଧିରଙ୍କ ଆଗରେ ରାଗ ଗାଇବା ପରି ନିଷ୍ଫଳ।

Verse 14

अविजानत्सु मूढेषु निर्मयदिषु माधव । नत्वं वाक्यं ब्रुवन्‌ युक्तश्नाण्डालेषु द्विजो यथा,“माधव! जैसे चाण्डालोंके बीचमें किसी विद्वान्‌ ब्राह्यणका उपदेश देना उचित नहीं है, उसी प्रकार उन मर्यादारहित मूर्ख और अज्ञानियोंके समीप आपका कुछ भी कहना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता

ହେ ମାଧବ! ଯେପରି ଚାଣ୍ଡାଳମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜଣେ ପଣ୍ଡିତ ଦ୍ୱିଜଙ୍କ ଉପଦେଶ ଦେବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ, ସେପରି ମର୍ଯ୍ୟାଦାହୀନ ଏହି ମୂଢ଼ ଅଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ସମୀପରେ ଆପଣଙ୍କ ବଚନ କହିବା ମୋତେ ଯଥୋଚିତ ଲାଗେ ନାହିଁ।

Verse 15

सो<यं बलस्थो मूढश्न॒ न करिष्यति ते वच: । तस्मिन्‌ निरर्थकं वाक्यमुक्तं सम्पत्स्यते तव,'मूढ़ दुर्योधन सैन्यसंग्रह करके अपनेको शक्तिशाली समझता है। वह आपकी बात नहीं मानेगा। उसके प्रति कहा हुआ आपका प्रत्येक वाक्य निरर्थक होगा

ଏହି ମୂଢ଼ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେନା ସଂଗ୍ରହ କରି ନିଜକୁ ବଳବାନ ଭାବୁଛି; ସେ ଆପଣଙ୍କ କଥା ମାନିବ ନାହିଁ। ତାହା ପ୍ରତି କହାଯାଇଥିବା ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବଚନ ନିରର୍ଥକ ହେବ।

Verse 16

तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां पापचेतसाम्‌ । तव मध्यावतरणं मम कृष्ण न रोचते,“श्रीकृष्ण! वे सभी पापपूर्ण विचार लेकर बैठे हुए हैं; अत: उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। वे सब-के-सब दुर्बुद्धि, अशिष्ट और दुष्टचित्त हैं। उनकी संख्या भी बहुत है। श्रीकृष्ण! आप उनके बीचमें जाकर कोई प्रतिकूल बात कहें, यह मुझे ठीक नहीं जान पड़ता

ହେ କୃଷ୍ଣ! ପାପଚେତନା ଧାରଣ କରିଥିବା ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଏକଠା ବସିଥିବାବେଳେ, ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣଙ୍କ ଯିବା ମୋତେ ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ।

Verse 17

दुर्बुद्धीनामशिष्टानां बहूनां दुष्टचेतसाम्‌ । प्रतीपं वचनं मध्ये तव कृष्ण न रोचते,“श्रीकृष्ण! वे सभी पापपूर्ण विचार लेकर बैठे हुए हैं; अत: उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। वे सब-के-सब दुर्बुद्धि, अशिष्ट और दुष्टचित्त हैं। उनकी संख्या भी बहुत है। श्रीकृष्ण! आप उनके बीचमें जाकर कोई प्रतिकूल बात कहें, यह मुझे ठीक नहीं जान पड़ता

ହେ କୃଷ୍ଣ! ସେମାନେ ଅନେକ—ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି, ଅଶିଷ୍ଟ ଓ ଦୁଷ୍ଟଚେତନାବାନ; ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତିକୂଳ ଭାବେ ଗ୍ରହୀତ ହେବା ଯୋଗ୍ୟ ବଚନ କହିବା ମୋତେ ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ।

Verse 18

अनुपासिततवृद्ध त्वाच्छियो दर्पाच्च मोहित: । वयोदर्पादमर्षाच्च न ते श्रेयो ग्रहीष्यति,“दुर्योधनने कभी वृद्ध पुरुषोंका सेवन नहीं किया है। वह राजलक्ष्मीके घमण्डसे मोहित है। इसके सिवा उसे अपनी युवावस्थापर भी गर्व है और वह पाण्डवोंके प्रति सदा अमर्षमें भरा रहता है। अत: आपकी हितकर बात भी वह नहीं मानेगा

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କେବେ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସେବା କିମ୍ବା ତାଙ୍କ କଥାକୁ ମାନିନାହିଁ। ସେ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀର ଦର୍ପରେ ମୋହିତ; ଯୌବନର ଅଭିମାନ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ। ତେଣୁ ତୁମେ ଯେ ହିତକର ଉପଦେଶ ଦେବ, ସେଥିକୁ ମଧ୍ୟ ସେ ଗ୍ରହଣ କରିବ ନାହିଁ।

Verse 19

बल॑ बलवदप्यस्य यदि वक्ष्यसि माधव । त्वय्यस्य महती शड्का न करिष्यति ते वच:,“माधव! दुर्योधनके पास प्रबल सैन्यबल है। इसके सिवा आपपर उसे महान संदेह है। अतः आप यदि उससे अच्छी बात कहेंगे, तो भी वह आपकी बात नहीं मानेगा

ମାଧବ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କର ସେନାବଳ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରବଳ। ତାହା ସହିତ ତୁମ ପ୍ରତି ତାଙ୍କର ଗଭୀର ସନ୍ଦେହ ଅଛି। ତେଣୁ ତୁମେ ଯଦି ହିତକର ଓ ବୁଦ୍ଧିମତୀ କଥା କହିବ, ସେଥିକୁ ମଧ୍ୟ ସେ ମାନିବ ନାହିଁ।

Verse 20

नेदमद्य युधा शक्‍्यमिन्द्रेणापि सहामरै: । इति व्यवसिता: सर्वे धार्तराष्ट्रा जनार्दन

ଜନାର୍ଦନ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମସ୍ତ ପୁତ୍ର ଏହିପରି ନିଶ୍ଚୟ କରିଛନ୍ତି—“ଆଜି ଯୁଦ୍ଧ ଦ୍ୱାରା ଏହା ସାଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ଦେବମାନଙ୍କ ସହିତ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରିବେ ନାହିଁ।”

Verse 21

“'जनार्दन! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंको यह दृढ़ विश्वास है कि देवताओंसहित इन्द्र भी इस समय युद्धके द्वारा हमारी इस सेनाको परास्त नहीं कर सकते ।। तेष्वेवमुपपन्नेषु कामक्रोधानुवर्तिषु । समर्थमपि ते वाक्यमसमर्थ भविष्यति,“जो इस प्रकार निश्चय किये बैठे हैं और काम-क्रोधके ही पीछे चलनेवाले हैं, उनके प्रति आपका युक्तियुक्त एवं सार्थक वचन भी निरर्थक एवं असफल हो जायगा

ଜନାର୍ଦନ! ସେମାନେ ଏଭଳି ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ କରି କାମ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ତୁମର ସମର୍ଥ ଓ ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ବଚନ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଅସମର୍ଥ—ନିଷ୍ଫଳ—ହୋଇଯିବ।

Verse 22

मध्ये तिष्ठन्‌ हस्त्यनीकस्य मन्दो रथाश्वयुक्तस्य बलस्य मूढ: । दुर्योधनो मनन्‍्यते वीतभीति: कृत्स्ना मयेयं पृथिवी जितेति,'रथियों और घुड़सवारोंसे युक्त हाथियोंकी सेनाके बीचमें खड़ा होकर भयसे रहित हुआ मन्दबुद्धि मूढ़ दुर्योधन यह समझता है कि यह सारी पृथ्वी मैंने जीत ली

ରଥୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀମାନଙ୍କ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ହସ୍ତିସେନାର ମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ, ଭୟଶୂନ୍ୟ ସେଇ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ମୂଢ଼ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଭାବେ—“ଏ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ମୁଁ ଜିତିଛି।”

Verse 23

आशंसते वै धृतराष्ट्रस्य पुत्रो महाराज्यमसपत्नं॑ पृथिव्याम्‌ | तस्मिज्छम: केवलो नोपलभ्यो बद्धं सन्‍्तं मन्यते लब्धमर्थम्‌,धृतराष्ट्रका वह ज्येष्ठ पुत्र भूमण्डलका शत्रुरहित साम्राज्य पानेकी आशा रखता है। वह मन-ही-मन यह संकल्प भी करता है कि जूएमें प्राप्त हुआ यह धन एवं राज्य अब मेरे ही अधिकारमें आबद्ध रहे; अत: उसके प्रति केवल संधिका प्रयत्न सफल न होगा

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ପୃଥିବୀରେ ନିର୍ବିରୋଧ ମହାସାମ୍ରାଜ୍ୟକୁ ହିଁ ଆକାଂକ୍ଷା କରେ। ତାଙ୍କ ପାଇଁ କେବଳ ସନ୍ଧି-ସମ୍ମିଳନ ଫଳଦାୟକ ହେବ ନାହିଁ; କାରଣ ପାଶାଖେଳରେ ଲାଭ କରା ଧନ ଓ ରାଜ୍ୟକୁ ସେ ନିଜ ଅଧିକାରରେ ବନ୍ଧା ଓ ଦୃଢ଼ଭାବେ ପ୍ରାପ୍ତ ବୋଲି ମନେ କରେ। ତେଣୁ ସରଳ ଶାନ୍ତି-ପ୍ରୟାସ ସଫଳ ହେବ ନାହିଁ।

Verse 24

पर्यस्तेयं पृथिवी कालपक्वा दुर्योधनार्थे पाण्डवान्‌ योद्धुकामा: । समागता: सर्वयोधाः पृथिव्यां राजानश्ष क्षितिपालै: समेता:,“जान पड़ता है, अब यह पृथ्वी कालसे परिपक्व होकर नष्ट होनेवाली है; क्योंकि राजाओंके साथ भूमण्डलके समस्त क्षत्रिय योद्धा दुर्योधनके लिये पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ एकत्र हुए हैं

ମନେ ହୁଏ କାଳରେ ପକ୍କ ହୋଇ ଏହି ପୃଥିବୀ ଏବେ ଉଲଟି ପଡ଼ି ଧ୍ୱଂସ ହେବାକୁ ଯାଉଛି; କାରଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଇଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ, ରାଜାମାନେ ଓ ସେମାନଙ୍କ ସହଯୋଗୀ କ୍ଷିତିପାଳମାନଙ୍କ ସହ, ପୃଥିବୀର ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ଏଠାରେ ଏକତ୍ର ହୋଇଛନ୍ତି।

Verse 25

सर्वे चैते कृतवैरा: पुरस्तात्‌ त्वया राजानो हृतसाराश्च कृष्ण । तवोद्देगात्‌ संश्रिता धार्तराष्ट्रान्‌ सुसंहता: सह कर्णेन वीरा:,“श्रीकृष्ण! ये सब-के-सब वे ही भूपाल हैं, जिन्होंने पहले आपके साथ वैर ठाना था और जिनका सार-सर्वस्व आपने हर लिया था। ये लोग आपके भयसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी शरणमें आये हैं तथा कर्णके साथ संगठित हो वीरता दिखानेको उद्यत हुए हैं

ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ସେହି ରାଜାମାନେ, ଯେମାନେ ପୂର୍ବେ ତୁମ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧିଥିଲେ ଏବଂ ଯାହାଙ୍କର ସାର-ଶକ୍ତି ତୁମେ ହରିନେଇଥିଲ। ଏବେ ତୁମ ଭୟରେ ସେମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଶରଣ ନେଇଛନ୍ତି ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସହ ଦୃଢ଼ଭାବେ ସଂଘବଦ୍ଧ ହୋଇ ବୀରତ୍ୱ ପ୍ରଦର୍ଶନକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛନ୍ତି।

Verse 26

त्यक्तात्मान: सह दुर्योधनेन हृष्टा योद्धुं पाण्डवान्‌ सर्वयोधा: । तेषां मध्ये प्रविशेथा यदि त्वं न तन्मतं मम दाशार्ह वीर,'ये सब योद्धा दुर्योधनके साथ मिल गये हैं और अपने प्राणोंका मोह छोड़कर हर्ष एवं उत्साहके साथ पाण्डवोंसे युद्ध करनेको तैयार हैं। दशार्हवंशी वीर! ऐसे विरोधियोंके बीचमें यदि आप जानेको उद्यत हैं तो यह मुझे ठीक नहीं जान पड़ता

ଏ ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ, ପ୍ରାଣମୋହ ତ୍ୟାଗ କରି, ହର୍ଷୋତ୍ସାହରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ହେ ଦାଶାର୍ହ ବୀର! ଏମିତି ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯଦି ତୁମେ ପ୍ରବେଶ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ, ତେବେ ତାହା ମୋତେ ଠିକ୍ ଲାଗୁନାହିଁ।

Verse 27

तेषां समुपविष्टानां बहूनां दुष्टचेतसाम्‌ । कथं मध्य प्रपद्येथा: शत्रूणां शत्रुकर्शन

ଅନେକ ଦୁଷ୍ଟଚିତ୍ତ ଲୋକ ଏକସାଥି ବସିଥିବାବେଳେ, ହେ ଶତ୍ରୁକର୍ଷଣ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ନିଜକୁ କିପରି ପ୍ରବେଶ କରାଇବ?

Verse 28

सर्वथा त्वं महाबाहो देवैरपि दुरुत्सह: । प्रभावं पौरुषं बुद्धि जानामि तव शत्रुहन्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମହାବାହୋ! ତୁମେ ସର୍ବଥା ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁରୁତ୍ସହ। ହେ ଶତ୍ରୁହନ୍ତା! ତୁମ ପ୍ରଭାବ, ପୌରୁଷ ଓ ବୁଦ୍ଧିବଳକୁ ମୁଁ ଭଲଭାବେ ଜାଣେ।

Verse 29

या मे प्रीति: पाण्डवेषु भूय: सा त्वयि माधव । प्रेमणा च बहुमानाच्च सौहृदाच्च ब्रवीम्यहम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମାଧବ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଯେ ମୋର ପ୍ରୀତି—ଏବଂ ତାହା ଅଧିକ—ସେଇ ପ୍ରୀତି ତୁମ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଅଛି। ପ୍ରେମ, ଗଭୀର ସମ୍ମାନ ଓ ସତ୍ୟ ସୌହାର୍ଦ୍ୟରୁ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ମୁଁ ଏହା କହୁଛି।

Verse 30

'शत्रुसूदन! जहाँ दुष्टतापूर्ण विचार लिये बहुसंख्यक शत्रु बैठे हों, वहाँ उनके बीच आप कैसे जाना चाहते हैं? शत्रुहन्ता महाबाहु श्रीकृष्ण! यद्यपि सम्पूर्ण देवता भी सर्वधा आपके सामने टिक नहीं सकते हैं तथा आपका जो प्रभाव, पुरुषार्थ और बुद्धिबल है, उसे भी मैं जानता हूँ; तथापि माधव! पाण्डवोंपर जो मेरा प्रेम है, वही और उससे भी बढ़कर आपके प्रति है। अत: प्रेम, अधिक आदर और सौहार्दसे प्रेरित होकर मैं यह बात कह रहा हूँ ।। २७ --२९ || या मे प्रीति: पुष्कराक्ष त्वद्दर्शनसमुद्धवा । सा किमाख्यायते तुभ्यमन्तरात्मासि देहिनाम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ପୁଷ୍କରାକ୍ଷ! ତୁମ ଦର୍ଶନରୁ ମୋ ମନରେ ଯେ ପ୍ରୀତି ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ, ତାହା ତୁମକୁ କିପରି ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି? ତୁମେ ତ ସମସ୍ତ ଦେହଧାରୀଙ୍କ ଅନ୍ତରାତ୍ମା।

Verse 91

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्ण-दुर्योधन- संवादविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ–ଦୁର୍ଯୋଧନ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକାନବେଁ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 92

“कमलनयन! आपके दर्शनसे आपके प्रति मेरा जो प्रेम उमड़ आया है, उसका आपसे क्या वर्णन किया जाय? आप समस्त देहधारियोंके अन्तर्यामी आत्मा हैं (अत: स्वयं ही सब कुछ देखते और जानते हैं)' ।। इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णविदुरसंवादे द्विनवतितमो<ध्याय:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ କମଳନୟନ! ତୁମ ଦର୍ଶନରୁ ମୋ ହୃଦୟରେ ଯେ ପ୍ରେମ ଉମଡ଼ି ଆସିଛି, ତାହା ତୁମକୁ କିପରି ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି? ତୁମେ ତ ସମସ୍ତ ଦେହଧାରୀଙ୍କ ଅନ୍ତର୍ଯ୍ୟାମୀ ଆତ୍ମା; ତେଣୁ ତୁମେ ନିଜେ ସବୁକିଛି ଦେଖ ଓ ଜାଣ। ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତ, ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ-ବିଦୁର ସଂବାଦ, ଦ୍ୱିନବତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether one must intervene decisively to prevent collective harm when leaders persist in destructive policy—balancing truthful counsel and friendship-duty against the likelihood that advice may be rejected.

Righteous action includes sincere effort toward peace: dharma- and artha-consistent speech, attempted reconciliation, and corrective friendship are duties whose moral value persists even when outcomes are constrained by others’ choices.

No explicit phalaśruti is stated; however, the chapter contains a merit-logic claim: undertaking a dharmic task to the extent of one’s capacity accrues puṇya even if the objective (successful pacification) is not attained.