Adhyaya 7
Udyoga ParvaAdhyaya 739 Verses

Adhyaya 7

Dvārakāyāṃ Sāhāyya-vibhāgaḥ (Alliance Allocation at Dvārakā) / उद्योगपर्व अध्याय ७

Upa-parva: Dvārikā-gamana / Nārāyaṇīya-sainyavaraṇa Episode (Udyoga Parva, early chapters)

Vaiśaṃpāyana reports that intelligence networks inform Duryodhana of Kṛṣṇa’s return to Dvārakā. Duryodhana travels swiftly to seek aid, while Arjuna independently reaches the Ānarta region and enters Dvārakā the same day. Both encounter Kṛṣṇa at rest; Duryodhana seats himself near Kṛṣṇa’s head, whereas Arjuna stands respectfully near his feet with folded hands. Upon waking, Kṛṣṇa first notices Arjuna and extends due welcome to both, then asks the purpose of their arrival. Duryodhana requests alliance, arguing parity of friendship and kinship ties. Kṛṣṇa acknowledges Duryodhana’s earlier arrival but notes he saw Arjuna first; he therefore offers support to both, granting Arjuna the right of first choice per procedural norm. Kṛṣṇa presents two options: the formidable Nārāyaṇa forces (armed) for one side, or Kṛṣṇa himself (unarmed, weapon-laid-aside) for the other. Arjuna selects Kṛṣṇa as non-combatant guide, desiring renown aligned with Kṛṣṇa’s fame and requesting charioteership; Kṛṣṇa accepts. Duryodhana departs satisfied with the army, later augmented by Kṛtavarmā’s akṣauhiṇī. After Duryodhana leaves, Kṛṣṇa queries Arjuna’s rationale; Arjuna articulates that counsel and association with Kṛṣṇa’s stature are strategically and reputationally decisive. Arjuna returns to Yudhiṣṭhira accompanied by Kṛṣṇa and Dāśārha leaders.

Chapter Arc: दूतों के प्रस्थान और राजनय की हलचल के बीच कथा द्वारका की ओर मुड़ती है—जहाँ एक ही पुरुष, श्रीकृष्ण, दोनों पक्षों के लिए निर्णायक सहारा बन सकते हैं। → धनंजय अर्जुन स्वयं द्वारका पहुँचते हैं, जबकि दुर्योधन भी उसी उद्देश्य से वहाँ आता है। कृष्ण-बलराम के नगर में वृष्णि-अन्धक-भोजों की उपस्थिति, और ‘किसे पहले वर दिया जाए’—यह प्रश्न तनाव को तीव्र करता है। → शास्त्र-परम्परा के अनुसार ‘पहले बालक’ को वर देने की बात उठती है और अर्जुन को प्राथमिकता मिलती है; कृष्ण अर्जुन को चुनने का अवसर देते हैं—अर्जुन कृष्ण का सारथ्य माँगते हैं, जबकि दुर्योधन कृष्ण की नारायणी सेना ले लेता है। → कृतवर्मा दुर्योधन को एक अक्षौहिणी सेना देता है; अर्जुन कृष्ण-सहित प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास लौटते हैं—पाण्डवों के लिए यह नैतिक-रणनीतिक विजय बनती है। → अब प्रश्न यह रह जाता है—कृष्ण के सारथ्य से पाण्डवों का धर्म-युद्ध किस दिशा में मुड़ेगा, और दुर्योधन की सेना-प्राप्ति युद्ध को कितना उग्र करेगी?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल बछ। अ>-छऋाज सप्तमो<ध्याय: श्रीकृष्णका दुर्योधन तथा अर्जुन दोनोंको सहायता देना वैशम्पायन उवाच पुरोहितं ते प्रस्थाप्य नगरं नागसाह्दयम्‌ | दूतान्‌ प्रस्थापयामासु: पार्थिवेभ्यस्ततस्ततः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहितको हस्तिनापुर भेजकर पाण्डवलोग यत्र-तत्र राजाओंके यहाँ अपने दूतोंको भेजने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ‘ନାଗସାହ୍ୱୟ’ ନଗର (ହସ୍ତିନାପୁର)କୁ ପ୍ରଥମେ ପୁରୋହିତଙ୍କୁ ପଠାଇ, ପାଣ୍ଡବମାନେ ତାପରେ ଚାରିଦିଗରେ ବିଭିନ୍ନ ରାଜାମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ନିଜ ଦୂତମାନଙ୍କୁ ପଠାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 2

प्रस्थाप्य दूतानन्यत्र द्वारकां पुरुषर्षभ: । स्वयं जगाम कौरव्य: कुन्तीपुत्रो धनंजय:,अन्य सब स्थानोंमें दूत भेजकर कुरुकुलनन्दन कुन्तीपुत्र नरश्रेष्ठ धनंजय स्वयं द्वारकापुरीको गये

ଅନ୍ୟ ସ୍ଥାନମାନଙ୍କୁ ଦୂତ ପଠାଇ, ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ—କୁରୁକୁଳର ଗୌରବ, କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟ—ସ୍ୱୟଂ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଗଲେ।

Verse 3

गते द्वारवतीं कृष्णे बलदेवे च माधवे । सह वृष्ण्यन्धकै: सर्वेरभोजैश्न शतशस्तदा,जब मधुकुलनन्दन श्रीकृष्ण और बलभद्र सैकड़ों वृष्णि, अन्धक और भोजवंशी यादवोंको साथ ले द्वारकापुरीकी ओर चले थे, तभी धूृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनने अपने नियुक्त किये हुए गुप्तचरोंसे पाण्डवोंकी सारी चेष्टाओंका पता लगा लिया था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାଧବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ବଲଦେବ ଶତଶଃ ବୃଷ୍ଣି, ଅନ୍ଧକ ଓ ଭୋଜମାନଙ୍କ ସହ ଦ୍ୱାରବତୀକୁ ଯାତ୍ରା କଲେ; ସେହି ସମୟରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଯୁକ୍ତ ଗୁପ୍ତଚରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଚେଷ୍ଟା ଉପରେ ଦୃଷ୍ଟି ରଖିଥିଲା।

Verse 4

सर्वमागमयामास पाण्डवानां विचेष्टितम्‌ । धृतराष्ट्रात्मजो राजा गूढै: प्रणिहितै श्चरै:,जब मधुकुलनन्दन श्रीकृष्ण और बलभद्र सैकड़ों वृष्णि, अन्धक और भोजवंशी यादवोंको साथ ले द्वारकापुरीकी ओर चले थे, तभी धूृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनने अपने नियुक्त किये हुए गुप्तचरोंसे पाण्डवोंकी सारी चेष्टाओंका पता लगा लिया था

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଗୁପ୍ତଭାବେ ପ୍ରେରିତ ଚରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ଚେଷ୍ଟାର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଚାର ଜାଣିଲା।

Verse 5

स श्रुत्वा माधवं यानन्‍्तं सदश्वैरनिलोपमै: । बलेन नातिमहता द्वारकामभ्ययात्‌ पुरीम्‌,जब उसने सुना कि श्रीकृष्ण विराटनगरसे द्वारकाको जा रहे हैं, तब वह वायुके समान वेगवान्‌ उत्तम अश्वों तथा एक छोटी-सी सेनाके साथ द्वारकापुरीकी ओर चल दिया

ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଯାତ୍ରା କରୁଛନ୍ତି ବୋଲି ଶୁଣି, ସେ ମଧ୍ୟ ପବନସମ ବେଗବାନ ଉତ୍ତମ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ସହ ଏବଂ ଅତିବଡ଼ ନୁହେଁ ଏମିତି ଏକ ବଳ ନେଇ ଦ୍ୱାରକାପୁରୀକୁ ଅଭିମୁଖୀ ହେଲା।

Verse 6

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्ोगपर्वमें पुरोहितप्रस्थानविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,तमेव दिवसं चापि कौन्तेय: पाण्डुनन्दन: । आनर्तनगरीं रम्यां जगामाशु धनंजय:

ସେହି ଦିନେ ମଧ୍ୟ କୌନ୍ତେୟ, ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଶୀଘ୍ର ରମ୍ୟ ଆନର୍ତ୍ତନଗରୀକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲା।

Verse 7

कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन अर्जुनने भी उसी दिन शीघ्रतापूर्वक रमणीय द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ।। तौ यात्वा पुरुषव्याप्रौ द्वारकां कुरुनन्दनौ । सुप्तं ददृशतु: कृष्णं शयानं चाभिजग्मतु:,कुरुवंशका आनन्द बढ़ानेवाले उन दोनों नरवीरोंने द्वारकामें पहुँचकर देखा, श्रीकृष्ण शयन कर रहे हैं। तब वे दोनों सोये हुए श्रीकृष्णके पास गये इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि कृष्णसारथ्यस्वीकारे सप्तमो<5ध्याय:

କୁରୁବଂଶର ଆନନ୍ଦବର୍ଧକ ସେଇ ଦୁଇ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯାଇ ଶୟନରତ ନିଦ୍ରାସ୍ଥ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ; ତାପରେ ସେମାନେ ଦୁଇଜଣେ ଶୋଇଥିବା କୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।

Verse 8

ततः शयाने गोविन्दे प्रविवेश सुयोधन: । उच्छीर्षतश्न॒ कृष्णस्य निषसाद वरासने,श्रीकृष्णके शयनकालमें पहले दुर्योधनने उनके भवनमें प्रवेश किया और उनके सिरहानेकी ओर रखे हुए एक श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठ गया

ତେବେ ଗୋବିନ୍ଦ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଶୟନ କରୁଥିବାବେଳେ ସୁଯୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ପ୍ରବେଶ କଲା ଏବଂ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଶିରୋପାଶ୍ୱରେ ରଖାଯାଇଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସିଂହାସନରେ ବସିଲା।

Verse 9

ततः किरीटी तस्यानुप्रविवेश महामना: । पश्चाच्चैव स कृष्णस्य प्रह्दोडतिषछ्ठत्‌ कृताञ्जलि:,तत्पश्चात्‌ महामना किरीटधारी अर्जुनने श्रीकृष्णके शयनागारमें प्रवेश किया। वे बड़ी नम्रतासे हाथ जोड़े हुए श्रीकृष्णके चरणोंकी ओर खड़े रहे

ତାପରେ ମହାମନା କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ସେହି କକ୍ଷରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିନୟରେ ହାତ ଯୋଡ଼ି କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପାଦଦେଶରେ ପଛେ ଦାଁଡ଼ି ରହିଲେ।

Verse 10

प्रतिबुद्धः स वार्ष्णेयो ददर्शाग्रे किरीटिनम्‌ । स तयोः स्वागतं कृत्वा यथावत्‌ प्रतिपूज्य तौ

ବାର୍ଷ୍ଣେୟ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଜାଗ୍ରତ ହେବା ପରେ ସମ୍ମୁଖରେ କିରୀଟିନ (ଅର୍ଜୁନ)କୁ ଦେଖିଲେ। ତାପରେ ସେ ଉଭୟଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କରି ଯଥାବିଧି ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଲେ।

Verse 11

तदागमनजं हेतुं पप्रच्छ मधुसूदन: । ततो दुर्योधन: कृष्णमुवाच प्रहसन्निव

ତେବେ ମଧୁସୂଦନ ତାଙ୍କ ଆଗମନର କାରଣ ପଚାରିଲେ। ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ହସୁଥିବା ପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କହିଲା।

Verse 12

जागनेपर वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णने पहले अर्जुनको ही देखा। मधुसूदनने उन दोनोंका यथायोग्य आदर-सत्कार करके उनसे उनके आगमनका कारण पूछा। तब दुर्योधनने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे हँसते हुएसे कहा-- ।। विग्रहे5स्मिन्‌ भवान्‌ साहां मम दातुमिहाहति | सम॑ं हि भवतः सख्यं मम चैवार्जुनेडपि च

ଜାଗ୍ରତ ହେବା ପରେ ବୃଷ୍ଣିକୁଳଭୂଷଣ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପ୍ରଥମେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ହିଁ ଦେଖିଲେ। ମଧୁସୂଦନ ଉଭୟଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଆଦର-ସତ୍କାର କରି ତାଙ୍କ ଆଗମନର କାରଣ ପଚାରିଲେ। ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ହସୁଥିବା ପରି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କହିଲା— “ଏହି ଆସନ୍ତା ସଂଗ୍ରାମରେ ଆପଣ ଏଠାରେ ମୋତେ ସହାୟତା ଦିଅନ୍ତୁ; କାରଣ ଆପଣଙ୍କ ସଖ୍ୟ ମୋ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଅର୍ଜୁନ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ସମାନ।”

Verse 13

तथा सम्बन्धकं तुल्यमस्माकं त्वयि माधव । अहं चाभिगत: पूर्व त्वामद्य मधुसूदन

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ହେ ମାଧବ! ସେହିପରି ତୁମ ପ୍ରତି ଆମର ସମ୍ବନ୍ଧ ମଧ୍ୟ ସେଇ ପ୍ରକାର ସମାନ। ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ତୁମ ପାଖକୁ ଆସିଥିଲି; ଏବଂ ଆଜି ପୁଣି, ହେ ମଧୁସୂଦନ, ତୁମ ପାଖକୁ ଆସିଛି।”

Verse 14

पूर्व चाभिगतं सन्‍्तो भजन्ते पूर्वसारिण: । त्वं च श्रेष्ठठमो लोके सतामद्य जनार्दन | सततं सम्मतश्वैव सद्वृत्तमनुपालय

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସଜ୍ଜନମାନେ ପୂର୍ବକାଳରୁ ସ୍ୱୀକୃତ ଆଚାରକୁ ମାନ୍ୟ କରନ୍ତି; ପୂର୍ବଜମାନଙ୍କ ଦେଖାଇଥିବା ପଥରେ ଚାଲନ୍ତି। ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଆଜି ତୁମେ ଲୋକରେ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠତମ, ସଦା ସମ୍ମାନିତ। ତେଣୁ ନିରନ୍ତର ସଦ୍ବୃତ୍ତକୁ ଅନୁପାଳନ କର।”

Verse 15

दुर्योधन और अर्जुनका श्रीकृष्णसे युद्धके लिये सहायता माँगना “माधव! (पाण्डवोंके साथ हमारा) जो युद्ध होनेवाला है, उसमें आप मुझे सहायता दें। आपकी मेरे तथा अर्जुनके साथ एक-सी मित्रता है एवं हमलोगोंका आपके साथ सम्बन्ध भी समान ही है और मधुसूदन! आज मैं ही आपके पास पहले आया हूँ। पूर्वपुरुषोंके सदाचारका अनुसरण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष पहले आये हुए प्रार्थीकी ही सहायता करते हैं। जनार्दन! आप इस समय संसारके सत्पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं और सभी सर्वदा आपको सम्मानकी दृष्टिसे देखते हैं। अतः आप सत्पुरुषोंके ही आचारका पालन करें! ॥| १२-- १४ || श्रीकृष्ण उवाच भवानभिगतः: पूर्वमत्र मे नास्ति संशय: । दृष्टस्तु प्रथमं राजन्‌ मया पार्थो धनंजय:,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--राजन्‌! इसमें संदेह नहीं कि आप ही मेरे यहाँ पहले आये हैं, परंतु मैंने पहले कुन्तीनन्दन अर्जुनको ही देखा है

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ରାଜନ! ତୁମେ ମୋ ନିବାସକୁ ପ୍ରଥମେ ଆସିଥିଲ ବୋଲି ନିଶ୍ଚୟ, ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ପ୍ରଥମେ ଦେଖିଥିଲି ପାର୍ଥ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନକୁ।”

Verse 16

तव पूर्वाभिगमनात्‌ पूर्व चाप्यस्य दर्शनात्‌ । साहाय्यमुभयोरेव करिष्यामि सुयोधन,सुयोधन! आप पहले आये हैं और अर्जुनको मैंने पहले देखा है; इसलिये मैं दोनोंकी ही सहायता करूँगा

“ହେ ସୁୟୋଧନ! ତୁମେ ପୂର୍ବେ ଆସିଛ; ତାକୁ ମୁଁ ପୂର୍ବେ ଦେଖିଛି; ତେଣୁ ମୁଁ ଉଭୟଙ୍କୁ ହିଁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବି।”

Verse 17

प्रवारणं तु बालानां पूर्व कार्यमिति श्रुति: । तस्मात्‌ प्रवारणं पूर्वमर्ह: पार्थो धनंजय:,शास्त्रकी आज्ञा है कि पहले बालकोंको ही उनकी अभीष्ट वस्तु देनी चाहिये; अतः अवस्थामें छोटे होनेके कारण पहले कुन्तीपुत्र अर्जुन ही अपनी अभीष्ट वस्तु पानेके अधिकारी हैं

“ଶ୍ରୁତିର ବିଧାନ—ପ୍ରଥମେ ବାଳମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ଇଚ୍ଛିତ ବସ୍ତୁ ଦେବା ଉଚିତ; ତେଣୁ ବୟସରେ କନିଷ୍ଠ ଥିବା ପାର୍ଥ ଧନଞ୍ଜୟ ପ୍ରଥମେ ନିଜ ଅଭୀଷ୍ଟ ପାଇବାକୁ ଅର୍ହ।”

Verse 18

मत्संहननतुल्यानां गोपानामर्बुदं महत्‌ | नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:,मेरे पास दस करोड़ गोपोंकी विशाल सेना है, जो सब-के-सब मेरे जैसे ही बलिष्ठ शरीरवाले हैं। उन सबकी “नारायण' संज्ञा है। वे सभी युद्धमें डटकर लोहा लेनेवाले हैं

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ମୋ ପାଖରେ ଗୋପମାନଙ୍କର ଏକ ବିଶାଳ ସେନା ଅଛି—ସଂଖ୍ୟାରେ ଏକ ‘ଅର୍ବୁଦ’; ସେମାନଙ୍କର ଦେହବଳ ଓ ଦେହଗଠନ ମୋ ସମାନ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ‘ନାରାୟଣ’ ନାମରେ ଖ୍ୟାତ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ଅଡିଗ ଯୋଦ୍ଧା।

Verse 19

ते वा युधि दुराधर्षा भवन्त्वेकस्थ सैनिका: । अयुध्यमान: संग्रामे न्यस्तशस्त्रो5हमेकत:

ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୁରାଧର୍ଷ ସେ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ଏକଠା ହୋଇ ଗୋଟିଏ ପକ୍ଷର ସଘନ ସେନା ହେଉନ୍ତୁ। ମୁଁ ତ ଯୁଦ୍ଧରେ ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱରେ—ଶସ୍ତ୍ର ତ୍ୟାଗ କରି, ଯୁଦ୍ଧ ନ କରି ରହିବି।

Verse 20

एक ओरे तो वे दुर्धर्ष सैनिक युद्धके लिये उद्यत रहेंगे और दूसरी ओरसे अकेला मैं रहूँगा; परंतु मैं न तो युद्ध करूँगा और न कोई शस्त्र ही धारण करूँगा ।। आशभ्यामन्यतरं पार्थ यत्‌ ते हृद्यतरं मतम्‌ । तद्‌ वृणीतां भवानग्रे प्रवार्यस्त्वं हि धर्मत:,अर्जुन! इन दोनोंमेंसे कोई एक वस्तु, जो तुम्हारे मनको अधिक प्रिय जान पड़े, तुम पहले चुन लो; क्योंकि धर्मके अनुसार पहले तुम्हें ही अपनी मनचाही वस्तु चुननेका अधिकार है

ଗୋଟିଏ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ସେ ଦୁରାଧର୍ଷ ସେନା ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଦ୍ୟତ ରହିବେ, ଅନ୍ୟ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ମୁଁ ଏକା ରହିବି; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ନ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି, ନ କୌଣସି ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରିବି। ଏହି ଦୁଇଟି ମଧ୍ୟରୁ, ହେ ପାର୍ଥ, ଯାହା ତୋ ହୃଦୟକୁ ଅଧିକ ପ୍ରିୟ ଲାଗେ, ସେହିଟି ତୁ ଆଗେ ବାଛ; କାରଣ ଧର୍ମାନୁସାରେ ପ୍ରଥମ ବରଣର ଅଧିକାର ତୋର ହିଁ।

Verse 21

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार धनंजयने संग्रामभूमिमें युद्ध न करनेवाले उन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना, जो साक्षात्‌ शत्रुहन्ता नारायण हैं और अजन्मा होते हुए भी स्वेच्छासे देवता, दानव तथा समस्त क्षत्रियोंके सम्मुख मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କୃଷ୍ଣ ଏପରି କହିବା ପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟ ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ଯୁଦ୍ଧ ନ କରୁଥିବା କେଶବଙ୍କୁ ହିଁ (ସହାୟ ଭାବେ) ବାଛିଲେ।

Verse 22

नारायणममित्रघ्नं कामाज्जातमजं नृषु । सर्वक्षत्रस्थ पुरतो देवदानवयोरपि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार धनंजयने संग्रामभूमिमें युद्ध न करनेवाले उन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना, जो साक्षात्‌ शत्रुहन्ता नारायण हैं और अजन्मा होते हुए भी स्वेच्छासे देवता, दानव तथा समस्त क्षत्रियोंके सम्मुख मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं

—ସେହି ନାରାୟଣଙ୍କୁ, ଯିଏ ଶତ୍ରୁହନ୍ତା; ଯିଏ ଅଜନ୍ମା ହୋଇ ସୁଦ୍ଧା ନିଜ ଇଚ୍ଛାରେ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛନ୍ତି—ଦେବ, ଦାନବ ଓ ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ।

Verse 23

दुर्योधनस्तु तत्‌ सैन्यं सर्वमावरयत्‌ तदा । सहस्राणां सहस्र॑ तु योधानां प्राप्प भारत,जनमेजय! तब दुर्योधनने वह सारी सेना माँग ली, जो अनेक सहस्र सैनिकोंकी सहस्तरों टोलियोंमें संगठित थी। उन योद्धाओंको पाकर और श्रीकृष्णको ठगा गया समझकर राजा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका बल भयंकर था। वह सारी सेना लेकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीके पास गया और उसने उन्हें अपने आनेका सारा कारण बताया। तब शूरवंशी बलरामजीने धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको इस प्रकार उत्तर दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେ ସମଗ୍ର ସେନାକୁ ନିଜ ଅଧୀନରେ ନେଲା। ହେ ଭାରତ, ହେ ଜନମେଜୟ! ହଜାର ହଜାର ଯୋଦ୍ଧା ପାଇ ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ନିଜେ ଠକାଇଦେଲି ବୋଲି ଭାବି ସେ ପରମ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲା। ତାହାର ଯୁଦ୍ଧବଳ ଭୟଙ୍କର ଲାଗିଲା; ଧର୍ମବଳରେ ନୁହେଁ, କେବଳ ସେନାସଂଚୟର ମଦରେ ସେ ନିଜ ପକ୍ଷକୁ ଦୃଢ଼ କଲା।

Verse 24

कृष्णं चापद्वतं ज्ञात्वा सम्प्राप परमां मुदम्‌ । दुर्योधनस्तु तत्‌ सैन्यं सर्वमादाय पार्थिव:,जनमेजय! तब दुर्योधनने वह सारी सेना माँग ली, जो अनेक सहस्र सैनिकोंकी सहस्तरों टोलियोंमें संगठित थी। उन योद्धाओंको पाकर और श्रीकृष्णको ठगा गया समझकर राजा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका बल भयंकर था। वह सारी सेना लेकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीके पास गया और उसने उन्हें अपने आनेका सारा कारण बताया। तब शूरवंशी बलरामजीने धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको इस प्रकार उत्तर दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୃଷ୍ଣ ଠକାଯାଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଜାଣି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ପରମ ଆନନ୍ଦ ପାଇଲା। ହେ ଜନମେଜୟ! ସେ ରାଜା ସେ ସମଗ୍ର ସେନାକୁ ନିଜ ଅଧୀନରେ ନେଲା। ଅସଂଖ୍ୟ ଯୋଦ୍ଧା ପାଇ ତାହାର ଆତ୍ମବିଶ୍ୱାସ ବଢ଼ିଗଲା; ତାହାର ବଳ ଭୟଙ୍କର ଲାଗିଲା। ଛଳ ଓ ସଂଗ୍ରହରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ବିଜୟମଦ ମନକୁ ମୋହିତ କରେ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧକୁ ନେଇଯାଉଥିବା ନୈତିକ ଫାଟକୁ ଆହୁରି ଗଭୀର କରେ—ଏହି ମୁହୂର୍ତ୍ତ ତାହା ଦର୍ଶାଏ।

Verse 25

ततो<भ्ययाद्‌ भीमबलो रौहिणेयं महाबल: । सर्व चागमने हेतुं स तस्मै संन्यवेदयत्‌ | प्रत्युवाच तत: शौरिर्धार्तराष्ट्रमिदं वच:,जनमेजय! तब दुर्योधनने वह सारी सेना माँग ली, जो अनेक सहस्र सैनिकोंकी सहस्तरों टोलियोंमें संगठित थी। उन योद्धाओंको पाकर और श्रीकृष्णको ठगा गया समझकर राजा दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका बल भयंकर था। वह सारी सेना लेकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीके पास गया और उसने उन्हें अपने आनेका सारा कारण बताया। तब शूरवंशी बलरामजीने धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको इस प्रकार उत्तर दिया

ତାପରେ ଭୀମବଳ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମହାବଳୀ ରୌହିଣେୟ (ବଳରାମ)ଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା। ନିଜ ଆଗମନର ସମସ୍ତ କାରଣ ସେ ତାଙ୍କୁ ଜଣାଇଲା। ତାହାପରେ, ହେ ଜନମେଜୟ! ଶୌରି ବଳରାମ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହି ଉତ୍ତର ଦେଲେ। ଯୁଦ୍ଧପୂର୍ବ ଏହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ସ୍ନେହ, କୁଳସମ୍ବନ୍ଧ ଓ ଧର୍ମ—ତିନିଟିର ପରୀକ୍ଷା ହେବାକୁ ଥିଲା।

Verse 26

बलदेव उवाच विदितं ते नरव्याप्र सर्व भवितुमरहति । यन्मयोक्तं विराटस्य पुरा वैवाहिके तदा,बलदेवजी बोले--पुरुषसिंह! पहले राजा विराटके यहाँ विवाहोत्सवके अवसरपर मैंने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें मालूम हो गया होगा

ବଳଦେବ କହିଲେ—ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ଏବେ ତୁମେ ସବୁ କଥା ଜାଣିବା ଉଚିତ। ପୂର୍ବେ ରାଜା ବିରାଟଙ୍କ ବିବାହୋତ୍ସବ ସମୟରେ ମୁଁ ଯାହା କହିଥିଲି, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ତୁମକୁ ଜଣା ପଡ଼ିଛି।

Verse 27

निगृह्मोक्तो हृषीकेशस्त्वदर्थ कुरुनन्दन । मया सम्बन्धकं तुल्यमिति राजन्‌ पुनः पुन:

ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ତୁମ ହିତ ପାଇଁ ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ଅନୁରୋଧ—ପ୍ରାୟ ଚାପ—ଦିଆଯାଇଥିଲା। ହେ ରାଜନ! ମୁଁ ମଧ୍ୟ ପୁନଃପୁନଃ କହିଥିଲି ଯେ ଦୁଇ ପକ୍ଷ ସହିତ ମୋର ସମ୍ବନ୍ଧ ସମାନ; ତେଣୁ ମୋତେ ସମଭାବରେ ସଂୟମ ରଖି କଥା ଓ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 28

न च तद्‌ वाक्यमुक्तं वै केशवं प्रत्यपद्यत । न चाहमुत्सहे कृष्णं विना स्थातुमपि क्षणम्‌

ସେ କଥା କୁହାଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ କେଶବ ତାହା ଗ୍ରହଣ କଲେ ନାହିଁ। ଆଉ ମୁଁ କୃଷ୍ଣ ବିନା ଏକ କ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ରହିବାକୁ ସାହସ କରେ ନାହିଁ।

Verse 29

कुरुनन्दन! तुम्हारे लिये मैंने श्रीकृष्णको बाध्य करके कहा था कि हमारे साथ दोनों पक्षोंका समानरूपसे सम्बन्ध है। राजन! मैंने वह बात बार-बार दुहरायी, परंतु श्रीकृष्णको जँची नहीं और मैं श्रीकृष्ण-को छोड़कर एक क्षण भी अन्यत्र कहीं ठहर नहीं सकता ।। नाहं सहाय: पार्थस्य नापि दुर्योधनस्य वै | इति मे निश्चिता बुद्धिर्वासुदेवमवेक्ष्य ह,अतः मैं श्रीकृष्णकी ओर देखकर मन-ही-मन इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि मैं न तो अर्जुनकी सहायता करूँगा और न दुर्योधनकी ही

କୁରୁନନ୍ଦନ! ତୁମ ପାଇଁ ମୁଁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆଗ୍ରହ କରି କହିଥିଲି—‘ଆମର ଦୁଇ ପକ୍ଷ ସହିତ ସମାନ ଭାବରେ ସମ୍ପର୍କ ଅଛି।’ ରାଜନ! ମୁଁ ସେ କଥା ପୁନଃପୁନଃ ଦୋହରାଇଲି; କିନ୍ତୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ତାହା ରୁଚିଲା ନାହିଁ, ଏବଂ ମୁଁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଏକ କ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ଅନ୍ୟତ୍ର ରହିପାରେ ନାହିଁ। ତେଣୁ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଦିଗକୁ ଚାହିଁ ମୋ ମନରେ ଏହି ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ହେଲା—ମୁଁ ନ ପାର୍ଥଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବି, ନ ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କୁ।

Verse 30

जातो<सि भारते वंशे सर्वपार्थिवपूजिते । गच्छ युध्यस्व धर्मेण क्षात्रेण पुरुषर्षभ,पुरुषरत्न! तुम समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित भरत-वंशमें उत्पन्न हुए हो। जाओ, क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करो

ତୁମେ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ଭରତବଂଶରେ ଜନ୍ମ ନେଇଛ। ତେଣୁ ଯାଅ—କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ଯୁଦ୍ଧ କର, ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ!

Verse 31

वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्तस्तु तदा परिष्वज्य हलायुधम्‌ । कृष्णं चापद्व॒तं ज्ञात्वा युद्धान्मेने जितं जयम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बलभद्रजीके ऐसा कहनेपर दुर्योधनने उन्हें हृदयसे लगाया और श्रीकृष्णको ठगा गया जानकर युद्धसे अपनी निश्चित विजय समझ ली

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଭଳି କୁହାଯାଇଥିବାବେଳେ ଦୁର୍ୟୋଧନ ହଲାୟୁଧ (ବଳରାମ)ଙ୍କୁ ହୃଦୟରେ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲା; ଏବଂ କୃଷ୍ଣ ନିଜ ପକ୍ଷକୁ ଆସିଛନ୍ତି ବୋଲି ଭାବି, ଯୁଦ୍ଧରେ ନିଜ ଜୟକୁ ନିଶ୍ଚିତ ମାନିଲା।

Verse 32

सो<भ्ययात्‌ कृतवर्माणं धृतराष्ट्रसुतो नृप: । कृतवर्मा ददौ तस्य सेनामक्षौहिणीं तदा

ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ୟୋଧନ କୃତବର୍ମାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା। ସେତେବେଳେ କୃତବର୍ମା ତାକୁ ଗୋଟିଏ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଦେଲେ।

Verse 33

तदनन्तर धुृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन कृतवर्मके पास गया। कृतवर्माने उसे एक अक्षौहिणी सेना दी ।। स तेन सर्वसैन्येन भीमेन कुरुनन्दन: । वृतः परिययौ हृष्ट: सुहृदः सम्प्रहर्षषन्‌,उस सारी भयंकर सेनाके द्वारा घिरा हुआ कुरुनन्दन दुर्योधन अपने सुहृदोंका हर्ष बढ़ाता हुआ बड़ी प्रसन्नताके साथ हस्तिनापुरको लौट गया

ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କୃତବର୍ମାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା। କୃତବର୍ମା ତାକୁ ଗୋଟିଏ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଦେଲେ। ସେଇ ସମସ୍ତ ଭୟଙ୍କର ସେନାଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇଥିବା କୁରୁନନ୍ଦନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ହର୍ଷିତ ହୋଇ, ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ବଢ଼ାଇବାକୁ ବଢ଼ାଇବାକୁ, ମହାସନ୍ତୋଷରେ ହସ୍ତିନାପୁର ଦିଗକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲା।

Verse 34

ततः पीताम्बरधरो जगत्स्रष्टा जनार्दन: । गते दुर्योधने कृष्ण: किरीटिनमथाब्रवीत्‌ । अयुध्यमान: कां बुद्धिमास्थायाहं वृतस्त्वया,दुर्योधनके चले जानेपर पीताम्बरधारी जगत्स्रष्टा जनार्दन श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा --'पार्थ! मैं तो युद्ध करूँगा नहीं; फिर तुमने क्या सोच-समझकर मुझे चुना है?”

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଚାଲିଯାଇବା ପରେ, ପୀତାମ୍ବରଧାରୀ ଜଗତ୍ସ୍ରଷ୍ଟା ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ପାର୍ଥ! ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି ନାହିଁ; ତେବେ କେଉଁ ବୁଦ୍ଧି ଓ କେଉଁ ଅଭିପ୍ରାୟରେ ତୁମେ ମୋତେ ବାଛିଲ?”

Verse 35

अर्जुन उवाच भवान्‌ समर्थस्तान्‌ सर्वान्‌ निहन्तुं नात्र संशय: । निहन्तुमहमप्येक: समर्थ: पुरुषर्षभ,अर्जुन बोले--भगवन्‌! आप अकेले ही उन सबको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। पुरुषोत्तम! (आपकी ही कृपासे) मैं भी अकेला ही उन सब शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हूँ

ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ଭଗବନ୍! ଆପଣ ଏକା ହିଁ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସଂହାର କରିବାକୁ ସମର୍ଥ; ଏଥିରେ କିଛିମାତ୍ର ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ଏବଂ ପୁରୁଷର୍ଷଭ! ଆପଣଙ୍କ କୃପାରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏକା ହିଁ ସେ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ନାଶ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ।”

Verse 36

भवांस्तु कीर्तिमॉल्लोके तद्‌ यशस्त्वां गमिष्यति । यशसां चाहमप्यर्थी तस्मादसि मया वृत:,परंतु आप संसारमें यशस्वी हैं। आप जहाँ भी रहेंगे, वह यश आपका ही अनुसरण करेगा। मुझे भी यशकी इच्छा है ही; इसीलिये मैंने आपका वरण किया है

ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“କିନ୍ତୁ ଆପଣ ଲୋକେ କୀର୍ତ୍ତିମାନ; ଆପଣ ଯେଉଁଠି ରହିବେ, ସେଇ ଯଶ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରିବ। ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଯଶ ଆକାଂକ୍ଷା ଅଛି; ସେହିପାଇଁ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ବାଛିଛି।”

Verse 37

सारथ्य॑ं तु त्वया कार्यमिति मे मानसं सदा । चिररात्रेप्सितं काम॑ तद्‌ भवान्‌ कर्तुमहति,मेरे मनमें बहुत दिनोंसे यह अभिलाषा थी कि आपको अपना सारथि बनाऊँ--अपने जीवनरथकी बागडोर आपके हाथोंमें सौंप दूँ। मेरी इस चिरकालिक अभिलाषाको आप पूर्ण करें

ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—“ଆପଣଙ୍କୁ ହିଁ ମୋ ସାରଥି ହେବାକୁ ପଡ଼ିବ—ଏହା ମୋ ମନର ସଦା ନିଶ୍ଚୟ। ଅନେକ ରାତି ଓ ଦୀର୍ଘକାଳ ଧରି ଯେ ଇଚ୍ଛା ମୁଁ ହୃଦୟରେ ପୋଷିଛି, ଦୟାକରି ଆପଣ ତାହା ପୂରଣ କରନ୍ତୁ।”

Verse 38

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ।। (गीता ५।१८) संजयकी श्रीकृष्ण एवं पाण्डवोंसे भेंट कौरव-सभामें विराट्‌ रूप ४५0) म़्र्छ ९७:०0. ५० | संजयको दिव्य दृष्टि सबमें भगवत्‌-दर्शन रे 20 6) नह बन्‍-7 8५ रू- ९ ५३ हा हि 4-० ७ |] है जयाकनि ज भक्तोंके द्वारा प्रेमसे दिये हुए पत्र, पुष्प, फल, जल आदिको भगवान प्रत्यक्ष प्रकट होकर ग्रहण करते हैं! भीष्म और अर्जुनका युद्ध भीष्मपितामहकी सेवामें श्रीकृष्णसहित पाण्डव वायुदेव उवाच उपपन्नमिदं पार्थ यत्‌ स्पर्थसि मया सह । सारथ्यं ते करिष्यामि काम: सम्पद्यतां तव,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--पार्थ! तुम जो (शत्रुओंपर विजय पानेमें) मेरे साथ स्पर्धा रखते हो, यह तुम्हारे लिये ठीक ही है। मैं तुम्हारा सारथ्य करूँगा। तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण हो

ବିଦ୍ୟା ଓ ବିନୟରେ ସମ୍ପନ୍ନ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଗାଈ, ହାତୀ, କୁକୁର ଏବଂ କୁକୁରମାଂସ ଭୋଜନକରି ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା ଲୋକ—ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପଣ୍ଡିତମାନେ ସମଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖନ୍ତି। ଏହାର ନୀତି ଏହି ନୁହେଁ ଯେ ଆଚରଣ କିମ୍ବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ଭେଦ ମିଟିଯାଉ; ବରଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀରେ ଏକେ ଅନ୍ତରାତ୍ମାକୁ ଦେଖି, ପଦମର୍ଯ୍ୟାଦା କିମ୍ବା ଜାତି-ପ୍ରଜାତିଭେଦରୁ ଜନ୍ମିତ ଅବମାନ, କ୍ରୂରତା ଓ ପକ୍ଷପାତକୁ ସଂଯମ କରିବା।

Verse 39

वैशग्पायन उवाच एवं प्रमुदित: पार्थ: कृष्णेन सहितस्तदा । वृतो दशार्हप्रवरै: पुनरायाद्‌ युधिष्ठिरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार (अपनी इच्छा पूर्ण होनेसे) प्रसन्न हुए अर्जुन श्रीकृष्णके सहित मुख्य-मुख्य दशार्हवंशी यादवोंसे घिरे हुए पुनः युधिष्ठिरके पास आये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏଭଳି ଭାବେ ନିଜ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେବାରୁ ପ୍ରମୁଦିତ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସହ, ଦଶାର୍ହ ଯାଦବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ, ପୁନର୍ବାର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ। ଏହା ଦର୍ଶାଏ—ବ୍ୟକ୍ତିଗତ ସଙ୍କଳ୍ପ ମଧ୍ୟ ଶେଷେ ଯଥାଧିକାରୀ ନେତାଙ୍କ ନିକଟେ ଦାୟିତ୍ୱସହ ପରାମର୍ଶରେ ପରିଣତ ହେବା ଉଚିତ।

Frequently Asked Questions

The chapter contrasts procedural priority and moral legitimacy against strategic opportunism: who should choose first, and whether victory is better pursued through sheer armed strength or through principled guidance and counsel.

The episode frames intelligence, restraint, and right association as decisive forms of power: selecting guidance (buddhi) can outweigh selecting force (bala), especially when outcomes depend on clarity of purpose and ethical direction.

No explicit phalaśruti is stated here; its meta-significance is narrative-structural—establishing Kṛṣṇa’s non-combatant role and the alliance distribution that conditions later events and ethical readings of agency.