Adhyaya 44
Udyoga ParvaAdhyaya 4423 Verses

Adhyaya 44

Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Brahmacarya and the Formless Brahman (Udyoga Parva 44)

Upa-parva: Sanatsujātīya (Sanatsujāta-Upākhyāna)

Chapter 44 presents a tightly argued dialogue in which Dhṛtarāṣṭra requests Sanatsujāta to articulate a “Brahmī” teaching that is rare amid worldly desires. Sanatsujāta cautions that Brahman is not attained through haste, and introduces an ancient, subtle (avyakta) knowledge perfected through intellect and brahmacarya. The discourse then operationalizes brahmacarya via normative duties toward the teacher: humility and vigilance in study; performing what is pleasing to the ācārya through deed, mind, and speech; equal propriety toward the guru’s spouse; and avoidance of self-advertising claims of service. The chapter elevates the ācārya as a true progenitor through instruction, contrasting bodily birth with the “immortal” birth conferred by teaching. It further states that conquering desire and enduring in the brāhmī condition enables liberation from embodiment. In response to Dhṛtarāṣṭra’s query about the ‘appearance’ of the imperishable, Sanatsujāta describes Brahman apophatically: not located in earth, sky, sea, stars, lightning, clouds, wind, deities, moon, sun, or Vedic meters; beyond darkness, subtler than a razor’s edge yet greater than mountains; the foundation from which beings arise and into which they dissolve. Knowing that reality yields ‘amṛtatva’ (deathlessness) in the chapter’s soteriological register.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र के भीतर उठती आशंका और आत्म-भ्रम की भूमि पर सनत्सुजात वाणी का प्रवेश होता है—राजा के सामने प्रश्न है: मनुष्य को पतन में कौन-से दोष घसीट ले जाते हैं और उनसे पार कैसे हुआ जाए? → सनत्सुजात क्रमशः उन आन्तरिक शत्रुओं का निरूपण करते हैं जो एक-एक करके मनुष्य को घेर लेते हैं—शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, ईर्ष्या आदि; फिर वे पापशील स्वभावों की पहचान कराते हैं और मद/अहंकार के वशीभूत होने के खतरे को तीखा करते हैं। → उपदेश का शिखर तब आता है जब सनत्सुजात दोष-लक्षणों से आगे बढ़कर ब्रह्मविद्या की दिशा दिखाते हैं—साधन-सम्पन्न होकर भी यदि सत्त्व से च्युत हो जाएँ तो तप भी केवल संकल्प-मात्र रह जाता है; और जो साधन-क्रम से स्थित होता है वह यहीं ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि दोषों की पहचान, मद-त्याग, सौहृद/सद्गुणों का अभ्यास और विवेकयुक्त साधना—इनसे मनुष्य पाप-प्रवृत्तियों से हटकर ब्रह्ममार्ग में स्थिर हो सकता है।

Shlokas

Verse 1

अर पडठ्चचत्वारिशो< ध्याय: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन सनत्युजात उवाच शोक: क्रोधश्व॒ लोभश्व॒ कामो मान: परासुता | ईर्ष्या मोहो विधित्सा च कृपासूया जुगुप्सुता

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଶୋକ, କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ, କାମ, ମାନ ଏବଂ ପରାସୁତା (ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବାର ତୀବ୍ର ଆକାଂକ୍ଷା); ଈର୍ଷ୍ୟା, ମୋହ, ବିଧିତ୍ସା (ହାନି କରିବାର ଇଚ୍ଛା), କୃପା, ଅସୂୟା ଏବଂ ଜୁଗୁପ୍ସା—ଏହିମାନେ ଦୋଷର ଲକ୍ଷଣ।

Verse 2

एकैकमेते राजेन्द्र मनुष्यान्‌ पर्युपासते । यैराविष्टो नर: पाप॑ मूढसंज्ञो व्यवस्यति,राजेन्द्र! क्रमशः एकके पीछे दूसरा आकर ये सभी दोष मनुष्योंको प्राप्त होते जाते हैं, जिनके वशमें होकर मूढ़बुद्धि मानव पापकर्म करने लगता है

ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଏହି ଦୋଷଗୁଡ଼ିକ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କୁ ଏକେକରେ କ୍ରମେ ଆଶ୍ରୟ କରେ। ଯେତେବେଳେ ଏମାନେ ମନୁଷ୍ୟକୁ ଆବିଷ୍ଟ କରନ୍ତି, ତାହାର ବୁଦ୍ଧି ମୋହିତ ହୁଏ ଏବଂ ସେ ପାପକର୍ମ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରେ।

Verse 3

स्पृहयालुरुग्र: परुषो वा वदान्य: क्रोधं बिभ्रन्मनसा वै विकत्थी । नृशंसधर्मा: षडिमे जना वै प्राप्पाप्पयर्थ नोत सभाजयन्ते,लोलुप, क्रूर, कठोरभाषी, कृपण, मन-ही-मन क्रोध करनेवाले और अधिक आत्मप्रशंसा करनेवाले--ये छ: प्रकारके मनुष्य निश्चय ही क्रूर कर्म करनेवाले होते हैं। ये प्राप्त हुई सम्पत्तिका उचित उपयोग नहीं करते

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଲୋଭୀ ଓ ଉଗ୍ର, କଠୋର ଭାଷୀ, କିମ୍ବା ବାହ୍ୟତଃ ଦାନଶୀଳ; ମନରେ କ୍ରୋଧ ପୋଷଣକାରୀ, ଏବଂ ଆତ୍ମପ୍ରଶଂସାକାରୀ—ଏହି ଛଅ ପ୍ରକାର ଲୋକ ନିଶ୍ଚୟ ନୃଶଂସ ସ୍ୱଭାବର। ଧନ କିମ୍ବା ଲାଭ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ଯଥାଯଥ ଉପଯୋଗ କରି ସମ୍ମାନ ଦେଉନାହାନ୍ତି।

Verse 4

सम्भोगसंविद्‌ विषमो5तिमानी दत्त्वा विकत्थी कृपणो दुर्बलश्न । बहुप्रशंसी वन्दितद्विट्‌ सदैव सप्तैवोक्ता: पापशीला नृशंसा:,सम्भोगमें मन लगानेवाले, विषमता रखनेवाले, अत्यन्त अभिमानी, दान देकर आत्मश्लाघा करनेवाले, कृपण, असमर्थ होकर भी अपनी बहुत बड़ाई करनेवाले और सम्मान्य पुरुषोंसे सदा द्वेष रखनेवाले--ये सात प्रकारके मनुष्य ही पापी और क्रूर कहे गये हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଭୋଗରେ ଆସକ୍ତ, ଆଚରଣରେ ବକ୍ର ଓ ବିଷମ, ଅତ୍ୟଧିକ ଅଭିମାନୀ, ଦାନ ଦେଇ ମଧ୍ୟ ଆତ୍ମଶ୍ଲାଘା କରୁଥିବା, କୃପଣ, ଦୁର୍ବଳ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ବଡ଼ାଇ କରୁଥିବା, ଏବଂ ମାନ୍ୟ-ପୂଜ୍ୟ ଲୋକଙ୍କ ପ୍ରତି ସଦା ଦ୍ୱେଷ ଧରୁଥିବା—ଏହି ସାତ ପ୍ରକାର ଲୋକ ପାପଶୀଳ ଓ ନୃଶଂସ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।

Verse 5

धर्मश्न॒ सत्यं च तपो दमश्न अमात्सरयय द्वीस्तितिक्षानसूया । दान॑ श्रुतं चैव धृति: क्षमा च महाव्रता द्वादश ब्राह्मणस्य,धर्म, सत्य, तप, इन्द्रियसंयम, डाह न करना, लज्जा, सहनशीलता, किसीके दोष न देखना, दान, शास्त्रज्ञान, धैर्य और क्षमा--ये ब्राह्मणके बारह महान्‌ व्रत हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଧର୍ମ, ସତ୍ୟ, ତପ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମ; ଅମାତ୍ସର୍ଯ୍ୟ (ଇର୍ଷ୍ୟାର ଅଭାବ), ଲଜ୍ଜା, ତିତିକ୍ଷା (ସହନଶୀଳତା), ଅନସୂୟା (ଦୋଷଦର୍ଶନ ନ କରିବା); ଦାନ, ଶ୍ରୁତ/ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ, ଧୃତି (ଧୈର୍ଯ୍ୟ) ଓ କ୍ଷମା—ଏହି ଦ୍ୱାଦଶ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ମହାବ୍ରତ।

Verse 6

यो नैतेभ्य: प्रच्यवेद्‌ द्वादशभ्य: सर्वामपीमां पृथिवीं स शिष्यात्‌ । त्रिभिद्धभ्यामेकतो वान्वितो यो नास्य स्वमस्तीति च वेदितव्यम्‌,जो इन बारह व्रतोंसे कभी च्युत नहीं होता, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर शासन कर सकता है। इनमेंसे तीन, दो या एक गुणसे भी जो युक्त है, उसका अपना कुछ भी नहीं होता--ऐसा समझना चाहिये (अर्थात्‌ उसकी किसी भी वस्तुमें ममता नहीं होती)

ଯେ ଏହି ଦ୍ୱାଦଶ ଶିକ୍ଷା/ବ୍ରତରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ହୁଏନାହିଁ, ସେ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ମଧ୍ୟ ଶାସନ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ। କିନ୍ତୁ ଯେ ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ତିନି, ଦୁଇ କିମ୍ବା ଗୋଟିଏ ଗୁଣରେ ମଧ୍ୟ ଯୁକ୍ତ—ତାହା ବିଷୟରେ ଜାଣିବା ଉଚିତ ଯେ ତାହାର କିଛି ମଧ୍ୟ ‘ନିଜର’ ନୁହେଁ; ଅର୍ଥାତ୍ ସେ ମମତା ଓ ସ୍ୱାମିତ୍ୱବୋଧରୁ ମୁକ୍ତ।

Verse 7

दमस्त्यागो<थाप्रमाद इत्येतेष्वमृतं स्थितम्‌ । एतानि ब्रद्ममुख्यानां ब्राह्मणानां मनीषिणाम्‌,इन्द्रियनिग्रह, त्याग और अप्रमाद--इनमें अमृतकी स्थिति है। ब्रह्म ही जिनका प्रधान लक्ष्य है, उन बुद्धिमान ब्राह्मणोंके ये ही मुख्य साधन हैं

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ, ତ୍ୟାଗ ଓ ଅପ୍ରମାଦ—ଏହି ତିନିରେ ଅମୃତ ସ୍ଥିତ। ଯାହାଙ୍କର ପରମ ଲକ୍ଷ୍ୟ ବ୍ରହ୍ମ, ସେହି ବୁଦ୍ଧିମାନ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହିଗୁଡ଼ିକ ମୁଖ୍ୟ ସାଧନ।

Verse 8

सद्‌ वासद्‌ वा परीवादो ब्राह्मणस्य न शस्यते । नरकप्रतिष्ठास्ते वै स्युर्य एवं कुर्वते जना:,सच्ची हो या झूठी, दूसरोंकी निन्‍्दा करना ब्राह्मणको शोभा नहीं देता। जो लोग दूसरोंकी निन्‍्दा करते हैं, वे अवश्य ही नरकमें पड़ते हैं

ସତ୍ୟ ହେଉ କି ଅସତ୍ୟ—ଅନ୍ୟଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରିବା ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଶୋଭା ଦେଉନାହିଁ। ଯେମାନେ ଦୋଷଖୋଜା ଓ ପରନିନ୍ଦାରେ ଲିପ୍ତ, ସେମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ନରକପଥରେ ନିଜକୁ ସ୍ଥାପିତ କରନ୍ତି।

Verse 9

मदो5ष्टादशदोष: स स्यात्‌ पुरा यो<प्रकीर्तित: । लोवदेष्यं प्रातिकूल्यमभ्यसूया मृषा वच:,मदके अठारह दोष हैं, जो पहले सूचित करके भी स्पष्टरूपसे नहीं बताये गये थे-- लोकविरोधी कार्य करना, शास्त्रके प्रतिकूल आचरण करना, गुणियोंपर दोषारोपण, असत्यभाषण

ମଦ (ଅହଂକାରର ମତ୍ତତା) ଅଷ୍ଟାଦଶ ଦୋଷରୂପେ ପ୍ରକଟ ହୁଏ—ପୂର୍ବେ ସୂଚିତ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଗଣାଯାଇନଥିଲା; ଯଥା—ଲୋକବିରୋଧୀ କର୍ମ, ଶାସ୍ତ୍ରବିରୁଦ୍ଧ ଆଚରଣ, ଗୁଣୀଙ୍କ ଉପରେ ଦୋଷାରୋପଣ, ଓ ମିଥ୍ୟାବଚନ।

Verse 10

कामक्रोधौ पारतन्त्रयं परिवादो5थ पैशुनम्‌ | अर्थहानिर्विवादश्न मात्सर्य प्राणिपीडनम्‌,काम, क्रोध, पराधीनता, दूसरोंके दोष बताना, चुगली करना, धनका (दुरुपयोगसे) नाश, कलह, डाह, प्राणियोंको कष्ट पहुँचाना

କାମ ଓ କ୍ରୋଧ, ପରାଧୀନତା, ପରଦୋଷକଥନ ଓ ପୈଶୁନ୍ୟ (ଚୁଗଲି), ଧନହାନି, କଳହ, ମାତ୍ସର୍ୟ ଓ ପ୍ରାଣୀପୀଡନ—ଏହି ସବୁ ନାଶକାରୀ ଦୁର୍ଗୁଣ ମନୁଷ୍ୟକୁ ଆତ୍ମସଂଯମ ଓ ଧର୍ମରୁ ଦୂରେ ଟାଣିନେଇଯାଏ।

Verse 11

ईर्ष्या, हर्ष, बहुत बकवाद, विवेकशून्यता तथा गुणोंमें दोष देखनेका स्वभाव। इसलिये विद्वान्‌ पुरुषको मदके वशीभूत नहीं होना चाहिये; क्योंकि सत्पुरुषोंने इस मदको सदा ही निन्दित बताया है

ମଦରୁ ଈର୍ଷ୍ୟା, ଅତିହର୍ଷ, ଅତ୍ୟଧିକ ଅର୍ଥହୀନ କଥା, ବିବେକନାଶ ଓ ଗୁଣରେ ମଧ୍ୟ ଦୋଷ ଦେଖିବାର ସ୍ୱଭାବ ଜନ୍ମେ। ତେଣୁ ବିଦ୍ୱାନ ପୁରୁଷ ମଦର ବଶରେ ପଡ଼ିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; କାରଣ ସତ୍ପୁରୁଷମାନେ ଏହି ମଦକୁ ସଦା ନିନ୍ଦିତ ବୋଲି କହିଛନ୍ତି।

Verse 12

सौहदे वै षड्‌ गुणा वेदितव्या: प्रिये हृष्यन्त्यप्रिये च व्यथन्ते । स्यादात्मन: सुचिरं याचते यो ददात्ययाच्यमपि देयं खलु स्यात्‌ । इष्टान्‌ पुत्रान्‌ विभवान्‌ स्वांश्षदारा- नभ्यर्थितश्चा्हति शुद्धभाव:,सौहार्द (मित्रता)-के छः: गुण हैं, जो अवश्य ही जाननेयोग्य हैं। सुह्ृदका प्रिय होनेपर हर्षित होना और अप्रिय होनेपर कष्टका अनुभव करना--ये दो गुण हैं। तीसरा गुण यह है कि अपना जो कुछ चिरसंचित धन है, उसे मित्रके माँगनेपर दे डाले। मित्रके लिये अयाच्य वस्तु भी अवश्य देनेयोग्य हो जाती है और तो क्या, सुहृदके माँगनेपर वह शुद्धभावसे अपने प्रिय पुत्र, वैभव तथा पत्नीको भी उसके हितके लिये निछावर कर देता है

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ସୌହାର୍ଦ୍ୟ (ମିତ୍ରତା)ର ଛଅଟି ଗୁଣ ଜାଣିବା ଯୋଗ୍ୟ। ମିତ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ଘଟିଲେ ହର୍ଷିତ ହେବା ଏବଂ ଅପ୍ରିୟ ଆସିଲେ ବ୍ୟଥିତ ହେବା—ଏ ଦୁଇ। ତୃତୀୟ—ମିତ୍ର ମାଗିଲେ ଦୀର୍ଘକାଳ ସଞ୍ଚିତ ଧନ ମଧ୍ୟ ଦେଇଦେବା; ମିତ୍ର ପାଇଁ ଯାହା ମାଗିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ସେହିଟି ମଧ୍ୟ ଦେବା ଉଚିତ୍ ହୋଇଯାଏ। ଏବଂ ଶୁଦ୍ଧଭାବୀ ପୁରୁଷ ଅନୁରୋଧ ପାଇଲେ ମିତ୍ରହିତାର୍ଥେ ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ର, ବୈଭବ ଓ ନିଜ ସ୍ତ୍ରୀକୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରେ।

Verse 13

ईर्ष्या मोदो&तिवादश्न संज्ञानाशो5 भ्यसूयिता । तस्मात्‌ प्राज्ञो न माद्येत सदा होतदू्‌ विगर्हितम्‌,त्यक्तद्रव्य: संवसेन्नेह कामाद्‌ भुड्क्ते कर्म स्वाशिषं बाधते च मित्रको धन देकर उसके यहाँ प्रत्युयकार पानेकी कामनासे निवास न करे--यह चौथा गुण है। अपने परिश्रमसे उपार्जित धनका उपभोग करे (मित्रकी कमाईपर अव-लम्बित न रहे)--यह पाँचवाँ गुण है तथा मित्रकी भलाईके लिये अपने भलेकी परवा न करे--यह छठा गुण है

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଇର୍ଷ୍ୟା, ମଦଜନିତ ଉନ୍ମତ୍ତ ଆନନ୍ଦ, ଅତିରିକ୍ତ ବାଦବିବାଦ, ସ୍ପଷ୍ଟବୋଧର ନାଶ ଓ ଦୋଷ ଖୋଜୁଥିବା ଅସୂୟା—ଏ ସବୁ ମଦ୍ୟପାନରୁ ଜନ୍ମେ। ତେଣୁ ପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁରୁଷ କେବେ ମତ୍ତ ହେବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ନୀତିଜୀବନରେ ଏହା ସଦା ନିନ୍ଦିତ।

Verse 14

द्रव्यवान्‌ गुणवानेवं त्यागी भवति सात््विक: । पज्च भूतानि पञ्चभ्यो निवर्तयति तादृश:,जो धनी गृहस्थ इस प्रकार गुणवान्‌, त्यागी और सात््विक होता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियोंसे पाँचों विषयोंको हटा देता है

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଧନବାନ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଯେ ଗୃହସ୍ଥ ଗୁଣବାନ, ତ୍ୟାଗୀ ଓ ସାତ୍ତ୍ୱିକ ହୁଏ, ସେ ନିଜ ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟକୁ ସେମାନଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ବିଷୟରୁ ଫେରାଇ ନେଇଥାଏ।

Verse 15

एतत्‌ समृद्धमप्यूर्थ्य तपो भवति केवलम्‌ | सत्त्वात्‌ प्रच्यवमानानां संकल्पेन समाहितम्‌,जो (वैराग्यकी कमीके कारण) सत्त्वसे भ्रष्ट हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंके दिव्य लोकोंकी प्राप्तिके संकल्पसे संचित किया हुआ यह इन्द्रियनिग्रहरूप तप समृद्ध होनेपर भी केवल ऊर्ध्वलोकोंकी प्राप्तिका कारण होता है [मुक्तिका नहीं]

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହରୂପ ଏହି ତପ ଯଦି ସମୃଦ୍ଧ ଓ ପରିପକ୍ୱ ହୋଇଥାଏ ମଧ୍ୟ, ସତ୍ତ୍ୱରୁ ଚ୍ୟୁତ ଲୋକମାନେ କେବଳ ସଙ୍କଳ୍ପବଳରେ ଏହାକୁ ଧାରଣ କରିଥିଲେ, ତେବେ ଏହା ମାତ୍ର ଊର୍ଧ୍ୱଲୋକ-ପ୍ରାପ୍ତିର ସାଧନ ହୁଏ; ମୋକ୍ଷର ନୁହେଁ।

Verse 16

द्वादशैते महादोषा मनुष्यप्राणनाशना: । सनत्सुजातजी कहते हैं--राजन्‌! शोक, क्रोध, लोभ, काम, मान, अत्यन्त निद्रा, ईर्ष्या, मोह, तृष्णा, कायरता, गुणोंमें दोष देखना और निन्‍दा करना--ये बारह महान्‌ दोष मनुष्योंके प्राणनाशक हैं,यतो यज्ञा: प्रवर्धन्ते सत्यस्यैवावरो धनात्‌ । मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा क्योंकि सत्यस्वरूप ब्रह्मका बोध न होनेसे ही इन सकाम यज्ञोंकी वृद्धि होती है। किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे और किसीका क्रियाके द्वारा सम्पन्न होता है

ସନତ୍ସୁଜାତ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ମନୁଷ୍ୟଜୀବନକୁ ନାଶ କରୁଥିବା ବାରଟି ମହାଦୋଷ ଅଛି: ଶୋକ, କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ, କାମ, ମାନ, ଅତିନିଦ୍ରା, ଇର୍ଷ୍ୟା, ମୋହ, ତୃଷ୍ଣା, କାୟରତା, ଗୁଣରେ ଦୋଷ ଦେଖିବା ଅଭ୍ୟାସ ଓ ନିନ୍ଦା। ସତ୍ୟସ୍ୱରୂପ ବ୍ରହ୍ମର ବୋଧ ନ ହେବାରୁ ହିଁ କାମ୍ୟ ଯଜ୍ଞମାନେ ବଢ଼ିଯାନ୍ତି; କାହାର ଯଜ୍ଞ ମନରେ, କାହାର ଯଜ୍ଞ ବାଣୀରେ, ଆଉ କାହାର ଯଜ୍ଞ କର୍ମ (ଦେହକ୍ରିୟା) ଦ୍ୱାରା ସମ୍ପନ୍ନ ହୁଏ।

Verse 17

संकल्पसिद्धं पुरुषमसंकल्पो5धितिष्ठति । ब्राह्मणस्य विशेषण किज्चान्यदपि मे शृणु,संकल्पसिद्ध अर्थात्‌ सकामपुरुषसे संकल्परहित यानी निष्कामपुरुषकी स्थिति ऊँची होती है; किंतु ब्रह्मवेत्ताकी स्थिति उससे भी विशिष्ट है। इसके सिवा एक बात और बताता हूँ, सुनो

ସଙ୍କଳ୍ପସିଦ୍ଧ (ସକାମ) ପୁରୁଷଠାରୁ ସଙ୍କଳ୍ପରହିତ (ନିଷ୍କାମ) ପୁରୁଷର ଅବସ୍ଥା ଉଚ୍ଚ; କିନ୍ତୁ ବ୍ରହ୍ମବେତ୍ତା ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଅବସ୍ଥା ତାହାଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଅଧିକ ବିଶେଷ। ଏହାଛଡ଼ା ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ଶୁଣ।

Verse 18

अध्यापयेन्महदेतद्‌ यशस्यं वाचो विकारा: कवयो वदन्ति । अस्मिन्‌ योगे सर्वमिदं प्रतिछितं ये तद्‌ विदुरमृतास्ते भवन्ति,यह महत्त्वपूर्ण शास्त्र परम यशरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है, इसे शिष्योंको अवश्य पढ़ाना चाहिये। परमात्मासे भिन्न यह सारा दृश्य-प्रपंच वाणीका विकारमात्र है-- ऐसा विद्वान्‌ लोग कहते हैं। इस योगशास्त्रमें यह परमात्मविषयक सम्पूर्ण ज्ञान प्रतिष्ठित है; इसे जो जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात्‌ जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं

ଏହି ମହାନ୍ ଓ ଯଶସ୍ବୀ ଉପଦେଶ—ଯାହା ପରମାତ୍ମା-ପ୍ରାପ୍ତି କରାଏ—ଯୋଗ୍ୟ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ପଢ଼ାଇବା ଉଚିତ। ପଣ୍ଡିତମାନେ କହନ୍ତି: ପରମାତ୍ମାଠାରୁ ଭିନ୍ନ ବୋଲି ଧରାଯାଇଥିବା ଏହି ଦୃଶ୍ୟ-ପ୍ରପଞ୍ଚ ହେଉଛି ବାଣୀର ମାତ୍ର ବିକାର—ଶବ୍ଦ-ନିର୍ମାଣ ମାତ୍ର। ଏହି ଯୋଗଶାସ୍ତ୍ରରେ ପରମାତ୍ମବିଷୟକ ସମଗ୍ର ଜ୍ଞାନ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ; ଯେମାନେ ଏହାକୁ ସତ୍ୟରୂପେ ଜାଣନ୍ତି, ସେମାନେ ଅମୃତ ହୁଅନ୍ତି—ଅର୍ଥାତ୍ ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁ ଚକ୍ରରୁ ମୁକ୍ତ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 19

न कर्मणा सुकृतेनैव राजन्‌ सत्यं जयेज्जुहुयाद्‌ वा यजेद्‌ वा । नैतेन बालोअमृत्युम भ्येति राजन्‌ रतिं चासौ न लभत्यन्तकाले,राजन! (निष्कामभावके बिना किये हुए) केवल पुण्यकर्मके द्वारा सत्यस्वरूप ब्रह्मको नहीं जीता जा सकता। अथवा जो हवन या यज्ञ किया जाता है, उससे भी अज्ञानी पुरुष अमरत्व--मुक्तिको नहीं पा सकता तथा अन्तकालनमें उसे शान्ति भी नहीं मिलती

ରାଜନ୍! କେବଳ ସୁକୃତ କର୍ମ ଦ୍ୱାରା ସତ୍ୟସ୍ୱରୂପ ବ୍ରହ୍ମକୁ ଜିତିହେବ ନାହିଁ। କେହି ହୋମ କରୁ କି ଯଜ୍ଞ କରୁ—ସେମାତ୍ରରେ ଅଜ୍ଞ ବ୍ୟକ୍ତି ଅମୃତତ୍ୱ ପାଉନାହିଁ; ଏବଂ ଅନ୍ତକାଳରେ ତାହାର ଶାନ୍ତି ମଧ୍ୟ ମିଳେ ନାହିଁ।

Verse 20

तूष्णीमेक उपासीत चेष्टेत मनसापि न | तथा संस्तुतिनिन्दाभ्यां प्रीतिरोषौ विवर्जयेत्‌,इसलिये सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर एकान्तमें उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न होने दे तथा स्तुतिमें राग और निन्दामें द्वेष न करे

ଏହିପରି ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଚେଷ୍ଟାରୁ ନିବୃତ୍ତ ହୋଇ ଏକାନ୍ତରେ ମୌନ ଉପାସନା କର; ମନରେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଅଶାନ୍ତି ହେବାକୁ ଦିଅନି। ଏବଂ ସ୍ତୁତିରୁ ଜନ୍ମୁଥିବା ଆସକ୍ତି ଓ ନିନ୍ଦାରୁ ଜନ୍ମୁଥିବା କ୍ରୋଧ—ଦୁହେଁକୁ ତ୍ୟାଗ କର।

Verse 21

अन्रैव तिष्ठन्‌ क्षत्रिय ब्रह्माविशति पश्यति । वेदेषु चानुपूर्व्येण एतद्‌ विद्वन्‌ ब्रवीमि ते,राजन! उपर्युक्त साधन करनेसे मनुष्य यहाँ ही ब्रह्मका साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाता है। विद्वन! वेदोंमें क्रमश: विचार करके जो मैंने जाना है, वही तुम्हें बता रहा हूँ

ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟ! ଏହିପରି ଅବସ୍ଥାରେ ରହିଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଏଠାରେଇ ବ୍ରହ୍ମରେ ପ୍ରବେଶ କରେ ଏବଂ ତାହାକୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖେ। ହେ ରାଜନ୍! ବେଦଗୁଡ଼ିକୁ କ୍ରମେ ବିଚାର କରି ଯାହା ମୁଁ ଜାଣିଛି, ସେହି କଥାକୁ ମୁଁ—ଜ୍ଞାନୀ ହୋଇ—ତୁମକୁ କହୁଛି।

Verse 44

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें सनत्युजातवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସନତ୍ସୁଜାତପର୍ବରେ ସନତ୍ସୁଜାତବାକ୍ୟବିଷୟକ ଚୁଆଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 45

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये पज्चचत्वारिंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें सनत्युजातवाक्यविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସନତ୍ସୁଜାତପର୍ବରେ ସନତ୍ସୁଜାତବାକ୍ୟବିଷୟକ ପଞ୍ଚଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra’s dilemma is epistemic and ethical: how to access ‘immortality’ and true brāhmaṇya while remaining embedded in worldly urgency and desire-driven concerns.

Realization is portrayed as discipline-dependent: conquering desire, practicing structured brahmacarya, and honoring the teacher’s role enable access to subtle knowledge of Brahman, which is beyond sensory predicates.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds its payoff as a doctrinal claim: those who know that foundational reality (Brahman) become ‘amṛta’ (deathless) in the soteriological sense.