
Dhṛtarāṣṭra’s Inquiry and Sañjaya’s Etymologies of Kṛṣṇa’s Names (Puruṣottama-nāma-nirvacana)
Upa-parva: Sañjaya–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda (Names and Epithets of Kṛṣṇa) — Udyoga-parva Adhyāya 68 Context Unit
Dhṛtarāṣṭra requests that Sañjaya again describe Puruṣottama by clarifying his names, actions, and significance. Sañjaya responds with a systematic nirvacana (etymological exposition) of Kṛṣṇa’s epithets, presenting each as an index of cosmic function and ethical capacity. The chapter links ‘Vāsudeva’ to indwelling and divine origin; ‘Mādhava’ to disciplined inwardness (silence, meditation, yoga); ‘Madhusūdana’ to the resolution of principles; and ‘Kṛṣṇa’ via semantic components associated with earth/being and cessation/beatitude. It continues with ‘Puṇḍarīkākṣa’ as aligned with an imperishable supreme abode; ‘Janārdana’ as a deterrent to predatory disorder; and ‘Sātvata/Vṛṣabhekṣaṇa’ as steadfastness of sattva and exemplary strength. Further epithets (‘Anīkajit’, ‘Dāmodara’, ‘Hṛṣīkeśa’, ‘Mahābāhu’, ‘Adhokṣaja’, ‘Nārāyaṇa’, ‘Puruṣottama’) depict transcendence, governance of faculties, sustaining power, and refuge-giving presence. The chapter culminates by characterizing this figure as the source and dissolution of all (sat and asat), ever-knowing, grounded in truth (‘Govinda’, ‘Satya’), victorious (‘Jiṣṇu’), all-pervading (‘Viṣṇu’), and eternal (‘Ananta’), arriving with sages for the purpose of non-cruelty and ethical stabilization (‘Acyuta’).
Chapter Arc: धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—तुम माधव (श्रीकृष्ण) को कैसे जानते हो, जो समस्त लोकों के महेश्वर हैं? यह प्रश्न राजसभा के भीतर एक आध्यात्मिक द्वार खोल देता है। → संजय स्पष्ट करते हैं कि कृष्ण-ज्ञान विद्या से आता है; विद्या-हीन मनुष्य अंधकार में डूबा रहकर केशव को नहीं पहचानता। इसी बीच गान्धारी का तीखा प्रहार दुर्योधन पर पड़ता है—वह ऐश्वर्य-लालसा में वृद्धों की आज्ञा लांघ रहा है, पिता और माता को भी तुच्छ समझ रहा है। → संजय ‘एकायन पन्था’—एकमात्र मोक्षमार्ग—का उद्घोष करते हैं: इन्द्रिय-जय, एकाग्र शुश्रूषा, और तत्त्व में प्रसन्नता के बिना केशव अप्राप्य हैं; काममूढ़ जन यम-वश में बार-बार गिरते हैं, जैसे अंधे अंधों को कर्मों की डोर से खींचते हों। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि कृष्ण को जानना केवल वंश, पद या वाणी से नहीं—विद्या, योग, आगम-आधिगम और इन्द्रिय-संयम से संभव है; यही भय (महतो भयात्) से मुक्ति का साधन है। → गान्धारी की फटकार और संजय का तत्त्वोपदेश यह संकेत छोड़ते हैं कि यदि दुर्योधन ने इन्द्रिय-जय और वृद्ध-आज्ञा का मार्ग न अपनाया, तो नीति-वार्ता युद्ध की ओर ही ढलेगी।
Verse 1
अप्--#क+ एकोनसप्ततितमो< ध्याय: संजयका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्ण-प्राप्ति एवं तत्त्वज्ञानका साधन बताना धृतराष्ट्र रवाच कथं त्वं माधवं वेत्थ सर्वलोकमहे श्वरम् कथमेनं न वेदाहं तन्ममाचक्ष्व संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! मधुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण समस्त लोकोंके महान् ईश्वर हैं, इस बातको तुम कैसे जानते हो? और मैं इन्हें इस रूपमें क्यों नहीं जानता? इसका रहस्य मुझे बताओ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ତୁମେ ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ମହେଶ୍ୱର ବୋଲି କିପରି ଜାଣ? ଏବଂ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ସେହି ରୂପରେ କାହିଁକି ଜାଣିପାରୁନାହିଁ? ତାହାର କାରଣ ମୋତେ କୁହ।
Verse 2
संजय उवाच शृणु राजन न ते विद्या मम विद्या न हीयते । विद्याहीनस्तमो ध्वस्तो नाभिजानाति केशवम्,संजयने कहा--राजन्! सुनिये, आपको तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं है और मेरी ज्ञानदृष्टि कभी लुप्त नहीं होती है। जो मनुष्य तत्त्वज्ञानसे शून्य है और जिसकी बुद्धि अज्ञानान्धकारसे विनष्ट हो चुकी है, वह श्रीकृष्णके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଶୁଣ; ତୁମ ପାଖରେ ତତ୍ତ୍ୱବିଦ୍ୟା ନାହିଁ, ମୋର ଜ୍ଞାନଦୃଷ୍ଟି କେବେ ହ୍ରାସ ପାଉନାହିଁ। ଯେ ଅବିଦ୍ୟାବାନ, ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଅଜ୍ଞାନାନ୍ଧକାରରେ ଧ୍ୱସ୍ତ, ସେ କେଶବଙ୍କ ଯଥାର୍ଥ ସ୍ୱରୂପ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 3
विद्यया तात जानामि त्रियुगं मधुसूदनम् । कर्तारमकृतं देवं भूतानां प्रभवाप्ययम्,तात! मैं ज्ञानदृष्टिसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश करनेवाले त्रियुगस्वरूप भगवान् मधुसूदनको, जो सबके कर्ता हैं, परंतु किसीके कार्य नहीं हैं, जानता हूँ
ତାତ! ଜ୍ଞାନଦୃଷ୍ଟିରେ ମୁଁ ତ୍ରିୟୁଗସ୍ୱରୂପ ମଧୁସୂଦନଙ୍କୁ ଜାଣେ—ସେ ସମସ୍ତଙ୍କ କର୍ତ୍ତା, ତଥାପି ସ୍ୱୟଂ ଅକୃତ; ଏବଂ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କ ଉଦ୍ଭବ ଓ ଲୟର କାରଣ।
Verse 4
धृतराष्ट्र रवाच गावल्गणे>त्र का भक्तिर्या ते नित्या जनार्दने । यया त्वमभिजानासि त्रियुगं मधुसूदनम्,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! भगवान् श्रीकृष्णमें जो तुम्हारी नित्य भक्ति है, उसका स्वरूप क्या है? जिससे तुम त्रियुगस्वरूप भगवान् मधुसूदनके तत्त्वको जानते हो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ! ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପ୍ରତି ତୋର ଯେ ନିତ୍ୟ ଭକ୍ତି, ତାହାର ସ୍ୱରୂପ କ’ଣ? ଯାହାଦ୍ୱାରା ତୁ ତ୍ରିୟୁଗସ୍ୱରୂପ ମଧୁସୂଦନଙ୍କ ତତ୍ତ୍ୱକୁ ଜାଣୁଛୁ?
Verse 5
संजय उवाच मायां न सेवे भद्रें ते न वृथा धर्ममाचरे । शुद्धभावं गतो भक््त्या शास्त्राद् वेझि जनार्दनम्,संजयने कहा--महाराज! आपका कल्याण हो। मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता। व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता। भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ମୁଁ କେବେ ମାୟା (ଛଳ-କପଟ)ର ଆଶ୍ରୟ ନେଉନି, ନାହିଁ କି ବ୍ୟର୍ଥ ଦେଖାଦେଖି ଧର୍ମାଚରଣ କରେ। ଭକ୍ତିରେ ମୋର ଅନ୍ତଃକରଣ ଶୁଦ୍ଧ ହୋଇଛି; ତେଣୁ ଶାସ୍ତ୍ରବଚନର ପ୍ରମାଣରେ ମୁଁ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣେ।
Verse 6
धृतराष्ट्र रवाच दुर्योधन हृषीकेशं प्रपद्यस्व जनार्दनम् आप्तो न: संजयस्तात शरणं गच्छ केशवम्,यह सुनकर धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा--बेटा दुर्योधन! संजय हमलोगोंका विश्वासपात्र है। इसकी बातोंपर श्रद्धा करके तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका आश्रय लो; उन्हींकी शरणमें जाओ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ହୃଷୀକେଶ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କ ଶରଣ ନେ। ପୁତ୍ର, ସଞ୍ଜୟ ଆମର ବିଶ୍ୱସ୍ତ ହିତେଷୀ; ତାଙ୍କ କଥାରେ ଶ୍ରଦ୍ଧା ରଖି କେଶବଙ୍କ ଶରଣକୁ ଯା—ତାଙ୍କୁ ହିଁ ଆଶ୍ରୟ କର।
Verse 7
दुर्योधन उवाच भगवान् देवकीपुत्रो लोकांभश्रैन्निहनिष्यति । प्रवदन्नर्जुने सख्यं नाहं गच्छेडद्य केशवम्,दुर्योधन बोला--पिताजी! माना कि देवकीनन्दन श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं और वे इच्छा करते ही सम्पूर्ण लोकोंका संहार कर डालेंगे, तथापि वे अपनेको अर्जुनका मित्र बताते हैं; अतः अब मैं उनकी शरणमें नहीं जाऊँगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତାଜୀ! ଦେବକୀପୁତ୍ର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସାକ୍ଷାତ୍ ଭଗବାନ ଓ ଇଚ୍ଛା କଲେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ସଂହାର କରିପାରିବେ—ଏହା ମାନିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସହ ମିତ୍ରତା କଥା କହୁଛନ୍ତି। ତେଣୁ ଆଜି ମୁଁ କେଶବଙ୍କ ଶରଣକୁ ଯିବି ନାହିଁ।
Verse 8
धृतराष्ट्र रवाच अवाग गान्धारि पुत्रस्ते गच्छत्येष सुदुर्मति: । ईर्षुर्दुरात्मा मानी च श्रेयसां वचनातिग:,तब धृतराष्ट्रने गान्धारीसे कहा--गान्धारी! तुम्हारा दुर्बुद्धि, दुरात्मा, ईर्ष्यालु और अभिमानी पुत्र श्रेष्ठ पुरुषोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके नरककी ओर जा रहा है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କୁ କହିଲେ—ଗାନ୍ଧାରୀ! ତୋର ଏହି ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ପୁତ୍ର ଈର୍ଷ୍ୟାଳୁ, ଦୁରାତ୍ମା ଓ ଅଭିମାନୀ; ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ବଚନକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ସେ ନରକପଥେ ଯାଉଛି।
Verse 9
गान्धायुवाच ऐश्वर्यकाम दुष्टात्मन् वृद्धानां शासनातिग । ऐश्वर्यजीविते हित्वा पितरं मां च बालिश,गान्धारी बोली--दुष्टात्मा दुर्योधन! तू ऐश्वर्यकी इच्छा रखकर अपने बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञाका उल्लंघन करता है! अरे मूर्ख! इस ऐश्वर्य, जीवन, पिता और मुझ माताको भी त्यागकर शत्रुओंकी प्रसन्नता और मेरा शोक बढ़ाता हुआ जब तू भीमसेनके हाथों मारा जायगा, उस समय तुझे पिताकी बातें याद आयेंगी
ଗାନ୍ଧାରୀ କହିଲେ—ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ! ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟର ଲୋଭରେ ତୁ ଜ୍ୟେଷ୍ଠମାନଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଉଲ୍ଲଂଘନ କରୁଛୁ। ହେ ମୂର୍ଖ! ରାଜ୍ୟ ଓ ଜୀବନର ମୋହରେ ତୁ ପିତାକୁ ଓ ମୋତେ—ମାତାକୁ ମଧ୍ୟ—ତ୍ୟାଗ କରି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ବଢ଼ାଉଛୁ ଏବଂ ମୋର ଶୋକ ବଢ଼ାଉଛୁ। ଯେତେବେଳେ ତୁ ଭୀମସେନଙ୍କ ହାତରେ ନିହତ ହେବୁ, ସେତେବେଳେ ପିତାଙ୍କ ବଚନ ତୋତେ ସ୍ମରଣ ହେବ।
Verse 10
वर्धयन् दुर्हदां प्रीतिं मां च शोकेन वर्धयन् । निहतो भीमसेनेन स्मर्तासि वचन पितु:,गान्धारी बोली--दुष्टात्मा दुर्योधन! तू ऐश्वर्यकी इच्छा रखकर अपने बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञाका उल्लंघन करता है! अरे मूर्ख! इस ऐश्वर्य, जीवन, पिता और मुझ माताको भी त्यागकर शत्रुओंकी प्रसन्नता और मेरा शोक बढ़ाता हुआ जब तू भीमसेनके हाथों मारा जायगा, उस समय तुझे पिताकी बातें याद आयेंगी
ତୁ ଦୁର୍ହୃଦ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପ୍ରୀତି ବଢ଼ାଉଛୁ ଏବଂ ସେହି ସମୟରେ ମୋର ଶୋକ ମଧ୍ୟ ବଢ଼ାଉଛୁ। ଯେତେବେଳେ ତୁ ଭୀମସେନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିହତ ହେବୁ, ସେତେବେଳେ ପିତାଙ୍କ ବଚନ ତୋତେ ସ୍ମରଣ ହେବ।
Verse 11
व्यास उवाच प्रियोडसि राजन् कृष्णस्य धृतराष्ट्र निबोध मे । यस्य ते संजयो दूतो यस्त्वां श्रेयसि योक्ष्यते,तदनन्तर व्यासजीने कहा--राजा धृतराष्ट्र! मेरी बातोंपर ध्यान दो। वास्तवमें तुम श्रीकृष्णके प्रिय हो, तभी तो तुम्हें संजय-जैसा दूत मिला है, जो तुम्हें कल्याण-साधनमें लगायेगा
ବ୍ୟାସ କହିଲେ—ହେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ମୋ କଥା ବୁଝ। ତୁମେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପ୍ରିୟ; ସେହିପାଇଁ ତୁମକୁ ସଞ୍ଜୟ ପରି ଦୂତ ମିଳିଛି, ଯେ ତୁମକୁ ଶ୍ରେୟସ୍ରେ ଯୋଗ କରିବ।
Verse 12
जानात्येष हृषीकेशं पुराणं यच्च वै परम् । शुश्रूषमाणमेकाग्रं मोक्ष्यते महतो भयात्,यह संजय पुराणपुरुष भगवान् श्रीकृष्णको जानता है और उनका जो परमतत्त्व है, वह भी इसे ज्ञात है। यदि तुम एकाग्रचित्त होकर इसकी बातें सुनोगे तो यह तुम्हें महान् भयसे मुक्त कर देगा
ଏହି ସଞ୍ଜୟ ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ—ପୁରାଣପୁରୁଷଙ୍କୁ—ଜାଣେ ଏବଂ ତାଙ୍କର ପରମ ତତ୍ତ୍ୱକୁ ମଧ୍ୟ ଜାଣେ। ତୁମେ ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତରେ ତାଙ୍କ କଥା ଶୁଣିଲେ, ସେ ତୁମକୁ ମହାଭୟରୁ ମୁକ୍ତ କରିବ।
Verse 13
वैचित्रवीर्य पुरुषा: क्रोधहर्षसमावृता: । सिता बहुविधे: पाशैर्ये न तुष्टाः स्वकैर्धनै:,विचित्रवीर्यकुमार! जो मनुष्य अपने धनसे संतुष्ट नहीं हैं और काम आदि विविध प्रकारके बन्धनोंसे बँधकर हर्ष और क्रोधके वशीभूत हो रहे हैं, वे काममोहित पुरुष अंधोंके नेतृत्वमें चलनेवाले अंधोंकी भाँति अपने कर्माद्वारा प्रेरित होकर बारंबार यमराजके वशमें आते हैं
ହେ ବୈଚିତ୍ରବୀର୍ଯ୍ୟକୁମାର! ଯେମାନେ ନିଜ ଧନରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ନୁହନ୍ତି ଏବଂ କାମ-ମୋହ ଆଦି ବହୁବିଧ ପାଶରେ ବନ୍ଧି ହର୍ଷ ଓ କ୍ରୋଧରେ ଆବୃତ ରହନ୍ତି, ସେମାନେ କର୍ମପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଅନ୍ଧର ନେତୃତ୍ୱରେ ଚାଲୁଥିବା ଅନ୍ଧମାନଙ୍କ ପରି ପୁନଃପୁନଃ ଯମର ଅଧୀନକୁ ପଡ଼ନ୍ତି।
Verse 14
यमस्य वशमायान्ति काममूढा: पुनः पुन: । अन्धनेत्रा यथैवान्धा नीयमाना: स्वकर्मभि:,विचित्रवीर्यकुमार! जो मनुष्य अपने धनसे संतुष्ट नहीं हैं और काम आदि विविध प्रकारके बन्धनोंसे बँधकर हर्ष और क्रोधके वशीभूत हो रहे हैं, वे काममोहित पुरुष अंधोंके नेतृत्वमें चलनेवाले अंधोंकी भाँति अपने कर्माद्वारा प्रेरित होकर बारंबार यमराजके वशमें आते हैं
କାମମୋହରେ ମୁଗ୍ଧ ଲୋକେ ପୁନଃପୁନଃ ଯମଙ୍କ ବଶକୁ ଯାଆନ୍ତି। ଯେପରି ଅନ୍ଧମାନେ ଅନ୍ଧଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ଚାଲନ୍ତି, ସେପରି ସେମାନେ ନିଜ କର୍ମଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ବାରମ୍ବାର ମୃତ୍ୟୁର ଅଧିକାରକୁ ପଡ଼ନ୍ତି।
Verse 15
एष एकायन: पन्था येन यान्ति मनीषिण: । त॑ं दृष्टवा मृत्युमत्येति महांस्तत्र न सज्जति,यह ज्ञानमार्ग एकमात्र परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। जिसपर मनीषी (ज्ञानी) पुरुष चलते हैं, उस मार्गको देख या जान लेनेपर मनुष्य जन्म-मृत्युरूप संसारको लाँघ जाता है और वह महात्मा पुरुष कभी इस संसारमें आसक्त नहीं होता है
ଏହା ଏକମାତ୍ର ସରଳ ପଥ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ମନୀଷୀମାନେ ଗତି କରନ୍ତି। ସେହି ପଥକୁ ଦେଖି—ଅର୍ଥାତ୍ ସତ୍ୟରୂପେ ଜାଣି—ମନୁଷ୍ୟ ମୃତ୍ୟୁକୁ ମଧ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କରେ; ଏବଂ ମହାତ୍ମା ଏହି ମର୍ତ୍ୟ-ସଂସାରରେ ଆସକ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 16
धृतराष्ट उवाच अड़ संजय मे शंस पन्थानमकुतो भयम् । येन गत्वा हृषीकेशं प्राप्तुयां सिद्धिमुत्तमाम्,धृतराष्ट्र बोले--वत्स संजय! तुम मुझे वह निर्भय मार्ग बताओ, जिससे चलकर मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी परममोक्षस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त कर सकूँ
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବତ୍ସ ସଞ୍ଜୟ! ମୋତେ ସେହି ନିର୍ଭୟ ପଥ କୁହ, ଯାହାରେ ଗତି କରି ମୁଁ ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରି ଉତ୍ତମ ସିଦ୍ଧି ଲାଭ କରିପାରିବି।
Verse 17
संजय उवाच नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् आत्मनस्तु क्रियोपायो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात्,संजयने कहा--महाराज! जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है, वह कभी नित्यसिद्ध परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकता। अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें किये बिना दूसरा कोई कर्म उन परमात्माकी प्राप्तिका उपाय नहीं हो सकता
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଯିଏ ନିଜକୁ ବଶ କରିନାହିଁ, ସେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ କେବେ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ। ଆତ୍ମସାଧନର ଉପାୟ ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କିଛି ନୁହେଁ।
Verse 18
इन्द्रियाणामुदीर्णानां कामत्यागो<5प्रमादत: । अप्रमादो<5विहिंसा च ज्ञानयोनिरसंशयम्,विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियोंकी भोग-कामनाओंका पूर्ण सावधानीके साथ त्याग कर देना, प्रमादसे दूर रहना तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना--ये तीन निश्चय ही तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण हैं
ବିଷୟମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଧାଉଥିବା ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସତର୍କତା ସହ କାମତ୍ୟାଗ କରିବା; ଅପ୍ରମାଦୀ ରହିବା; ଏବଂ କୌଣସି ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ହିଂସା ନ କରିବା—ଏହି ତିନିଟି ନିଶ୍ଚୟ ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞାନର ଯୋନି।
Verse 19
इन्द्रियाणां यमे यत्तो भव राजन्नतन्द्रित: । बुद्धिश्च ते मा च्यवतु नियच्छैनां यतस्तत:,राजन्! आप आलस्य छोड़कर इन्द्रियोंके संयममें तत्पर हो जाइये और अपनी बुद्धिको जैसे भी सम्भव हो, नियन्त्रणमें रखिये, जिससे वह अपने लक्ष्यसे भ्रष्ट न हो
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଆଳସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ସତର୍କ ରୁହ; ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହରେ ନିବିଡ଼ ହେ। ତୋର ବୁଦ୍ଧି ଲକ୍ଷ୍ୟରୁ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେଉ—ଯଥାଶକ୍ତି ତାକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ରଖ, ଯେପରି ସେ ସତ୍ପଥରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ ନ ହୁଏ।
Verse 20
एतज्ज्ञानं विदुर्विप्रा ध्रुवमिन्द्रियधारणम् । एतऊज्ञानं च पन्थाक्ष येन यान्ति मनीषिण:,इन्द्रियोंको दृढ़तापूर्वक संयममें रखना चाहिये। विद्वान् ब्राह्मण इसीको ज्ञान मानते हैं। यह ज्ञान ही वह मार्ग है, जिससे मनीषी पुरुष चलते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଧାରଣ କରି ନିଗ୍ରହ କରିବାକୁ ହିଁ ସତ୍ୟ ଜ୍ଞାନ ବୋଲି ବିଦ୍ୱାନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ନିଶ୍ଚୟ କରନ୍ତି। ଏହି ହିଁ ଜ୍ଞାନ, ଏହି ହିଁ ପଥ—ଯାହାରେ ମନୀଷୀମାନେ ଚାଲନ୍ତି।
Verse 21
अप्राप्य: केशवो राजन्निन्द्रियेरजितैर्नभि: । आगमाधिगमाद्ू योगाद् वशी तत्त्वे प्रसीदति,राजन! मनुष्य अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये बिना भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकते। जिसने शास्त्रज्ञान और योगके प्रभावसे अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, वही तत्त्वज्ञान पाकर प्रसन्न होता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଯେମାନେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟ କରିନାହାନ୍ତି, ସେମାନେ କେଶବଙ୍କୁ ପାଇପାରନ୍ତି ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଯିଏ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ ଓ ଯୋଗସାଧନାର ପ୍ରଭାବରେ ମନ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ବଶ କରି ରଖିଛି, ସେ ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞାନ ପାଇ ଅନ୍ତରେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଏ।
Verse 69
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये एकोनसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକୋଣସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The chapter addresses the problem of rightful recognition: how a ruler or advisor should evaluate legitimate authority and moral capacity before decisive political action, using name-exegesis as a structured assessment of qualities.
Names are presented as compressed doctrines: Kṛṣṇa is framed as truth-grounded, all-knowing, sustaining, and transcendent—implying that ethical governance should align with truth, steadiness, and protection rather than coercive disorder.
No explicit phalaśruti formula is stated in the provided verses; the chapter’s meta-function is justificatory and orienting—establishing interpretive authority and ethical framing within the broader pre-conflict counsel.