Adhyaya 67
Udyoga ParvaAdhyaya 6717 Verses

Adhyaya 67

Sañjaya’s Knowledge of Keśava and the Discipline of Indriya-nigraha (संजयस्य केशवज्ञानम्—इन्द्रियनिग्रह-उपदेशः)

Upa-parva: Sañjaya–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda (Udyoga-parva: Adhyāya 67 Context Unit)

Adhyāya 67 presents a multi-voice court dialogue. Dhṛtarāṣṭra asks how Saṃjaya recognizes Mādhava as ‘sarvaloka-maheśvara’ and why he himself does not. Saṃjaya replies that mere ‘vidyā’ without inner qualification fails, while knowledge grounded in purified disposition and devotion enables recognition of Kṛṣṇa as the uncreated agent and the source and dissolution of beings (prabhava–apyaya). Dhṛtarāṣṭra inquires into Saṃjaya’s bhakti; Saṃjaya denies serving illusion (māyā), rejects purposeless adharma, and attributes his understanding to śāstra with a śuddha-bhāva. Dhṛtarāṣṭra urges Duryodhana to take refuge in Hṛṣīkeśa; Duryodhana refuses, citing Kṛṣṇa’s friendship with Arjuna. Dhṛtarāṣṭra laments his son’s envy and disregard for beneficial counsel; Gāndhārī warns that abandoning elders for power will culminate in violent retribution and regret. Vyāsa affirms Dhṛtarāṣṭra’s relationship to Kṛṣṇa and Saṃjaya’s competence, then frames the broader human predicament: those bound by desire repeatedly fall under Yama’s domain. Asked for a fearless path (akutobhaya panthā), Saṃjaya prescribes inner discipline—sense-control, vigilant renunciation of desire, non-injury, and yogic mastery—stating that Keśava is inaccessible to the uncontrolled senses but is realized through āgama-informed yoga and steadiness in truth.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र बार-बार पाण्डवों के ‘सार-असार बल’ का रहस्य पूछते हैं; तब संजय अर्जुन और वासुदेव—दोनों धनुर्धरों की परम-पूज्यता और कृष्ण-तत्त्व की ओर कथा को मोड़ते हैं। → संजय बतलाते हैं कि वासुदेव की माया से सुदर्शन-चक्र का अलक्ष्य, अचिन्त्य प्रभाव चलता है—यह केवल अस्त्र नहीं, धर्म-रक्षा का दैवी संकेत है; धृतराष्ट्र की जिज्ञासा अब सैन्य-गणना से उठकर ‘किस ओर विजय’ के प्रश्न में बदलती जाती है। → निर्णायक वाक्य उभरता है—‘यतः सत्यं यतो धर्मो… यतः कृष्णस्ततो जयः’; सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता जहाँ हैं, वहीं गोविन्द हैं और वहीं विजय निश्चित है। → संजय कृष्ण को कालचक्र, जगच्चक्र और युगचक्र का नियन्ता बताते हैं—वे आत्मयोग से सब परिवर्तित करते हैं; वे ही काल और मृत्यु तक के ईश्वर हैं, और उनकी माया लोक को मोहित करती है, पर जो उन्हें शरण लेते हैं वे मोह से नहीं गिरते। → धृतराष्ट्र के लिए निष्कर्ष स्पष्ट है—विजय का केन्द्र कृष्ण हैं; पर वह इस सत्य को स्वीकार कर नीति बदलेगा या मोह में अड़ा रहेगा—यही आगे की अनिश्चितता बनती है।

Shlokas

Verse 1

असजन कार (.) आ+औअन+- अष्टषष्टितमो< ध्याय: संजयका धृतराष्ट्रको भगवान्‌ श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना संजय उवाच अर्जुनो वासुदेवश्च धन्विनौ परमार्चितौ | कामादन्यत्र सम्भूतौ सर्वभावाय सम्मितौ,संजयने कहा--राजन्‌! अर्जुन तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण दोनों बड़े सम्मानित धनुर्थर हैं। वे (यद्यपि सदा साथ रहनेवाले नर और नारायण हैं, तथापि) लोककल्याणकी कामनासे पृथक्‌-पृथक्‌ प्रकट हुए हैं और सब कुछ करनेमें समर्थ हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଅର୍ଜୁନ ଓ ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଉଭୟେ ପରମ ପୂଜିତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧନୁର୍ଧର। ସ୍ୱରୂପରେ ନିତ୍ୟ ଏକ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଲୋକକଲ୍ୟାଣର ସଙ୍କଳ୍ପରୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛନ୍ତି ଏବଂ ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟରେ ସମାନ ଭାବେ ସମର୍ଥ।

Verse 2

व्यामान्तरं समास्थाय यथामुक्त मनस्विन: । चक्र तद्‌ वासुदेवस्य मायया वर्तते विभो,प्रभो! उदारचेता भगवान्‌ वासुदेवका सुदर्शन नामक चक्र उनकी मायासे अलक्षित होकर उनके पास रहता है। उसके मध्यभागका विस्तार लगभग साढ़े तीन हाथका है। वह भगवानके संकल्पके अनुसार (विशाल एवं तेजस्वी रूप धारण करके शत्रुसंहारके लिये) प्रयुक्त होता है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ପ୍ରଭୋ! ବାସୁଦେବଙ୍କ ସୁଦର୍ଶନ ଚକ୍ର ତାଙ୍କ ମାୟାଶକ୍ତିରେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଅଲକ୍ଷିତ ରହି ସଦା ତାଙ୍କ ସହିତ ରହେ। ତାହାର ମଧ୍ୟଭାଗର ବିସ୍ତାର ପ୍ରାୟ ସାଢେ ତିନି ହାତ। ଭଗବାନଙ୍କ ସଙ୍କଳ୍ପାନୁସାରେ ତାହା ବିଶାଳ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ରୂପ ଧାରଣ କରି ଶତ୍ରୁନାଶ ପାଇଁ ପ୍ରୟୋଗ ହୁଏ।

Verse 3

सापद्ववं कौरवेषु पाण्डवानां सुसम्मतम्‌ । सारासारबल ज्ञातुं तेज:पुञज्जावभासितम्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କୌରବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସ୍ଥିତି ସୁସ୍ୱୀକୃତ ଓ ଦୃଢ଼ ଥିଲା। ଏବଂ ସାର-ଅସାର, ଅର୍ଥାତ୍ ଯଥାର୍ଥ ବଳ କ’ଣ ଓ ଖୋଖଳା କ’ଣ, ଏହା ଜାଣିବା ପାଇଁ ତେଜର ଏକ ଦୀପ୍ତ ପୁଞ୍ଜ ପ୍ରକଟ ହୋଇ ଜ୍ୱଲିଲା।

Verse 4

कौरवोंपर उसका प्रभाव प्रकट नहीं है। पाण्डवोंको वह अत्यन्त प्रिय है। वह सबके सार-असारभूत बलको जाननेमें समर्थ और तेज:पुंजसे प्रकाशित होनेवाला है ।। नरकं शम्बरं चैव कंसं चैद्यं च माधव: । जितवान्‌ घोरसंकाशान्‌ क्रीडन्निव महाबल:,महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्णने अत्यन्त भयंकरप्रतीत होनेवाले नरकासुर, शम्बरसुर, कंस तथा शिशुपालको भी खेल-ही-खेलमें जीत लिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାବଳୀ ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଭୟଙ୍କର ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିବା ନରକ, ଶମ୍ବର, କଂସ ଓ ଚୈଦ୍ୟ (ଶିଶୁପାଳ)ଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମାନୋ ଖେଳରେ ଜିତିଥିଲେ।

Verse 5

पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव पुरुषोत्तम: । मनसैव विशिष्टात्मा नयत्यात्मवशं वशी,पूर्णतः स्वाधीन एवं श्रेष्ठस्वरूप पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण मनके संकल्पमात्रसे ही भूतल, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकको भी अपने अधीन कर सकते हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ବିଶିଷ୍ଟ ଆତ୍ମଶକ୍ତି ଓ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଆତ୍ମସଂଯମରେ ଯୁକ୍ତ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ମନର ସଙ୍କଳ୍ପମାତ୍ରରେ ପୃଥିବୀ, ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ଓ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ନିଜ ବଶରେ ଆଣିପାରନ୍ତି।

Verse 6

भूयो भूयो हि यद्‌ राजन्‌ पृच्छसे पाण्डवानू्‌ प्रति । सारासारबल ज्ञातुं तत्‌ समासेन मे शृणु

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଆପଣ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ପୁନଃପୁନଃ ପଚାରୁଛନ୍ତି। ତାଙ୍କର ବଳର ସାର ଓ ଅସାର ଜାଣିବାକୁ ମୋ କଥା ସଂକ୍ଷେପରେ ଶୁଣନ୍ତୁ।

Verse 7

राजन! आप जो बारंबार पाण्डवोंके विषयमें, उनके सार या असारभूत बलको जाननेके लिये मुझसे पूछते रहते हैं, वह सब आप मुझसे संक्षेपमें सुनिये ।। एकतो वा जगत्‌ कृत्स्नमेकतो वा जनार्दन: । सारतो जगत: कृत्स्नादतिरिक्तो जनार्दन:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବଳ ସାରଭୂତ କି ମାତ୍ର ଦେଖାଦେଖି, ଏହା ଜାଣିବାକୁ ଆପଣ ପୁନଃପୁନଃ ପଚାରୁଛନ୍ତି; ସଂକ୍ଷେପରେ ଶୁଣନ୍ତୁ। ଏକ ପକ୍ଷରେ ସମଗ୍ର ଜଗତ, ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ ଏକା ଜନାର୍ଦନ; ସାରଦୃଷ୍ଟିରେ ଜନାର୍ଦନ ସମଗ୍ର ଜଗତଠାରୁ ଅଧିକ।

Verse 8

एक ओर सम्पूर्ण जगत्‌ हो और दूसरी ओर अकेले भगवान्‌ श्रीकृष्ण हों तो सारभूत बलकी दृष्टिसे वे भगवान्‌ जनार्दन ही सम्पूर्ण जगत्से बढ़कर सिद्ध होंगे ।। भस्म कुर्याज्जगदिदं मनसैव जनार्दन: । न तु कृत्स्नं जगच्छक्तं भस्म कर्तु जनार्दनम्‌,श्रीकृष्ण अपने मानसिक संकल्पमात्रसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को भस्म कर सकते हैं; परंतु उन्हें भस्म करनेमें यह सारा जगत्‌ समर्थ नहीं हो सकता

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏକ ପକ୍ଷରେ ସମଗ୍ର ଜଗତ ଓ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ ଏକା ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଜନାର୍ଦନ ଥିଲେ, ସାରଭୂତ ବଳଦୃଷ୍ଟିରେ ସେଇ ଜନାର୍ଦନ ଜଗତଠାରୁ ଅଧିକ। ଜନାର୍ଦନ ମନସିକ ସଙ୍କଳ୍ପମାତ୍ରରେ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ଭସ୍ମ କରିପାରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ସମଗ୍ର ଜଗତ ମିଶି ମଧ୍ୟ ଜନାର୍ଦନଙ୍କୁ ଭସ୍ମ କରିବାରେ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ।

Verse 9

यतः सत्यं यतो धर्मो यतो द्वीरार्जव॑ यतः । ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जय:,जिस ओर सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, उसी ओर भगवान्‌ श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେଉଁଠି ସତ୍ୟ, ଯେଉଁଠି ଧର୍ମ, ଯେଉଁଠି ଧୀରତା, ଲଜ୍ଜା ଓ ସରଳତା ଅଛି, ସେଉଁଠି ଗୋବିନ୍ଦ ଅଛନ୍ତି; ଏବଂ ଯେଉଁଠି କୃଷ୍ଣ, ସେଉଁଠି ଜୟ।

Verse 10

पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तम: । विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दन:,समस्त प्राणियोंके आत्मा पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण खेल-सा करते हुए ही पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकका संचालन करते हैं

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଆତ୍ମା, ପୁରୁଷୋତ୍ତମ ଜନାର୍ଦନ, ଖେଳ-ପରି ଭାବେ ପୃଥିବୀ, ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ଓ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ଚାଳନା କରନ୍ତି।

Verse 11

स कृत्वा पाण्डवान्‌ सत्र लोक॑ सम्मोहयन्निव । अधर्मनिरतान्‌ मूढान्‌ दग्धुमिच्छति ते सुतान्‌,वे इस समय समस्त लोकको मोहित-सा करते हुए पाण्डवोंके मिससे आपके अधर्मपरायण मूढ़ पुत्रोंकोी भस्म करना चाहते हैं

ସେ ସଭାରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ର କରି ସେ ଯେନେ ସମଗ୍ର ଲୋକକୁ ମୋହିତ କରୁଛି; ଏବଂ ଅଧର୍ମରେ ଲିପ୍ତ, ମୂଢ—ତୁମ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଭସ୍ମ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 12

कालचक्रं जगच्चक्रं युगचक्रं च केशव: । आत्मयोगेन भगवान्‌ परिवर्तयतेडनिशम्‌,ये भगवान्‌ केशव ही अपनी योगशक्तिसे निरन्तर कालचक्र, संसारचक्र तथा युगचक्रको घुमाते रहते हैं

ଭଗବାନ କେଶବ ନିଜ ଆତ୍ମଯୋଗଶକ୍ତିରେ ନିରନ୍ତର କାଳଚକ୍ର, ଜଗଚକ୍ର ଓ ଯୁଗଚକ୍ରକୁ ପରିବର୍ତ୍ତନ କରାନ୍ତି।

Verse 13

कालस्य च हि मृत्योश्व॒ जड़मस्थावरस्य च | ईशते भगवानेक: सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,मैं आपसे यह सच कहता हूँ कि एकमात्र भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही काल, मृत्यु तथा चराचर जगतके स्वामी एवं शासक हैं

ମୁଁ ତୁମକୁ ସତ୍ୟ କହୁଛି—ଏକମାତ୍ର ଭଗବାନ ହିଁ କାଳ, ମୃତ୍ୟୁ ଓ ଜଡ-ସ୍ଥାବର ଜଗତର ଈଶ୍ୱର।

Verse 14

ईशन्नपि महायोगी सर्वस्य जगतो हरि: । कर्माण्यारभते कर्तु कीनाश इव वर्धन:,महायोगी श्रीहरि सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी एवं ईश्वर होते हुए भी खेतीको बढ़ानेवाले किसानकी भाँति सदा नये-नये कर्मोका आरम्भ करते रहते हैं

ମହାଯୋଗୀ ହରି ସମଗ୍ର ଜଗତର ଈଶ୍ୱର ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଫସଲ ବଢ଼ାଇବାକୁ ପରିଶ୍ରମ କରୁଥିବା କୃଷକ ପରି, ସଦା ନୂତନ-ନୂତନ କର୍ମ ଆରମ୍ଭ କରନ୍ତି।

Verse 15

तेन वज्चयते लोकान्‌ मायायोगेन केशव: । ये तमेव प्रपद्यन्ते न ते मुहान्ति मानवा:,भगवान्‌ केशव अपनी मायाके प्रभावसे सब लोगोंको मोहमें डाले रहते हैं; किंतु जो मनुष्य केवल उन्हींकी शरण ले लेते हैं, वे उनकी मायासे मोहित नहीं होते हैं

କେଶବ ମାୟାଯୋଗଦ୍ୱାରା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମୋହିତ କରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଯେ ମନୁଷ୍ୟ କେବଳ ତାଙ୍କର ଶରଣ ନେଇଥାଏ, ସେମାନେ ସେଇ ମାୟାରେ ଭ୍ରମିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 67

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें व्याय और गान्धारीके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ବ୍ୟାସ ଓ ଗାନ୍ଧାରୀଙ୍କ ଆଗମନ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସତଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 68

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्येडष्टषष्टितमो5 ध्याय: ।। ६८ || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟବାକ୍ୟବିଷୟକ ଅଷ୍ଟଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The chapter contrasts two ethical orientations: seeking welfare through humility, refuge, and disciplined self-governance versus persisting in pride and envy that rejects corrective counsel—personified by Dhṛtarāṣṭra’s urging and Duryodhana’s refusal.

Realization of the highest principle is not achieved by uncontrolled senses or status-based reasoning; it requires indriya-nigraha, vigilant abandonment of desire, non-injury, and yoga grounded in authoritative teaching (āgama/śāstra), producing steadiness in truth.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary functions indirectly by asserting soteriological and practical consequence: disciplined listeners ‘escape great fear’ (mahato bhayāt) and approach peace through the ‘akutobhaya’ path of restraint and knowledge.