
उलूकदूतवाक्यम् / Ulūka’s Message to the Pāṇḍavas
Upa-parva: Ulūka-dūta (Uluka’s Embassy) Episode
Saṃjaya reports that, with the Pāṇḍavas settled at Hiraṇvatī, Duryodhana—alongside Karṇa, Śakuni, and Duḥśāsana—summons Ulūka and instructs him to deliver a pointed address to the Pāṇḍavas while Vāsudeva Kṛṣṇa listens. The message frames the impending Pāṇḍava–Kuru war as long contemplated and now arrived. It urges the Pāṇḍavas to remember the seizure of their kingdom, the hardships of exile, and Draupadī (Kṛṣṇā)’s suffering, presenting these memories as grounds for immediate assertion of kṣatra capability. It contrasts boastful speech with enacted competence, stating that the virtuous judge action as the proof of declared intent. It further frames the stakes as binary—either defeat the Kauravas and rule the earth or fall and attain the warrior’s posthumous reward. The speech culminates in a direct taunt toward Bhīma regarding his assembly vow about drinking Duḥśāsana’s blood, and it closes with logistical readiness imagery: the field prepared, horses fed, warriors maintained, and a call to engage promptly, “with Keśava.”
Chapter Arc: उद्योग-पर्व की कूटनीतिक आँधी के बीच दक्षिणापथ का प्रसिद्ध राजकुमार रुक्मी, चतुरङ्गिणी सेना सहित, युद्ध में ‘सहायता’ का प्रस्ताव लेकर पाण्डव-शिविर की ओर बढ़ता है—मानो एक नया पलड़ा तराजू पर रखा जा रहा हो। → रुक्मी का परिचय उसके यश, धनुर्वेद-निपुणता और दूर तक मार करने वाली विशाल सेना के साथ होता है। वह वीरों की सभा के मध्य बैठकर अर्जुन को लक्ष्य करता है और अपने पराक्रम का स्मरण कराते हुए (घोषयात्रा-प्रसंग में गन्धर्वों से युद्ध का उल्लेख) स्वयं को ‘उपयुक्त सहायक’ सिद्ध करने लगता है। परन्तु उसके शब्दों में सहायता से अधिक आत्म-प्रदर्शन और श्रेष्ठता का आग्रह झलकता है, जिससे सभा का संतुलन डगमगाने लगता है। → रुक्मी अर्जुन के सामने अपनी ‘सहायता’ को चुनौती-भरे प्रस्ताव की तरह रखता है—मानो पाण्डवों की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा हो। इसी क्षण युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की उपस्थिति में, अन्य राजाओं के सुनते हुए, अर्जुन (प्रहस्य, सखि-भाव से) ऐसा प्रत्युत्तर देता है कि रुक्मी की दर्प-ध्वजा झुक जाती है; सहायता का प्रस्ताव सम्मानजनक गठबंधन न रहकर अहंकार की परीक्षा बन जाता है। → पाण्डव रुक्मी का विधिपूर्वक सत्कार करते हैं, उसकी प्रशंसा भी करते हैं, परन्तु उसकी शर्तों/अहं-रंगित मुद्रा को स्वीकार नहीं करते। रुक्मी को दोनों पक्षों से ‘कोरा उत्तर’ मिलता है—न पाण्डव उसे अपने साथ बाँधते हैं, न कौरव उसे अपनाते हैं। वह अपनी सेना सहित लौट जाता है, और एक संभावित बाहरी शक्ति युद्ध-राजनीति से बाहर हो जाती है। → रुक्मी के लौटने के बाद प्रश्न हवा में रह जाता है—जब बड़े राजा भी अहंकार के कारण निष्प्रभावी हो जाएँ, तब आगामी संघर्ष में कौन-सा नया गठबंधन या नया विघ्न अचानक प्रकट होगा?
Verse 1
ऑपनआक्राता छा अकाल अष्टपञ्चाशर्दाधिकशततमो« ध्याय: रुक्मीका सहायता देनेके लिये आना; परंतु पाण्डव और कौरव दोनों पक्षोंके द्वारा कोरा उत्तर पाकर लौट जाना वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मकस्य महात्मन: । हिरण्यरोम्णो नृपते: साक्षादिन्द्रसखस्य वै,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इसी समय अति यशस्वी दाक्षिणात्य देशके अधिपति भोजवंशी तथा इन्द्रके सखा हिरण्यरोमा नामवाले संकल्पोंके स्वामी महामना भीष्मकका सगा पुत्र, सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात रुक्मी, पाण्डवोंके पास आया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେହି ସମୟରେ ମହାତ୍ମା ଭୀଷ୍ମକଙ୍କ ବଂଶର, ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସଖା ଏବଂ ‘ହିରଣ୍ୟରୋମା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ସେହି ନୃପ (ଘଟଣାକ୍ରମରେ) ଆସିଲେ।
Verse 2
आकूतीनामधिपतिभोजस्यातियशस्विन: । दाक्षिणात्यपते: पुत्रो दिक्षु रुक्मीति विश्रुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इसी समय अति यशस्वी दाक्षिणात्य देशके अधिपति भोजवंशी तथा इन्द्रके सखा हिरण्यरोमा नामवाले संकल्पोंके स्वामी महामना भीष्मकका सगा पुत्र, सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात रुक्मी, पाण्डवोंके पास आया
ଅତି ଯଶସ୍ବୀ ଭୋଜବଂଶୀ, ଦକ୍ଷିଣ ଦେଶର ଅଧିପତିଙ୍କ ପୁତ୍ର—ଯିଏ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ‘ରୁକ୍ମୀ’ ନାମରେ ବିଖ୍ୟାତ—(ସେହି ସମୟରେ) ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।
Verse 3
यः किंपुरुषसिंहस्य गन्धमादनवासिन: । कृत्स्नं शिष्यो धरनुर्वेदं चतुष्पादमवाप्तवान्,जिसने गन्धमादननिवासी किंपुरुषप्रवर द्रुमका शिष्य होकर चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी
ସେ ଗନ୍ଧମାଦନ-ନିବାସୀ କିମ୍ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ରୁମକଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ ହୋଇ, ଚାରି ପାଦରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧନୁର୍ବେଦକୁ ସମଗ୍ରରୂପେ ଅବାପ୍ତ କରିଥିଲେ।
Verse 4
यो माहेन्द्रं धनुर्लेभे तुल्यं गाण्डीवतेजसा । शार्ड्रेण च महाबाहु: सम्मितं दिव्यलक्षणम्,जिस महाबाहुने गाण्डीवधनुषके तेजके समान ही तेजस्वी विजय नामक धनुष इन्द्रदेवतासे प्राप्त किया था। वह दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न धनुष शार्ज््धनुषकी समानता करता था
ସେ ମହାବାହୁ ଇନ୍ଦ୍ରଲୋକରୁ ‘ବିଜୟ’ ନାମକ ଧନୁ ପାଇଥିଲେ; ତାହା ଗାଣ୍ଡୀବର ତେଜ ସମାନ ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା। ଦିବ୍ୟ ଲକ୍ଷଣରେ ଯୁକ୍ତ ସେହି ଧନୁ ଶାର୍ଙ୍ଗ ସହ ସମତୁଳ୍ୟ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ ହେଉଥିଲା।
Verse 5
त्रीण्येवैतनि दिव्यानि धनूंषि दिवि चारिणाम् । वारुणं गाण्डिवं तत्र माहेन्द्रं विजयं धनु: । शार्ज्ज तु वैष्णवं प्राहुर्दिव्यं तेजोमयं धनु:,झुलोकमें विचरनेवाले देवताओंके ये तीन ही धनुष दिव्य माने गये हैं। उनमेंसे गाण्डीव धनुष वरुणका, विजय देवराज इन्द्रका तथा शार्क् नामक दिव्य तेजस्वी धनुष भगवान् विष्णुका बताया गया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦିବିରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ଦେବତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟରେ ଦିବ୍ୟ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ ହେଉଛି ଏହି ତିନିଟି ଧନୁ ମାତ୍ର। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଗାଣ୍ଡୀବ ବରୁଣଙ୍କର; ‘ବିଜୟ’ ଧନୁ ଦେବରାଜ ମହେନ୍ଦ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କର; ଏବଂ ତେଜୋମୟ ଦିବ୍ୟ ‘ଶାର୍ଙ୍ଗ’ ଧନୁ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କର ବୋଲି କୁହାଯାଏ॥
Verse 6
धारयामास तत् कृष्ण: परसेना भयावहम् । गाण्डीवं पावकाललेभे खाण्डवे पाकशासनि:,शत्रुसेनाको भयभीत करनेवाले उस शार्क्न -धनुषको भगवान् श्रीकृष्णने धारण किया और खाण्डव-दाहके समय इन्द्रकुमार अर्जुनने साक्षात् अग्निदेवसे गाण्डीवधनुष प्राप्त किया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ଭୟଭୀତ କରୁଥିବା ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଶାର୍ଙ୍ଗ ଧନୁକୁ କୃଷ୍ଣ ଧାରଣ କଲେ। ଏବଂ ଖାଣ୍ଡବବନ ଦାହ ସମୟରେ ଅର୍ଜୁନ ଅଗ୍ନିଦେବଙ୍କ ଠାରୁ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ ପାଇଥିଲେ॥
Verse 7
ट्रुमाद् रुक्मी महातेजा विजयं प्रत्यपद्यत । संछिद्य मौरवान् पाशान् निहत्य मुरमोजसा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ମହାତେଜସ୍ବୀ ରୁକ୍ମୀ ପୁନର୍ବାର ବିଜୟ ପାଇଲେ। କୌରବମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପତିତ ବନ୍ଧନକୁ ଛେଦି, ନିଜ ବଳରେ ମୁରକୁ ନିହତ କଲେ॥
Verse 8
निर्जित्य नरक॑ भौममाह्त्य मणिकुण्डले । षोडश स्त्रीसहसत्राणि रत्नानि विविधानि च
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୂମିପୁତ୍ର ନରକକୁ ଜୟ କରି, ମଣିମୟ କୁଣ୍ଡଳ ହରଣ କରି, ସେ ଷୋଳହ ହଜାର ସ୍ତ୍ରୀ ଓ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ରତ୍ନମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଉଦ୍ଧାର କଲେ॥
Verse 9
प्रतिपेदे हृषीकेश: शार्ड्ध च धनुरुत्तमम् । महातेजस्वी रुक््मीने द्रमसे विजय नामक धनुष पाया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने तेज और बलसे मुर दैत्यके पाशोंका उच्छेद करके भूमिपुत्र नरकासुरको जीतकर जब उसके यहाँसे अदितिके मणिमय कुण्डल वापस ले लिये और सोलह हजार स्त्रियों तथा नाना प्रकारके रत्नोंको अपने अधिकारमें कर लिया, उसी समय उन्हें शार्ड़् नामक उत्तम धनुष भी प्राप्त हुआ था || ७-८ है ।। रुक्मी तु विजयं लब्ध्वा धनुर्मेघनिभस्वनम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ‘ଶାର୍ଙ୍ଗ’ ନାମକ ଉତ୍ତମ ଧନୁ ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ॥
Verse 10
नामृष्यत पुरा योडसौ स्वबाहुबलगर्वितः
ଯେ ପୂର୍ବେ ନିଜ ବାହୁବଳର ଗର୍ବରେ ଫୁଲିଉଠିଥିଲା, ସେ ତାହା ସହିପାରିଲା ନାହିଁ।
Verse 11
कृत्वा प्रतिज्ञां नाहत्वा निवर्तिष्ये जनार्दनम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ଏହି ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରି ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ଆଘାତ ନକରି ମୁଁ ଫେରିବି ନାହିଁ।”
Verse 12
सेनया चतुरद्धिण्या महत्या दूरपातया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୂରରୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରହାର କରିପାରୁଥିବା, ବିଶାଳ ଚତୁରଙ୍ଗିଣୀ ସେନା ସହ (ସେମାନେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ)।
Verse 13
स समासाद्य वार्ष्णेयं योगानामीश्ररं प्रभुम्
ସେ ବାର୍ଷ୍ଣେୟ—ଯୋଗମାନଙ୍କର ଈଶ୍ୱର, ପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ—ନିକଟକୁ ଯାଇ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲା।
Verse 14
यत्रैव कृष्णेन रणे निर्जित: परवीरहा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ସ୍ଥାନରେ, ରଣଭୂମିରେ, ପରବୀରହନ୍ତା କୃଷ୍ଣ ତାକୁ ପରାଜିତ କଲେ।”
Verse 15
सैन्येन महा तेन प्रभूतगजवाजिना
ହାତୀ ଓ ଘୋଡ଼ାରେ ପ୍ରଚୁର ଏହି ବିଶାଳ ସେନା ସହିତ ଯାତ୍ରା ଓ ଯୁଦ୍ଧ-ସଜ୍ଜା ଯେନ ଅପାର ଶକ୍ତିର ପ୍ରଦର୍ଶନ ହେଲା—ଧର୍ମୋଚିତ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଓ ଯୁଦ୍ଧର ବିନାଶକ ଗତି ମଧ୍ୟରେ ଉଠୁଥିବା ନୈତିକ ତଣାପୋଡ଼ାର ପୂର୍ବାଭାସ।
Verse 16
स भोजराज: सैन्येन महता परिवारित:
ସେ ଭୋଜରାଜ ମହାସେନାରେ ପରିବେଷ୍ଟିତ ଓ ସୁରକ୍ଷିତ ହୋଇ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ—ରାଜପ୍ରତାପର ଏହି ଚିତ୍ର ଦର୍ଶାଏ ଯେ ଏହି ପର୍ବରେ ରାଜନୈତିକ ଅଧିକାର ସେନାବଳ ଓ ଆସନ୍ନ ସଂଘର୍ଷର ନୈତିକ ତଣାପୋଡ଼ାରୁ ଅଲଗା ନୁହେଁ।
Verse 17
ततः स कवच धन्वी तली खड़्गी शरासनी
ତାପରେ ସେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଜ୍ଜ ହୋଇ ଦେଖାଦେଲେ—କବଚଧାରୀ, ଧନୁର୍ଧାରୀ, ତଳୱାରର ପଟା ବାନ୍ଧି, ଖଡ଼୍ଗ ଧରି, ତୂଣୀର ଓ ଧନୁଷ-ସାମଗ୍ରୀ ସହିତ—ଆସନ୍ନ ସଂଘର୍ଷ ଓ ଘଟଣାର ଗମ୍ଭୀର ମୋଡ଼ର ସଙ୍କେତ ଦେଇ।
Verse 18
विदित: पाण्डवेयानां वासुदेवप्रियेप्सया
ବାସୁଦେବଙ୍କ ପ୍ରୀତି ଲାଭ କରିବାର ତାଙ୍କ ଆକାଂକ୍ଷାରୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି କଥା ବିଦିତ ହେଲା (ଯେ ଏକ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ପଥ ଅନୁସରଣ କରିବାକୁ ହେବ)।
Verse 19
स पूजित: पाण्डुपुत्रैर्य थान्यायं सुसंस्तुत:
ଏହିପରି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ନ୍ୟାୟ୍ୟ ରୀତିଅନୁସାରେ ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ପୂଜା-ସତ୍କାର କଲେ ଓ ହୃଦୟପୂର୍ବକ ପ୍ରଶଂସା କଲେ—ଏହା ତାଙ୍କର ଧର୍ମାଚରଣ ଓ ସମ୍ମାନଜନକ ଆତିଥ୍ୟର ପ୍ରତିବିମ୍ବ ଥିଲା।
Verse 20
उवाच मध्ये वीराणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम्,तदनन्तर वीरोंके बीचमें बैठकर उसने कुन्तीकुमार अर्जुनसे कहा--'पाण्डुनन्दन! यदि तुम डरे हुए हो तो मैं युद्धमें तुम्हारी सहायताके लिये आ पहुँचा हूँ। मैं इस महायुद्धमें तुम्हारी वह सहायता करूँगा, जो तुम्हारे शत्रुओंके लिये असह्य हो उठेगी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବୀରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ପରାକ୍ରମୀ ବୀର ବସି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ କହିଲା—“ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ! ଯଦି ତୁମ ମନେ ଭୟ ଉଠିଛି, ତେବେ ଯୁଦ୍ଧରେ ତୁମ ସହାୟତା ପାଇଁ ମୁଁ ଆସିଛି। ଏହି ମହାଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଏମିତି ସହାୟତା କରିବି, ଯାହା ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅସହ୍ୟ ହେବ।”
Verse 21
सहायो<स्मि स्थितो युद्धे यदि भीतो5सि पाण्डव । करिष्यामि रणे साहा[मसहां तव शत्रुभि:,तदनन्तर वीरोंके बीचमें बैठकर उसने कुन्तीकुमार अर्जुनसे कहा--'पाण्डुनन्दन! यदि तुम डरे हुए हो तो मैं युद्धमें तुम्हारी सहायताके लिये आ पहुँचा हूँ। मैं इस महायुद्धमें तुम्हारी वह सहायता करूँगा, जो तुम्हारे शत्रुओंके लिये असह्य हो उठेगी
“ପାଣ୍ଡବ! ଏହି ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ତୁମ ସହାୟ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ଯଦି ତୁମେ ଭୀତ, ତେବେ ତୁମକୁ ଆଶ୍ରୟ ଦେବାକୁ ମୁଁ ଆସିଛି। ରଣରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଏମିତି ସହାୟତା କରିବି, ଯାହା ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନେ ସହି ପାରିବେ ନାହିଁ।”
Verse 22
न हि मे विक्रमे तुल्य: पुमानस्तीह कश्नन | हनिष्यामि रणे भागं यन्मे दास्यसि पाण्डव,“इस जगतमें मेरे समान पराक्रमी दूसरा कोई पुरुष नहीं है। पाण्डुकुमार! तुम शत्रुओंका जो भाग मुझे सौंप दोगे, मैं समरभूमिमें उसका संहार कर डालूँगा
“ଏହି ଜଗତରେ ମୋ ପରାକ୍ରମ ସମାନ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ପୁରୁଷ ନାହିଁ। ପାଣ୍ଡବ! ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେଉଁ ଭାଗ ତୁମେ ମୋତେ ଦେବ, ରଣରେ ମୁଁ ତାହାକୁ ସଂହାର କରିଦେବି।”
Verse 23
अपि द्रोणकृपौ वीरौ भीष्मकर्णावथो पुन: । अथवा सर्व एवैते तिष्ठन्तु वसुधाधिपा:
“ଦ୍ରୋଣ ଓ କୃପ—ଏହି ଦୁଇ ବୀର—ଏବଂ ପୁନଃ ଭୀଷ୍ମ ଓ କର୍ଣ୍ଣ ମଧ୍ୟ (ସମ୍ମୁଖେ) ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହୁନ୍ତୁ; କିମ୍ବା ଏହି ସମସ୍ତ ବସୁଧାଧିପ ରାଜାମାନେ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ରହୁନ୍ତୁ।”
Verse 24
निहत्य समरे शत्रूंस्तव दास्यामि मेदिनीम् । “मेरे हिस्सेमें द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा वीरवर भीष्म एवं कर्ण ही क्यों न हों, किसीको जीवित नहीं छोड़ूँगा अथवा यहाँ पधारे हुए ये सब राजा चुपचाप खड़े रहें। मैं अकेला ही समरभूमिमें तुम्हारे सारे शत्रुओंका वध करके तुम्हें पृथ्वीका राज्य अर्पित कर दूँगा” ।। २३ -॥] इत्युक्तो धमराजस्य केशवस्य च संनिधौ,उवाच धीमान् कौन्तेय: प्रहस्य सखिपूर्वकम् | धर्मराज युधिष्ठिर तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप अन्य सब राजाओंके सुनते हुए रुक्मीके ऐसा कहनेपर परमबुद्धिमान् कुन्तीपुत्र अर्जुनने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए मित्रभावसे हँसकर कहा--
“ସମରରେ ତୁମ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ବଧ କରି ମୁଁ ତୁମକୁ ପୃଥିବୀ (ରାଜ୍ୟ) ଦେଇଦେବି।” ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଓ କେଶବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସନ୍ନିଧିରେ, ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ, ସେ ଏପରି କହିଲା; ତେବେ ବୁଦ୍ଧିମାନ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ କେଶବ ଓ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ଦେଖି, ସଖିଭାବରେ ହସି ଉତ୍ତର ଦେଲେ।
Verse 25
शृण्वतां पार्थिवेन्द्राणामन्येषां चैव सर्वश: । वासुदेवमभिप्रेक्ष्य धर्मराजं च पाण्डवम्
ଚାରିଦିଗରେ ସମବେତ ରାଜେନ୍ଦ୍ରମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତେ ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ, ସେ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଦିଗକୁ ଏବଂ ଧର୍ମରାଜ ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦିଗକୁ ଦୃଷ୍ଟି ନିକ୍ଷେପ କଲା।
Verse 26
कौरवाणां कुले जात: पाण्डो: पुत्रो विशेषत:,“वीर! मैं कौरवोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। विशेषतः महाराज पाण्डुका पुत्र हूँ। आचार्य द्रोणको अपना गुरु कहता हूँ और स्वयं उनका शिष्य कहलाता हूँ। इसके सिवा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हमारे सहायक हैं और मैं अपने हाथमें गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। ऐसी स्थितिमें मैं अपने-आपको डरा हुआ कैसे कह सकता हूँ?
“ବୀର! ମୁଁ କୌରବକୁଳରେ ଜନ୍ମିଛି; ବିଶେଷତଃ ମୁଁ ମହାରାଜ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁତ୍ର। ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଗୁରୁ ଭାବେ ମାନେ ଏବଂ ନିଜକୁ ତାଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ ବୋଲି କହେ। ତଦୁପରି ସ୍ୱୟଂ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆମ ସହାୟ; ମୋ ହାତରେ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ ଅଛି। ଏମିତି ଅବସ୍ଥାରେ ମୁଁ ନିଜକୁ ଭୀତ ବୋଲି କିପରି କହିବି?”
Verse 27
द्रोणं व्यपदिशज्शिष्यो वासुदेवसहायवान् । भीतो<स्मीति कथं ब्रूयां दधानो गाण्डिवं धनु:,“वीर! मैं कौरवोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। विशेषतः महाराज पाण्डुका पुत्र हूँ। आचार्य द्रोणको अपना गुरु कहता हूँ और स्वयं उनका शिष्य कहलाता हूँ। इसके सिवा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हमारे सहायक हैं और मैं अपने हाथमें गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। ऐसी स्थितिमें मैं अपने-आपको डरा हुआ कैसे कह सकता हूँ?
“ଦ୍ରୋଣଙ୍କୁ ଗୁରୁ ବୋଲି କହି ନିଜକୁ ତାଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ ମାନୁଥିବା ମୁଁ, ବାସୁଦେବ ସହାୟ ଥିବାବେଳେ, ହାତରେ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ ଧରିଥିବାବେଳେ—‘ମୁଁ ଭୀତ’ ବୋଲି କିପରି କହିବି?”
Verse 28
युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्व: सुमहाबलै: । सहायो घोषयात्रायां कस्तदा55सीत् सखा मम,“वीरवर! कौरवोंकी घोषयात्राके समय जब मैंने महाबली गन्धर्वोके साथ युद्ध किया था, उस समय कौन-सा मित्र मेरी सहायताके लिये आया था?
“ବୀର! କୌରବମାନଙ୍କ ଘୋଷଯାତ୍ରା ସମୟରେ, ମୁଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାବଳୀ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବାବେଳେ, ସେତେବେଳେ ମୋ ସହାୟତାକୁ କେଉଁ ସଖା ଆସିଥିଲା?”
Verse 29
तथा प्रतिभये तस्मिन् देवदानवसंकुले । खाण्डवे युध्यमानस्य क: सहायस्तदाभवत्,“खाण्डववनमें देवताओं और दानवोंसे परिपूर्ण भयंकर युद्धमें जब मैं अपने प्रतिपक्षियोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा कौन सहायक था?
“ସେହିପରି ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଆତଙ୍କରେ—ଯେତେବେଳେ ଖାଣ୍ଡବବନ ଦେବ ଓ ଦାନବମାନଙ୍କରେ ଭରିଯାଇଥିଲା—ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧରତ ଥିବାବେଳେ, ସେତେବେଳେ ମୋ ସହାୟ କିଏ ଥିଲା?”
Verse 30
निवातकवचैर्युद्धे कालकेयैश्व दानवै: । तत्र मे युध्यमानस्य कः सहायस्तदाभवत्,“जब निवातकवच तथा कालकेय नामक दानवोंके साथ छिड़े हुए युद्धमें मैं अकेला ही लड़ रहा था, उस समय मेरी सहायताके लिये कौन आया था?
ନିବାତକବଚ ଓ କାଲକେୟ ନାମକ ଦାନବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ, ସେଠାରେ ମୁଁ ଏକା ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବାବେଳେ, ସେ ସମୟରେ ମୋର ସହାୟ କିଏ ଥିଲା?
Verse 31
तथा विराटनगरे कुरुभि: सह संगरे । युध्यतो बहुभिस्तत्र क: सहायो5भवन्मम,“इसी प्रकार विराटनगरमें जब कौरवोंके साथ होनेवाले संग्राममें मैं अकेला ही बहुत-से वीरोंके साथ युद्ध कर रहा था, उस समय मेरा सहायक कौन था?
ସେହିପରି ବିରାଟନଗରରେ କୁରୁମାନଙ୍କ ସହ ସଂଗ୍ରାମ ହେଲାବେଳେ, ମୁଁ ସେଠାରେ ଏକା ଅନେକ ବୀରଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲି; ସେ ସମୟରେ ମୋର ସହାୟ କିଏ ଥିଲା?
Verse 32
उपजीव्य रणे रुद्रं शक्रं वैश्रवणं यमम् । वरुणं पावकं चैव कृपं द्रोणं च माधवम्,“मैंने युद्धमें सफलताके लिये रुद्र, इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण, अग्नि, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना की है। मैं तेजस्वी, दृढ़ एवं दिव्य गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। मेरे पास अक्षय बाणोंसे भरे हुए तरकस मौजूद हैं और दिव्यास्त्रोंके ज्ञानसे मेरी शक्ति बढ़ी हुई है। नरश्रेष्ठ! फिर मेरे-जैसा पुरुष साक्षात् वज्रधारी इन्द्रके सामने भी “मैं डरा हुआ हूँ" यह सुयशका नाश करनेवाला वचन कैसे कह सकता है?
ରଣରେ ସଫଳତା ପାଇଁ ମୁଁ ରୁଦ୍ର, ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର), ବୈଶ୍ରବଣ (କୁବେର), ଯମ, ବରୁଣ, ପାବକ (ଅଗ୍ନି) ଏବଂ କୃପ, ଦ୍ରୋଣ, ମାଧବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଆଶ୍ରୟ କରିଛି।
Verse 33
धारयन् गाण्डिवं दिव्यं धनुस्तेजोमयं दृढम् । अक्षय्यशरसंयुक्तो दिव्यास्त्रपरिबृंहित:,“मैंने युद्धमें सफलताके लिये रुद्र, इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण, अग्नि, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना की है। मैं तेजस्वी, दृढ़ एवं दिव्य गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। मेरे पास अक्षय बाणोंसे भरे हुए तरकस मौजूद हैं और दिव्यास्त्रोंके ज्ञानसे मेरी शक्ति बढ़ी हुई है। नरश्रेष्ठ! फिर मेरे-जैसा पुरुष साक्षात् वज्रधारी इन्द्रके सामने भी “मैं डरा हुआ हूँ" यह सुयशका नाश करनेवाला वचन कैसे कह सकता है?
ମୁଁ ତେଜୋମୟ, ଦୃଢ଼ ଓ ଦିବ୍ୟ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁ ଧାରଣ କରିଛି; ଅକ୍ଷୟ ବାଣରେ ସଜ୍ଜିତ; ଏବଂ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନରେ ମୋର ପରାକ୍ରମ ବଢ଼ିଛି।
Verse 34
कथमस्मद्विधो ब्रूयाद् भीतो5स्मीति यशोहरम् । वचन नरशार्दूल वज्जायुधमपि स्वयम्,“मैंने युद्धमें सफलताके लिये रुद्र, इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण, अग्नि, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना की है। मैं तेजस्वी, दृढ़ एवं दिव्य गाण्डीव धनुष धारण करता हूँ। मेरे पास अक्षय बाणोंसे भरे हुए तरकस मौजूद हैं और दिव्यास्त्रोंके ज्ञानसे मेरी शक्ति बढ़ी हुई है। नरश्रेष्ठ! फिर मेरे-जैसा पुरुष साक्षात् वज्रधारी इन्द्रके सामने भी “मैं डरा हुआ हूँ" यह सुयशका नाश करनेवाला वचन कैसे कह सकता है?
ନରଶାର୍ଦୂଳ! ମୋ ପରି ପୁରୁଷ ‘ମୁଁ ଭୟଭୀତ’ ବୋଲି ଯଶ ହରଣକାରୀ ବଚନ କିପରି କହିପାରିବ? ସେହି ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂ ବଜ୍ରାୟୁଧଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ!
Verse 35
नास्मिभीतो महाबाहो सहायार्थश्न नास्ति मे । यथाकामं यथायोगं गच्छ वान्यत्र तिष्ठ वा,“महाबाहो! मैं डरा हुआ नहीं हूँ तथा मुझे सहायककी भी आवश्यकता नहीं है। आप अपनी इच्छाके अनुसार जैसा उचित समझें अन्यत्र चले जाइये या यहीं रहिये”
ମହାବାହୋ! ମୁଁ ଭୟଭୀତ ନୁହେଁ, ଏବଂ ମୋତେ କୌଣସି ସହାୟତାର ଆବଶ୍ୟକତା ମଧ୍ୟ ନାହିଁ। ତୁମ ଇଚ୍ଛା ଓ ଯାହା ଯଥୋଚିତ ମନେ ହୁଏ, ସେହିପରି ଅନ୍ୟତ୍ର ଯାଅ କିମ୍ବା ଏଠି ରୁହ।
Verse 36
वैशम्पायन उवाच (तच्छुत्वा वचनं तस्य विजयस्य हि धीमत: ।) विनिवर्त्य ततो रुक्मी सेनां सागरसंनिभाम् | दुर्योधनमुपागच्छत् तथैव भरतर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! उन परम बुद्धिमान् अर्जुनका यह वचन सुनकर रुक्मी अपनी समुद्र-सदूश विशाल सेनाको लौटाकर उसी प्रकार दुर्योधनके पास गया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେ ଧୀମାନ୍ ବିଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି, ରୁକ୍ମୀ ସମୁଦ୍ରସଦୃଶ ବିଶାଳ ସେନାକୁ ଫେରାଇ ଦେଇ, ପୂର୍ବବତ୍ ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲା।
Verse 37
तथैव चाभिगम्यैनमुवाच वसुधाधिप: । प्रत्याख्यातश्न॒ तेनापि स तदा शूरमानिना,दुर्योधनसे मिलकर राजा रुक्मीने उससे भी वैसी ही बातें कहीं। तब अपनेको शूरवीर माननेवाले दुर्योधनने भी उसकी सहायता लेनेसे इन्कार कर दिया
ସେହିପରି ବସୁଧାଧିପ ରୁକ୍ମୀ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ସେହି ଭଳି କଥା କହିଲା; କିନ୍ତୁ ସେ ସମୟରେ ନିଜକୁ ଶୂର ମାନୁଥିବା ଦୁର୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟ ତାକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କଲା।
Verse 38
द्वावेव तु महाराज तस्माद् युद्धादपेयतु: । रौहिणेयश्व॒ वार्ष्णेयो रुक्मी च वसुधाधिप:,महाराज! उस युद्धसे दो ही वीर अलग हो गये थे--एक तो वृष्णिवंशी रोहिणीनन्दन बलराम और दूसरा राजा रुक्मी
ମହାରାଜ! ସେହି ଯୁଦ୍ଧରୁ କେବଳ ଦୁଇଜଣ ବୀର ଅଲଗା ହୋଇଗଲେ—ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ରୋହିଣୀନନ୍ଦନ ବଳରାମ ଏବଂ ବସୁଧାଧିପ ରାଜା ରୁକ୍ମୀ।
Verse 39
गते रामे तीर्थयात्रां भीष्मकस्य सुते तथा । उपाविशन् पाण्डवेया मन्त्राय पुनरेव च,बलरामजीके तीर्थयात्रामें और भीष्मकपुत्र रुक्मीके अपने नगरको चले जानेपर पाण्डवोंने पुनः गुप्त मन्त्रणाके लिये बैठक की
ବଳରାମ ତୀର୍ଥଯାତ୍ରାକୁ ଚାଲିଯିବା ପରେ ଏବଂ ଭୀଷ୍ମକପୁତ୍ର ରୁକ୍ମୀ ନିଜ ନଗରକୁ ଫେରିଯିବା ପରେ, ପାଣ୍ଡବମାନେ ପୁନର୍ବାର ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣା ପାଇଁ ବସିଲେ।
Verse 40
समितिर्धर्मराजस्य सा पार्थिवसमाकुला । शुशुभे तारवैश्षित्रा द्यौश्न्द्रेणेव भारत,भारत! राजाओंसे भरी हुई धर्मराजकी वह सभा तारों और चन्द्रमासे विचित्र शोभा धारण करनेवाले आकाशकी भाँति सुशोभित हुई
ରାଜାମାନଙ୍କରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ସେହି ସଭା, ତାରା ଓ ଚନ୍ଦ୍ରର ଅଦ୍ଭୁତ ଶୋଭାରେ ଭାସୁଥିବା ଆକାଶ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା।
Verse 96
विभीषयन्निव जगत् पाण्डवानभ्यवर्तत । रुक्मी मेघकी गर्जनाके समान भयानक टंकार करनेवाले विजय नामक धनुषको पाकर सम्पूर्ण जगत्को भयभीत-सा करता हुआ पाण्डवोंके यहाँ आया
ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ଭୟଭୀତ କରୁଥିବା ପରି ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲା। ମେଘଗର୍ଜନ ସମ ଭୟଙ୍କର ଟଙ୍କାର କରୁଥିବା ‘ବିଜୟ’ ନାମକ ଧନୁ ପାଇ, ଜଗତକୁ କମ୍ପିତ କରୁଥିବା ପରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲା।
Verse 106
रुक्मिण्या हरणं वीरो वासुदेवेन धीमता । यह वही वीर रुक्मी था, जो अपने बाहुबलके घमंडमें आकर पहले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा किये गये रुक्मिणीके अपहरणको नहीं सह सका था
ସେଇ ଥିଲା ସେ ବୀର ରୁକ୍ମୀ—ନିଜ ବାହୁବଳର ଗର୍ବରେ ମତ୍ତ ହୋଇ, ପରମ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ହୋଇଥିବା ରୁକ୍ମିଣୀ-ହରଣକୁ ସହି ପାରିଲା ନାହିଁ।
Verse 116
ततो<न्वधावद् वार्ष्णेयं सर्वशस्त्रभूतां वर: । वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था। उसने यह प्रतिज्ञा करके कि मैं वृष्णिवंशी श्रीकृष्णको मारे बिना अपने नगरको नहीं लौटूँगा, उनका पीछा किया था
ତାପରେ ସମସ୍ତ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ବୀର ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପଛୁଆଇଲା। ସେ ଭୟଙ୍କର ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲା—“ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ନ ମାରିଲେ ମୁଁ ମୋ ନଗରକୁ ଫେରିବି ନାହିଁ।”
Verse 126
विचित्रायुधवर्मिण्या गड़येव प्रवृद्धया । उस समय उसके साथ विचित्र आयुधों और कवचोंसे सुशोभित, दूरतकके लक्ष्यको मार गिरानेमें समर्थ तथा बढ़ी हुई गंगाके समान विशाल चतुरंगिणी सेना थी
ସେ ସମୟରେ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅଦ୍ଭୁତ ଅସ୍ତ୍ର ଓ କବଚରେ ଶୋଭିତ, ଦୂର ଲକ୍ଷ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ନିହତ କରିବାରେ ସମର୍ଥ, ଏବଂ ବଢ଼ିଥିବା ଗଙ୍ଗା ପରି ବିଶାଳ ଚତୁରଙ୍ଗିଣୀ ସେନା ଥିଲା।
Verse 136
व्यंसितो व्रीडितो राजन् नाजगाम स कुण्डिनम् । राजन! योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके पास पहुँचकर उनसे पराजित होनेके कारण लज्जित हो वह पुनः कुण्डिनपुरको नहीं लौटा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ପରାଜୟରେ ଅପମାନିତ ଓ ଲଜ୍ଜିତ ହୋଇ ସେ କୁଣ୍ଡିନକୁ ପୁନଃ ଫେରିଲା ନାହିଁ। ଯୋଗେଶ୍ୱର ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କ ହାତରେ ପରାଜିତ ହେବାର ଗ୍ଲାନିରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ, ଫେରିବା ପରିବର୍ତ୍ତେ ଦୂରେଇ ରହିଲା।
Verse 146
तत्र भोजकटं नाम कृतं नगरमुत्तमम् । भगवान् श्रीकृष्णने जहाँ युद्धमें शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले रुक्मीको हराया था, वहीं रुक्मीने भोजकट नामक उत्तम नगर बसाया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ‘ଭୋଜକଟ’ ନାମକ ଏକ ଉତ୍ତମ ନଗର ସ୍ଥାପିତ ହେଲା। ଯେଉଁ ସ୍ଥାନରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଶତ୍ରୁବୀରହନ୍ତା ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ରୁକ୍ମୀକୁ ପରାଜିତ କରିଥିଲେ, ସେଇ ଅଞ୍ଚଳରେ ରୁକ୍ମୀ ପରେ ‘ଭୋଜକଟ’ ନାମରେ ଏକ ଭବ୍ୟ ନଗର ବସାଇଲା।
Verse 156
पुरं तद् भुवि विख्यातं नाम्ना भोजकटं नृप । राजन! प्रचुर हाथी-घोड़ोंवाली विशाल सेनासे सम्पन्न वह भोजकट नामक नगर सम्पूर्ण भूमण्डलमें विख्यात है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନୃପ, ସେ ନଗର ପୃଥିବୀରେ ‘ଭୋଜକଟ’ ନାମରେ ବିଖ୍ୟାତ। ହେ ରାଜନ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ାରେ ପ୍ରଚୁର ମହାସେନାରେ ସମୃଦ୍ଧ ସେଇ ଭୋଜକଟ ନଗର ସମଗ୍ର ଲୋକେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
Verse 158
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि रुक्मिप्रत्याख्याने अष्टपञज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବରେ ରୁକ୍ମୀ-ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଅଠାନବେଁଶତମ (୧୫୮ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 166
अक्षौहिण्या महावीर्य: पाण्डवान् क्षिप्रमागमत् । महापराक्रमी भोजराज रुक्मी एक अक्षौहिणी विशाल सेनासे घिरा हुआ शीघ्रतापूर्वक पाण्डवोंके पास आया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାବୀର୍ୟ ଭୋଜରାଜ ରୁକ୍ମୀ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ ଶୀଘ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲା।
Verse 176
ध्वजेनादित्यवर्णेन प्रविवेश महाचमूम् । उसने कवच, धनुष, दस्ताने, खड़ग और तरकस धारण किये सूर्यके समान तेजस्वी ध्वजके साथ पाण्डवोंकी विशाल सेनामें प्रवेश किया
ସେ କବଚ, ଧନୁ, ହସ୍ତମୋଜା, ଖଡ୍ଗ ଓ ତୂଣୀର ଧାରଣ କରି, ସୂର୍ଯ୍ୟସଦୃଶ ଦୀପ୍ତିମାନ ଧ୍ୱଜ ସହ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିଶାଳ ସେନାରେ ପ୍ରବେଶ କଲା।
Verse 186
युधिष्ठिरस्तु तं राजा प्रत्युद्गम्याभ्यपूजयत् । वह वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छासे आया था। पाण्डवोंको उसके आगमनकी सूचना दी गयी, तब राजा युधिष्ठिरने आगे बढ़कर उसकी अगवानी की और उसका यथायोग्य आदर-सत्कार किया
ତାଙ୍କ ଆଗମନର ସୂଚନା ପାଇ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆଗକୁ ବଢ଼ି ତାଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କରି, ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଆଦର-ସତ୍କାର କଲେ।
Verse 196
प्रतिगृह्य तु तान् सर्वान् विश्रान्त: सहसैनिक:ः । पाण्डवोंने रुक्मीका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। रुक्मीने भी उन सबको प्रेमपूर्वक अपनाकर सैनिकोंसहित विश्राम किया
ପାଣ୍ଡବମାନେ ରୁକ୍ମୀଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଆଦର-ସତ୍କାର କରି ଭୂରି-ଭୂରି ପ୍ରଶଂସା କଲେ। ରୁକ୍ମୀ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସ୍ନେହରେ ଗ୍ରହଣ କରି ସେନାସହିତ ବିଶ୍ରାମ କଲେ।
Verse 256
उवाच धीमान् कौन्तेय: प्रहस्य सखिपूर्वकम् | धर्मराज युधिष्ठिर तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप अन्य सब राजाओंके सुनते हुए रुक्मीके ऐसा कहनेपर परमबुद्धिमान् कुन्तीपुत्र अर्जुनने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए मित्रभावसे हँसकर कहा--
ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ରୁକ୍ମୀ ଏପରି କହିବା ପରେ, ପରମବୁଦ୍ଧିମାନ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ବସୁଦେବନନ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଦେଖି, ସଖାଭାବରେ ହସି କହିଲେ—
The chapter pressures the Pāṇḍavas to translate remembered injustice into sanctioned action, intensifying the tension between restraint/peaceful settlement and the asserted duty to uphold honor and vows through decisive enforcement.
Declared intent is portrayed as incomplete without enacted competence: social and moral evaluation, the speech claims, ultimately rests on karma (deed) rather than katthana (boast), especially in matters of royal responsibility and public vows.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as situational meta-commentary by framing war-readiness and vow-enforcement as interpretive lenses for subsequent events rather than promising a recitational merit.