
भीमसेनस्य आत्मबलप्रशंसा — Bhīmasena’s Assertion of Strength (Udyoga Parva, Adhyāya 74)
Upa-parva: Bhīmasena–Kṛṣṇa Saṃvāda (Boast and Reassurance Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates a post-remark exchange in which Bhīmasena, described as consistently wrathful and impatient of insult, responds to Vāsudeva Kṛṣṇa. Bhīma interprets Kṛṣṇa’s words as misjudging his intent and capacity in battle, and he challenges the appropriateness of such speech toward him. He then delivers a self-assessment that he acknowledges as generally improper (self-praise being socially discouraged), yet he proceeds due to provocation. Employing cosmic-scale imagery, Bhīma claims he could restrain even the two ‘worlds’ (rodasī) if they collided in anger, and describes the inescapability of his arms, likening them to massive iron bars. He asserts that even formidable natural or divine forces would not protect adversaries once he has engaged them, and he frames future combat as the arena where Kṛṣṇa will empirically ‘know’ his power. Despite the intensity, Bhīma concludes by reframing his endurance of hardship as grounded in friendship and compassion, requesting that the Bhāratas not be destroyed—thus tempering martial boast with a stated preference for the welfare of the polity.
Chapter Arc: भीम—जो सामान्यतः अग्नि-सा उग्र है—आज एकान्त में बोझ से दबे दुर्बल-से मनुष्य की भाँति बैठा है; कभी हँसता, कभी रोता-सा, आँखें मूँदे, भौंहें चढ़ाए—यह उलटा दृश्य सबको चकित करता है। → श्रीकृष्ण (शौरि, शार्ङ्गधन्वा) भीम के मुख से निकले ‘अभूतपूर्व मृदु’ वचन सुनकर आश्चर्य करते हैं—यह तो पावक में शीतलता या पर्वत के सरकने जैसा है। वे भीम के भीतर उठे विषाद, ग्लानि और मन्यु-जन्य विक्षोभ को पहचानकर उसे टटोलते हैं और कारण पूछते हैं। → कृष्ण का तीक्ष्ण, पर करुण, उत्तेजक उपदेश: ‘यह तुम्हारे योग्य नहीं; अपने कर्म, अपने कुल और क्षत्रिय-धर्म को देखो—उठो, विषाद मत करो; जो पराक्रम से नहीं मिलता, उसे क्षत्रिय शोभा नहीं देता।’ भीम के ‘असंगत’ मृदु-वचन को वे पर्वत-सरकने जैसा महदाश्चर्य कहकर झकझोरते हैं। → कृष्ण भीम के मन में जमी ग्लानि को ‘अनुरूप नहीं’ कहकर काटते हैं और उसे स्थिरता, धैर्य तथा कर्तव्य-निष्ठा की ओर मोड़ते हैं—भीम का मन्यु अब दिशाहीन नहीं, धर्म-संगत संकल्प में ढलने लगता है। → कृष्ण द्वारा भीम को उठाकर कर्तव्य-पथ पर लाने के बाद प्रश्न शेष रहता है—यह जाग्रत भीम आगे किस प्रतिज्ञा/कर्म-निर्णय की ओर बढ़ेगा, और दूत-यात्रा के व्यापक राजनैतिक संकट में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीमवाक्यविषयक चौद्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ ऑपन-माजल बछ। अं कऋाज पड्चसप्ततितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा महाबाहु: केशव: प्रहसन्निव । अभूतपूर्व भीमस्य मार्दवोपहितं वच:,वैशम्पायनजी कहते हैं--भीमसेनके मुखसे यह अभूतपूर्व मृदुतापूर्ण वचन सुनकर महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण हँसने-से लगे। जैसे पर्वतमें लघुता आ जाय और अम्निमें शीतलता प्रकट हो जाय, उसी प्रकार उनमें यह नम्रताका प्रादुर्भाव हुआ था। यह सोचकर शार्ड्धनुष धारण करनेवाले रामानुज श्रीकृष्ण अपने पास बैठे हुए वृकोदर भीमसेनको, जो उस समय दयासे द्रवित हो रहे थे, अपने वचनोंद्वारा उसी प्रकार उत्तेजित करते हुए बोले, मानो वायु अग्निको उद्दीप्त कर रही हो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୀମସେନଙ୍କ ମୁଖରୁ ନିଷ୍କୃତ ଏହି ଅଭୂତପୂର୍ବ, ମୃଦୁତାପୂର୍ଣ୍ଣ ବଚନ ଶୁଣି ମହାବାହୁ କେଶବ ଯେନ ହସି ପକାଇଲେ। ତାପରେ ଶାର୍ଙ୍ଗଧନୁଧାରୀ ରାମାନୁଜ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ଦୟାରେ ଦ୍ରବିତ ହୋଇ ପାଖରେ ବସିଥିବା ବୃକୋଦରକୁ ନିଜ ବଚନରେ ସେହିପରି ଉଦ୍ଦୀପିତ କଲେ, ଯେପରି ବାୟୁ ଅଗ୍ନିକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରେ।
Verse 2
गिरेरिव लघुत्वं तच्छीतत्वमिव पावके । मत्वा रामानुज: शौरि: शार्ज्र्धन्वा वृकोदरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--भीमसेनके मुखसे यह अभूतपूर्व मृदुतापूर्ण वचन सुनकर महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण हँसने-से लगे। जैसे पर्वतमें लघुता आ जाय और अम्निमें शीतलता प्रकट हो जाय, उसी प्रकार उनमें यह नम्रताका प्रादुर्भाव हुआ था। यह सोचकर शार्ड्धनुष धारण करनेवाले रामानुज श्रीकृष्ण अपने पास बैठे हुए वृकोदर भीमसेनको, जो उस समय दयासे द्रवित हो रहे थे, अपने वचनोंद्वारा उसी प्रकार उत्तेजित करते हुए बोले, मानो वायु अग्निको उद्दीप्त कर रही हो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୀମସେନଙ୍କ ମୁଖରୁ କରୁଣାରେ ମୃଦୁ ହୋଇଥିବା ସେଇ ଅପୂର୍ବ ବଚନ ଶୁଣି ମହାବାହୁ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ହସିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ଯେପରି ପର୍ବତରେ ଲଘୁତା ଆସିଯାଏ କିମ୍ବା ଅଗ୍ନିରେ ଶୀତଳତା ପ୍ରକଟ ହୁଏ—ସେପରି ଭୀମଙ୍କ ମନରେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ନମ୍ରତା ଉଦ୍ଭବ ହୋଇଥିଲା। ଏହା ବୁଝି ରାମାନୁଜ ଶୌରି, ଶାର୍ଙ୍ଗଧନୁଧାରୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ନିଜ ପାଖରେ ବସିଥିବା ଦୟାରେ ଦ୍ରବିତ ବୃକୋଦର ଭୀମକୁ ବଚନଦ୍ୱାରା ପୁଣି ଉତ୍ତେଜିତ କଲେ—ଯେପରି ପବନ ଅଗ୍ନିକୁ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ କରେ।
Verse 3
संतेजयंस्तदा वाम्भिर्मातरिश्वेव पावकम् | उवाच भीममासीनं कृपयाभिपरिप्लुतम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--भीमसेनके मुखसे यह अभूतपूर्व मृदुतापूर्ण वचन सुनकर महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण हँसने-से लगे। जैसे पर्वतमें लघुता आ जाय और अम्निमें शीतलता प्रकट हो जाय, उसी प्रकार उनमें यह नम्रताका प्रादुर्भाव हुआ था। यह सोचकर शार्ड्धनुष धारण करनेवाले रामानुज श्रीकृष्ण अपने पास बैठे हुए वृकोदर भीमसेनको, जो उस समय दयासे द्रवित हो रहे थे, अपने वचनोंद्वारा उसी प्रकार उत्तेजित करते हुए बोले, मानो वायु अग्निको उद्दीप्त कर रही हो
ତା’ପରେ ସେ ମାତରିଶ୍ୱା (ବାୟୁଦେବ) ଯେପରି ବାୟୁବେଗରେ ଅଗ୍ନିକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରେ, ସେପରି ବଚନଦ୍ୱାରା ଆସୀନ, କରୁଣାରେ ପ୍ଲାବିତ ଭୀମକୁ ଉତ୍ତେଜିତ କଲେ।
Verse 4
श्रीभगवानुवाच त्वमन्यदा भीमसेन युद्धमेव प्रशंससि । वधाभिनन्दिन: क्रूरान् धार्तराष्ट्रानू मिमर्दिषु:,श्रीभगवान् बोले--भैया भीमसेन! आजके सिवा और दिन तो तुम हिंसासे ही प्रसन्न होनेवाले क्रूर धृतराष्ट्रप््न्रोंको मसल डालनेकी इच्छा मनमें लेकर सदा युद्धकी ही प्रशंसा किया करते थे
ଶ୍ରୀଭଗବାନ କହିଲେ—ହେ ଭୀମସେନ! ଅନ୍ୟ ଦିନରେ ତୁମେ କେବଳ ଯୁଦ୍ଧକୁ ହିଁ ପ୍ରଶଂସା କରୁଥିଲ; ଏବଂ ବଧରେ ଆନନ୍ଦ ପାଉଥିବା ସେଇ କ୍ରୂର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରିଦେବା ଇଚ୍ଛା ମନେ ଧରିଥିଲ।
Verse 5
न च स्वपिषि जागर्षि न्युब्ज: शेषे परंतप । घोरामशान्तां रुषतीं सदा वाचं प्रभाषसे,परंतप! (इन्हीं विचारोंमें डूबे रहनेके कारण) तुम रातमें सोते भी नहीं थे, जागते ही रहते थे। कभी सोना ही पड़ा, तो औंधे-मुँह लेट जाते और सदा घोर, अशान्त तथा रोषभरी बातें ही तुम्हारे मुँठउसले निकलती थीं
ହେ ପରନ୍ତପ! ତୁମେ ଶୋଇଲେ ମଧ୍ୟ ଘୁମେଇ ପାରୁନଥିଲ; ଜାଗି ରହୁଥିଲ। ଏବଂ କେବେ ଶୋଇବାକୁ ପଡ଼ିଲେ ମୁହଁ ତଳକୁ କରି ଉବୁଡ଼ି ପଡ଼ି ରହୁଥିଲ; ତୁମ ମୁଖରୁ ସଦା ଘୋର, ଅଶାନ୍ତ ଓ କ୍ରୋଧଭରା ବାଣୀ ହିଁ ବାହାରୁଥିଲା।
Verse 6
निःश्वसन्नग्निवत् तेन संतप्त: स्वेन मन्युना । अप्रशान्तमना भीम सधूम इव पावक:,भीम! तुम बारंबार लंबी साँस खींचते हुए अपने ही क्रोधसे उसी प्रकार संतप्त होते थे, जैसे आग अपने ही तेजसे तपी रहती है। धुएँसे व्याप्त हुई अग्निकी भाँति तुम्हारे नित्य- निरन्तर अशान्ति छायी रहती थी
ହେ ଭୀମ! ତୁମେ ଅଗ୍ନି ପରି ବାରମ୍ବାର ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି, ନିଜ କ୍ରୋଧରେ ନିଜେ ହିଁ ଦଗ୍ଧ ହେଉଥିଲ। ତୁମ ମନ ଶାନ୍ତ ହୁଏନି; ଧୂଆଁରେ ଢାକା ଅଗ୍ନି ପରି ତୁମେ ସଦା ଅଶାନ୍ତିରେ ଆବୃତ ଥିଲ।
Verse 7
एकान्ते निः:श्वसज्छेषे भारार्त इव दुर्बल: । अपि त्वां केचिदुन्मत्तं मन्यन्तेडतद्विदों जना:,भारी बोझसे पीड़ित दुर्बल मनुष्यकी भाँति तुम एकान्तमें बैठकर जोर-जोरसे साँस खींचते रहते थे। इसीलिये तुम्हें कुछ लोग, जो इस बातको नहीं जानते हैं, पागल मानते हैं
ଏକାନ୍ତରେ ତୁମେ ଭାରରେ ପୀଡିତ ଦୁର୍ବଳ ମଣିଷ ପରି ପୁନଃପୁନଃ ଦୀର୍ଘ ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ୁଥିଲ; ତେଣୁ ଏହା ନଜାଣିଥିବା କେତେକ ଲୋକ ତୁମକୁ ଉନ୍ମତ୍ତ ଭାବନ୍ତି।
Verse 8
आरुज्य वक्षान् निर्मूलान् गज: परिरुजन्निव | निष्नन् पद्धिः क्षितिं भीम निष्टनन् परिधावसि,भीम! जैसे हाथी वृक्षोंको जड़-मूलसहित उखाड़कर उन्हें पैरोंकी ठोकरोंसे टूक-टूक कर डालता है, उसी प्रकार तुम भी पैरोंसे पृथ्वीपर आघात करते हुए जोर-जोरसे गर्जते और चारों ओर दौड़ते थे
ଭୀମ! ଯେପରି ହାତୀ ଗଛକୁ ମୂଳସହିତ ଉପାଡ଼ି ପାଦଘାତରେ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରିଦିଏ, ସେପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ପାଦରେ ପୃଥିବୀକୁ ଆଘାତ କରି, ଉଚ୍ଚ ଗର୍ଜନ କରି, ସବୁଦିଗରେ ଦୌଡ଼ୁଥିଲ।
Verse 9
नास्मिज्जने5भिरमसे रह: क्षिपसि पाण्डव । नान्यं निशि दिवा चापि कदाचिदभिनन्दसि,पाण्डुनन्दन! तुम कभी इस जनसमुदायमें प्रसन्नताका अनुभव नहीं करते थे; सदा एकान्तमें ही बैठकर कालक्षेप करते थे। दिन हो या रात, तुम कभी किसी दूसरेका अभिनन्दन नहीं करते थे
ପାଣ୍ଡବ! ଏହି ଜନସମୂହରେ ତୁମେ କେବେ ଆନନ୍ଦ ପାଉନଥିଲ; ବରଂ ଏକାନ୍ତରେ ହିଁ ସମୟ କାଟୁଥିଲ। ଦିନ ହେଉ କି ରାତି, ତୁମେ କେବେ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ଅଭିନନ୍ଦନ କରୁନଥିଲ।
Verse 10
अकस्मात् स्मयमानश्न रहस्यास्से रुदन्निव | जान्वोर्मूर्धानमाधाय चिरमास्से प्रमीलित:,कभी सहसा हँस पड़ते और कभी एकान्त स्थानमें रोते हुए-से प्रतीत होते थे और कभी घुटनोंपर मस्तक रखकर दीर्घकालतक नेत्र बंद किये बैठे रहते थे
କେବେ କେବେ ତୁମେ ହଠାତ୍ ହସିପଡ଼ୁଥିଲ; କେବେ ଏକାନ୍ତରେ ବସି କାନ୍ଦୁଥିବା ପରି ଲାଗୁଥିଲ; ଆଉ କେବେ ଜାନୁ ଉପରେ ମୁଣ୍ଡ ରଖି, ଆଖି ବୁଜି, ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ବସି ରହୁଥିଲ।
Verse 11
भ्रुकुटिं च पुन: कुर्वन्नोष्ठी च विदशन्निव । अभीक्षणं दृश्यसे भीम सर्व तन््मन्युकारितम्,भीमसेन! मैंने बार-बार तुम्हें भौंहें टेढ़ी करके दोनों ओठोंको चबाते हुए-से देखा है। यह सब तुम्हारे क्रोधकी करतूत है
ଭୀମସେନ! ମୁଁ ତୁମକୁ ପୁନଃପୁନଃ ଭୃକୁଟି କୁଚକାଇ, ଯେନେ ଓଠ କାମୁଡ଼ୁଛ, ସେପରି ଦେଖୁଛି। ଏ ସବୁ ତୁମ କ୍ରୋଧର କର୍ତ୍ତୃତ୍ୱ।
Verse 12
यथा पुरस्तात् सविता दृश्यते शुक्रमुच्चरन् । यथा च पश्चान्निर्मुक्तो ध्रुवं पर्येति रश्मिवान्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେପରି ପୂର୍ବଦିଗରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଉଦିତ ହୋଇ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ତେଜ ପ୍ରକାଶ କରି ଦେଖାଯାଏ, ଏବଂ ଯେପରି ଆଗକୁ ଗତି କରି ସେଇ ରଶ୍ମିମାନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅଚଳ ନିୟମରେ ପଶ୍ଚିମଦିଗକୁ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ଗମନ କରେ—ସେହିପରି ଏହି କଥା ମଧ୍ୟ ଅବ୍ୟଭିଚାରୀ, ନିୟତ ଓ ନିଶ୍ଚିତ କ୍ରମରେ ଅଗ୍ରସର ହୁଏ।
Verse 13
तथा सत्य ब्रवीम्येतन्नास्ति तस्य व्यतिक्रम: । हन्ताहं गदयाभ्येत्य दुर्योधनममर्षणम्
ସେହିପରି ମୁଁ ଏହାକୁ ସତ୍ୟ ଭାବେ କହୁଛି—ଏଥିରେ କୌଣସି ବ୍ୟତିକ୍ରମ ନାହିଁ। ମୁଁ ଗଦା ନେଇ ଆଗେଇ ଯାଇ ଅମର୍ଷଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ବଧ କରିବି।
Verse 14
इति सम मध्ये भ्रातृणां सत्येनालभसे गदाम् । तस्य ते प्रशमे बुद्धिर्ध्रियतेडद्य परंतप
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଭଳି ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟବଳରେ ତୁମେ ଗଦା ଲାଭ କରିଥିଲ। ତେଣୁ, ହେ ପରନ୍ତପ, ଆଜି ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ଶମନ ଓ ସଂଯମରେ ଧୃଢ଼ ରହୁ—ଆଜି ମନକୁ ଶାନ୍ତି-ସ୍ଥାପନରେ ନିବେଶ କର।
Verse 15
तुम अपने भाइयोंके बीचमें सत्यकी शपथ खाकर बार-बार गदा छूते हुए यह कहते थे -- जैसे सूर्यदेव पूर्वदिशामें उदित होते हुए अपने तेजोमण्डलको प्रकट करते दिखायी देते हैं और पश्चिमदिशामें वे ही अंशुमाली अस्ताचलको जाकर निश्चितरूपसे मेरुपर्वतकी परिक्रमा करते हैं, उनके इस नियममें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता; उसी प्रकार मैं यह सच कहता हूँ कि अमर्षशील दुर्योधनके पास जाकर अपनी गदासे उसके प्राण ले लूँगा। मेरे इस कथनमें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ सकता।” परंतप! ऐसी प्रतिज्ञा करनेवाले तुम-जैसे वीरशिरोमणिकी बुद्धि आज शान्ति-स्थापनमें लग रही है; (यह आश्वर्यकी बात है!) ।। १२ -१४ || अहो युद्धाभिकाड्क्षाणां युद्धकाल उपस्थिते । चेतांसि विप्रतीपानि यत् त्वां भीर्भीम विन्दति,अहो! युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर पहलेसे युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले लोगोंके विचार भी इतने बदल जाते हैं कि वे विपरीत सोचने लगते हैं। भीमसेन! जान पड़ता है, इसीलिये तुम्हें भी युद्धसे भय होने लगा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତୁମେ ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟର ଶପଥ କରି, ପୁନଃପୁନଃ ଗଦାକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ଏପରି କହୁଥିଲ—‘ଯେପରି ସୂର୍ଯ୍ୟ ପୂର୍ବଦିଗରେ ଉଦିତ ହୋଇ ନିଜ ତେଜୋମଣ୍ଡଳ ପ୍ରକାଶ କରେ, ଏବଂ ସେଇ ରଶ୍ମିମାନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପଶ୍ଚିମର ଅସ୍ତଗିରିକୁ ଯାଇ ନିତ୍ୟ ମେରୁର ପରିକ୍ରମା କରେ—ତାଙ୍କ ନିୟମରେ କେବେ ଭେଦ ହୁଏ ନାହିଁ; ସେହିପରି ମୁଁ ସତ୍ୟ କହୁଛି—ମୁଁ ଅମର୍ଷଶୀଳ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ମୋ ଗଦାରେ ତାଙ୍କ ପ୍ରାଣ ହରିବି; ମୋ କଥାରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ହେବ ନାହିଁ।’ କିନ୍ତୁ, ହେ ପରନ୍ତପ, ଆଜି ସେହି ପ୍ରତିଜ୍ଞାବଦ୍ଧ ବୀରଶିରୋମଣି ତୁମ ବୁଦ୍ଧି ଶାନ୍ତି-ସ୍ଥାପନରେ ଲାଗିଛି—ଏହା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ। ହାୟ! ଯୁଦ୍ଧକାଳ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ଚିନ୍ତା ମଧ୍ୟ ବିପରୀତ ହୋଇଯାଏ; ତେଣୁ, ହେ ଭୀମ, ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧଭୟ ଆବର୍ତ୍ତିଛି ବୋଲି ଲାଗୁଛି।
Verse 16
अहो पार्थ निमित्तानि विपरीतानि पश्यसि । स्वप्रान्ते जागरान्ते च तस्मात् प्रशममिच्छसि,कुन्तीनन्दन! बड़े विस्मयकी बात है कि तुम्हें सोते और जागतेमें उलटे परिणामकी सूचना देनेवाले अपशकुन दिखायी देते हैं। इसीसे तुम शान्तिकी इच्छा प्रकट कर रहे हो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହାୟ, ହେ ପାର୍ଥ! ତୁମେ ନିଦ୍ରାନ୍ତରେ ଓ ଜାଗରଣାନ୍ତରେ ମଧ୍ୟ ବିପରୀତ ଫଳ ସୂଚକ ଅପଶକୁନ ଦେଖୁଛ; ତେଣୁ, ହେ କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ, ତୁମେ ଶମନ ଓ ଶାନ୍ତି ଇଚ୍ଛା କରୁଛ।
Verse 17
अहो नाशंससे किज्वचित् पुंस्त्वं क्लीब इवात्मनि । कश्मलेनाभिपन्नो$सि तेन ते विकृतं मन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହାୟ! ତୁମେ ନିଜ ଭିତରେ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ପୁରୁଷାର୍ଥକୁ ସ୍ୱୀକାର କରୁନାହ; ନିଜ ପ୍ରତି ନପୁଂସକ ପରି। କଶ୍ମଳ (ମୋହ-ଭ୍ରମ) ତୁମକୁ ଆବରିଛି; ତେଣୁ ତୁମ ମନ ବିକୃତ ହୋଇଛି।
Verse 18
अहो! कायर और नपुंसककी भाँति इस समय तुम अपनेमें कुछ भी पुरुषार्थ नहीं मानते। तुम्हारे ऊपर मोह छा गया है, जिससे तुम्हारी मानसिक दशा बिगड़ गयी है ।। उद्वेपते ते हृदयं मनस्ते प्रतिसीदति । ऊरुस्तम्भगृहीतो5सि तस्मात् प्रशममिच्छसि,जान पड़ता है कि तुम्हारा हृदय काँपता है, मन शिथिल होता जाता है, तुम्हारी जाँचें मानो अकड़ गयी हैं; इसीलिये तुम शान्ति चाहते हो
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତୁମ ହୃଦୟ କମ୍ପିତ ହେଉଛି, ମନ ବିଷାଦରେ ଡୁବୁଛି। ଯେପରି ଜଂଘା ଜଡତାରେ ଧରାପଡ଼ି ଆଗକୁ ବଢ଼ିପାରୁନାହ, ସେପରି ତୁମେ ‘ଶାନ୍ତି’ ଚାହୁଁଛ—ଜ୍ଞାନରୁ ନୁହେଁ, ସଙ୍କଳ୍ପ ଭଙ୍ଗରୁ।
Verse 19
अनित्यं किल मर्त्यस्य पार्थ चित्त चलाचलम् | वातवेगप्रचलिता अछ्लीला शाल्मलेरिव,पार्थ! कहते हैं कि मनुष्यका चित्त सदा एक निश्चयपर अटल नहीं रहता। वह हवाके वेगसे हिलती हुई सेंमलके फलकी गाँठके समान डाँवाडोल रहता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! କୁହାଯାଏ, ମର୍ତ୍ୟର ଚିତ୍ତ ଏକ ନିଶ୍ଚୟରେ ସ୍ଥିର ରହେନାହିଁ; ତାହା ଅନିତ୍ୟ ଓ ଚଞ୍ଚଳ। ପବନର ବେଗରେ ହଲୁଥିବା ଶାଲ୍ମଳୀ (ସେମଳ)ର ପଞ୍ଜା ପରି ତାହା ଡୋଳେ।
Verse 20
तवैषा विकृता बुद्धिर्गवां वागिव मानुषी । मनांसि पाण्डुपुत्राणां मज्जयत्यप्लवानिव,यदि गौएँ मनुष्योंकी बोली बोलें, तो वह जैसे बिगड़ी हुई होगी, उसी प्रकार तुम्हारी यह बुद्धि विकृत होकर अगाध समुद्रमें नावके बिना डूबनेवाले मनुष्योंकी भाँति पाण्डवोंके मनको चिन्तामग्न किये देती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତୁମର ଏହି ବିକୃତ ବୁଦ୍ଧି ଗାଈମାନଙ୍କର ମାନବୀୟ ବାଣୀ ପରି—ଅସ୍ୱାଭାବିକ ଓ ବିକଳ। ଏହିପରି ଏହା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ମନକୁ ଚିନ୍ତାରେ ଡୁବାଇ ଦିଏ, ଯେପରି ନାଉ ନଥିବା ଲୋକ ଅଗାଧ ସମୁଦ୍ରରେ ମଜ୍ଜିଯାନ୍ତି।
Verse 21
इदं मे महदाश्चर्य पर्वतस्येव सर्पणम् । यदीदृशं प्रभाषेथा भीमसेनासमं वच:,भीमसेन! तुम जो बात कह रहे हो, वह तुम्हारे योग्य कदापि नहीं है। जैसे पर्वतका चलना आश्चर्यकी बात है, उसी प्रकार तुम्हारे द्वारा किया हुआ यह शान्ति-प्रस्ताव मुझे महान आश्चर्यमें डाल रहा है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହା ମୋ ପାଇଁ ମହା ଆଶ୍ଚର୍ୟ, ଯେପରି ପର୍ବତ ଚଳିଲା। ହେ ଭୀମସେନ! ତୁମ ମୁଖରୁ ଏପରି କଥା ନିଷ୍କ୍ରମଣ ତୁମକୁ ଶୋଭା ଦେଉନାହିଁ; ଏହି ଶାନ୍ତି-ପ୍ରସ୍ତାବ ମୋତେ ବିସ୍ମୟରେ ପକାଇଦେଉଛି।
Verse 22
स दृष्टवा स्वानि कर्माणि कुले जन्म च भारत | उत्तिष्ठस्व विषादं मा कृथा वीर स्थिरो भव,भारत! तुम अपने कर्मोंकी ओर देखकर और जिस कुलनमें तुम्हारा जन्म हुआ है, उसपर भी दृष्टिपात करके खड़े हो जाओ। वीरवर! विषाद न करो और अपने क्षत्रियोचित कर्मपर डट जाओ
ହେ ଭାରତ! ନିଜ କର୍ମକୁ ଦେଖି, ଯେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୁଳରେ ତୁମ ଜନ୍ମ ହୋଇଛି ତାହାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ମରଣ କରି ଉଠ। ହେ ବୀର! ବିଷାଦ କରନି; ସ୍ଥିର ହୋଇ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମର କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ ହୁଅ।
Verse 23
न चैतदनुरूपं ते यत् ते ग्लानिररिंदम । यदोजसा न लभते क्षत्रियो न तदश्लुते,शत्रुदमन! तुम्हारे चित्तमें जो ग्लानि उत्पन्न हुई है, यह तुम्हारे-जैसे शूरवीरके योग्य कदापि नहीं है; क्योंकि क्षत्रिय जिसे ओज एवं पराक्रमसे प्राप्त नहीं करता, उसे अपने उपयोगमें नहीं लाता है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଅରିନ୍ଦମ! ତୁମ ମନରେ ଯେ ଗ୍ଲାନି ଉଦ୍ଭବ ହୋଇଛି, ତାହା ତୁମ ପରି ବୀରଙ୍କୁ କେବେ ଶୋଭା ଦେଉନାହିଁ; କାରଣ କ୍ଷତ୍ରିୟ ନିଜ ଓଜ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଯାହା ପାଉନାହିଁ, ତାହାକୁ ଭୋଗ କରେନାହିଁ।
Verse 75
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीमोत्तेजकश्रीकृष्णवाक्ये पजञ्चसप्ततितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ, ଭୀମଙ୍କ ତେଜକୁ ଉଦ୍ଦୀପିତ କରୁଥିବା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟରେ ଚିହ୍ନିତ ପଞ୍ଚସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma concerns whether forceful self-assertion (including socially disfavored self-praise) is justified to correct perceived disrespect, versus maintaining restraint to preserve harmonious counsel among allies.
Speech is ethically consequential: counsel should be truthful and strategic while honoring the recipient’s dignity; simultaneously, personal power must be governed by friendship, compassion, and responsibility to collective welfare.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-level function is character-ethical, positioning Bhīma’s rhetoric as a psychological and political signal within the pre-conflict narrative rather than a ritualized promise of merit.