Adhyaya 155
Udyoga ParvaAdhyaya 15538 Versesयुद्ध आरंभ नहीं; कुरु-पक्ष की संगठनात्मक बढ़त—सेनापति नियुक्ति और कुरुक्षेत्र में सुव्यवस्थित पड़ाव—से तैयारी का पलड़ा भारी।

Adhyaya 155

Rukmī’s Offer of Aid and Arjuna’s Refusal (रुक्मिप्रस्तावः—अर्जुनप्रत्याख्यानम्)

Upa-parva: Alliance Mobilization and Rukmī’s Approach (Udyoga Parva, late council episodes)

Vaiśaṃpāyana identifies Rukmī—son of the southern ruler associated with Bhīṣmaka’s line—as a celebrated archer trained in the complete fourfold discipline of dhanurveda. The chapter catalogs divine bows to establish martial hierarchy: Gāṇḍīva (Varuṇa/Pāvaka lineage), Vijaya (Māhendra), and Śārṅga (Vaiṣṇava), with Kṛṣṇa’s acquisition of Śārṅga recalled through prior victories. Rukmī, having obtained the bow Vijaya, advances toward the Pāṇḍavas with a large fourfold army and enters their camp under an aditya-hued banner. Yudhiṣṭhira receives and honors him according to protocol. Rukmī then offers himself as Arjuna’s battlefield helper, claiming unmatched prowess and promising victory services. In the presence of Dharmarāja and Keśava, Arjuna responds with controlled irony, citing earlier high-risk engagements (Ghoṣayātrā episode, Khāṇḍava conflict, battles with Nivātakavacas and Kālakeyas, and Virāṭa’s city) to assert that his established support network and divine armament suffice. He explicitly denies fear and declines the need for additional assistance, permitting Rukmī to go elsewhere. Rukmī withdraws his ocean-like force and approaches Duryodhana, but is similarly rejected. The chapter closes by noting that only two figures abstain from that impending engagement context (Balarāma/Rauhiṇeya and Rukmī), and the Pāṇḍavas resume counsel as the royal assembly shines like a star-filled sky with the moon.

Chapter Arc: कुरु-सेना के विशाल होने पर भी एक प्रश्न धधकता है—यदि ‘सेनाप्रणेतार’ न हो तो यह महाबल भी युद्ध में चींटियों के ढेर-सा बिखर जाएगा। दुर्योधन के सामने अब शस्त्र नहीं, नेतृत्व का संकट खड़ा है। → सभा में तर्क उभरता है कि दो योग्य नायकों की बुद्धि कभी समान नहीं होती; शौर्य और नेतृत्व-प्रतिस्पर्धा भीतर से सेना को फाड़ सकती है। इसी भय के बीच दुर्योधन को ऐसा प्रधान सेनापति चाहिए जो सबको एक ध्वज के नीचे बाँध दे—और जिसकी प्रतिष्ठा स्वयं अनुशासन बन जाए। → भीष्म का प्रधान सेनापति के रूप में अभिषेक—और उनका स्पष्ट वचन कि वे ‘एक शर्त’ पर ही सेनापति होंगे। यह क्षण कुरु-पक्ष की युद्ध-यात्रा को औपचारिक रूप से अपरिवर्तनीय दिशा देता है: अब सेना का सिर तय है, और उसके साथ युद्ध का भाग्य भी। → दुर्योधन, भीष्म को अग्रणी बनाकर, जय-आशीर्वादों के साथ सेना को लेकर निकलता है। कुरुक्षेत्र के निकट मधुर, अनूषर (ऊसर-रहित) प्रदेश में—जहाँ घास और ईंधन प्रचुर हैं—शिविर-निर्माण होता है; व्यवस्था, विभाग और पड़ाव युद्ध-यंत्र को चालू कर देते हैं। → भीष्म की ‘शर्त’ का नैतिक भार और उसका आगामी युद्ध-नीति पर प्रभाव—यह संकेत देता है कि सेनापति का अभिषेक केवल आरंभ है; निर्णायक टकराव अब निकट है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ कराता बा अं षट्पज्चाशर्दाधेकशततमो< ध्याय: दुर्योधनके द्वारा भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर अभिषेक और कुरक्षेत्रमें पहुँचकर शिविर-निर्माण वैशम्पायन उवाच तत: शान्तनवं भीष्म प्राञ्जलिर्धुतराष्ट्रज: । सह सर्वर्महीपालैरिदं वचनमत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन समस्त राजाओंके साथ शान्तनु-नन्दन भीष्मके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସମସ୍ତ ରାଜମାନଙ୍କ ସହିତ ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ହାତ ଯୋଡ଼ି ଏହି କଥା କହିଲା।

Verse 2

ऋते सेनाप्रणेतारं पृतना सुमहत्यपि । दीर्यते युद्धमासाद्य पिपीलिकपुटं यथा,“पितामह! कितनी ही बड़ी सेना क्‍यों न हो? किसी योग्य सेनापतिके बिना युद्धमें जाकर चींटियोंकी पंक्तिके समान छिलन्न-भिन्न हो जाती है

ପିତାମହ! ଯେତେ ବଡ଼ ସେନା ହେଉ ନାହିଁ, ଯୋଗ୍ୟ ସେନାପତି ବିନା ଯୁଦ୍ଧକୁ ଯାଇଲେ ତାହା ପିପିଳିକାର ଶାରୀ ପରି ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ।

Verse 3

न हि जातु द्वयोरबुद्धि: समा भवति कर्हिचित्‌ | शौर्य च बलनेतृणां स्पर्थते च परस्परम्‌,“दो पुरुषोंकी बुद्धि कभी समान नहीं होती। यदि दोनों ओर योग्य सेनापति हों तो उनका शौर्य एक-दूसरेकी होड़में बढ़ता है

ଦୁଇ ଜଣଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି କେବେ ଏକ ସମାନ ହୁଏ ନାହିଁ। ଏବଂ ଉଭୟ ପକ୍ଷରେ ଯୋଗ୍ୟ ସେନାନାୟକ ଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କ ଶୌର୍ଯ୍ୟ ପରସ୍ପର ସ୍ପର୍ଧାରେ ବଢ଼ିଯାଏ।

Verse 4

श्रूयते च महाप्राज्ञ हैहघानमितौजस: । अभ्ययुब्रद्विणा: सर्वे समुच्छितकुशध्वजा:,“महामते! सुना जाता है कि समस्त ब्राह्मणोंने अपनी कुशमयी ध्वजा फहराते हुए पहले कभी अमिततेजस्वी हैहयवंशके क्षत्रियोंपर आक्रमण किया था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାମତେ! ପୁରାତନ ପରମ୍ପରାରେ ଶୁଣାଯାଏ ଯେ ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପବିତ୍ର କୁଶଧ୍ୱଜା ଉଚ୍ଚ କରି, ଏକଦା ଅପରିମିତ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ହୈହୟ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ଉପରେ ବୈରଭାବେ ଆକ୍ରମଣ କରିଥିଲେ।

Verse 5

तानभ्ययुस्तदा वैश्या: शूद्राश्नैव पितामह । एकतत्तु त्रयो वर्णा एकत: क्षत्रियर्षभा:,“पितामह! उस समय ब्राह्मणोंके साथ वैश्यों और शूद्रोंने भी उनपर धावा किया था। एक ओर तीनों वर्णके लोग थे और दूसरी ओर चुने हुए श्रेष्ठ क्षत्रिय

ପିତାମହ! ସେ ସମୟରେ ବୈଶ୍ୟ ଓ ଶୂଦ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ଧାଇଯାଇଥିଲେ। ଏପରି ଏକ ପଟେ ତିନି ବର୍ଣ୍ଣ ଏକତ୍ର ଥିଲେ, ଅନ୍ୟ ପଟେ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବୃଷଭସମାନ ଯୋଦ୍ଧା ଥିଲେ।

Verse 6

ततो युद्धेष्वभज्यन्त त्रयो वर्णा: पुन: पुन: । क्षत्रियाश्न॒ जयन्त्येव बहुलं चैकतो बलम्‌,“तदनन्तर जब युद्ध आरम्भ हुआ, तब तीनों वर्णोके लोग बारंबार पीठ दिखाकर भागने लगे। यद्यपि इनकी सेना अधिक थी तो भी क्षत्रियोंने एकमत होकर उनपर विजय पायी

ତାପରେ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲାବେଳେ ତିନି ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଭାଙ୍ଗି ପଛକୁ ହଟିଲେ; କିନ୍ତୁ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ, ସଂଖ୍ୟାରେ ଅଧିକ ଥିବା ପ୍ରତିପକ୍ଷ ବଳକୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ।

Verse 7

ततस्ते क्षत्रियानेव पप्रच्छुद्धिजसत्तमा: । तेभ्य: शशंसुर्धर्मज्ञा याथातथ्यं पितामह,“पितामह! तब जन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंसे ही पूछा--हमारी पराजयका क्या कारण है? उस समय धर्मज्ञ क्षत्रियोंने उनसे यथार्थ कारण बता दिया

ତାପରେ ସେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ କେବଳ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ—“ଆମ ପରାଜୟର କାରଣ କ’ଣ?” ତେବେ ଧର୍ମଜ୍ଞ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ, ପିତାମହ, ଯେପରି ଘଟିଥିଲା ସେପରି ସତ୍ୟଭାବେ ସେମାନଙ୍କୁ କହିଦେଲେ।

Verse 8

वयमेकस्य शृण्वाना महाबुद्धिमतो रणे । भवन्तस्तु पृथक्‌ सर्वे स्वबुद्धिवशवर्तिन:,“वे बोले--हमलोग एक परम बुद्धिमान्‌ पुरुषको सेनापति बनाकर युद्धमें उसीका आदेश सुनते और मानते हैं। परंतु आप सब लोग पृथक्‌-पृथक्‌ अपनी ही बुद्धिके अधीन हो मनमाना बर्ताव करते हैं

ସେମାନେ କହିଲେ—“ଆମେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଏକ ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ବ୍ୟକ୍ତିର ଆଦେଶ ଶୁଣି ମାନୁ; କିନ୍ତୁ ଆପଣମାନେ ସମସ୍ତେ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ନିଜ ନିଜ ବୁଦ୍ଧିର ବଶରେ ଚାଲନ୍ତି।”

Verse 9

ततस्ते ब्राह्मुणाश्षक्रुरेकं सेनापतिं द्विजम्‌ | नये सुकुशलं शूरमजयन क्षत्रियांस्तत:,“यह सुनकर उन ब्राह्मणोंने एक शूरवीर एवं नीति-निपुण ब्राह्मणको सेनापति बनाया और क्षत्रियोंपर विजय प्राप्त की

ତେବେ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ନୀତିରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କୁଶଳ ଓ ଶୂର ଏକ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଏକମାତ୍ର ସେନାପତି କଲେ; ତାଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ସେମାନେ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କଲେ।

Verse 10

एवं ये कुशल शूरं हितेप्सितमकल्मषम्‌ | सेनापतिं प्रकुर्वन्ति ते जयन्ति रणे रिपून्‌,“इस प्रकार जो लोग किसी हितैषी, पापरहित तथा युद्ध-कुशल शूरवीरको सेनापति बना लेते हैं, वे संग्राममें शत्रुओंपर अवश्य विजय पाते हैं

ଏହିପରି ଯେମାନେ ଯୁଦ୍ଧକୁଶଳ, ଶୂର, ହିତେଚ୍ଛୁ ଓ ନିର୍ମଳ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ସେନାପତି କରନ୍ତି, ସେମାନେ ରଣରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ଜୟ କରନ୍ତି।

Verse 11

भवानुशनसा तुल्यो हितैषी च सदा मम । असंहार्य: स्थितो धर्मे स न: सेनापतिर्भव,“आप सदा मेरा हित चाहनेवाले तथा नीतिमें शुक्राचार्यके समान हैं। आपको आपकी इच्छाके बिना कोई मार नहीं सकता। आप सदा धर्ममें ही स्थित रहते हैं, अतः हमारे प्रधान सेनापति हो जाइये

ଆପଣ ସଦା ମୋର ହିତେଚ୍ଛୁ, ନୀତିରେ ଉଶନସ୍‌ (ଶୁକ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ) ସମାନ। ଆପଣଙ୍କ ଇଚ୍ଛା ବିରୋଧରେ କେହି ଆପଣଙ୍କୁ ମାରିପାରିବ ନାହିଁ। ଆପଣ ଧର୍ମରେ ସ୍ଥିତ; ତେଣୁ ଆମ ସେନାପତି ହୁଅନ୍ତୁ।

Verse 12

रश्मिवतामिवादित्यो वीरुधामिव चन्द्रमा: । कुबेर इव यक्षाणां देवानामिव वासव:,'जैसे किरणोंवाले तेजस्वी पदार्थोंके सूर्य, वृक्ष और ओषधियोंके चन्द्रमा, यक्षोंके कुबेर, देवताओंके इन्द्र, पर्वतोंके मेरु, पक्षियोंके गरुड़, समस्त देवयोनियोंके कार्तिकिय और वसुओंके अग्निदेव अधिपति एवं संरक्षक हैं (उसी प्रकार आप हमारी समस्त सेनाओंके अधिनायक और संरक्षक हों)

ଯେପରି ଦୀପ୍ତିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ, ବନସ୍ପତି ଓ ଔଷଧିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଚନ୍ଦ୍ର, ଯକ୍ଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କୁବେର, ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ପ୍ରଧାନ—ସେପରି ଆପଣ ଆମ ସମସ୍ତ ସେନାର ଅଧିନାୟକ ଓ ରକ୍ଷକ ହୁଅନ୍ତୁ।

Verse 13

पर्वतानां यथा मेरु: सुपर्ण: पक्षिणां यथा । कुमार इव देवानां वसूनामिव हव्यवाट्‌,'जैसे किरणोंवाले तेजस्वी पदार्थोंके सूर्य, वृक्ष और ओषधियोंके चन्द्रमा, यक्षोंके कुबेर, देवताओंके इन्द्र, पर्वतोंके मेरु, पक्षियोंके गरुड़, समस्त देवयोनियोंके कार्तिकिय और वसुओंके अग्निदेव अधिपति एवं संरक्षक हैं (उसी प्रकार आप हमारी समस्त सेनाओंके अधिनायक और संरक्षक हों)

ଯେପରି ପର୍ବତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମେରୁ, ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୁପର୍ଣ୍ଣ (ଗରୁଡ଼), ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କୁମାର (କାର୍ତ୍ତିକେୟ), ଓ ବସୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ହବ୍ୟବାଟ୍ (ଅଗ୍ନି) ପ୍ରଧାନ—ସେପରି ଆପଣ ଆମ ସମସ୍ତ ସେନାର ଅଧିନାୟକ ଓ ରକ୍ଷକ ହୁଅନ୍ତୁ।

Verse 14

भवता हि वंय गुप्ता: शक्रेणेव दिवौकस: । अनाधृष्या भविष्यामस्त्रिदशानामपि ध्रुवम्‌,“इन्द्रके द्वारा सुरक्षित देवताओंकी भाँति आपके संरक्षणमें रहकर हमलोग निश्चय ही देवगणोंके लिये भी अजेय हो जायँगे

ଆପଣଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ଆମେ, ଯେପରି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଦେବମାନଙ୍କୁ ସୁରକ୍ଷା କରନ୍ତି, ସେପରି ନିଶ୍ଚୟ ଅପରାଜେୟ ହେବୁ—ତ୍ରିଦଶମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଅଜେୟ।

Verse 15

प्रयातु नो भवानग्रे देवानामिव पावकि: । वयं त्वामनुयास्थाम: सौरभेया इवर्षभम्‌,'जैसे कार्तिकेय देवताओंके आगे-आगे चलते हैं, वैसे ही आप हमारे अगुआ हों। जैसे बछड़े साँड़के पीछे चलते हैं, उसी प्रकार हम आपका अनुसरण करेंगे”

ଦେବମାନଙ୍କ ଅଗ୍ରେ ଯେପରି ପାବକ (ଅଗ୍ନି) ଅଗ୍ରସର ହୁଏ, ସେପରି ଆପଣ ଆମ ଆଗରେ ଯାଆନ୍ତୁ। ଏବଂ ସୌରଭେୟ ଗାଈମାନଙ୍କ ବଛୁଆମାନେ ଯେପରି ବୃଷଭଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି, ସେପରି ଆମେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରିବୁ।

Verse 16

भीष्म उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत | यथैव हि भवन्तो मे तथैव मम पाण्डवा:,भीष्मने कहा--भारत! तुम जैसा कहते हो वह ठीक है, पर मेरे लिये जैसे तुम हो, वैसे ही पाण्डव हैं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୁ ଭାରତ, ତୁମେ ଯେପରି କହୁଛ, ସେପରି ହିଁ। କାରଣ ମୋ ପାଇଁ ତୁମେ ଯେପରି ଆପଣା, ପାଣ୍ଡବମାନେ ମଧ୍ୟ ସେପରି ଆପଣା।

Verse 17

अपि चैव मया श्रेयो वाच्यं तेषां नराधिप । संयोद्धव्यं तवार्थाय यथा मे समय: कृत:,नरेश्वर! मैं पाण्डवोंको उनके पूछनेपर अवश्य ही हितकी बात बताऊँगा और तुम्हारे लिये युद्ध करूँगा। ऐसी ही मैंने प्रतिज्ञा की है

ଆଉ ହେ ନରାଧିପ, ତାଙ୍କ ଶ୍ରେୟସ୍‌ର କଥା ମଧ୍ୟ ମୋତେ କହିବାକୁ ହେବ; ଏବଂ ତୁମ ପାଇଁ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ହେବ—ମୋର କୃତ ସମୟ (ପ୍ରତିଜ୍ଞା) ଅନୁସାରେ।

Verse 18

न तु पश्यामि योद्धारमात्मन: सदृशं भुवि | ऋते तस्मान्नरव्याप्रात्‌ कुन्तीपुत्रादू धनंजयात्‌,मैं इस भूतलपर नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र अर्जुनके सिवा दूसरे किसी योद्धाको अपने समान नहीं देखता हूँ

କିନ୍ତୁ ଏହି ପୃଥିବୀରେ ମୋ ସମାନ ଯୋଦ୍ଧାକୁ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ—ସେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ବ୍ୟତୀତ।

Verse 19

स हि वेद महाबुद्!िर्दिव्यान्यस्त्राण्यनेकश: । नतुमां विवृतो युद्धे जातु युध्येत पाण्डव:,महाबुद्धिमान्‌ पाण्डुकुमार अर्जुन अनेक दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखते हैं; परंतु वे मेरे सामने आकर प्रकट रूपमें कभी युद्ध नहीं कर सकते

ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ଅନେକ ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ର ଜାଣେ; କିନ୍ତୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ସେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ପ୍ରକାଶ୍ୟ ଭାବେ ଦାଁଡ଼ି କେବେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ ନାହିଁ।

Verse 20

अहं चैव क्षणेनैव निर्मनुष्यमिदं जगत्‌ । कुर्या शस्त्रबलेनैव ससुरासुरराक्षसम्‌,अर्जुनकी ही भाँति मैं भी यदि चाहूँ तो अपने शस्त्रोंके बलसे देवता, मनुष्य, असुर तथा राक्षसोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्‌को क्षणभरमें निर्जीव बना दूँ

ଅର୍ଜୁନ ପରି ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଯଦି ଚାହେଁ, ମୋର ଶସ୍ତ୍ରବଳରେ ଦେବ, ମନୁଷ୍ୟ, ଅସୁର ଓ ରାକ୍ଷସ ସହିତ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ କ୍ଷଣମାତ୍ରରେ ମନୁଷ୍ୟଶୂନ୍ୟ କରିଦେଇପାରିବି।

Verse 21

न त्वेवोत्सादनीया मे पाण्डो: पुत्रा जनाधिप । तस्माद्‌ योधान्‌ हनिष्यामि प्रयोगेणायुतं सदा,परंतु जनेश्वर! मैं पाण्डुके पुत्रोंकी किसी तरह हत्या नहीं करूँगा। कुरुनन्दन! यदि पाण्डव इस युद्धमें मुझे पहले ही नहीं मार डालेंगे तो मैं अपने अस्त्रोंके प्रयोगद्वारा प्रतिदिन उनके पक्षके दस हजार योद्धाओंका वध करता रहूँगा, मैं इस प्रकार इनकी सेनाका संहार करूँगा

କିନ୍ତୁ ହେ ଜନାଧିପ! ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ସମୂଳେ ନାଶ କରିବି ନାହିଁ। ତେଣୁ ମୋର ଅସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗର ନିୟମିତତାରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ସଦା ଦଶହଜାର ଯୋଧାଙ୍କୁ ବଧ କରିଚାଲିବି।

Verse 22

एवमेषां करिष्यामि निधनं कुरुनन्दन । न चेत्‌ ते मां हनिष्यन्ति पूर्वमेव समागमे,परंतु जनेश्वर! मैं पाण्डुके पुत्रोंकी किसी तरह हत्या नहीं करूँगा। कुरुनन्दन! यदि पाण्डव इस युद्धमें मुझे पहले ही नहीं मार डालेंगे तो मैं अपने अस्त्रोंके प्रयोगद्वारा प्रतिदिन उनके पक्षके दस हजार योद्धाओंका वध करता रहूँगा, मैं इस प्रकार इनकी सेनाका संहार करूँगा

ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ଏହିପରି ଭାବେ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କର ନିଧନ ସାଧିବି। ଯଦି ଏହି ସମାଗମରେ ସେମାନେ ପୂର୍ବରୁ ମୋତେ ନ ମାରିପକାନ୍ତି, ତେବେ ମୁଁ ମୋର ଅସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗରେ ପ୍ରତିଦିନ ସେମାନଙ୍କ ପକ୍ଷର ଦଶହଜାର ଯୋଧାଙ୍କୁ ବଧ କରିଚାଲିବି।

Verse 23

सेनापतिस्त्वहं राजन्‌ समये नापरेण ते । भविष्यामि यथाकामं तन्मे श्रोतुमिहाहसि,राजन! मैं अपनी इच्छाके अनुसार एक शर्तपर तुम्हारा सेनापति होऊँगा। उसके बदले दूसरी शर्त नहीं मानूँगा। उस शर्तको तुम मुझसे यहाँ सुन लो

ହେ ରାଜନ୍! ମୋର ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଗୋଟିଏ ଶର୍ତ୍ତରେ ମାତ୍ର ମୁଁ ତୁମର ସେନାପତି ହେବି; ତାହାର ବଦଳରେ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଶର୍ତ୍ତ ମୁଁ ମାନିବି ନାହିଁ। ସେଇ ଶର୍ତ୍ତଟି ତୁମେ ଏଠାରେ ମୋ ମୁଖରୁ ଶୁଣ।

Verse 24

कर्णो वा युध्यतां पूर्वमहं वा पृथिवीपते । स्पर्थते हि सदात्यर्थ सूतपुत्रो मया रणे,पृथ्वीपते! या तो पहले कर्ण ही युद्ध कर ले या मैं ही युद्ध करूँ; क्योंकि यह सूतपुत्र सदा युद्धमें मुझसे अत्यन्त स्पर्धा रखता है

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତି! ପ୍ରଥମେ କର୍ଣ୍ଣ ଯୁଦ୍ଧ କରୁ, କିମ୍ବା ମୁଁ ପ୍ରଥମେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି; କାରଣ ଏହି ସୂତପୁତ୍ର ରଣଭୂମିରେ ସଦା ମୋ ସହ ଅତ୍ୟଧିକ ସ୍ପର୍ଧା କରେ, ହେ ରାଜନ।

Verse 25

कर्ण उवाच नाहं जीवति गाड़ेये राजन्‌ योत्स्पे कथंचन । हते भीष्मे तु योत्स्यामि सह गाण्डीवधन्चना,कर्ण बोला--राजन! मैं गंगानन्दन भीष्मके जीते-जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। इनके मारे जानेपर ही गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ लड़ूँगा

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—ହେ ରାଜନ! ଗଙ୍ଗାପୁତ୍ର ଭୀଷ୍ମ ଜୀବିତ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି ନାହିଁ। ଭୀଷ୍ମ ହତ ହେଲେ ତବେ ମୁଁ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।

Verse 26

वैशम्पायन उवाच ततः सेनापतिं चक्रे विधिवद्‌ भूरिदक्षिणम्‌ । धृतराष्ट्रात्मजो भीष्म सोडभिषिक्तो व्यरोचत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भीष्मजीका प्रधान सेनापतिके पदपर विधिपूर्वक अभिषेक किया। अभिषेक हो जानेपर उनकी बड़ी शोभा हुई

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ବିଧିପୂର୍ବକ, ପ୍ରଚୁର ଦକ୍ଷିଣା ଦେଇ, ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ପ୍ରଧାନ ସେନାପତି ପଦରେ ଅଭିଷେକ କଲା। ଅଭିଷେକ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବା ପରେ ଭୀଷ୍ମ ଅଧିକ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲେ।

Verse 27

ततो भेरीश्व॒ शड्खांश्व शतशो5थ सहस्रश: । वादयामासुरव्यग्रा वादका राजशासनात्‌,तदनन्तर बाजा बजानेवालोंने राजाकी आज्ञासे निर्भय होकर सैकड़ों और हजारों भेरियों तथा शंखोंको बजाया

ତାପରେ ରାଜାଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ବାଦକମାନେ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ଶତଶଃ ସହସ୍ରଶଃ ଭେରୀ ଓ ଶଙ୍ଖ ବଜାଇଲେ।

Verse 28

सिंहनादाश्न विविधा वाहनानां च नि:स्वना: । प्रादुरासन्नन भ्रे च वर्ष रुधिरकर्दमम्‌,उस समय वीरोंके सिंहनाद तथा वाहनोंके नाना प्रकारके शब्द सब ओर गूँज उठे। बिना बादलके ही आकाशसे रक्तकी वर्षा होने लगी, जिसकी कीच जम गयी

ସେତେବେଳେ ବୀରମାନଙ୍କର ନାନାପ୍ରକାର ସିଂହନାଦ ଓ ରଥାଦି ବାହନମାନଙ୍କର ବିଭିନ୍ନ ଗର୍ଜନ ସବୁଦିଗରେ ଗୁଞ୍ଜିଉଠିଲା। ଏବଂ ମେଘ ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଆକାଶରୁ ରକ୍ତବର୍ଷା ହେଲା; ପୃଥିବୀ ରକ୍ତକର୍ଦ୍ଦମରେ ଢାକିଗଲା।

Verse 29

निर्घाता: पृथिवीकम्पा गजबंहितनि:स्वना: । आसंश्न सर्वयोधानां पातयन्तो मनांस्युत,हाथियोंके चिग्घाड़नेके साथ ही बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान भयंकर शब्द होने लगे। धरती डोलने लगी। इन सब उत्पातोंने प्रकट होकर समस्त योद्धाओंके मानसिक उत्साहको दबा दिया

ହାତୀମାନଙ୍କ ଚିତ୍କାର ସହ ବିଜୁଳିର ଗର୍ଜନ ପରି ଭୟଙ୍କର ଶବ୍ଦ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା। ପୃଥିବୀ କମ୍ପି ଉଠିଲା। ଏହି ସମସ୍ତ ଅପଶକୁନ ପ୍ରକଟ ହୋଇ ସମସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କ ମନୋବଳକୁ ଦମନ କରିଦେଲା।

Verse 30

वाचश्नाप्यशरीरिण्यो दिवश्नोल्का: प्रपेदिरे । शिवाश्व भयवेदिन्यो नेदुर्दीप्ततरा भूशम्‌,अशुभ आकाशवाणी सुनायी देने लगी, आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, भयकी सूचना देनेवाली सियारिनियाँ जोर-जोरसे अमंगलजनक शब्द करने लगीं

ଅଶୁଭ ଆକାଶବାଣୀ ଶୁଣାଗଲା, ଆକାଶରୁ ଉଲ୍କା ପଡ଼ିବାକୁ ଲାଗିଲା, ଏବଂ ଭୟର ସୂଚନା ପାଇଥିବା ଶିଆଳମାନେ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ଅମଙ୍ଗଳ ଧ୍ୱନି କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 31

सैनापत्ये यदा राजा गाड़ेयमभिषिक्तवान्‌ | तदैतान्युग्ररूपाणि बभूवु: शतशो नृूप,नरेश्वर! राजा दुर्योधनने जब गंगानन्दन भीष्मको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया, उसी समय ये सैकड़ों भयानक उत्पात प्रकट हुए

ନରେଶ୍ୱର! ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯେତେବେଳେ ଗଙ୍ଗାନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସେନାପତି ପଦରେ ଅଭିଷିକ୍ତ କଲେ, ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଏପରି ଶତଶଃ ଭୟଙ୍କର ଉତ୍ପାତ ପ୍ରକଟ ହେଲା।

Verse 32

ततः सेनापतिं कृत्वा भीष्म परबलार्दनम्‌ | वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान्‌ गोभिनिष्किश्व भूरिश:,इस प्रकार शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले भीष्मको सेनापति बनाकर दुर्योधनने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्‍्वस्तिवाचन कराया और उन्हें गौओं तथा सुवर्णमुद्राओंकी भूरि-भूरि दक्षिणाएँ दीं। उस समय ब्राह्मणोंने विजयसूचक आशीर्वादोंद्वारा राजाका अभ्युदय मनाया और वह सैनिकोंसे घिरकर भीष्मजीको आगे करके भाइयोंके साथ हस्तिनापुरसे बाहर निकला तथा विशाल तम्बू-शामियानोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया

ଏହିପରି ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ପୀଡ଼ାଦାନ କରୁଥିବା ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସେନାପତି କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲେ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କୁ ଗୋଧନ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୁଦ୍ରାର ଅପାର ଦକ୍ଷିଣା ଦେଲେ।

Verse 33

वर्धमानो जयाशोीर्भिनिर्यियौ सैनिकैर्वृत: । आपगेय॑ पुरस्कृत्य भ्रातृभि: सहितस्तदा,इस प्रकार शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले भीष्मको सेनापति बनाकर दुर्योधनने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्‍्वस्तिवाचन कराया और उन्हें गौओं तथा सुवर्णमुद्राओंकी भूरि-भूरि दक्षिणाएँ दीं। उस समय ब्राह्मणोंने विजयसूचक आशीर्वादोंद्वारा राजाका अभ्युदय मनाया और वह सैनिकोंसे घिरकर भीष्मजीको आगे करके भाइयोंके साथ हस्तिनापुरसे बाहर निकला तथा विशाल तम्बू-शामियानोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया

ଏହିପରି ବିଜୟାଶୀର୍ବାଦରେ ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ରାଜା ସେନାଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ବାହାରିଲେ। ଭୀଷ୍ମ—ଆପଗେୟ—ଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସେ ତେବେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।

Verse 34

स्कन्धावारेण महता कुरुक्षेत्र जगाम ह,इस प्रकार शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले भीष्मको सेनापति बनाकर दुर्योधनने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्‍्वस्तिवाचन कराया और उन्हें गौओं तथा सुवर्णमुद्राओंकी भूरि-भूरि दक्षिणाएँ दीं। उस समय ब्राह्मणोंने विजयसूचक आशीर्वादोंद्वारा राजाका अभ्युदय मनाया और वह सैनिकोंसे घिरकर भीष्मजीको आगे करके भाइयोंके साथ हस्तिनापुरसे बाहर निकला तथा विशाल तम्बू-शामियानोंके साथ कुरुक्षेत्रको गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ମହା ସ୍କନ୍ଧାବାର ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଯାତ୍ରା କଲା। ଶତ୍ରୁସେନାକୁ ପୀଡ଼ା ଦେବାରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ସେନାପତି କରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ କରାଇଲା ଏବଂ ସେମାନଙ୍କୁ ଗୋଧନ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣମୁଦ୍ରାର ଅପାର ଦକ୍ଷିଣା ଦେଲା। ତାପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବିଜୟସୂଚକ ଆଶୀର୍ବାଦରେ ରାଜାଙ୍କ ଅଭ୍ୟୁଦୟ ପାଳନ କଲେ। ରାଜା ସେନାବେଷ୍ଟିତ ହୋଇ, ଆଗରେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ରଖି, ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ହସ୍ତିନାପୁରରୁ ବାହାରି, ବିଶାଳ ତମ୍ବୁ-ଶାମିଆନା ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଗଲା।

Verse 35

परिक्रम्य कुरुक्षेत्र कर्णेन सह कौरव: । शिबिरं मापयामास समे देशे जनाधिप,जनमेजय! कर्णके साथ कुरक्षेत्रमें जाकर दुर्योधनने एक समतल प्रदेशमें शिविरके लिये भूमिको नपवाया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଜନମେଜୟ! କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସହ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ପରିକ୍ରମା କରି କୌରବ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ଏକ ସମତଳ ପ୍ରଦେଶରେ ଶିବିର ସ୍ଥାପନ ପାଇଁ ଭୂମି ମାପିବାକୁ ଆଦେଶ ଦେଲା।

Verse 36

मधुरानूषरे देशे प्रभूतयवसेन्धने । यथैव हास्तिनपुरं तद्गच्छिेबिरमाबभौ,ऊसररहित मनोहर प्रदेशमें जहाँ घास और ईंधनकी बहुतायत थी, दुर्योधनकी सेनाका शिविर हस्तिनापुरकी भाँति सुशोभित होने लगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମଧୁର ଓ ଊସର-ରହିତ ପ୍ରଦେଶରେ, ଯେଉଁଠାରେ ଚାରା-ଘାସ ଓ ଇନ୍ଧନ ପ୍ରଚୁର ଥିଲା, ସେଠାରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନାଶିବିର ହସ୍ତିନାପୁର ପରି ଶୁଭ୍ର ଓ ଶୋଭାମୟ ହୋଇ ଉଠିଲା।

Verse 155

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें दुर्योधनकी सेनाका विभागविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନାର ବିଭାଗ-ବିନ୍ୟାସ ବିଷୟକ ଏକଶେ ପଚପନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 156

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि भीष्मसैनापत्ये षट्पञज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବରେ ଭୀଷ୍ମସେନାପତ୍ୟ-ପ୍ରକରଣର ଏକଶେ ଛପନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

Whether to accept powerful assistance from a politically motivated ally whose past grievances may compromise trust—balancing immediate advantage against long-term strategic and ethical risk.

Legitimate strength includes discernment: alliances are not merely additive; reliability, prior conduct, and alignment with dharma determine whether support stabilizes or destabilizes a just cause.

No explicit phalaśruti appears; the meta-function is historiographic and ethical—ranking weapons and reputations to clarify why some offers are refused despite apparent utility.