
अध्याय ३९: विदुरेण धृतराष्ट्राय नीत्युपदेशः (Timely Counsel, Association, and Kin-Duty)
Upa-parva: Vidura-nīti (Counsel to Dhṛtarāṣṭra) — Udyoga-parva
The chapter opens with Dhṛtarāṣṭra’s reflection on human helplessness under fate, requesting Vidura’s guidance. Vidura begins by warning that even authoritative speech, if ill-timed, invites contempt, then analyzes how affection is won through gifts, speech, and influence, and how bias distorts moral judgment (good deeds are credited to the liked; faults magnified in the disliked). He argues that certain ‘losses’ are actually growth-enhancing, while some gains are ruinous, and urges discrimination between wealth and virtue. Vidura describes traits of harmful associates—slander, delight in others’ suffering, constant conflict, and fear-inducing cohabitation—and advises avoidance. He then pivots to jñāti-dharma: supporting needy relatives brings increase in prosperity and lasting reputation; therefore the king should extend favor to the Pāṇḍavas, even through material provisions, to preserve lineage stability. The counsel continues with practical ethics: evaluate people by conduct and household management; cultivate enduring friendship through compatibility of mind and wisdom; avoid arrogant, reckless, or lawless companions; seek grateful, truthful, self-controlled allies. The chapter enumerates stabilizing virtues (gentleness, non-envy, forgiveness, endurance), the value of perseverance, and governance-oriented self-mastery. It closes by urging Dhṛtarāṣṭra to practice impartiality between his sons and the sons of Pāṇḍu, presenting equity as the political form of dharma.
Chapter Arc: रात्रि के प्रजागर में विदुर धृतराष्ट्र को धर्म की महत्ता का स्मरण कराते हैं—ऐसा धर्म जो राज्य-नीति से भी ऊँचा है और जिसके बिना वैभव भी विष बन जाता है। → विदुर अधर्म से उपार्जित धन, असत्य, चुगली, गुरु के प्रति कपट, और लोभ-प्रेरित आचरण को ‘ब्रह्महत्या’ तुल्य पाप बताकर चेताते हैं; साथ ही मनु-स्मृति के आधार पर गृहस्थ-धर्म, दान, अतिथि-पूजा और चारों वर्णों के कर्तव्यों का संक्षिप्त विधान रखते हैं, मानो राजसभा के लिए नैतिक दर्पण खड़ा कर देते हों। → अधर्मयुक्त महान् अर्थ को भी त्याग देने वाला मनुष्य सर्प के जीर्ण त्वचा त्यागने की भाँति पाप-भार उतारकर शान्ति पाता है—यह उपदेश अध्याय का शिखर बनकर धृतराष्ट्र के ‘राज्य-लाभ’ को ‘धर्म-लाभ’ के सामने नगण्य ठहराता है। → विदुर आत्मा-नदी का रूपक देकर आन्तरिक तीर्थ-स्नान (सत्य, धृति, दया आदि गुणों में स्थित होकर) को सर्वोच्च शुद्धि बताते हैं; इन्द्रिय-निग्रह और संयम की व्यावहारिक शिक्षा देते हैं तथा देव- ब्राह्मण- अतिथि-पूजा हेतु गृहस्थ के आवश्यक द्रव्यों का निर्देश कर धर्म-मार्ग को ठोस कर्म-रूप देते हैं। → धृतराष्ट्र के मन में यह प्रश्न अनकहा रह जाता है—क्या वह पुत्रमोह छोड़कर इस धर्म-उपदेश को राज्य-निर्णय में उतारेगा, या उसी अधर्म-धन और पक्षपात की राह पर बढ़ेगा? (null)
Verse 1
ऑपन-माज बक। डे - हाथी, घोड़े, रथ आदि। चत्वारिशो< ध्याय: धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोके धर्मका संक्षिप्त वर्णन विदुर उवाच योअ<भ्यर्चित: सद्धिरसज्जमान: करोत्यर्थ शक्तिमहापयित्वा । क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सनन््त- मलं॑ प्रसन्ना हि सुखाय सन्त:,विदुरजी कहते हैं-राजन्! जो सज्जन पुरुषोंसे आदर पाकर आसक्तिरहित हो अपनी शक्तिके अनुसार (न्यायपूर्वक) अर्थ-साधन करता रहता है, उस श्रेष्ठ पुरुषको शीघ्र ही सुयशकी प्राप्ति होती है; क्योंकि संत जिसपर प्रसन्न होते हैं, वह सदा सुखी रहता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଯେ ଲୋକ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଆସକ୍ତିରହିତ ରହେ ଏବଂ ନିଜ ସାମର୍ଥ୍ୟର ସୀମା ରକ୍ଷା କରି ଧର୍ମସମ୍ମତ ନ୍ୟାୟମାର୍ଗରେ ଅର୍ଥସାଧନ କରେ, ସେ ଶୀଘ୍ର ଚିରସ୍ଥାୟୀ ଯଶ ପାଏ। କାରଣ ଯାହାପରେ ସନ୍ତମାନେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତି, ସେ ସଦା ସୁଖୀ ରହେ।
Verse 2
महान्तमप्यर्थमधर्मयुक्तं यः संत्यजत्यनपाकृष्ट एव | सुखं सुदुःखान्यवमुच्य शेते जीर्णा त्वचं सर्प इवावमुच्य,जो अधर्मसे उपार्जित महान् धनराशिको भी उसकी ओर आदकृष्ट हुए बिना ही त्याग देता है, वह जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुलको छोड़ता है, उसी प्रकार दु:खोंसे मुक्त हो सुखपूर्वक शयन करता है
ଯେ ଲୋକ ଅଧର୍ମରେ ଅର୍ଜିତ ବିଶାଳ ଧନକୁ ମଧ୍ୟ କାହାର ଟାଣାଟାଣି ବା ବାଧ୍ୟତା ବିନା ସ୍ୱୟଂ ତ୍ୟାଗ କରେ, ସେ ସର୍ପ ଯେପରି ଜୀର୍ଣ୍ଣ ଚର୍ମ ଛାଡ଼େ ସେପରି ଦୁଃଖ ଛାଡ଼ି ସୁଖରେ ଶୟନ କରେ।
Verse 3
अनृते च समुत्कर्षो राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्वनालीकनिर्बन्ध: समानि ब्रह्महत्यया
ମିଥ୍ୟାରେ ଆଧାର କରି ନିଜ ଉନ୍ନତି କରିବା, ରାଜାଙ୍କ କାନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚୁଗୁଲି ପହଞ୍ଚାଇବା, ଏବଂ ଗୁରୁଙ୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଅସତ୍ୟରେ ହଠ ଧରିବା—ଏସବୁ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟା ସମାନ ପାପ।
Verse 4
झूठ बोलकर उन्नति करना, राजाके पासतक चुगली करना, गुरुजनपर भी झूठा दोषारोपण करनेका आग्रह करना--ये तीन कार्य ब्रह्महत्याके समान हैं ।। असूयैकपदं मृत्युरतिवाद: श्रियो वध: । अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रय:
ଈର୍ଷ୍ୟାରେ ଗୋଟିଏ ପଦକ୍ଷେପ ମଧ୍ୟ ମୃତ୍ୟୁ ସମାନ; ଅତିବାଦ (ଅତିରେକ କଥା) ଶ୍ରୀର ବଧ; ଏବଂ ବଡ଼ମାନଙ୍କ ସେବା-ଶ୍ରବଣର ଅଭାବ, ତ୍ୱରା, ଆତ୍ମଶ୍ଲାଘା—ଏ ତିନିଟି ବିଦ୍ୟାର ଶତ୍ରୁ।
Verse 5
गुणोंमें दोष देखना एकदम मृत्युके समान है, निन्दा करना लक्ष्मीका वध है तथा सेवाका अभाव, उतावलापन और आत्मप्रशंसा--ये तीन विद्याके शत्रु हैं ।। आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोषछ्िरेव च । स्तब्धता चाभिमानित्वं तथात्यागित्वमेव च । एते वै सप्त दोषा: स्यु: सदा विद्यार्थिनां मता:,आलस्य, मद-मोह, चंचलता, गोष्ठी, उद्ण्डता, अभिमान और स्वार्थत्यागकका अभाव-- ये सात विद्यार्थियों-के लिये सदा ही दोष माने गये हैं
ଅନ୍ୟର ଗୁଣରେ ଦୋଷ ଦେଖିବା ମୃତ୍ୟୁ ସମାନ; ନିନ୍ଦା-ଚୁଗୁଲି ଶ୍ରୀର ବଧ; ଏବଂ ବଡ଼ମାନଙ୍କ ସେବା-ଶ୍ରବଣର ଅଭାବ, ତ୍ୱରା, ଆତ୍ମଶ୍ଲାଘା—ଏ ତିନିଟି ବିଦ୍ୟାର ଶତ୍ରୁ। ତଦୁପରି ଆଳସ୍ୟ, ମଦ-ମୋହ, ଚଞ୍ଚଳତା, ବ୍ୟର୍ଥ ଗୋଷ୍ଠୀ/ସଙ୍ଗ, ହଠାତ୍ ସ୍ତବ୍ଧତା, ଅଭିମାନ, ଏବଂ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ-ତ୍ୟାଗର ପ୍ରବୃତ୍ତି—ଏ ସାତଟି ଦୋଷ ଛାତ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସଦା ଦୋଷ ବୋଲି ମନାଯାଇଛି।
Verse 6
सुखार्थिन: कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिन: सुखम् । सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्ू सुखम्
ସୁଖ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ କେମିତି ବିଦ୍ୟା ପାଇବ? ଏବଂ ବିଦ୍ୟା ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ ପାଇଁ ସୁଖ ନାହିଁ। ତେଣୁ ସୁଖାର୍ଥୀ ବିଦ୍ୟା ଛାଡ଼ୁ, କିମ୍ବା ବିଦ୍ୟାର୍ଥୀ ସୁଖ ତ୍ୟାଗ କରୁ।
Verse 7
सुख चाहनेवालेको विद्या कहाँसे मिले? विद्या चाहनेवालेके लिये सुख नहीं है; सुखकी चाह हो तो विद्याको छोड़े और विद्या चाहे तो सुखका त्याग करे ।। नाग्निस्तृप्पति काष्ठानां नापगानां महोदधि: । नानतकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना,ईंधनसे आगकी, नदियोंसे समुद्रकी, समस्त प्राणियोंसे मृत्युकी और पुरुषोंसे कुलटा सत्रीकी कभी तृप्ति नहीं होती
ସୁଖ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ ବିଦ୍ୟା କେମିତି ପାଇବ? ଏବଂ ବିଦ୍ୟା ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକ ପାଇଁ ସୁଖ ନାହିଁ। ସୁଖ ଚାହିଲେ ବିଦ୍ୟା ଛାଡ଼; ବିଦ୍ୟା ଚାହିଲେ ସୁଖ ତ୍ୟାଗ କର। କାଠରେ ଅଗ୍ନି ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ, ନଦୀରେ ମହାସାଗର ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; ସେପରି ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କରେ ମୃତ୍ୟୁ ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ, ଏବଂ ପୁରୁଷମାନଙ୍କରେ ବାମଲୋଚନା (କୁଲଟା) ନାରୀ ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 8
आशा धुृतिं हन्ति समृद्धिमन्तकः क्रोध: श्रियं हन्ति यश: कदर्यता । अपालन हन्ति पशुूंश्व राज- न्नेकः क्रुद्धो ब्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम्ू,आशा धैर्यको, यमराज समृद्धिको, क्रोध लक्ष्मीको, कृपणता यशको और सार- सँभालका अभाव पशुओंको नष्ट कर देता है, परंतु राजन! ब्राह्मण यदि अकेला ही क्रुद्ध हो जाय तो सम्पूर्ण राष्ट्रका नाश कर देता है
ଆଶା ଧୈର୍ଯ୍ୟକୁ ନଷ୍ଟ କରେ, ମୃତ୍ୟୁ ସମୃଦ୍ଧିର ଅନ୍ତ କରେ; କ୍ରୋଧ ଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ନଷ୍ଟ କରେ, କୃପଣତା ଯଶକୁ କ୍ଷୟ କରେ; ଅପାଳନ ପଶୁଧନକୁ ନଷ୍ଟ କରେ; କିନ୍ତୁ ରାଜନ! ଏକମାତ୍ର ବ୍ରାହ୍ମଣ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହେଲେ ସମଗ୍ର ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ନାଶ କରିପାରେ।
Verse 9
अजाश्ष कांस्यं रजतं च नित्यं॑ मध्वाकर्ष: शकुनि: श्रोत्रियश्व । वृद्धो ज्ञातिरवसन्न: कुलीन एतानि ते सन्तु गृहे सदैव,बकरियाँ, काँसेका पात्र, चाँदी, मधु, धनुष, पक्षी, वेदवेत्ता ब्राह्मण, बूढ़ा कुटुम्बी और विपत्तिग्रस्त कुलीन पुरुष--ये सब आपके घरमें सदा मौजूद रहें
ଛେଳି, କାଂସ୍ୟ ପାତ୍ର, ରୂପା, ମଧୁ, ଧନୁ, ପକ୍ଷୀ, ବେଦଜ୍ଞ ଶ୍ରୋତ୍ରିୟ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବୃଦ୍ଧ ଜ୍ଞାତି ଏବଂ ବିପଦଗ୍ରସ୍ତ କୁଳୀନ ପୁରୁଷ—ଏସବୁ ତୁମ ଘରେ ସଦା ରହୁ।
Verse 10
अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी । विषमौदुम्बरं शड्ख: स्वर्णनाभो5थ रोचना,भारत! मनुजीने कहा है कि देवता, ब्राह्मण तथा अतिथियोंकी पूजाके लिये बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबेके बर्तन, शंख, शालग्राम और गोरोचन--ये सब वस्तुएँ घरपर रखनी चाहिये
ଛେଳି, ବଳଦ, ଚନ୍ଦନ, ବୀଣା, ଦର୍ପଣ, ମଧୁ ଓ ଘିଅ, ଉଦୁମ୍ବର କାଠର ପାତ୍ର, ଶଙ୍ଖ, ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣନାଭ (ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ଯୁକ୍ତ ବସ୍ତୁ) ଏବଂ ଗୋରୋଚନା—ଏସବୁ ଘରେ ରଖିବା ଉଚିତ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଦେବତା, ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ଅତିଥିଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ପୂଜା-ସତ୍କାର କରାଯାଇପାରିବ।
Verse 11
भारत! मनुजीने कहा है कि देवता, ब्राह्मण तथा अतिथियोंकी पूजाके लिये बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबेके बर्तन, शंख, शालग्राम और गोरोचन--ये सब वस्तुएँ घरपर रखनी चाहिये
ହେ ଭାରତବଂଶଧର! ମନୁ କହିଛନ୍ତି—ଦେବତା, ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ଅତିଥିଙ୍କ ପୂଜା-ସତ୍କାର ପାଇଁ ଘରେ କିଛି ଆବଶ୍ୟକ ବସ୍ତୁ ରଖିବା ଉଚିତ—ଛେଳି ଓ ବଳଦ, ଚନ୍ଦନ, ବୀଣା, ଦର୍ପଣ, ମଧୁ, ଘିଅ, ଜଳ, ତାମ୍ର ପାତ୍ର, ଶଙ୍ଖ, ଶାଳଗ୍ରାମ ଶିଳା ଓ ଗୋରୋଚନା। ଏହି ସାମଗ୍ରୀରେ ପୂଜା, ଅତିଥିସତ୍କାର ଓ ନିୟମିତ ଗୃହସ୍ଥଧର୍ମ ସୁଦୃଢ଼ ହୁଏ।
Verse 12
इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि पुण्यं पद तात महाविशिष्टम् । न जातु कामाजन्न भयान्न लोभाद् धर्म जह्माज्जीवितस्यापि हेतो:,तात! अब मैं तुम्हें यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्यजनक बात बता रहा हूँ-- कामनासे, भयसे, लोभसे तथा इस जीवनके लिये भी कभी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है, किंतु सुख-दुःख अनित्य हैं। जीव नित्य है, पर इसका कारण अनित्य है। आप अनित्यको छोड़कर नित्यमें स्थित होइये और संतोष धारण कीजिये; क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा लाभ है
ତାତ! ଏବେ ମୁଁ ତୁମକୁ ସର୍ବୋପରି ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୁଣ୍ୟମୟ ଉପଦେଶ କହୁଛି—କାମନାରୁ ନୁହେଁ, ଭୟରୁ ନୁହେଁ, ଲୋଭରୁ ନୁହେଁ; ପ୍ରାଣରକ୍ଷା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କେବେ ଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 13
नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:ः । त्यक्त्वानित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये संतुष्य त्वं तोषपरो हि लाभ:,तात! अब मैं तुम्हें यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्यजनक बात बता रहा हूँ-- कामनासे, भयसे, लोभसे तथा इस जीवनके लिये भी कभी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है, किंतु सुख-दुःख अनित्य हैं। जीव नित्य है, पर इसका कारण अनित्य है। आप अनित्यको छोड़कर नित्यमें स्थित होइये और संतोष धारण कीजिये; क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा लाभ है
ଧର୍ମ ନିତ୍ୟ; ସୁଖ-ଦୁଃଖ ଅନିତ୍ୟ। ଜୀବ ନିତ୍ୟ; କିନ୍ତୁ ତାହାର କାରଣ ଅନିତ୍ୟ। ତେଣୁ ଅନିତ୍ୟକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ନିତ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହେଉ; ସନ୍ତୋଷ ଧାରଣ କର—କାରଣ ସନ୍ତୋଷ ହିଁ ପରମ ଲାଭ।
Verse 14
महाबलान् पश्य महानुभावान् प्रशास्य भूमिं धनधान्यपूर्णाम् । राज्यानि हित्वा विपुलांश्व भोगान् गतान् नरेन्द्रान् वशमन्तकस्य,धन-धान्यादिसे परिपूर्ण पृथ्वीका शासन करके अन्तमें समस्त राज्य और विपुल भोगोंको यहीं छोड़कर यमराजके वशमें गये हुए बड़े-बड़े बलवान् एवं महानुभाव राजाओंकी ओर दृष्टि डालिये
ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ପୃଥିବୀକୁ ଶାସନ କରିଥିବା ସେଇ ମହାବଳୀ, ମହାନୁଭାବ ନରେନ୍ଦ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦେଖ—ଶେଷରେ ସେମାନେ ରାଜ୍ୟ ଓ ବିପୁଳ ଭୋଗ ଏଠିଏ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ତକ (ମୃତ୍ୟୁ)ର ବଶକୁ ଗଲେ।
Verse 15
मृतं पुत्र दुःखपुष्टं मनुष्या उत्क्षिप्य राजन् स्वगृहान्निर्हरन्ति । त॑ मुक्तकेशा: करुणं रुदन्ति चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति,राजन! जिसको बड़े कष्टसे पाला-पोसा था, वही पुत्र जब मर जाता है, तब मनुष्य उसे उठाकर तुरंत अपने घरसे बाहर कर देते हैं। पहले तो उसके लिये बाल छितराये करुणाभरे स्वरमें विलाप करते हैं, फिर साधारण काष्ठकी भाँति उसे जलती चितामें झोंक देते हैं
ହେ ରାଜନ! ଯାହାକୁ ମଣିଷ ବହୁତ ଦୁଃଖ ସହି ପାଳି-ପୋଷିଥାଏ, ସେଇ ପୁଅ ମରିଗଲେ ସେମାନେ ତାକୁ ଉଠାଇ ଶୀଘ୍ରେ ନିଜ ଘରୁ ବାହାରକୁ ନେଇଯାନ୍ତି। ପ୍ରଥମେ କେଶ ଖୋଲି କରୁଣ ଭାବେ ବିଲାପ କରନ୍ତି; ପରେ ଚିତାର ମଝିରେ ସାଧାରଣ କାଠ ପରି ତାକୁ ଛାଡ଼ିଦିଅନ୍ତି।
Verse 16
अन्यो धन प्रेतगतस्य भुड्न््ते वयांसि चाग्निश्व शरीरधातून् । द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र पुण्येन पापेन च वेष्ट्यमान:,मरे हुए मनुष्यका धन दूसरे लोग भोगते हैं, उसके शरीरकी धातुओंको पक्षी खाते हैं या आग जलाती है। यह मनुष्य पुण्य-पापसे बँधा हुआ इन्हीं दोनोंके साथ परलोकमें गमन करता है
ମୃତ ମନୁଷ୍ୟର ଧନ ଅନ୍ୟେ ଭୋଗ କରନ୍ତି; ତାହାର ଶରୀରଧାତୁକୁ ପକ୍ଷୀମାନେ ଖାଇଦିଅନ୍ତି କିମ୍ବା ଅଗ୍ନି ଭସ୍ମ କରିଦିଏ। କିନ୍ତୁ ସେ ଶୂନ୍ୟହସ୍ତ ଯାଏ ନାହିଁ—ପୁଣ୍ୟ ଓ ପାପ, ଏହି ଦୁଇରେ ବନ୍ଧିତ ଓ ଆବୃତ ହୋଇ, ଏହି ଦୁଇକୁ ସହ ନେଇ ପରଲୋକକୁ ଗମନ କରେ।
Verse 17
उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातय: सुहृद: सुता: । अपुष्पानफलान वृक्षान् यथा तात पतत्रिण:,तात! बिना फल-फूलके वृक्षको जैसे पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उस प्रेतको उसके जातिवाले, सुहृद् और पुत्र चितामें छोड़कर लौट आते हैं
ତାତ! ଯେପରି ପୁଷ୍ପ-ଫଳ ନଥିବା ବୃକ୍ଷକୁ ପକ୍ଷୀମାନେ ଛାଡ଼ି ଯାଆନ୍ତି, ସେପରି ଜ୍ଞାତି, ସୁହୃଦ ଓ ପୁତ୍ରମାନେ ସେ ପ୍ରେତକୁ ଚିତାରେ ଛାଡ଼ି ଫେରିଯାଆନ୍ତି।
Verse 18
अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम् । तस्मात् तु पुरुषो यत्नाद् धर्म संचिनुयाच्छनै:,अग्निमें डाले हुए उस पुरुषके पीछे तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्मका ही संग्रह करे
ଅଗ୍ନିରେ ଅର୍ପିତ ସେ ପୁରୁଷଙ୍କ ପଛେ କେବଳ ତାଙ୍କର ନିଜେ କରା ଶୁଭ-ଅଶୁଭ କର୍ମ ହିଁ ଯାଏ। ତେଣୁ ମନୁଷ୍ୟ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ଧୀରେ ଧୀରେ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ସଞ୍ଚୟ କରୁ।
Verse 19
अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो महत् तमस्तिष्ठति हान्धकारम् | तद् वै महामोहनमिन्द्रियाणां बुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन्,इस लोक और परलोकसे ऊपर और नीचेतक सर्वत्र अज्ञानरूप महान् अन्धकार फैला हुआ है। वह इन्द्रियोंको महान् मोहमें डालनेवाला है। राजन! आप इसको जान लीजिये, जिससे यह आपका स्पर्श न कर सके
ଏହି ଲୋକ ଓ ପରଲୋକର ଉପରେ ଓ ତଳେ—ସବୁଠାରେ ଅଜ୍ଞାନରୂପ ମହା ଅନ୍ଧକାର ବ୍ୟାପିଛି। ସେଇ ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ମହାମୋହରେ ପକାଏ। ରାଜନ! ଏହାକୁ ଭଲଭାବେ ବୁଝନ୍ତୁ, ଯେପରି ଏହା ଆପଣଙ୍କୁ ଠକି ନପାରେ।
Verse 20
इदं वच: शक्ष्यसि चेद् यथाव- न्निशम्य सर्व प्रतिपत्तुमेव । यश: पर प्राप्स्सि जीवलोके भयं न चामुत्र न चेह ते5स्ति,मेरी इस बातको सुनकर यदि आप सब ठीक-ठीक समझ सकेंगे तो इस मनुष्यलोकमें आपको महान् यश प्राप्त होगा और इहलोक तथा परलोकमें आपके लिये भय नहीं रहेगा
ମୋର ଏହି କଥା ଶୁଣି ଯଦି ଆପଣ ସବୁକିଛି ଯଥାର୍ଥଭାବେ ବୁଝି ଆଚରଣରେ ଆଣିପାରିବେ, ତେବେ ଏହି ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ଆପଣ ପରମ ଯଶ ପାଇବେ; ଏବଂ ନ ଏଠାରେ, ନ ପରଲୋକରେ, ଆପଣଙ୍କ ପାଇଁ ଭୟ ରହିବ।
Verse 21
आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था सत्योदका धृतिकूला दयोर्मि: । तस्यां स्नात: पूयते पुण्यकर्मा पुण्यो ह्वात्मा नित्यमलो भ एव,भारत! यह जीवात्मा एक नदी है। इसमें पुण्य ही तीर्थ है। सत्यस्वरूप परमात्मासे इसका उद्गम हुआ है। धैर्य ही इसके किनारे हैं। दया इसकी लहरें हैं। पुण्यकर्म करनेवाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है; क्योंकि लोभरहित आत्मा सदा पवित्र ही है
ହେ ଭାରତ! ଆତ୍ମା ଏକ ନଦୀ ସଦୃଶ; ପୁଣ୍ୟ ହିଁ ତାହାର ତୀର୍ଥ। ସତ୍ୟ ତାହାର ଜଳ, ଧୈର୍ଯ୍ୟ ତାହାର କୂଳ, ଦୟା ତାହାର ତରଙ୍ଗ। ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରୁଥିବା ମଣିଷ ଏହି ନଦୀରେ ସ୍ନାନ କରି ପବିତ୍ର ହୁଏ; କାରଣ ଲୋଭରହିତ ଆତ୍ମା ସଦା ନିର୍ମଳ।
Verse 22
कामक्रोधग्राहवतीं पजड्चेन्द्रियजलां नदीम् । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर,काम-क्रोधादिरूप ग्राहसे भरी, पाँच इन्द्रियोंके जलसे पूर्ण इस संसारनदीके जन्म- मरणरूप दुर्गम प्रवाहको धैर्यकी नौका बनाकर पार कीजिये
କାମ-କ୍ରୋଧ ରୂପ ଗ୍ରାହରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ପଞ୍ଚେନ୍ଦ୍ରିୟର ଜଳରେ ଫୁଲିଉଠିଥିବା ଏହି ସଂସାର-ନଦୀକୁ—ଧୈର୍ଯ୍ୟକୁ ନାଉ କରି ଜନ୍ମ-ମୃତ୍ୟୁର ଦୁର୍ଗମ ପଥ ଅତିକ୍ରମ କର।
Verse 23
प्रज्ञावृद्ध धर्मवृद्ध॑ स्वबन्धुं विद्यावृद्धं वयसा चापि वृद्धम् । कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य यः सम्पृच्छेन्न स मुहोत् कदाचित्,जो बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्थामें बड़े अपने बन्धुको आदर-सत्कारसे प्रसन्न करके उससे कर्तव्य-अकर्तव्यके विषयमें प्रश्न करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता
ଯେ ଜଣେ ପ୍ରଜ୍ଞା, ଧର୍ମ, ବିଦ୍ୟା ଓ ବୟସରେ ବୃଦ୍ଧ ନିଜ ବନ୍ଧୁକୁ ସମ୍ମାନ କରି ପ୍ରସନ୍ନ କରି, ପରେ କାର୍ଯ୍ୟ-ଅକାର୍ଯ୍ୟ ବିଷୟରେ ପଚାରେ—ସେ କେବେ ମୋହରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ।
Verse 24
धृत्या शिक्षोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा । चक्षु:श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा,शिश्व और उदरकी धैर्यसे रक्षा करे अर्थात् कामवेग और भूखकी ज्वालाको धैर्यपूर्वक सहे। इसी प्रकार हाथ-पैरकी नेत्रोंसे, नेत्र और कानोंकी मनसे तथा मन और वाणीकी सत्कर्मोंसे रक्षा करे
ଧୈର୍ଯ୍ୟଦ୍ୱାରା ଶିଶ୍ନ ଓ ଉଦରକୁ ରକ୍ଷା କର—ଅର୍ଥାତ୍ କାମବେଗ ଓ ଭୁଖର ଜ୍ୱାଳାକୁ ସହ। ଏହିପରି ଚକ୍ଷୁର ସତର୍କତାରେ ହାତ-ପାକୁ, ମନର ବିବେକରେ ଚକ୍ଷୁ-ଶ୍ରୋତ୍ରକୁ, ଏବଂ ସତ୍କର୍ମରେ ମନ ଓ ବାଣୀକୁ ସଂଯମରେ ରଖ।
Verse 25
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्नवर्जी । सत्यं ब्रुवन् गुरवे कर्म कुर्वन् न ब्राह्मुणश्व्यवते ब्रह्मलोकात्,जो प्रतिदिन जलसे स्नान-संध्या-तर्पण आदि करता है, नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पतितोंका अन्न त्याग देता है, सत्य बोलता और गुरुकी सेवा करता है, वह ब्राह्मण कभी ब्रह्मलोकसे भ्रष्ट नहीं होता
ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପ୍ରତିଦିନ ଜଳକର୍ମ—ସ୍ନାନ, ସନ୍ଧ୍ୟା ଓ ତର୍ପଣ—କରେ; ନିତ୍ୟ ଯଜ୍ଞୋପବୀତ ଧାରଣ କରେ; ନିତ୍ୟ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ନିଷ୍ଠାବାନ ରହେ; ପତିତଙ୍କ ଅନ୍ନ ବର୍ଜନ କରେ; ସତ୍ୟ କହେ ଏବଂ ଗୁରୁଙ୍କ ସେବାରୂପେ ନିୟତ କର୍ମ କରେ—ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣ କେବେ ବ୍ରହ୍ମଲୋକରୁ ଚ୍ୟୁତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 26
अधीत्य वेदान् परिसंस्तीर्य चाग्नी- निष्ट्वा यज्ञै: पालयित्वा प्रजाश्न । गोब्राह्मणार्थ शस्त्रपूतान्तरात्मा हतः संग्रामे क्षत्रिय: स्वर्गमेति,वेदोंको पढ़कर, अग्निहोत्रके लिये अग्निके चारों ओर कुश बिछाकर नाना प्रकारके यज्ञोंद्ारय यजन कर और प्रजाजनोंका पालन करके गौ और ब्राह्मणोंके हितके लिये संग्राममें मृत्युको प्राप्त हुआ क्षत्रिय शस्त्रसे अन्तःकरण पवित्र हो जानेके कारण ऊर्ध्वलोकको जाता है
ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରି, ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ପାଇଁ ଅଗ୍ନିର ଚାରିପାଖେ କୁଶ ପସାରି, ବିଭିନ୍ନ ଯଜ୍ଞ କରି, ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ପାଳନ କରି—ଗୋ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ ସଙ୍ଗ୍ରାମରେ ନିହତ ହେଉଥିବା କ୍ଷତ୍ରିୟ, ଶସ୍ତ୍ରଧର୍ମରେ ଅନ୍ତଃକରଣ ପବିତ୍ର ହୋଇ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 27
वैश्यो<धीत्य ब्राह्मणान क्षत्रियां श्र धनै: काले संविभज्यतश्रितांश्ष । त्रेतापूतं धूममापच्राय पुण्यं प्रेत्य स्वर्गे दिव्यसुखानि भुझ्क्ते,वैश्य यदि वेद-शास्त्रोंका अध्ययन करके ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा आश्रितजनोंको समय- समयपर धन देकर उनकी सहायता करे और यज्ञोंद्वारा तीनों- अग्नियोंके पवित्र धूमकी सुगन्ध लेता रहे तो वह मरनेके पश्चात् स्वर्गलोकमें दिव्य सुख भोगता है
ବୈଶ୍ୟ ଯଦି ବେଦ-ଶାସ୍ତ୍ର ଅଧ୍ୟୟନ କରି, ସମୟମତେ ଧନ ଦ୍ୱାରା ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ଆଶ୍ରିତମାନଙ୍କୁ ବଣ୍ଟନ କରି ସହାୟତା କରେ, ଏବଂ ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ତ୍ରେତାଗ୍ନିର ପବିତ୍ର ଧୂମର ସୁଗନ୍ଧରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରେ—ତେବେ ସେ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ପୁଣ୍ୟ ପାଇ ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦିବ୍ୟ ସୁଖ ଭୋଗ କରେ।
Verse 28
ब्रह्म क्षत्रं वैश्यवर्ण च शूद्र: क्रमेणैतान् न््यायत: पूजयान: । तुष्टेष्वेतेष्वव्यथो दग्धपाप- स्त्यकत्वा देहं स्वर्गसुखानि भुड्न्ते,शूद्र यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी क्रमसे न्यायपूर्वक सेवा करके इन्हें संतुष्ट करता है तो वह व्यथासे रहित हो पापोंसे मुक्त होकर देह-त्यागके पश्चात् स्वर्गसुखका उपभोग करता है
ଶୂଦ୍ର ଯଦି ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ବୈଶ୍ୟଙ୍କୁ କ୍ରମେ ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ ସେବା-ପୂଜା କରି ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରେ, ତେବେ ସେ ବ୍ୟଥାରହିତ ହୁଏ; ପାପ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଦେହତ୍ୟାଗ ପରେ ସ୍ୱର୍ଗସୁଖ ଭୋଗ କରେ।
Verse 29
चातुर्वर्ण्यस्यैष धर्मस्तवोक्तो हेतुं चानुब्रुवतो मे निबोध । क्षात्राद् धर्माद्धीयते पाण्डुपुत्र- स्तं त्वं राजन् राजधर्मे नियुड्धक्ष्य,महाराज! आपसे यह मैंने चारों वर्णोका धर्म बताया है; इसे बतानेका कारण भी सुनिये। आपके कारण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर क्षत्रियधर्मसे गिर रहे हैं, अत: आप उन्हें पुनः राजधर्ममें नियुक्त कीजिये
ମହାରାଜ, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟର ଏହି ଧର୍ମ କହିଲି; ଏବେ ମୋ କହିବାର କାରଣ ମଧ୍ୟ ଶୁଣନ୍ତୁ। ଆପଣଙ୍କ କାରଣରୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମରୁ ଖସୁଛନ୍ତି; ତେଣୁ, ହେ ରାଜନ, ତାଙ୍କୁ ପୁନଃ ରାଜଧର୍ମରେ ନିଯୁକ୍ତ କରନ୍ତୁ।
Verse 30
धृतराष्ट उवाच एवमेतद् यथा त्वं मामनुशाससि नित्यदा । ममापि च मति: सौम्य भवत्येवं यथा55तथ माम्
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ତୁମେ ମୋତେ ନିତ୍ୟ ଯେପରି ଉପଦେଶ ଦେଉଛ, ସେପରି ହିଁ ସତ୍ୟ। ହେ ସୌମ୍ୟ, ମୋର ବୁଦ୍ଧି ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ହୁଏ, ଏବଂ ମୁଁ କଥାକୁ ଯଥାତଥ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରେ।
Verse 31
धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! तुम प्रतिदिन मुझे जिस प्रकार उपदेश दिया करते हो, वह बहुत ठीक है। सौम्य! तुम मुझसे जो कुछ भी कहते हो, ऐसा ही मेरा भी विचार है ।। सातु बुद्धि: कृताप्येवं पाण्डवान् प्रति मे सदा । दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते,यद्यपि मैं पाण्डवोंके प्रति सदा ऐसी ही बुद्धि रखता हूँ, तथापि दुर्योधनसे मिलनेपर फिर बुद्धि पलट जाती है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବିଦୁର! ତୁମେ ପ୍ରତିଦିନ ମୋତେ ଯେପରି ହିତୋପଦେଶ ଦେଉଛ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଠିକ୍। ସୌମ୍ୟ! ତୁମେ ମୋତେ ଯାହା କହ, ସେହି ମୋର ମତ ମଧ୍ୟ। ତଥାପି, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ମୁଁ ସଦା ଏମିତି ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଭେଟିଲେ ମୋର ବୁଦ୍ଧି ପୁଣି ଉଲଟିଯାଏ।
Verse 32
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक््यं भूतेन केनचित् । दिष्टमेव ध्रुवं मन््ये पौरुषं तु निरर्थकम्,प्रारब्धका उल्लंघन करनेकी शक्ति किसी भी प्राणीमें नहीं है। मैं तो प्रारब्धको ही अचल मानता हूँ, उसके सामने पुरुषार्थ तो व्यर्थ है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବିଧି ଯାହା ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ କରିଛି, ତାହାକୁ କୌଣସି ପ୍ରାଣୀ ଅତିକ୍ରମ କରିପାରେ ନାହିଁ। ମୋ ମତରେ ଦୈବ ହିଁ ଧ୍ରୁବ ଓ ଅଚଳ; ତାହାର ସମ୍ମୁଖରେ ପୁରୁଷାର୍ଥ ନିରର୍ଥକ ଲାଗେ।
Verse 39
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजायरपर्वमें विदुरवाक्यविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ପ୍ରଜାଗରପର୍ବରେ ବିଦୁରବାକ୍ୟବିଷୟକ ଉଣଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 40
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये चत्वारिंशोडध्याय: || ४० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजायरपर्वमें विदुरवाक्यविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ପ୍ରଜାଗରପର୍ବରେ ବିଦୁରବାକ୍ୟବିଷୟକ ଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ॥୪୦॥
Verse 131
गृहे स्थापयितव्यानि धन्यानि मनुरब्रवीत् । देवब्राह्मणपूजार्थमतिथीनां च भारत
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ମନୁ କହିଛନ୍ତି, ଘରେ ଧାନ୍ୟ ଓ ଧନ ସଞ୍ଚୟ କରି ରଖିବା ଉଚିତ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଦେବତା ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ପୂଜା କରାଯାଇପାରିବ ଏବଂ ଅତିଥିମାନଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସତ୍କାର କରାଯାଇପାରିବ।
The dilemma is whether a ruler who acknowledges ethical counsel can act impartially—prioritizing kinship justice and social stability—despite personal attachment and factional pressures surrounding his own son’s ambitions.
Ethical governance requires kāla-viveka (right timing), saṅga-viveka (wise association), and kṣamā/saṃyama (forbearance and restraint); without these, wealth, power, and even correct advice become instruments of decline.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s ‘result’ is framed pragmatically—reputation, stability, and avoidance of later remorse—rather than as a formal recitational merit statement.