
Udyoga Parva, Adhyāya 73 — Kr̥ṣṇa’s Appraisal of Bhīma’s Altered Temper and Reaffirmation of Martial Resolve
Upa-parva: Udyoga Parva — Krishna’s Consolation and Reorientation of Bhima (Chapter 73 context unit)
Vaiśaṃpāyana narrates that Kr̥ṣṇa (Keśava), appearing almost amused by the rarity of Bhīma’s softened speech, evaluates the incongruity as something like “lightness in a mountain” or “coolness in fire.” Kr̥ṣṇa then addresses Bhīma compassionately yet firmly, describing outward markers of agitation: sleeplessness, harsh and restless speech, heated breathing, solitary lamentation, sudden laughter and weeping, prolonged silence with head on knees, and repeated frowning—symptoms attributed to anger and inner turmoil. He notes that uninformed observers may misjudge such conduct as instability. Kr̥ṣṇa recalls Bhīma’s earlier public vow among his brothers to strike Duryodhana with the gadā, asserting its certainty and urging a return to composure. He challenges Bhīma’s perception of adverse omens and fear at the very moment when war-time decision is imminent, framing the wavering mind as transient and wind-tossed. The chapter concludes with a directive: remember one’s deeds, lineage, and kṣatriya capacity; rise from dejection, reject despondency, and regain stable resolve aligned with duty and prior commitment.
Chapter Arc: कृष्ण के शान्ति-प्रयास की पृष्ठभूमि में भीमसेन का उग्र स्वर उठता है—वह मधुसूदन से कहता है कि कुरुओं में शान्ति तभी टिकेगी जब दुर्योधन की प्रकृति को पहचानकर उसी के अनुरूप नीति अपनाई जाए। → भीम दुर्योधन के स्वभाव का कठोर चित्र खींचता है—अमर्षी, जातसंरम्भी, श्रेय-द्वेषी, ऐश्वर्य-मद में मतवाला और पाण्डवों से वैर बाँध चुका; वह चेतावनी देता है कि ऐसे व्यक्ति को केवल ‘साम’ से साधना भ्रम है। → भीम दुर्योधन को ‘कुलाङ्गार’ और ‘युगान्त-कालसम्भृत’ विनाश-कारक के रूप में रखकर अतीत के अठारह विख्यात राजाओं का उदाहरण देता है, जिन्होंने धर्म-विप्लव के समय कुल-नाश और सुहृद-बान्धवों के उच्छेद का कारण बनकर इतिहास में कलंक छोड़ा—और कहता है कि दुर्योधन भी उसी पंक्ति का है। → भीम स्पष्ट करता है कि वह शान्ति-स्थापन के हित में ही बोल रहा है; युधिष्ठिर भी शान्ति चाहता है, अर्जुन स्वभावतः दयालु है और युद्ध-लोलुप नहीं—परन्तु शान्ति का मार्ग दुर्योधन की हठ-प्रकृति से टकराए बिना पूरा नहीं होगा। → कृष्ण के दूत-धर्म और शान्ति-नीति के सामने भीम की यह भविष्यवाणी खड़ी रह जाती है—क्या दुर्योधन समझेगा, या शान्ति-प्रयास विफल होकर युद्ध को अवश्यंभावी बना देगा?
Verse 1
अपन बक। ] अत्णशाए<म चतु:ःसप्ततितमो< ध्याय: भीमसेनका शान्तिविषयक प्रस्ताव भीम उवाच यथा यथैव शान्ति: स्यात् कुरूणां मधुसूदन । तथा तथैव भाषेथा मा सम युद्धेन भीषये:,भीमसेन बोले--मधुसूदन! आप कौरवोंके बीचमें वैसी ही बातें कहें, जिससे हमलोगोंमें शान्ति स्थापित हो सके। युद्धकी बात सुनाकर उन्हें भयभीत न कीजियेगा
ଭୀମସେନ କହିଲେ—“ମଧୁସୂଦନ! କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯେପରି ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପିତ ହେବ, ସେପରି ଭାବେ ପୁନଃପୁନଃ କଥା କହ। ସେହି ଅନୁସାରେ ହିଁ କହ; ଯୁଦ୍ଧର କଥା ଉଠାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ଭୟଭୀତ କରନି।”
Verse 2
अमर्षी जातसंरम्भ: श्रेयोद्वेषी महामना: । नोग्र॑ दुर्योधनो वाच्य: साम्नैवैनं समाचरे:,दुर्योधन असहनशील, क्रोधमें भरा रहनेवाला, श्रेयका विरोधी और मनमें बड़े-बड़े हौसले रखनेवाला है। अत: उसके प्रति कठोर बात न कहियेगा, उसे सामनीतिके द्वारा ही समझानेका प्रयत्न कीजियेगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଅସହନଶୀଳ, କ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ଶ୍ରେୟର ବିରୋଧୀ ଏବଂ ମହାମନା। ତେଣୁ ତାଙ୍କୁ କଠୋର କଥା କହିବେ ନାହିଁ; ସାମନୀତିରେ ହିଁ ତାଙ୍କୁ ବୁଝାଇବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତୁ।
Verse 3
प्रकृत्या पापसत्त्वश्न तुल्यचेतास्तु दस्युभि: । ऐश्वर्यमदमत्तश्न कृतवैरश्न पाण्डवै:,दुर्योधन स्वभावसे ही पापात्मा है। उसके हृदयमें डाकुओंके समान क्रूरता भरी रहती है। वह ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो गया है और पाण्डवोंके साथ सदा वैर बाँधे रखता है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସ୍ୱଭାବତଃ ପାପାତ୍ମା; ତାହାର ଚିତ୍ତ ଦସ୍ୟୁମାନଙ୍କ ପରି କ୍ରୂର। ଐଶ୍ୱର୍ୟର ମଦରେ ସେ ମତ୍ତ ହୋଇ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଜାଣିଶୁଣି ସ୍ଥାୟୀ ବୈର ବାନ୍ଧି ରଖିଛି।
Verse 4
अदीर्घदर्शी निष्टूरी क्षेप्ता क्रूरपराक्रम: । दीर्घमन्युरनेयश्व पापात्मा निकृतिप्रिय:,वह अदूरदर्शी, निषह्ठर वचन बोलनेवाला, परनिन्दक, क्रूर पराक्रमी, दीर्घकालतक क्रोधको मनमें संचित रखनेवाला, शिक्षा देने या सन्मार्गपर ले जाया जानेकी योग्यतासे रहित, पापात्मा तथा शठतासे प्रेम रखनेवाला है
ସେ ଅଦୀର୍ଘଦର୍ଶୀ, ନିଷ୍ଠୁର ଭାଷୀ, ପରନିନ୍ଦକ, କ୍ରୂର ପରାକ୍ରମୀ; ଦୀର୍ଘକାଳ କ୍ରୋଧକୁ ମନେ ସଞ୍ଚୟ କରି ରଖେ; ସନ୍ମାର୍ଗକୁ ନେଇଯିବା ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ; ପାପାତ୍ମା ଏବଂ ନିକୃତି-ପ୍ରିୟ।
Verse 5
ग्रियेतापि न भज्येत नैव जह्यात् स्वकं मतम् । तादृशेन शम: कृष्ण मन्ये परमदुष्कर:,श्रीकृष्ण! वह मर जायगा, किंतु झुक न सकेगा। अपनी टेक नहीं छोड़ेगा। मैं समझता हूँ, ऐसे दुराग्रही मनुष्यके साथ संधि स्थापित करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है
ହେ କୃଷ୍ଣ! ସେ ଚାପି ଦିଆଯାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଭାଙ୍ଗିବ ନାହିଁ; ନିଜ ମତକୁ କେବେ ଛାଡ଼ିବ ନାହିଁ। ତେଣୁ ଏପରି ଦୁରାଗ୍ରହୀ ସହ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ କରିବା ପରମ ଦୁଷ୍କର ବୋଲି ମୁଁ ମନେ କରେ।
Verse 6
सुहृदामप्यवाचीनस्त्यक्तधर्मा प्रियानृतः । प्रतिहन्त्येव सुह्दां वाचश्वैव मनांसि च,दुर्योधन हितैषी सुहृदोंके भी विपरीत आचरण करनेवाला है। उसने धर्मको तो त्याग ही दिया है, झूठको भी प्रिय मानकर अपना लिया है। वह मित्रोंकी भी बातोंका खण्डन करता है और उनके हृदयको चोट पहुँचाता है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ନୀଚ ଆଚରଣ କରେ। ସେ ଧର୍ମକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଅସତ୍ୟକୁ ପ୍ରିୟ କରିଛି। ସେ ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ଉପଦେଶକୁ ଖଣ୍ଡନ କରି, ତାଙ୍କର କଥା ଓ ହୃଦୟ—ଦୁହିଁକୁ ଆଘାତ କରେ।
Verse 7
स मन्युवशमापतन्न: स्वभावं दुष्टमास्थित: । स्वभावात् पापमभ्येति तृणैश्छन्न इवोरग:,उसने क्रोधके वशीभूत होकर दुष्ट स्वभावका आश्रय ले रखा है। वह तिनकोंमें छिपे सर्पकी भाँति स्वभावतः दूसरोंकी हिंसा करता है
ସେ କ୍ରୋଧବଶ ହୋଇ ଦୁଷ୍ଟ ସ୍ୱଭାବର ଆଶ୍ରୟ ନେଇଛି। ସ୍ୱଭାବତଃ ସେ ପାପଦିଗକୁ ଧାଉଛି—ଶୁଖିଲା ତୃଣ ତଳେ ଲୁଚିଥିବା ସର୍ପ ପରି, ଲୁଚିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଅନ୍ୟକୁ ଆଘାତ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ।
Verse 8
दुर्योधनो हि यत्सेन: सर्वथा विदितस्तव । यच्छीलो यत्स्वभावश्न यद्धलो यत्पराक्रम:,भगवन! दुर्योधनकी सेना जैसी है, उसका शील और स्वभाव जैसा है, उसका बल और पराक्रम जिस प्रकारका है, वह सब कुछ आपको सब प्रकारसे ज्ञात है
ଭଗବନ୍! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନା କେମିତି, ତାଙ୍କ ଶୀଳ ଓ ସ୍ୱଭାବ କେମିତି, ତାଙ୍କ ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମ କେମିତି—ଏ ସବୁ ଆପଣଙ୍କୁ ସର୍ବଥା ଜଣା।
Verse 9
पुरा प्रसन्ना: कुरव: सहपुत्रास्तथा वयम् । इन्द्रज्येष्ठा इवा भूम मोदमाना: सबान्धवा:
ପୂର୍ବକାଳରେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ କୁରୁମାନେ ଓ ଆମେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବଙ୍କ ସହ ପ୍ରସନ୍ନ ଥିଲୁ; ଇନ୍ଦ୍ରକୁ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ କରି ଦେବମାନେ ଯେପରି ଏକତ୍ର ଆନନ୍ଦ କରନ୍ତି, ସେପରି ଆମେ ମଧ୍ୟ ଏକତାରେ ହର୍ଷିତ ଥିଲୁ।
Verse 10
पूर्वकालमें पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित कौरव और हमलोग इन्द्र आदि देवताओंकी भाँति परस्पर मिलकर बड़ी प्रसन्नता और आनन्दके साथ रहते थे ।। दुर्योधनस्य क्रोधेन भरता मधुसूदन । धक्ष्यन्ते शिशिरापाये वनानीव हुताशनै:,परंतु मधुसूदन! जैसे शिशिरके अन्तमें (ग्रीष्मकाल आनेपर) वन दावानलसे जलने लगते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण भरतवंशी इस समय दुर्योधनकी क्रोधाग्निसे जलनेवाले हैं
ପୂର୍ବକାଳରେ ପୁତ୍ର ଓ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବମାନଙ୍କ ସହ କୁରୁମାନେ ଓ ଆମେ ଇନ୍ଦ୍ରାଦି ଦେବମାନଙ୍କ ପରି ପରସ୍ପର ମିଶି ମହାହର୍ଷରେ ବସୁଥିଲୁ। କିନ୍ତୁ ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଶିଶିରର ଶେଷରେ ଯେପରି ବନ ଦାବାନଳରେ ଜଳିଉଠେ, ସେପରି ଏବେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ କ୍ରୋଧରେ ସମଗ୍ର ଭରତବଂଶ ଦଗ୍ଧ ହେବାକୁ ଯାଉଛି।
Verse 11
अष्टादशेमे राजान: प्रख्याता मधुसूदन । ये समुच्चिच्छिदुर्जातीन् सुहृदश्च॒ सबान्धवान्,श्रीकृष्ण! आगे बताये जानेवाले ये अठारह विख्यात नरेश हैं, जिन्होंने बन्धु- बान्धवोंसहित कुट॒म्बीजनों तथा हितैषी सुहृदोंका संहार कर डाला था
ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଏମାନେ ହେଲେ ସେଇ ଅଷ୍ଟାଦଶ ପ୍ରଖ୍ୟାତ ରାଜା; ଯେମାନେ ନିଜ ଜାତି-ଗୋଷ୍ଠୀକୁ ସମୂଳ ଉଚ୍ଛେଦ କରିଥିଲେ ଏବଂ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ସହ ହିତେଷୀ ସୁହୃଦମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସଂହାର କରିଥିଲେ।
Verse 12
असुराणां समृद्धानां ज्वलतामिव तेजसा । पर्यायकाले धर्मस्य प्राप्त कलिरजायत,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ଭୀମ କହିଲେ— ଯେପରି ତେଜରେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଅସୁରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧର୍ମର ଚକ୍ର ପରିବର୍ତ୍ତିତ ହୋଇ ଧର୍ମକ୍ଷୟର ସମୟ ଆସିଲେ ଭୟଙ୍କର କଳହ ଉଦ୍ଭବ ହୋଇଥିଲା, ସେପରି ଯୁଗାନ୍ତ ସନ୍ନିକଟ ହେଲେ ନାନା ରାଜବଂଶରେ ନୀଚ ଓ କୁଳନାଶକ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ।
Verse 13
हैहयानां मुदावर्तो नीपानां जनमेजय: । बहुलस्तालजंघानां कृमीणामुद्धतो वसु:,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ହୈହୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଦାବର୍ତ୍ତ, ନୀପମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜନମେଜୟ; ତାଲଜଂଘମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବହୁଲ, କୃମିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉଦ୍ଧତ ବସୁ ଜନ୍ମିଲା।
Verse 14
अजबिन्दु: सुवीराणां सुराष्ट्राणां रुषर्द्धिक: । अर्कजश्न बलीहानां चीनानां धौतमूलक:,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ସୁବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଜବିନ୍ଦୁ, ସୁରାଷ୍ଟ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରୁଷର୍ଦ୍ଧିକ; ବଲୀହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅର୍କଜ, ଚୀନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧୌତମୂଳକ ଜନ୍ମିଲା।
Verse 15
हयग्रीवो विदेहानां वरयुश्न महौजसाम् । बाहु: सुन्दरवंशानां दीप्ताक्षाणां पुरूरवा:,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ବିଦେହମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ହୟଗ୍ରୀବ, ମହୌଜସମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବରୟୁ; ସୁନ୍ଦରବଂଶୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବାହୁ, ଦୀପ୍ତାକ୍ଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୂରବା ଜନ୍ମିଲା।
Verse 16
सहजकश्नेदिमत्स्यानां प्रवीराणां वृषध्वज: । धारणभश्रन्द्रवत्सानां मुकुटानां विगाहन:,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ଚେଦି ଓ ମତ୍ସ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସହଜ, ପ୍ରବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୃଷଧ୍ୱଜ; ଚନ୍ଦ୍ରବତ୍ସମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଧାରଣ, ମୁକୁଟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବିଗାହନ ଜନ୍ମିଲା।
Verse 17
शमश्न नन्दिवेगानामित्येते कुलपांसना: । युगान्ते कृष्ण सम्भूता: कुले कुपुरुषाधमा:,जैसे धर्मके विप्लवका समय उपस्थित होनेपर तेजसे प्रज्वलित होनेवाले समृद्धिशाली असुरोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हुआ था, उसी प्रकार हैहयवंशमें मुदावर्त, नीपकुलमें जनमेजय, तालजंघोंके वंशमें बहुल, कृमिकुलमें उद्ण्ड वसु, सुवीरोंके वंशमें अजबिंदु, सुराष्ट्रकुलमें रुषद्धिक, बलीहवंशमें अर्कज, चीनोंके कुलमें धौतमूलक, विदेहवंशमें हयग्रीव, महौजा नामक क्षत्रियोंके कुलमें वरयु, सुन्दरवंशी क्षत्रियोंमें बाहु, दीप्ताक्षकुलमें पुरूरवा, चेदि और मत्स्यदेशमें सहज, प्रवीरवंशमें वृषध्वज, चन्द्रवत्सकुलमें धारण, मुकुटवंशमें विगाहन तथा नन्दिवेगकुलमें शम--ये सभी कुलांगार एवं नराधम क्षत्रिय युगान्तकाल आनेपर ऊपर बताये अनुसार भिन्न-भिन्न कुलोंमें प्रकट हुए थे
ଭୀମ କହିଲେ—ନନ୍ଦିବେଗ ବଂଶର ଶମଶ୍ନ ଓ ତାଙ୍କ ପରି ଅନ୍ୟମାନେ—ଏମାନେ ନିଜ-ନିଜ କୁଳର ଖାକ ଓ କଳଙ୍କ। ଯୁଗାନ୍ତରେ, ଯେତେବେଳେ ଧର୍ମର ବିପ୍ଲବ ହୁଏ, ସେତେବେଳେ ଯେପରି ତେଜସ୍ବୀ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଅସୁରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭୟଙ୍କର କଳହ ଉଠିଥିଲା, ସେହିପରି ଅନ୍ଧକାରରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ପରି ଏହି ନୀଚ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ବିଭିନ୍ନ ରାଜବଂଶରେ ପ୍ରକଟ ହୋଇ, ପତନ ଓ ଆନ୍ତରିକ ସଂଘର୍ଷର କାରଣ ହୁଅନ୍ତି।
Verse 18
अप्ययं न: कुरूणां स्याद् युगान्ते कालसम्भृत: । दुर्योधन: कुलाड्रारो जघन्य: पापपूरुष:,पूर्वोक्त (अठारह) राजाओंकी भाँति यह कुलांगार, नीच एवं पापपुरुष दुर्योधन भी इस द्वापरयुगके अन्तमें कालसे प्रेरित हो हमारे कुरुकुलके विनाशका कारण होकर उत्पन्न हुआ है
ଭୀମ ଘୋଷଣା କଲେ—ପୂର୍ବେ ଉଲ୍ଲେଖିତ ରାଜାମାନଙ୍କ ପରି ଏହି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ଯୁଗାନ୍ତରେ କାଳର ପ୍ରେରଣାରେ ଜନ୍ମିଛି, ଆମ କୁରୁବଂଶର ବିନାଶର କାରଣ ହେବାକୁ। ସେ କୁଳର ଅଙ୍ଗାର, ଅତ୍ୟନ୍ତ ନୀଚ ଓ ପାପପୁରୁଷ।
Verse 19
तस्मान्मृदु शनैर््रूया धर्मार्थसहितं हितम् । कामानुबन्धबहुल नोग्रमुग्रपराक्रम,अतः भयंकर पराक्रमी श्रीकृष्प! आप उससे जो कुछ भी कहें, कोमल एवं मधुर वाणीमें धीरे-धीरे कहें। आपका कथन धर्म एवं अर्थसे युक्त तथा हितकर हो। उसमें तनिक भी उग्रता न आने पावे। साथ ही इसका भी ध्यान रखें कि आपकी अधिकांश बातें उसकी रुचिके अनुकूल हों
ଏହେତୁ, ହେ ଉଗ୍ର ପରାକ୍ରମୀ, ତାଙ୍କୁ ଧୀରେ ଧୀରେ ମୃଦୁ ବାଣୀରେ କହ। ତୋର କଥା ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥରେ ଯୁକ୍ତ, ହିତକର ହେଉ; ତାହାରେ କିଛିମାତ୍ର କଠୋରତା ନ ଥାଉ। ଏବଂ ତୋର ଅଧିକାଂଶ କଥା ତାଙ୍କ ରୁଚିକୁ ଅନୁସରଣ କରୁ।
Verse 20
अपि दुर्योधन कृष्ण सर्वे वयमधश्च्रा: । नीचैर्भूत्वानुयास्यथामो मा सम नो भरतानशन्,भगवन्! हम सब लोग नीचे पैदल चलकर अत्यन्त नम्र होकर दुर्योधनका अनुसरण करते रहेंगे; परंतु हमारे कारणसे भरतवंशियोंका नाश न हो
ଭୀମ କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଯଦି ଏପରି ମଧ୍ୟ ହୁଏ ଯେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ତଳେ ପାଦଚାରୀ ହୋଇ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ନମ୍ର ହୋଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲିବାକୁ ପଡ଼େ—ତେବେ ମଧ୍ୟ ତାହା ହେଉ; କିନ୍ତୁ ଆମ କାରଣରୁ ଭରତବଂଶୀମାନଙ୍କ ନାଶ ନ ହେଉ।
Verse 21
अप्युदासीनवृत्ति: स्याद् यथा न: कुरुभि: सह । वासुदेव तथा कार्य न कुरूननय: स्पृशेत्,वासुदेव! हमारा कौरवोंके साथ उदासीनभाव एवं तटस्थताका बर्ताव भी जैसे बना रहे, वैसा ही प्रयत्न आपको करना चाहिये। किसी प्रकार भी कौरवोंको अन्यायका स्पर्श नहीं होना चाहिये
ଭୀମ କହିଲେ—ହେ ବାସୁଦେବ! କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ଆମର ଯେ ଉଦାସୀନ ଓ ତଟସ୍ଥ ଭାବ ରହିଛି, ସେହିପରି ରହିବାକୁ ତୁମେ ଏମିତି କାର୍ଯ୍ୟ କର। କୌରବମାନଙ୍କୁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଅନ୍ୟାୟର ସ୍ପର୍ଶ ନ ହେଉ।
Verse 22
वाच्य: पितामहो वृद्धो ये च कृष्ण सभासद: । भ्रातृणामस्तु सौक्षात्रं धार्तराष्ट्र: प्रशाम्यताम्,श्रीकृष्ण! आप वहाँ बूढ़े पितामह भीष्मजी तथा अन्य सभासदोंसे ऐसा करनेके लिये ही कहें, जिससे सब भाइयोंमें सौहार्द बना रहे और दुर्योधन भी शान्त हो जाय
ହେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ସେଠାରେ ବୃଦ୍ଧ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମ ଓ ଅନ୍ୟ ସଭାସଦମାନଙ୍କୁ ଆପଣ ଏମିତି କହନ୍ତୁ, ଯେପରି ଭାଇମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୌହାର୍ଦ୍ଦ ରହେ ଏବଂ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତ ହୁଏ।
Verse 23
अहमेतद् ब्रवीम्येवं राजा चैव प्रशंसति । अर्जुनो नैव युद्धार्थी भूयसी हि दयार्जुने,मैं इस प्रकार शान्ति-स्थापनके लिये कह रहा हूँ। राजा युधिष्ठिर भी शान्तिकी ही प्रशंसा करते हैं और अर्जुन भी युद्धके इच्छुक नहीं हैं; क्योंकि अर्जुनमें बहुत अधिक दया भरी हुई है
ମୁଁ ଏହିପରି ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ କହୁଛି। ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତିକୁ ହିଁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି, ଏବଂ ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁନାହାନ୍ତି; କାରଣ ଅର୍ଜୁନରେ ଅତ୍ୟଧିକ ଦୟା ଭରିଛି।
Verse 73
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ତିହତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 74
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीमवाक्ये चतु:सप्ततितमो<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭୀମବାକ୍ୟବିଷୟକ ଚଉହତ୍ତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
The dilemma is whether a warrior bound by prior vows and collective duty may yield to inward fear, adverse-omen interpretation, and emotional exhaustion at a decisive time—risking both personal integrity and group morale.
The chapter teaches that the mind is volatile and can distort perception; therefore, one should stabilize conduct through duty, self-knowledge, and remembered commitments, converting agitation into disciplined resolve.
No explicit phalaśruti is stated here; the implicit meta-point is pragmatic: understanding this counsel clarifies how ethical commitment and psychological steadiness function as enabling conditions for dharmic action within the epic’s war-preparatory frame.