
अध्याय ४६ — सभाप्रवेशः तथा सञ्जयस्य दूतवृत्तान्तः (Entry into the Royal Assembly and Sañjaya’s Envoy Report)
Upa-parva: Sañjaya-dūta (Messenger) Episode — Kuru Sabhā Proceedings
Vaiśaṃpāyana narrates that the night passes while the king converses with Sanatsujāta and the wise Vidura. At dawn, the assembled kings and eminent warriors enter the auspicious royal hall, described in architectural and material detail (bright plastered expanse, gold-inlaid features, refined seating and coverings). Prominent elders and allies—Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Śalya, Kṛtavarmā, Jayadratha, Aśvatthāmā, Vikarna, Somadatta, Bāhlika—enter with Vidura and Yuyutsu, led by Dhṛtarāṣṭra. Duryodhana and his circle also enter, and the hall is likened to a cavern adorned by lions, indicating concentrated power. Once seated, the doorkeeper announces the arrival of the sūta-putra Sañjaya. Sañjaya enters swiftly and reports his return from the Pāṇḍavas, stating that they received the Kurus with due honor: elders were greeted respectfully, peers treated as peers, and younger persons addressed appropriately; he further notes he conveyed Dhṛtarāṣṭra’s message exactly as instructed, preparing the court for the next phase of deliberation.
Chapter Arc: रात्रि के बीतते ही प्रभात में कौरव-सभा जाग उठती है—पाण्डवों के शिविर से लौटे सूतपुत्र संजय को सुनने हेतु धृतराष्ट्र-प्रमुख समस्त राजागण सभा में उमड़ पड़ते हैं। → सभा देव-सभा-सी भरती जाती है; दुर्योधन-पक्ष के उग्र योद्धा (दुःशासन, कर्ण, शकुनि, उलूक आदि) अमर्ष से भरे उपस्थित होते हैं, जबकि विदुर और युयुत्सु जैसे विवेकशील भी वहीं हैं—एक ही कक्ष में नीति और हठ का टकराव सघन होता जाता है। → संजय स्पष्ट घोषणा करता है कि वह पाण्डवों से मिलकर लौटा है और बताता है कि पाण्डव कुरुओं का यथोचित सम्मान करते हैं; फिर वह धृतराष्ट्र के आदेशानुसार जो संदेश लेकर गया था, उसके प्रत्युत्तर का वृत्तांत सुनाने को उद्यत होता है—सभा का समस्त ध्यान उसी वाणी पर टिक जाता है। → अध्याय का समापन सभा-प्रवेश, आसन-ग्रहण और संजय के प्रतिवेदन की भूमिका पर होता है—कौरव-सभा एकत्रित होकर ‘अब क्या कहा गया?’ के प्रश्न पर स्थिर हो जाती है। → संजय के मुख से पाण्डवों (विशेषतः वासुदेव और धनंजय) की धर्मयुक्त वाणी का वास्तविक विवरण अगले अध्यायों में खुलने वाला है।
Verse 1
३) (यानसंधिपर्व) सप्तचत्वारिशो< ध्याय: पाण्डवोंके यहाँसे लौटे हुए संजयका कौरवसभामें आगमन वैशम्पायन उवाच एवं सनत्सुजातेन विदुरेण च धीमता । सार्थ कथयतो राज्ञ: सा व्यतीयाय शर्वरी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार महर्षि सनत्सुजात और बुद्धिमान् विदुरजीके साथ बातचीत करते हुए राजा धृतराष्ट्रकी सारी रात बीत गयी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏହିପରି ମହର୍ଷି ସନତ୍ସୁଜାତ ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁରଙ୍କ ସହ ଆଲୋଚନା କରୁ କରୁ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସମଗ୍ର ରାତ୍ରି ବିତିଗଲା।
Verse 2
तस्यां रजन्यां व्युष्टायां राजान: सर्व एव ते । सभामाविविशुर्द्वश: सूतस्योपदिदृक्षया,वह रात बीतनेपर जब प्रभातकाल आया, तब सब राजालोग सूतपुत्र संजयको देखनेके लिये बड़े हर्षके साथ सभामें आये
ସେଇ ରାତି ଅତିବାହିତ ହୋଇ ପ୍ରଭାତ ଆସିଲାପରେ, ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ସୂତପୁତ୍ର ସଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ଦେଖିବା ଆକାଙ୍କ୍ଷାରେ ଶୀଘ୍ର ସଭାଗୃହକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 3
शुश्रूषमाणा: पार्थानां वाचो धर्मार्थसंहिता: । धृतराष्ट्रमुखा: सर्वे ययू राजसभां शुभाम्,धृतराष्ट्र आदि समस्त कौरवोंने भी पाण्डवोंकी धर्मार्थयुक्त बातें सुननेकी इच्छासे उस सुन्दर एवं विशाल राजसभामें प्रवेश किया, जो चूनेसे पुती होनेके कारण अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थी। सुवर्णमय प्रांगण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह सभा चन्द्रमाकी श्वेत रश्मियोंके समान प्रकाशित हो रही थी। वह देखनेमें अत्यन्त मनोहर थी और उसके भीतर चन्दनमिश्रित जलसे छिड़काव किया गया था
ପାର୍ଥମାନଙ୍କ ଧର୍ମାର୍ଥସଂହିତ ବାକ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସମସ୍ତେ ଶୁଭ ରାଜସଭାକୁ ଗଲେ।
Verse 4
सुधावदातां विस्तीर्णा कनकाजिरभूषिताम् । चन्द्रप्रभां सुरुचिरां सिक्तां चन्दनवारिणा,धृतराष्ट्र आदि समस्त कौरवोंने भी पाण्डवोंकी धर्मार्थयुक्त बातें सुननेकी इच्छासे उस सुन्दर एवं विशाल राजसभामें प्रवेश किया, जो चूनेसे पुती होनेके कारण अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थी। सुवर्णमय प्रांगण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह सभा चन्द्रमाकी श्वेत रश्मियोंके समान प्रकाशित हो रही थी। वह देखनेमें अत्यन्त मनोहर थी और उसके भीतर चन्दनमिश्रित जलसे छिड़काव किया गया था
ସେଇ ରାଜସଭା ଚୁନା ଲେପା ଭଳି ଧବଳ ଓ ବିସ୍ତୃତ ଥିଲା, ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ପ୍ରାଙ୍ଗଣରେ ଭୂଷିତ; ଚନ୍ଦ୍ରପ୍ରଭା ସମ ଦୀପ୍ତ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁରୁଚିର, ଏବଂ ଚନ୍ଦନମିଶ୍ରିତ ଜଳରେ ସିକ୍ତ ଥିଲା।
Verse 5
रुचिरैरासनैस्तीर्णा काञ्चनैर्दारवैरपि । अश्मसारमयैदन्ति: स्वास्तीर्णै: सोत्तरच्छदै:,उस राजसभामें सुवर्ण, काष्ठ, मणि तथा हाथीदाँतके बने हुए सुन्दर-सुन्दर आसन सुरुचिपूर्ण ढंगसे बिछे हुए थे और उनके ऊपर चादरें फैला दी गयी थीं
ସେଇ ସଭାରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ କାଠର, ତଥା କଠିନ ଶିଳାସାର ପଦାର୍ଥ ଓ ଦନ୍ତରେ ତିଆରି ସୁନ୍ଦର ଆସନଗୁଡ଼ିକ ସୁସଜ୍ଜିତ ଭାବେ ପତିଆଯାଇଥିଲା; ଏବଂ ସେଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ଉତ୍ତରୀୟ ସହିତ ଆବରଣ ଭଲଭାବେ ପତିଆଯାଇଥିଲା।
Verse 6
भीष्मो द्रोण: कृप: शल्य: कृतवर्मा जयद्रथ: । अश्रृत्थामा विकर्णश्ष॒ सोमदत्तश्न बाह्विक:
ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପ, ଶଲ୍ୟ, କୃତବର୍ମା, ଜୟଦ୍ରଥ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ବିକର୍ଣ୍ଣ, ସୋମଦତ୍ତ ଏବଂ ବାହ୍ଲିକ—ଏ ସମସ୍ତେ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 7
विदुरश्न महाप्राज्ञो युयुत्सुश्न महारथ: । सर्वे च सहिता: शूरा: पार्थिवा भरतर्षभ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ବିଦୁର ଓ ମହାରଥୀ ଯୁଯୁତ୍ସୁ, ଏବଂ ସମବେତ ସମସ୍ତ ଶୂର ପାର୍ଥିବ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଏକତ୍ର ଏକମତ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ।
Verse 8
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां शुभाम् | भरतश्रेष्ठ! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा, जयद्रथ, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, परम बुद्धिमान् विदुर, महारथी युयुत्सु तथा अन्य सभी शूरवीर नरेश धृतराष्ट्रको आगे करके उस सुन्दर सभामें एक साथ प्रविष्ट हुए ।। ६-७ ह ।। दुःशासनश्रित्रसेन: शकुनिश्चापि सौबल:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ କରି ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସେଇ ଶୁଭ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ, ଶଲ୍ୟ, କୃତବର୍ମା, ଜୟଦ୍ରଥ, ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା, ବିକର୍ଣ୍ଣ, ସୋମଦତ୍ତ, ବାହ୍ଲିକ, ପରମପ୍ରାଜ୍ଞ ବିଦୁର, ମହାରଥୀ ଯୁଯୁତ୍ସୁ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଶୂର ନରେଶ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି—ଏକସାଥି ଏହି ସୁନ୍ଦର ସଭାମଣ୍ଡପରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। (ସେଠାରେ) ଦୁଃଶାସନ, ଚିତ୍ରସେନ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 9
न््जॉिमान- (9) निजशिशन्य $. प्रस्तुत रूपकका कठोपनिषदके प्रथम अध्यायकी तीसरी वल्लीके तीसरेसे लेकर नवें श"्लोकतक विस्तृत विवरण मिलता है। २. इससे प्राय: मिलता-जुलता एक श्लोक कठोपनिषद्में मिलता है-- न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । ह॒दा मनीषा मनसाभिक्लूप्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ।। (२,दुर्मुखो दुःसह: कर्ण उलूको5थ विविंशति: । कुरुराजं पुरस्कृत्य दुर्योधनममर्षणम्
ଦୁର୍ମୁଖ, ଦୁଃସହ, କର୍ଣ୍ଣ, ଉଲୂକ ଓ ବିବିଂଶତି—କୁରୁରାଜ (ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର)ଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ କରି—ଅମର୍ଷପରାୟଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ।
Verse 10
विविशुस्तां सभां राजन् सुरा: शक्रसदो यथा । राजन! दुःशासन, चित्रसेन, सुबलपुत्र शकुनि, दुर्मुख, दुःसह, कर्ण, उलूक और विविंशति--इन सबने अमर्षमें भरे हुए कुरुराज दुर्योधनको आगे करके उस राजसभामें ठीक वैसे ही प्रवेश किया, जैसे देवतालोग इन्द्रकी सभामें प्रवेश करते हैं ।। ८-९ ह ।। आविशद्धिस्तदा राजज्शूरै: परिघबाहुभि:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ୍! ସେମାନେ ସେଇ ରାଜସଭାରେ ଏମିତି ପ୍ରବେଶ କଲେ, ଯେପରି ଦେବଗଣ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି। ଦୁଃଶାସନ, ଚିତ୍ରସେନ, ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି, ଦୁର୍ମୁଖ, ଦୁଃସହ, କର୍ଣ୍ଣ, ଉଲୂକ ଓ ବିବିଂଶତି—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଅମର୍ଷରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ କରି—ସେଇ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 11
ते प्रविश्य महेष्वासा: सभा सर्वे महौजस:
ତାପରେ ସେଇ ସମସ୍ତ ମହାଧନୁର୍ଧର, ମହାଓଜସ୍ବୀ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ସଭାମଣ୍ଡପରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 12
आसनस्थेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत
ହେ ଭାରତ! ସେ ସମସ୍ତ ରାଜା ନିଜ ନିଜ ଆସନରେ ଉପବିଷ୍ଟ ହେଲେ।
Verse 13
द्वाःस्थो निवेदयामास सूतपुत्रमुपस्थितम् | अयं स रथ आयाति यो<यासीत् पाण्डवान् प्रति
ଦ୍ୱାରସ୍ଥ ନିବେଦନ କଲା—ସୂତପୁତ୍ର ଉପସ୍ଥିତ। “ଏହି ସେଇ ରଥ ଆସୁଛି, ଯେ ପୂର୍ବେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଗଲାଥିଲା।”
Verse 14
दूतो नस्तूर्णमायातः सैन्धवै: साधुवाहिभि: । भारत! जब वे सब राजा आकर यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये, तब द्वारपालने सूचना दी कि संजय राजसभाके द्वारपर उपस्थित हैं। यह वही रथ आ रहा है, जो पाण्डवोंके पास भेजा गया था। रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले सिन्धुदेशीय घोड़ोंसे जुते हुए इस रथपर हमारे दूत संजय शीघ्र आ पहुँचे हैं ।। १२-१३ ह ।। उपेयाय स तु क्षिप्रं रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली । प्रविवेश सभां पूर्णा महीपालैर्महात्मभि:,द्वारपालके इतना कहते ही कानोंमें कुण्डल धारण किये संजय रथसे नीचे उतरकर राजसभाके निकट आया और महामना महीपालोंसे भरी हुई उस सभाके भीतर प्रविष्ट हुआ
ଆମ ଦୂତ ସାଧୁବାହୀ ସୈନ୍ଧବ ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ରଥରେ ଶୀଘ୍ର ଆସି ପହଞ୍ଚିଲା। କୁଣ୍ଡଳଧାରୀ ସଞ୍ଜୟ ତୁରନ୍ତ ରଥରୁ ଅବତରି, ମହାତ୍ମ ରାଜମାନଙ୍କରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କଲା।
Verse 15
संजय उवाच प्राप्तोडस्मि पाण्डवान् गत्वा तं विजानीत कौरवा: । यथावय: कुरून् सर्वान् प्रतिनन्दन्ति पाण्डवा:,संजयने कहा--कौरवो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं पाण्डवोंके यहाँ जाकर लौटा हूँ। पाण्डवलोग अवस्थाक्रमके अनुसार सभी कौरवोंका अभिनन्दन करते हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲା—ହେ କୌରବମାନେ! ଜାଣ, ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଫେରିଆସିଛି। ପାଣ୍ଡବମାନେ ବୟସକ୍ରମ ଅନୁସାରେ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଅଭିନନ୍ଦନ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 16
अभिवादयन्ति वृद्धांश्व॒ वयस्यांश्व वयस्यवत् । यूनश्वाभ्यवदन् पार्था: प्रतिपूज्य यथावय:,उन्होंने बड़े-बूढ़ोंको प्रणाम कहलाया है। जो समवयस्क हैं, उनके साथ मित्रोचित बर्तावका संदेश दिया है तथा नवयुवकोंको भी उनकी अवस्थाके अनुसार सम्मान देकर उनसे प्रेमालापकी इच्छा प्रकट की है
ସେମାନେ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ ଜଣାନ୍ତି; ସମବୟସ୍କମାନଙ୍କୁ ମିତ୍ରଭାବରେ ଅଭିବାଦନ କରନ୍ତି; ଏବଂ କନିଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବୟସ ଅନୁସାରେ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ମଧୁର ବଚନ କହନ୍ତି।
Verse 17
यथाहं धृतराष्ट्रेण शिष्ट: पूर्वमितो गतः । अब्र॒ुवं पाण्डवान् गत्वा तन्निबोधत पार्थिवा:,(अब्रूतां तत्र धर्मेण वासुदेवधनंजयौ ।) पहले यहाँसे जाते समय महाराज धूृतराष्ट्रने मुझे जैसा उपदेश दिया था, पाण्डवोंके पास जाकर मैंने वैसी ही बातें कही हैं। राजाओ! अब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो धर्मके अनुकूल उत्तर दिया है, उसे आपलोग ध्यान देकर सुनें
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ପୂର୍ବେ ମୁଁ ଏଠାରୁ ଯିବାବେଳେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଯେପରି ମୋତେ ଉପଦେଶ ଦେଇଥିଲେ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ମୁଁ ସେହିପରି କଥା କହିଲି। ହେ ରାଜମାନେ, ଏବେ ସେଠାରେ ଧର୍ମାନୁକୂଳ ଭାବେ ବାସୁଦେବ (କୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଯେ ଉତ୍ତର ଦେଇଛନ୍ତି, ତାହା ମନୋଯୋଗ ଦେଇ ଶୁଣନ୍ତୁ।
Verse 47
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयप्रत्यागमने सप्तचत्वारिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଯାନସନ୍ଧିପର୍ବରେ ସଞ୍ଜୟଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟାଗମନବିଷୟକ ସପ୍ତଚତ୍ୱାରିଂଶ (୪୭) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 106
शुशुभे सा सभा राजन् सिंहैरिव गिरेगुहा । जनमेजय! उस समय परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाले उन शूरवीर नरेशोंके प्रवेश करनेसे वह सभा उसी प्रकार शोभा पाने लगी, जैसे सिंहोंके प्रवेश करनेसे पर्वतकी कन्दरा सुशोभित होती है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ସେ ସଭା ସିଂହମାନଙ୍କ ପ୍ରବେଶରେ ପର୍ବତଗୁହା ଯେପରି ଶୋଭିତ ହୁଏ, ସେପରି ଶୋଭା ପାଇଲା। ହେ ଜନମେଜୟ, ପରିଘ ସମାନ ସୁଦୃଢ଼ ଭୁଜାବଳୀ ଥିବା ସେହି ଶୂର ନରେଶମାନେ ପ୍ରବେଶ କରିବାମାତ୍ରେ ସଭାର ମହିମା ଅଧିକ ବଢ଼ିଗଲା।
Verse 116
आसनानि विचित्राणि भेजिरे सूर्यवर्चस: । महान् धनुष धारण करनेवाले तथा सूर्यके समान कान्तिमान् उन समस्त महातेजस्वी नरेशोंने सभामें प्रवेश करके वहाँ बिछे हुए विचित्र आसनोंको सुशोभित किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସୂର୍ଯ୍ୟସମ କାନ୍ତିମାନ ସେହି ମହାତେଜସ୍ବୀ ନରେଶମାନେ ସଭାରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେଠାରେ ପିଛାଇଥିବା ବିଚିତ୍ର ଆସନଗୁଡ଼ିକୁ ଗ୍ରହଣ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ଶୋଭାୟମାନ କଲେ।
The court must interpret diplomatic signals under institutional pressure: whether to treat respectful protocol and formal reporting as grounds for reconciliation or as mere procedure preceding escalation—testing judgment, restraint, and responsibility in governance.
Legitimacy in interstate conduct is demonstrated through disciplined etiquette and accurate transmission of messages; respectful reception of envoys and elders functions as a political ethic that stabilizes negotiation even amid rivalry.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s significance is contextual, establishing procedural credibility and the formal conditions for subsequent counsel and decision-making.