
उद्योगपर्व — अध्याय १५१: कृष्णस्य कौरव-अवज्ञा-निर्णयः तथा पाण्डव-योगाज्ञा (Krishna on the Kauravas’ Rejection of Counsel; Pandava Readiness Ordered)
Upa-parva: Udyoga Parva — Counsel and Mobilization (Krishna–Yudhishthira Deliberation Unit)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, recalling Kṛṣṇa’s earlier statements, asks what course is now proper and how the Pāṇḍavas may act without deviating from svadharma. He appeals to Kṛṣṇa’s comprehensive knowledge of the intentions of Duryodhana, Karṇa, Śakuni, and also of Vidura, Bhīṣma, and Kuntī. Kṛṣṇa responds that he has already delivered beneficial counsel grounded in dharma and artha, but it does not take root in Duryodhana, portrayed as guided by harmful calculation and reliance on Karṇa. Kṛṣṇa notes that Duryodhana disregards even Bhīṣma, Droṇa, Vidura, and Kṛṣṇa himself; most follow Duryodhana’s line except Vidura. He characterizes the negative tendencies within the Kaurava camp as concentrated around their leadership, while affirming that the Pāṇḍavas do not seek extreme renunciation; they seek peace, but if peace fails, structured engagement follows. Hearing this, allied rulers look to Yudhiṣṭhira; he orders ‘yoga’ (organized readiness/array) with Bhīma, Arjuna, and the twins. The army becomes animated. Yudhiṣṭhira voices ethical distress about conflict with ‘avadhya’ persons and the prospect of victory through harm to elders and teachers. Arjuna reiterates confidence in Kṛṣṇa’s and the elders’ counsel as non-adharmic and argues that withdrawal without engagement is improper. Kṛṣṇa affirms Arjuna. The Pāṇḍavas, resolved, pass the night in composure with their forces prepared.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र की सीमा पर पाण्डव-सेना का आगमन होता है—परन्तु युधिष्ठिर पहले ही आदेश देते हैं कि श्मशान, देवालय, ऋषि-आश्रम, तीर्थ और सिद्ध-क्षेत्रों से दूर ही पड़ाव डाला जाए, ताकि भूमि की पवित्रता और लोक-धर्म अक्षुण्ण रहे। → राजाओं और असंख्य वाहनों के विश्राम के बाद सेना आगे बढ़ती है; कुरुक्षेत्र के पुण्य-प्रदेश में प्रवेश करते ही शिविर-व्यवस्था का प्रश्न विशाल रूप ले लेता है—लाखों योद्धा, गज, अश्व, रथ, रसद, जल और सुरक्षा—सबका सम्यक् विन्यास आवश्यक है। → केशव (कृष्ण) स्वयं पाण्डवों के शिविर-विधान का संचालन कराते हैं; युधिष्ठिर प्रत्येक शिविर में बहुजल, सुयवस (उत्तम घास), भूसी और अग्नि-भार (ईंधन/व्यवस्था) की प्रचुर व्यवस्था कराते हैं, और पर्वत-से गजराजों की कतारें युद्ध-तत्पर दिखाई देती हैं—मानो धरती पर ‘विमान’ उतर आए हों। → पृथक्-पृथक् राजाओं के शिविर सुव्यवस्थित रूप से भूमि पर स्थापित हो जाते हैं; कुरुक्षेत्र में पाण्डव-सेना का पड़ाव पूर्ण होता है और अभियान का अगला चरण (कौरव-पक्ष के समक्ष निर्णायक स्थिति) निकट आ जाता है। → अब जब दोनों पक्षों की सेनाएँ कुरुक्षेत्र में जम चुकी हैं, अगला प्रश्न अनिवार्य बनता है—क्या शान्ति का कोई द्वार शेष है, या युद्ध का शंख अब अवश्य बजेगा?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका इं श्लोक मिलाकर कुल ७१ ३ “लोक हैं।] भीकम (2 अमान द्विपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कुरुक्षेत्रमें पाण्डव-सेनाका पड़ाव तथा शिविर-निर्माण वैशम्पायन उवाच ततो देशे समे स्निग्धे प्रभूतयवसेन्धने । निवेशयामास तदा सेनां राजा युधिष्ठटिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने एक चिकने और समतल प्रदेशमें जहाँ घास और ईंधनकी अधिकता थी, अपनी सेनाका पड़ाव डाला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସମତଳ ଓ ସୁମଧୁର ଏକ ସ୍ଥାନରେ, ଯେଉଁଠାରେ ଘାସ ଓ ଇନ୍ଧନ ପ୍ରଚୁର ଥିଲା, ସେଠାରେ ନିଜ ସେନାର ପଡ଼ାଉ ଦେଲେ।
Verse 2
परिहृत्य श्मशानानि देवतायतनानि च । आश्रमांश्व महर्षीणां तीर्थान्यायतनानि च,श्मशान, देवमन्दिर, महर्षियोंके आश्रम, तीर्थ और सिद्धक्षेत्र--इन सबका परित्याग करके उन स्थानोंसे बहुत दूर ऊसररहित मनोहर शुद्ध एवं पवित्र स्थानमें जाकर कुन्तीपुत्र महामति युधिष्ठटिरने अपनी सेनाको ठहराया
ଶ୍ମଶାନ, ଦେବମନ୍ଦିର, ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରମ, ତୀର୍ଥ ଓ ପୁଣ୍ୟସ୍ଥାନ—ଏ ସବୁକୁ ପରିହାର କରି, ସେଠାରୁ ଅତି ଦୂରେ, ଉସର ନଥିବା, ମନୋହର, ଶୁଚି ଓ ପବିତ୍ର ଦେଶରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ମହାମତି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ସେନାକୁ ଶିବିର କରାଇଲେ—ଯେପରି ପବିତ୍ର ସ୍ଥାନମାନଙ୍କ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ ନ ହୁଏ।
Verse 3
मधुरानूषरे देशो शुचौ पुण्ये महामति: । निवेशं कारयामास कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,श्मशान, देवमन्दिर, महर्षियोंके आश्रम, तीर्थ और सिद्धक्षेत्र--इन सबका परित्याग करके उन स्थानोंसे बहुत दूर ऊसररहित मनोहर शुद्ध एवं पवित्र स्थानमें जाकर कुन्तीपुत्र महामति युधिष्ठटिरने अपनी सेनाको ठहराया
ମଧୁର, ଉସର-ରହିତ, ଶୁଚି ଓ ପୁଣ୍ୟ ଦେଶରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ମହାମତି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେନାର ନିବାସ (ଶିବିର) କରାଇଲେ। ଶ୍ମଶାନ, ଦେବମନ୍ଦିର, ଋଷିଆଶ୍ରମ, ତୀର୍ଥ ଓ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ପୁଣ୍ୟସ୍ଥାନମାନଙ୍କୁ ଦୂରେ ରଖି ଏହି ବ୍ୟବସ୍ଥା କରି, ସେ ଯୁଦ୍ଧସନ୍ନାହରେ ମଧ୍ୟ ସଂଯମ ଓ ଧର୍ମମର୍ଯ୍ୟାଦାକୁ ଅଟୁଟ ରଖିଲେ।
Verse 4
ततश्न पुनरुत्थाय सुखी विश्रान्तवाहन: । प्रययौ पृथिवीपालैव[त: शतसहसत्रश:,तत्पश्चात् समस्त वाहनोंके विश्राम कर लेनेपर स्वयं भी विश्रामसुखका अनुभव करके भगवान् श्रीकृष्ण उठे और सैकड़ों-हजारों भूमिपालोंसे घिरकर कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ आगे बढ़े। उन्होंने दुर्योधनके सैकड़ों सैनिक दलोंको दूर भगाकर वहाँ सब ओर विचरण करना प्रारम्भ किया
ତାପରେ, ରଥ ଓ ଅଶ୍ୱମାନେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ରାମ କରିଥିବାବେଳେ, ନିଜେ ମଧ୍ୟ ବିଶ୍ରାମସୁଖ ଅନୁଭବ କରି, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପୁନର୍ବାର ଉଠିଲେ। ଶତ-ସହସ୍ର ଭୂପାଳମାନଙ୍କ ଘେରାଉରେ, କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ସହ ଆଗକୁ ବଢ଼ି, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଅନେକ ସେନାଦଳକୁ ଦୂରେ ହଟାଇ, ସେଠାରେ ସବୁଦିଗରେ ନିର୍ବାଧ ଭାବେ ବିଚରଣ କରିଲେ।
Verse 5
विद्राव्य शतशो गुल्मान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । पर्यक्रामत् समन्ताच्च पार्थेन सह केशव:,तत्पश्चात् समस्त वाहनोंके विश्राम कर लेनेपर स्वयं भी विश्रामसुखका अनुभव करके भगवान् श्रीकृष्ण उठे और सैकड़ों-हजारों भूमिपालोंसे घिरकर कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ आगे बढ़े। उन्होंने दुर्योधनके सैकड़ों सैनिक दलोंको दूर भगाकर वहाँ सब ओर विचरण करना प्रारम्भ किया
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେନାର ଶତଶଃ ଦଳକୁ ଖେଦାଇ ଦେଇ, କେଶବ ପାର୍ଥ ସହ ସେଠାରେ ସବୁଦିଗରେ ପରିଭ୍ରମଣ କଲେ।
Verse 6
शिबिरं मापयामास धृष्टय्युम्नश्न पार्षत: । सात्यकिश्व रथोदारो युयुधान: प्रतापवान्,द्रपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा प्रतापशाली एवं उदाररथी सत्यकपुत्र युयुधानने शिविर बनानेयोग्य भूमि नापी
ପାର୍ଷତପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଶିବିର ପାଇଁ ଭୂମି ମାପି ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରାଇଲେ; ଏବଂ ଉଦାର ରଥଧାରୀ ପ୍ରତାପବାନ୍ ଯୁୟୁଧାନ ସାତ୍ୟକି ମଧ୍ୟ ଶିବିର ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ ସହଯୋଗ କଲେ।
Verse 7
आसाद्य सरितं पुण्यां कुरुक्षेत्रे हिरण्वतीम् | सूपतीर्था शुचिजलां शर्करापड्कवर्जिताम्,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତନନ୍ଦନ ଜନମେଜୟ! କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ‘ହିରଣ୍ୱତୀ’ ନାମକ ଏକ ପୁଣ୍ୟ ନଦୀ ଅଛି। ତାହାର ଜଳ ନିର୍ମଳ ଓ ପବିତ୍ର; ତଟରେ ସୁନ୍ଦର ସ୍ନାନଘାଟ ଅଛି; ତାହାରେ କଙ୍କଡ଼, ପଥର ଓ କାଦୁଆର ଲେଶ ନାହିଁ। ସେହି ନଦୀ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ପରିଖା ଖୋଦାଇଲେ, ରକ୍ଷା ପାଇଁ ପହରାଦାର ନିଯୁକ୍ତ କଲେ ଏବଂ ସେଠାରେ ହିଁ ସେନାକୁ ରଖିଲେ। ଯେପରି ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଶିବିର ବ୍ୟବସ୍ଥା ହୋଇଥିଲା, ସେହିପରି କେଶବ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଶିବିର ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଇଲେ।
Verse 8
खानयामास परिखां केशवस्तत्र भारत । गुप्त्यर्थमपि चादिश्य बल तत्र न्यवेशयत्,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! କେଶବ ସେଠାରେ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ପରିଖା ଖୋଦାଇଲେ; ଏବଂ ସୁରକ୍ଷାର ନିମିତ୍ତେ ଆଦେଶ ଦେଇ ସେଠାରେ ହିଁ ସେନାକୁ ନିୟୋଜିତ କଲେ।
Verse 9
विधिर्य: शिबिरस्यासीत् पाण्डवानां महात्मनाम् | तद्विधानि नरेन्द्राणां कारयामास केशव:,भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है। उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं। उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है। उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया। महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଶିବିର ଯେଉଁ ବିଧି-ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ ସ୍ଥାପିତ ହୋଇଥିଲା, ସେହି ଏକେ ବିଧାନରେ କେଶବ ଅନ୍ୟ ନରେନ୍ଦ୍ରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଶିବିର କରାଇଲେ।
Verse 10
राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक्-पृथक् बनवाये गये थे। उनके भीतर बहुत-से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य- भोज्य अन्न एवं पान-सामग्रीका संग्रह किया गया था। वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେ ସମୟରେ ରାଜାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଶତଶଃ ସହସ୍ରଶଃ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଓ ବହୁମୂଲ୍ୟ ଶିବିର ନିର୍ମିତ ହୋଇଥିଲା। ସେଗୁଡ଼ିକ ଭିତରେ ବହୁ କାଠ, ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ଅନ୍ନ ଓ ପାନ-ପାନୀୟ ସାମଗ୍ରୀର ପ୍ରଚୁର ସଂଗ୍ରହ ରଖାଯାଇଥିଲା। ଭୂମିରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ସମସ୍ତ ଶିବିର ବିମାନମାନଙ୍କ ପରି ଶୋଭା ପାଉଥିଲେ।
Verse 11
राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक्-पृथक् बनवाये गये थे। उनके भीतर बहुत-से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य- भोज्य अन्न एवं पान-सामग्रीका संग्रह किया गया था। वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜନ୍! ସେ ସମୟରେ ରାଜାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଶତଶଃ ସହସ୍ରଶଃ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଓ ବହୁମୂଲ୍ୟ ଶିବିର ନିର୍ମିତ ହୋଇଥିଲା। ସେଗୁଡ଼ିକ ଭିତରେ ବହୁ କାଠ, ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ଅନ୍ନ, ବିଭିନ୍ନ ପାନୀୟ ଓ ଆବଶ୍ୟକ ସାମଗ୍ରୀ ପ୍ରଚୁର ଭାବେ ସଂଗ୍ରହିତ ଥିଲା। ଭୂମିରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଶିବିରଗୁଡ଼ିକ ଦେବବିମାନମାନଙ୍କ ପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଥିଲେ।
Verse 12
तत्रासन् शिल्पिन: प्राज्ञा: शतशो दत्तवेतना: । सर्वोपकरणैरयुक्ता वैद्या: शास्त्रविशारदा:,वहाँ सैकड़ों विद्वान शिल्पी और शास्त्रविशारद वैद्य वेतन देकर रखे गये थे, जो समस्त आवश्यक उपकरणोंके साथ वहाँ रहते थे
ସେଠାରେ ଶତଶଃ ପ୍ରାଜ୍ଞ ଶିଳ୍ପୀମାନଙ୍କୁ ବେତନ ଦେଇ ନିଯୁକ୍ତ କରାଯାଇଥିଲା; ଏବଂ ଶାସ୍ତ୍ରବିଶାରଦ ବୈଦ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ଆବଶ୍ୟକ ଉପକରଣ ସହିତ ସେଠାରେ ରହୁଥିଲେ।
Verse 13
ज्याभनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषो: । ससर्जरसपांसूनां राशय: पर्वतोपमा:,प्रत्येक शिविरमें प्रत्यंचा, धनुष, कवच, अस्त्र-शस्त्र, मधु, घी तथा रालका चूरा--इन सबके पहाड़ों-जैसे ढेर लगे हुए थे
ପ୍ରତ୍ୟେକ ଶିବିରରେ ଧନୁର୍ଜ୍ୟା, ଧନୁ, କବଚ ଓ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରର, ତଥା ମଧୁ, ଘିଅ ଏବଂ ରାଳର ଚୁରାର—ପର୍ବତସମ ଢେର ଥିଲା।
Verse 14
बहूदकं सुयवसं तुषाड्भारसमन्वितम् । शिबिरे शिबिरे राजा संचकार युधिष्ठिर:,राजा युधिष्ठिरने प्रत्येक शिविरमें प्रचुर जल, सुन्दर घास, भूसी और अग्निका संग्रह करा रखा था
ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଶିବିରରେ ପ୍ରଚୁର ଜଳ, ଉତ୍ତମ ଚାରା-ଘାସ, ଏବଂ ଭୁସି ଓ ଇନ୍ଧନର ଢେର ସଂଗ୍ରହ କରାଇ ରଖିଥିଲେ।
Verse 15
महायन्त्राणि नाराचास्तोमराणि परकश्चधा: । धनूंषि कवचादीनि ऋष्टयस्तूणसंयुता:,बड़े-बड़े यन्त्र, नाराच, तोमर, फरसे, धनुष, कवच, ऋष्टि और तरकस--ये सब वस्तुएँ भी उन सभी शिविरोंमें संगृूहीत थीं
ମହାଯନ୍ତ୍ର, ନାରାଚ, ତୋମର, ପରଶ୍ୱଧ, ଧନୁ, କବଚାଦି, ଏବଂ ତୂଣସହିତ ଋଷ୍ଟି—ଏ ସମସ୍ତ ଯୁଦ୍ଧସାମଗ୍ରୀ ସେହି ସମସ୍ତ ଶିବିରରେ ସଂଗ୍ରହିତ ଥିଲା।
Verse 16
गजा: कण्टकसंनाहा लोहवर्मोत्तरच्छदा: । दृश्यन्ते तत्र गिर्याभा: सहस्रशतयोधिन:,वहाँ लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ पर्वतोंके समान विशालकाय बहुत-से हाथी दिखायी देते थे, जो काँटेदार साज-सामान, लोहेके कवच तथा लोहेकी ही झूल धारण किये हुए थे
ସେଠାରେ କଣ୍ଟକସଂନାହ ପିନ୍ଧି, ଲୋହକବଚ ଓ ଲୋହଝୁଲ ଧାରଣ କରିଥିବା—ପର୍ବତସମ ବିଶାଳ ଗଜମାନେ ଦେଖାଯାଉଥିଲେ; ସେମାନେ ଶତ-ସହସ୍ର ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ ଥିଲେ।
Verse 17
निविष्टान् पाण्डवांस्तत्र ज्ञात्वा मित्राणि भारत । अभिससुर्यथादेशं सबला: सहवाहना:,भारत! पाण्डवोंने कुरुक्षेत्रमें जाकर अपनी सेनाका पड़ाव डाल दिया है, यह जानकर उनसे मित्रता रखनेवाले बहुत-से राजा अपनी सेना और सवारियोंके साथ उनके पास, जहाँ वे ठहरे थे, आये
ହେ ଭାରତ! ପାଣ୍ଡବମାନେ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଯାଇ ଯେଉଁଠାରେ ସେନାର ଶିବିର ସ୍ଥାପନ କରିଥିଲେ, ଏହା ଜାଣି ସେମାନଙ୍କର ମିତ୍ର ଅନେକ ରାଜା ନିଜ ନିଜ ସେନା ଓ ବାହନ ସହିତ ସେଠାକୁ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 18
चरितन्रह्मचर्यास्ते सोमपा भूरिदक्षिणा: । जयाय पाण्दुपुत्राणां समाजम्मुर्महीक्षित:,जिन्होंने यथासमय ब्रह्मचर्यव्रतका पालन, यज्ञोंमें सोमरसका पान तथा प्रचुर दक्षिणाओंका दान किया था, ऐसे भूपालगण पाण्डवोंकी विजयके लिये कुरुक्षेत्रमें पधारे
ଯେଉଁ ରାଜାମାନେ ଯଥାବିଧି ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟବ୍ରତ ପାଳନ କରିଥିଲେ, ଯଜ୍ଞରେ ସୋମପାନ କରିଥିଲେ ଓ ପ୍ରଚୁର ଦକ୍ଷିଣା ଦାନ କରିଥିଲେ—ସେହି ଭୂପାଳମାନେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଜୟ ପାଇଁ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ସମବେତ ହେଲେ।
Verse 20
प्रभूततरकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च । भक्ष्यभोज्यान्नपानानि शतशो5थ सहस्रश:
ସେଠାରେ ଇନ୍ଧନ କାଠ ଅତ୍ୟଧିକ ଥିଲା; ଶତ୍ରୁ ପାଇଁ ଛିନିନେବାକୁ ଅଧିକ ଦୁର୍ଲଭ ଏମିତି ସଞ୍ଚୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ; ଏବଂ ଭକ୍ଷ୍ୟ, ଭୋଜ୍ୟ, ଅନ୍ନ ଓ ପାନୀୟ—ସବୁ ଶତଶଃ ସହସ୍ରଶଃ ପରିମାଣରେ ଯୋଗାଡ଼ ହୋଇଥିଲା।
Verse 131
शिबिराणि महाहणि राज्ञां तत्र पृथक् पृथक् । विमानानीव राजेन्द्र निविष्टानि महीतले
ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେଠାରେ ରାଜାମାନଙ୍କର ବିଶାଳ ଶିବିରଗୁଡ଼ିକ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ସ୍ଥାନରେ ଏମିତି ଭାବେ ଭୂମିତଳେ ବସିଥିଲା, ଯେନେ ବିମାନମାନେ।
Verse 151
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें पाण्डवसेनाका कुरुक्षेत्रगें प्रवेशविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସୈନ୍ୟନିର୍ୟାଣପର୍ବରେ ପାଣ୍ଡବସେନାର କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରପ୍ରବେଶ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଏକାନ୍ନବତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 152
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि शिबिरादिनिर्माणे द्विपज्चाशदधिकशततमो<्ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ସେନା-ନିର୍ୟାଣପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଶିବିର-ନିର୍ମାଣ ଓ ବ୍ୟବସ୍ଥାପନ ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଏକଶେ ବାଉନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
He fears deviation from svadharma if conflict proceeds, especially the ethical burden of engaging ‘avadhya’ persons and the prospect of success obtained through harm to elders and teachers.
Ethically grounded counsel should be offered and evaluated, but when governance becomes unreceptive to dharma-artha reasoning, responsible leadership may require organized preparedness while still preferring reconciliation over excess.
No explicit phalaśruti is presented in the provided passage; the meta-significance lies in documenting the transition from counsel to readiness and framing the ethical rationale for action within the epic’s broader dharma inquiry.