
Nakula’s Adaptive Counsel to Kṛṣṇa in the Kuru Assembly (उद्योगपर्व, अध्याय ७८)
Upa-parva: Kṛṣṇa-dūta (Krishna’s Embassy) — Nakula’s Counsel Segment
Nakula addresses Kṛṣṇa after acknowledging that Yudhiṣṭhira’s dharma-grounded discourse, Bhīma’s emphasis on restraint and strength, and Arjuna’s views have already been heard. He argues that in human affairs intention and strategy shift with circumstance: what was thought earlier can become otherwise, and judgments differ between unseen contingencies and visible realities. He notes that during forest exile the Pāṇḍavas’ attachment to immediate kingship was not as pronounced as it is now, since their return has drawn substantial allied forces (seven akṣauhiṇīs) by Kṛṣṇa’s support. Nakula requests that Kṛṣṇa speak in the Kuru court with conciliatory framing that nonetheless carries deterrent weight, so that Duryodhana is not destabilized into rash reaction. He enumerates key allied leaders to underscore the political stakes and suggests that Vidura, Bhīṣma, Droṇa, and Bāhlīka can recognize beneficial counsel and help persuade Dhṛtarāṣṭra while restraining Duryodhana’s harmful policy. The chapter thus integrates vāk-nīti (speech ethics), kāla-yukti (timely strategy), and coalition realism within diplomacy.
Chapter Arc: अर्जुन, श्रीकृष्ण के दूत-धर्म और आगामी नीति-प्रयासों को सुनकर, शान्ति बनाम युद्ध के निर्णय-भार को सामने रखता है—क्या दुर्योधन को रोका जा सकता है, या धर्मयुद्ध अनिवार्य है? → श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों को स्वीकारते हुए कर्म के दो मार्गों—शान्ति-प्रयत्न और युद्ध-प्रयत्न—की मर्यादा बताते हैं; वे संकेत करते हैं कि फल-निष्पत्ति केवल पुरुषार्थ से नहीं, समय, विधि और शुद्ध कर्म-नीति से होती है, पर दुर्योधन की दुरबुद्धि और अधर्म-आदत उसे समझौते से दूर रखती है। → कृष्ण स्पष्ट कर देते हैं कि दुर्योधन पाप-मार्ग नहीं छोड़ेगा; यदि वह अन्याय पर अड़ा रहा तो लोक-धर्म की दृष्टि से वह वध्य होगा और पाण्डवों का राज्य नृशंसता से लुप्त किया गया अन्याय अंततः प्रतिकार माँगेगा—यहीं शान्ति-प्रयास की सीमा और युद्ध की अनिवार्यता का बोध तीव्र होता है। → कृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि विराट-नगर के गोहरण-प्रसंग में भी भीष्म ने दुर्योधन को राज्य-दान की सलाह दी थी, फिर भी वह नहीं माना; अतः अब भी नीति-प्रयत्न किया जाएगा, पर परिणाम दुर्योधन के स्वभाव पर निर्भर है—पाण्डव पक्ष को धर्म-स्थित रहकर उचित मार्ग अपनाना है। → कृष्ण के वचन अगले अध्याय में और कठोर स्पष्टता के साथ आगे बढ़ते हैं—दूत-यात्रा का उद्देश्य शान्ति है, पर संकेत युद्ध की ओर झुकता है।
Verse 1
>> हु हि कक एकोनाशीतितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका अर्जुनको उत्तर देना श्रीभगवानुवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव । पाण्डवानां कुरूणां च प्रतिपत्स्ये निरामयम्,श्रीभगवान् बोले--महाबाहु पाण्डुकुमार! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करना उचित है। मैं वही करनेका प्रयत्न करूँगा, जिससे कौरव तथा पाण्डव--दोनोंका संकट दूर हो-- दोनों सुखी हो सकें
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—“ହେ ମହାବାହୁ ପାଣ୍ଡବ! ତୁମେ ଯେପରି କହୁଛ, ସେପରି ହିଁ ଯୁକ୍ତ। ପାଣ୍ଡବ ଓ କୁରୁ—ଦୁହେଁଙ୍କର ଦୁଃଖ ଦୂର ହେବା ପାଇଁ ନିର୍ଦୋଷ ପଥ ମୁଁ ଅବଲମ୍ବନ କରିବି।”
Verse 2
सर्व त्विदं ममायत्तं बीभत्सो कर्मणोर्द्दयो: । क्षेत्र हि रसवच्छुद्ध कर्मणैवोपपादितम्
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ବୀଭତ୍ସୁ! ଦୁଇ ପ୍ରକାର କର୍ମର ବିଷୟରେ ଏ ସବୁ ମୋ ଉପରେ ନିର୍ଭର। କାରଣ ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଓ ଶୁଦ୍ଧ କ୍ଷେତ୍ର ମଧ୍ୟ କେବଳ ସତ୍କର୍ମ ଦ୍ୱାରା ହିଁ ସ୍ଥାପିତ ହୁଏ।
Verse 3
तत्र वै पौरुषं ब्रूयुरासेकं यत्र कारितम्
ସେଥିରେ ଯେଉଁଠାରେ ଫଳ ପ୍ରକୃତରେ ସାଧିତ ହୋଇଛି, ସେଠାକୁ ଲୋକେ ସତ୍ୟ ପୌରୁଷ ବୋଲି କହନ୍ତି; କର୍ମରେ ସିଦ୍ଧ ନ ହେଉଁଯାଏ କେବଳ ଇଚ୍ଛା କିମ୍ବା କଥାକୁ ପରାକ୍ରମ ମାନନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 4
तत्र चापि ध्रुवं पश्येच्छोषणं दैवकारितम् । जिस खेतमें जुताई और सिंचाई की गयी है, वहाँ यह पुरुषार्थ ही किया गया है; परंतु वहाँ भी दैववश सूखा पड़ गया, यह निश्चितरूपसे देखा जाता है। [अतः पुरुषार्थकी सफलताके लिये प्रारब्धकी अनुकूलता आवश्यक है] ।। तदिदं निश्चितं बुद्धया पूर्वरपि महात्मभि:
ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ଦୈବକୃତ ଖରା ନିଶ୍ଚୟ ଦେଖାଯାଏ। ଯେଉଁ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଚାଷ ଓ ସିଚାଇ ହୋଇଛି, ସେଠାରେ ପୁରୁଷାର୍ଥ ପୂର୍ଣ୍ଣ; ତଥାପି ଭାଗ୍ୟବଶତଃ ଶୁଷ୍କତା ଆସିପାରେ। ତେଣୁ ପ୍ରୟାସ ଫଳିବା ପାଇଁ ପ୍ରାରବ୍ଧର ଅନୁକୂଳତା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ—ଏହି ନିଷ୍କର୍ଷ ପୂର୍ବ ମହାତ୍ମମାନେ ଦୃଢ ବୁଦ୍ଧିରେ କରିଛନ୍ତି।
Verse 5
अहं हि तत् करिष्यामि परं पुरुषकारत:
ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ତାହା କରିବି—କିନ୍ତୁ ପୁରୁଷାର୍ଥରେ ଯେତେ ସମ୍ଭବ, ସେତେ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମାତ୍ର।
Verse 6
सहि धर्म च लोकं च त्यक्त्वा चरति दुर्मति:
ସେ ଦୁର୍ମତି ପୁରୁଷ ଧର୍ମ ଓ ଲୋକଲଜ୍ଜା—ଦୁହିଁକୁ ତ୍ୟାଗ କରି—ତାପରେ ମନମତା ଚାଲିଥାଏ।
Verse 7
तथापि बुद्धि पापिष्ठां वर्धयन्त्यस्य मन्त्रिण:
ତଥାପି ତାହାର ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ ତାହାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପିଷ୍ଠ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଆହୁରି ଉତ୍ତେଜିତ କରି ବଢ଼ାଇ ଦେଉଛନ୍ତି।
Verse 8
शकुनि: सूतपुत्रश्न भ्राता दुःशासनस्तथा । इतनेपर भी उसके मन्त्री शकुनि, सूतपुत्र कर्ण तथा भाई दुःशासन--ये उसकी अत्यन्त पापपूर्ण बुद्धिको बढ़ावा देते रहते हैं ।। ७ है ।। स हि त्यागेन राज्यस्य न शमं समुपैष्यति
ଶକୁନି, ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ଓ ତାହାର ଭ୍ରାତା ଦୁଃଶାସନ—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ ତାହାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପିଷ୍ଠ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ନିତ୍ୟ ଉତ୍ତେଜିତ କରୁଛନ୍ତି। କାରଣ ସେ କେବଳ ରାଜ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କଲେ ମାତ୍ର ଶାନ୍ତି ପାଇବ ନାହିଁ।
Verse 9
अन्तरेण वध पार्थ सानुबन्ध: सुयोधन: । कुन्तीनन्दन! अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित दुर्योधन जबतक मारा नहीं जायगा, तबतक वह राज्यभाग देकर कदापि संधि नहीं करेगा ।। ८ हू ।। न चापि प्रणिपातेन त्यक्तुमिच्छति धर्मराट् । याच्यमानश्व राज्यं स न प्रदास्यति दुर्मति:,धर्मराज युधिष्छिर भी नम्रतापूर्वक संधिके लिये अपना राज्य छोड़ना नहीं चाहते हैं। उधर दुर्बुद्धि दुर्योधन माँगनेपर भी राज्य नहीं देगा
ହେ ପାର୍ଥ! ସାନୁବନ୍ଧ ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ବଧ ହୋଇନଥିଲେ ସନ୍ଧି ନାହିଁ। ସେ ନିଜ ସ୍ୱଜନ ଓ ସହାୟମାନଙ୍କ ସହିତ ଜୀବିତ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ରାଜ୍ୟଭାଗ ଦେଇ କେବେ ମେଳ କରିବ ନାହିଁ। ଏବଂ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ କେବଳ ପ୍ରଣିପାତ କରି ନିଜ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଧିକାର ତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି ନାହିଁ; ଅନ୍ୟପଟେ ସେ ଦୁର୍ମତି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଅନୁରୋଧ କଲେ ମଧ୍ୟ ରାଜ୍ୟ ଦେବ ନାହିଁ।
Verse 10
न तु मन्ये स तद् वाच्यो यद् युधिष्ठिशासनम् । उक्त प्रयोजन यत् तु धर्मराजेन भारत,भरतनन्दन! धर्मराज युधिष्ठिरने केवल पाँच गाँवोंको माँगनेके लिये जो आज्ञा दी है तथा नम्रतापूर्ण वचनोंमें जो संधिका प्रयोजन बताया है, वह सब दुर्योधनसे कहना उचित नहीं है--ऐसा मैं मानता हूँ; क्योंकि वह कुरुकुलकलंक पापात्मा उन सब बातों--को कभी स्वीकार नहीं करेगा। हमलोगोंका प्रस्ताव स्वीकार न करनेपर वह इस जगत्में अवश्य ही वधके योग्य हो जायगा
ହେ ଭରତନନ୍ଦନ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଓ ଧର୍ମରାଜ ଯେ ନମ୍ର ବଚନରେ ସନ୍ଧିର ପ୍ରୟୋଜନ କହିଛନ୍ତି—ସେ ସବୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ ବୋଲି ମୁଁ ଭାବେ। କାରଣ କୁରୁକୁଳର କଳଙ୍କ ସେ ପାପାତ୍ମା କେବେ ମଧ୍ୟ ତାହା ଗ୍ରହଣ କରିବ ନାହିଁ। ଆମ ପ୍ରସ୍ତାବ ଅସ୍ୱୀକାର କଲେ ସେ ଏହି ଲୋକରେ ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ।
Verse 11
भरतनन्दन! धर्मराज युधिष्ठिरने केवल पाँच गाँवोंको माँगनेके लिये जो आज्ञा दी है तथा नम्रतापूर्ण वचनोंमें जो संधिका प्रयोजन बताया है, वह सब दुर्योधनसे कहना उचित नहीं है--ऐसा मैं मानता हूँ; क्योंकि वह कुरुकुलकलंक पापात्मा उन सब बातों--को कभी स्वीकार नहीं करेगा। हमलोगोंका प्रस्ताव स्वीकार न करनेपर वह इस जगत्में अवश्य ही वधके योग्य हो जायगा
ହେ ଭରତନନ୍ଦନ! ଆଜି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର କେବଳ ପାଞ୍ଚଟି ଗାଁ ମାଗିବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଇଛନ୍ତି ଓ ନମ୍ର ବଚନରେ ସନ୍ଧିର ପ୍ରୟୋଜନ କହିଛନ୍ତି—ଏ ସବୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ କହିବାକୁ ମୁଁ ଅନୁଚିତ ଭାବେ ମନେ କରେ। କାରଣ କୁରୁକୁଳର କଳଙ୍କ ସେ ପାପାତ୍ମା ଏଥିରୁ କିଛି ମଧ୍ୟ କେବେ ଗ୍ରହଣ କରିବ ନାହିଁ। ଆମ ପ୍ରସ୍ତାବ ଅସ୍ୱୀକାର କଲେ ସେ ଏହି ଜଗତରେ ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ।
Verse 12
मम चापि स वध्यो हि जगतश्नापि भारत । येन कौमारके यूय॑ सर्वे विप्रकृता: सदा,भारत! जिसने तुम सब लोगोंको कुमारावस्थामें भी सदा नाना प्रकारके कष्ट दिये हैं, जिस दुरात्मा एवं निर्दयीने तुम्हारे राज्यका भी अपहरण कर लिया है तथा जो पापी दुर्योधन युधिष्ठिरके पास सम्पत्ति देखकर शान्त नहीं रह सकता है, वह मेरे और समस्त संसारके लिये भी वध्य है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେ ପୁରୁଷ ମୋ ହାତରେ ନିଶ୍ଚୟ ବଧ୍ୟ, ଏବଂ ସମଗ୍ର ଜଗତର ହିତ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ; କାରଣ ତୁମମାନଙ୍କର କୌମାର୍ୟକାଳରୁ ସେ ତୁମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନିରନ୍ତର ଅନ୍ୟାୟ କରି ଅନେକ କଷ୍ଟ ଦେଇଆସିଛି।
Verse 13
तथा पापस्तु तत् सर्व न करिष्यति कौरव: । तस्मिंश्नाक्रियमाणेड्सौ लोके वध्यो भविष्यति,विप्रलुप्तं च वो राज्यं नृशंसेन दुरात्मना । न चोपशाम्यते पाप: श्रियं दृष्टवा युधिष्ठिरे भारत! जिसने तुम सब लोगोंको कुमारावस्थामें भी सदा नाना प्रकारके कष्ट दिये हैं, जिस दुरात्मा एवं निर्दयीने तुम्हारे राज्यका भी अपहरण कर लिया है तथा जो पापी दुर्योधन युधिष्ठिरके पास सम्पत्ति देखकर शान्त नहीं रह सकता है, वह मेरे और समस्त संसारके लिये भी वध्य है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ସେ ପାପୀ କୌରବ ଏ ସବୁ କରିବ ନାହିଁ। ଏ ବିଷୟରେ କିଛି ନ କରାଗଲେ, ଲୋକଦୃଷ୍ଟିରେ ସେ ବଧ୍ୟ ହେବ। ସେ ନିର୍ଦୟ ଦୁରାତ୍ମା ତୁମମାନଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ଛିନିନେଇଛି; ଏବଂ ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁମ ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ପାପୀ ଶାନ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋ ପାଇଁ ଓ ସମଗ୍ର ଜଗତ ପାଇଁ ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ।
Verse 14
असकृच्चाप्यहं तेन त्वत्कृते पार्थ भेदित: । न मया तद् गृहीतं च पापं तस्य चिकीर्षितम्,कुन्तीनन्दन! उसने मुझे भी तुम्हारी ओरसे फोड़नेके लिये अनेक बार चेष्टा की है; परंतु मैंने उसके पापपूर्ण प्रस्तावको कभी स्वीकार नहीं किया है
ହେ କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ତୁମ ପାଇଁ ମୋତେ ତୁମଠାରୁ ଭିନ୍ନ କରିବାକୁ ସେ ବାରମ୍ବାର ଚେଷ୍ଟା କରିଛି; କିନ୍ତୁ ତାହାର ସେଇ ପାପପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରସ୍ତାବକୁ ମୁଁ କେବେ ଗ୍ରହଣ କରିନାହିଁ।
Verse 15
जानासि हि महाबाहो त्वमप्यस्य परं मतम् । प्रियं चिकीर्षमाणं च धर्मराजस्य मामपि,महाबाहो! तुम जानते ही हो कि दुर्योधनकी भी मेरे विषयमें यही निश्चित धारणा है कि मैं धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करना चाहता हूँ
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୋ! ତୁମେ ମଧ୍ୟ ତାହାର ଦୃଢ଼ ମତ ଜାଣ—ଯେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ।
Verse 16
संजानंस्तस्य चात्मानं मम चैव परं मतम् । अजानन्निव मां कस्मादर्जुनाद्याभिशड्कसे,अर्जुन! इस प्रकार तुम दुर्योधनके मनकी भावना तथा मेरे दृढ़ निश्चयको जानते हुए भी आज अनजानकी भाँति क्यों मुझपर संदेह कर रहे हो?
ତାହାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଓ ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ହେ ଅର୍ଜୁନ! ଆଜି ତୁମେ ଅଜାଣା ଲୋକ ପରି କାହିଁକି ମୋ ପ୍ରତି ସନ୍ଦେହ କରୁଛ?
Verse 17
यच्चापि परमं दिव्यं तच्चाप्यनुगतं त्वया । विधान विहितं पार्थ कथं शर्म भवेत् परै:,कुन्तीकुमार! जो देवताओंका परम दिव्य (भूभार उतारनेके लिये) निश्चित विधान है, उससे भी तुम सर्वथा परिचित हो। फिर शत्रुओंके साथ संधि कैसे हो सकती है?
କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର! ଦେବକାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ନିୟତ ଯେ ପରମ ଦିବ୍ୟ ବିଧାନ, ସେଥିରେ ତୁମେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପରିଚିତ। ଯେତେବେଳେ ସେହି ବିଧି ଚାଲିପଡ଼ିଛି, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କରି ସତ୍ୟ ଶାନ୍ତି କିପରି ହେବ?
Verse 18
यत् तु वाचा मया शक्यं कर्मणा वापि पाण्डव । करिष्ये तदहं पार्थ न त्वाशंसे शमं परै:,पाण्डुनन्दन! मेरे द्वारा वाणी और प्रयत्नसे जो कुछ हो सकता है, वह मैं अवश्य करूँगा; परंतु पार्थ! मुझे यह तनिक भी आशा नहीं है कि शत्रुओंके साथ संधि हो जायगी
ପାଣ୍ଡବ! ବାଣୀରେ କିମ୍ବା କର୍ମରେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ଯାହା କିଛି ସମ୍ଭବ, ସେ ସବୁ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ କରିବି। କିନ୍ତୁ ପାର୍ଥ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ଶାନ୍ତି କିମ୍ବା ମେଳ ହେବ—ଏମିତି ମୋର ଅଳ୍ପମାତ୍ର ଆଶା ମଧ୍ୟ ନାହିଁ।
Verse 19
कथं गोहरणे हाक्तो नैतच्छर्म तथा हितम् । याच्यमानो हि भीष्मेण संवत्सरगते5ध्वनि
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ଗୋହରଣ ବିଷୟରେ ସେ କିପରି ପ୍ରେରିତ ହେଲା? ଏହା ନ ଶରଣ, ନ ହିତକର। ଭୀଷ୍ମ ଅନୁରୋଧ କରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ତ ଏକ ବର୍ଷର ପଥରେ ଆଗେଇ ପଡ଼ିଥିଲା।
Verse 20
विराटनगरमें गोहरणके समय तुम्हारे अज्ञातवासका वर्ष पूरा हो चुका था। उस समय भीष्मजीने मार्ममें दुर्योधनसे याचना की कि तुम पाण्डवोंको उनका राज्य देकर उनसे मेल कर लो, परंतु यह कल्याण और हितकी बात भी उसने किसी प्रकार स्वीकार नहीं की ।। तदैव ते पराभूता यदा संकल्पितास्त्वया । लवश: क्षणशश्लापि न च तुष्ट: सुयोधन:,जब तुमने कौरवोंको पराजित करनेका संकल्प किया, उसी समय वे पराजित हो गये। परंतु दुर्योधन तुमलोगोंपर क्षणभरके लिये किंचिन्मात्र भी संतुष्ट नहीं है
ବିରାଟନଗରରେ ଗୋହରଣ ସମୟରେ ତୁମମାନଙ୍କର ଅଜ୍ଞାତବାସର ବର୍ଷ ପୂରା ହୋଇଯାଇଥିଲା। ସେତେବେଳେ ମଧ୍ୟ ଭୀଷ୍ମ ହୃଦୟରୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କଲେ—“ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ଦେଇ ସେମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କର”; କିନ୍ତୁ ସେ ଏହି କଲ୍ୟାଣକର ଓ ହିତକର କଥାକୁ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଗ୍ରହଣ କଲା ନାହିଁ। ପ୍ରକୃତରେ, ତୁମେ କୌରବମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିବାକୁ ସଙ୍କଳ୍ପ କରିଥିବା ସେଇ କ୍ଷଣରୁ ସେମାନେ ପରାଭୂତ; ତଥାପି ସୁୟୋଧନ ଏକ କ୍ଷଣ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ତୁମମାନଙ୍କ ଉପରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ନୁହେଁ।
Verse 21
सर्वथा तु मया कार्य धर्मराजस्य शासनम् | विभाव्यं तस्य भूयश्व कर्म पापं दुरात्मन:,मुझे वहाँ जाकर सबसे पहले धर्मराजकी आज्ञाके अनुसार संधिके लिये सब प्रकारसे प्रयत्न करना है। यदि यह सफल न हुआ तो फिर मुझे यह विचार करना होगा कि दुरात्मा दुर्योधनको उसके पापकर्मका दण्ड कैसे दिया जाय?
ସର୍ବଥା ମୋତେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରିବାକୁ ହେବ। ସେଠାକୁ ଯାଇ ପ୍ରଥମେ ସନ୍ଧି ପାଇଁ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଚେଷ୍ଟା କରିବି; ଯଦି ତାହା ସଫଳ ନ ହୁଏ, ତେବେ ଦୁରାତ୍ମା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାପକର୍ମର ଦଣ୍ଡ କିପରି ଦିଆଯିବ—ସେଥିରେ ପୁନଃ ବିଚାର କରିବି।
Verse 26
ऋते वर्षान्न कौन्तेय जातु निर्वर्तयेत् फलम् । अर्जुन! इसमें संदेह नहीं कि शान्ति और युद्ध--इन दोनों कार्योमेंसे किसी एकको हितकर समझकर अपनानेका सारा दायित्व मेरे हाथमें आ गया है; तथापि (इसमें प्रारब्धकी अनुकूलता अपेक्षित है) कुन्तीनन्दन! जुताई और सिंचाई करके कितना ही शुद्ध और सरस बनाया हुआ खेत क्यों न हो, कभी-कभी वर्षके बिना वह अच्छी उपज नहीं दे सकता
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ହେ କୌନ୍ତେୟ! ବର୍ଷା ବିନା କୌଣସି ପ୍ରୟାସ କେବେ ସତ୍ୟ ଫଳକୁ ପହଞ୍ଚେ ନାହିଁ। ଶାନ୍ତି କି ଯୁଦ୍ଧ—ଏ ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରୁ ଯାହା ହିତକର, ତାହା ଗ୍ରହଣ କରିବାର ଭାର ଏବେ ମୋ ହାତରେ ଆସିଛି; ତଥାପି ସିଦ୍ଧି ପ୍ରାରବ୍ଧର ଅନୁକୂଳତା ଉପରେ ନିର୍ଭର। ଯେପରି ଭଲଭାବେ ଚାଷ ଓ ସିଞ୍ଚନ କରି ଶୁଦ୍ଧ ଓ ସାରବତୀ କରାଯାଇଥିବା କ୍ଷେତ୍ର ମଧ୍ୟ କେବେ କେବେ ବର୍ଷା ନ ହେଲେ ଭଲ ଫସଲ ଦେଇପାରେ ନାହିଁ।
Verse 46
दैवे च मानुषे चैव संयुक्ते लोककारणम् | इसलिये पूर्वकालके महात्माओंने अपनी बुद्धि-द्वारा यही निश्चय किया है कि लोकहितका साधन दैव तथा पुरुषार्थ दोनोंपर निर्भर है
ଦୈବ ଓ ମାନବ ପ୍ରୟାସ—ଏ ଦୁଇଟିର ସଂଯୋଗରୁ ହିଁ ଲୋକ-ବ୍ୟବସ୍ଥା ଓ ଲୋକହିତ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ। ତେଣୁ ପୂର୍ବକାଳର ମହାତ୍ମାମାନେ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବୁଦ୍ଧିରେ ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିଲେ ଯେ ଲୋକହିତର ସାଧନ ଦୈବ ଓ ପୁରୁଷାର୍ଥ—ଉଭୟ ଉପରେ ନିର୍ଭର।
Verse 56
दैवं तु न मया शक्यं कर्म कर्तु कथंचन । मैं पुरुषार्थसे जितना हो सकता है, उतना संधि-स्थापनके लिये अधिक-से-अधिक प्रयत्न करूँगा; परंतु प्रारब्धके विधानको किसी प्रकार भी टाल देना या बदल देना मेरे लिये सम्भव नहीं है
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ଦୈବବିଧାନକୁ ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ କରିବା କିମ୍ବା ବଦଳାଇବାରେ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ। ମୁଁ ପୁରୁଷାର୍ଥରେ ଯେତେ ସମ୍ଭବ, ସନ୍ଧି-ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରୟାସ କରିବି; କିନ୍ତୁ ପ୍ରାରବ୍ଧର ବିଧାନକୁ ଟାଳିବା କିମ୍ବା ପରିବର୍ତ୍ତନ କରିବା ମୋ ପାଇଁ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ।
Verse 66
न हि संतप्यते तेन तथारूपेण कर्मणा । दुर्बुद्धि दुर्योधन सदा धर्म और लोकाचारको छोड़कर ही चलता है; परंतु इस प्रकार धर्म और लोकके विरुद्ध कार्य करके भी वह उससे संतप्त नहीं होता
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ଏପରି ଆଚରଣ ଓ ଏପରି କର୍ମ କରି ମଧ୍ୟ ସେ କିଛିମାତ୍ର ସନ୍ତପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ। ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସଦା ଧର୍ମ ଓ ଲୋକାଚାରକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଚାଲେ; ତଥାପି ଧର୍ମ ଓ ଲୋକବ୍ୟବସ୍ଥାର ବିରୋଧରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରି ମଧ୍ୟ ତାହାର କୌଣସି ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ ନାହିଁ।
Verse 78
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें अजुनवाक्यविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଅର୍ଜୁନବାକ୍ୟବିଷୟକ ଅଷ୍ଟସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 79
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये एकोनाशीतितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକୋଣାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is how to pursue rightful aims through diplomacy without triggering escalatory fear or rashness—balancing truthful firmness with conciliatory speech to preserve the possibility of orderly settlement.
Human intentions and outcomes are contingent; therefore, prudent action requires kāla-yukti—adapting decisions and communication to changing contexts while maintaining ethical orientation and strategic clarity.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-level significance lies in illustrating how dharma-guided policy is operationalized through speech, counsel networks, and context-aware judgment within governance.