Adhyaya 145
Udyoga ParvaAdhyaya 14529 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं हुआ; पर कर्ण की प्रतिज्ञा से भावी युद्ध का स्वरूप तय होने लगता है—चार पाण्डव अपेक्षाकृत सुरक्षित, अर्जुन पर संकट केंद्रित।

Adhyaya 145

भीष्मस्य दुर्योधनं प्रति कुलहितोपदेशः | Bhīṣma’s Counsel to Duryodhana on Dynastic Welfare

Upa-parva: Kṛṣṇa–Pāṇḍava Mantra (Upaplavya Counsel Episode)

Vaiśaṃpāyana narrates that Krishna returns from Hāstinapura to Upaplavya and reports events to the Pāṇḍavas. After releasing allied kings and performing twilight observances, the Pāṇḍavas recall Krishna for renewed deliberation. Yudhiṣṭhira asks what Duryodhana said in the Kuru assembly and requests the views of elders—Bhīṣma, Droṇa, Vidura (kṣattā), and other kings. Krishna replies that he delivered counsel that was factual, salutary, and beneficial, but Duryodhana did not accept it. Krishna then recounts the sabhā scene: Duryodhana laughs upon hearing Krishna’s message, prompting Bhīṣma to speak in anger yet with dynastic intent. Bhīṣma frames his authority through autobiographical history: Śaṃtanu’s lineage problem, Bhīṣma’s vow (renunciation of kingship and procreation) for kula preservation, installation of Vicitravīrya, and the subsequent crisis of governance and public suffering when the kingdom lacked a ruler. Bhīṣma describes how citizens and elites urged him to rule for the sake of social stability, but he maintained his vow and instead facilitated succession through Vyāsa, resulting in heirs where Dhṛtarāṣṭra’s blindness prevented kingship and Pāṇḍu assumed the throne. Bhīṣma’s normative conclusion to Duryodhana is constitutional and ethical: avoid internecine conflict, restore equilibrium by granting an appropriate share of the kingdom, heed elders, and do not destroy oneself and the earth through distrust and disregard of counsel.

Chapter Arc: रात्रि के एकांत में कुन्ती सूर्यपुत्र कर्ण के पास पहुँचती है—मातृत्व का सत्य और राज्य-राजनीति का संकट एक ही श्वास में टकराते हैं। → कुन्ती अपना रहस्य खोलकर कर्ण को पाण्डव-पक्ष में आने, या कम-से-कम भाई-भाई के रक्तपात को रोकने का आग्रह करती है। कर्ण के भीतर जन्म-परिचय की पुकार और दुर्योधन के ऋण की बेड़ियाँ साथ-साथ कसती जाती हैं; सूर्य (भानु) और पिता-तुल्य सत्य का आग्रह भी उसे डिगाने का प्रयत्न करता है। → कर्ण निर्णायक वचन देता है: वह दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ेगा, क्योंकि उसे धृतराष्ट्र-पुत्रों से मान, दान और प्रतिष्ठा मिली है; पर वह कुन्ती को एक प्रतिज्ञा देता है—अर्जुन को छोड़कर शेष चार पाण्डवों को वह नहीं मारेगा। → कुन्ती कर्ण के ‘अभयदान’ को स्वीकार करती है; कर्ण अपनी निष्ठा और मर्यादा दोनों को एक साथ साधने का प्रयास करता है—दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता निभाते हुए मातृ-वचन का मान भी रखता है। → युद्ध अवश्यंभावी रह जाता है: अब प्रश्न केवल इतना है कि कर्ण-अर्जुन का सामना किस दिन, किस घड़ी, और किस मूल्य पर होगा।

Shlokas

Verse 1

अपर षट्चत्वारिशर्दाधेकशततमो< ध्याय: कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा वैशम्पायन उवाच ततः सूर्यन्निश्वरितां कर्ण: शुश्राव भारतीम्‌ । दुरत्ययां प्रणयिनीं पितृवद्‌ भास्करेरिताम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर सूर्यमण्डलसे एक वाणी प्रकट हुई, जो सूर्यदेवकी ही कही हुई थी। उसमें पिताके समान स्नेह भरा हुआ था और वह दुर्लड्घ्य प्रतीत होती थी। कर्णने उसे सुना

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ କର୍ଣ୍ଣ ସୂର୍ୟମଣ୍ଡଳରୁ ନିଷ୍କ୍ରାନ୍ତ ଏକ ବାଣୀ ଶୁଣିଲା। ସେହି ବାଣୀ ଭାସ୍କରଙ୍କ ନିଜ ଉଚ୍ଚାରଣ—ପିତୃସ୍ନେହରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, କିନ୍ତୁ ଅବହେଳା କରିବାକୁ ଦୁର୍ଲଂଘ୍ୟ ପ୍ରତୀତ।

Verse 2

सत्यमाह पृथा वाक्‍्यं कर्ण मातृवच: कुरु । श्रेयस्ते स्यान्नरव्याप्र सर्वमाचरतस्तथा,(वह वाणी इस प्रकार थी--) “नरश्रेष्ठ कर्ण! कुन्ती सत्य कहती है। तुम माताकी आज्ञाका पालन करो। उसका पूर्णरूपसे पालन करनेपर तुम्हारा कल्याण होगा”

“କର୍ଣ୍ଣ! ପୃଥା ସତ୍ୟ କହୁଛନ୍ତି। ମାତୃବଚନ ପାଳନ କର। ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ତାହାକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଆଚରଣ କଲେ ତୋର ଶ୍ରେୟ ହେବ।”

Verse 3

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्य मात्रा च स्वयं पित्रा च भानुना । चचाल नैव कर्णस्य मति: सत्यधृतेस्तदा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମାତା ଓ ସ୍ୱୟଂ ପିତା ଭାନୁ ଏପରି କହିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ସମୟରେ ସତ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ମତି କିଛିମାତ୍ରେ ଚଳିତ ହେଲା ନାହିଁ।

Verse 4

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! माता कुन्ती और पिता साक्षात्‌ सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर भी उस समय सच्चे धैर्यवाले कर्णकी बुद्धि विचलित नहीं हुई ।। कर्ण उवाच न चैतच्छुद्दधे वाक्य क्षत्रिये भाषितं त्वया । धर्मद्वारं ममैतत्‌ स्यान्नियोगकरणं तव,कर्ण बोला--राजपुत्रि! तुमने जो कुछ कहा है, उसपर मेरी श्रद्धा नहीं होती। तुम्हारी इस आज्ञाका पालन करना मेरे लिये धर्मका द्वार है, इसपर भी मैं विश्वास नहीं करता

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲା—“ହେ କ୍ଷତ୍ରିୟକନ୍ୟେ! ତୁମେ କହିଥିବା ଏହି କଥାରେ ମୋର ଶ୍ରଦ୍ଧା ହୁଏ ନାହିଁ। ତୁମ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ ଯଦି ମୋ ପାଇଁ ଧର୍ମର ଦ୍ୱାର ମଧ୍ୟ ହୁଏ, ତଥାପି ମୁଁ ଏହାକୁ ସତ୍ୟ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିପାରେ ନାହିଁ।”

Verse 5

अकरोन्मयि यत्‌ पापं भवती सुमहात्ययम्‌ | अपाकीर्णोउस्मि यन्मातस्तद्‌ यश: कीर्तिनाशनम्‌,तुमने मेरे प्रति जो अत्याचार किया है, वह महान्‌ कष्टदायक है। माता! तुमने जो मुझे पानीमें फेंक दिया, वह मेरे लिये यश और कीर्तिका नाशक बन गया

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ— ମୋ ପ୍ରତି ତୁମେ ଯେ ପାପ କରିଛ, ସେ ମହା ଅପରାଧ; ତାହାରୁ ମୁଁ ଭୟଙ୍କର ଦୁଃଖ ଭୋଗିଛି। ମା, ତୁମେ ମୋତେ ପାଣିରେ ଫେଙ୍ଗିଦେଇଥିଲ, ସେଥିପାଇଁ ମୁଁ ପରିତ୍ୟକ୍ତ ପରି ଜୀବନ କାଟିଛି; ଏବଂ ସେଇ ମୋର ଯଶ ଓ କୀର୍ତ୍ତିର ନାଶକ ହୋଇଛି।

Verse 6

अहं चेत्‌ क्षत्रियो जातो न प्राप्त: क्षत्रसत्क्रियाम्‌ । त्वत्कृते कि नु पापीय: शत्रु: कुर्यान्ममाहितम्‌,यद्यपि मैं क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ था तो भी तुम्हारे कारण क्षत्रियोचित संस्कारसे वंचित रह गया। कोई शत्रु भी मेरा इससे बढ़कर कष्टदायक एवं अहितकारक कार्य और क्या कर सकता है?

ମୁଁ ଯଦିଓ କ୍ଷତ୍ରିୟକୁଳରେ ଜନ୍ମିଥିଲି, ତଥାପି ତୁମ ଦୋଷରୁ କ୍ଷତ୍ରିୟୋଚିତ ସଂସ୍କାର ଓ ସ୍ୱୀକୃତି ପାଇଲି ନାହିଁ। ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଃଖଦାୟକ ଓ ଅହିତକର କାମ ଗୋଟିଏ ଶତ୍ରୁ ମଧ୍ୟ ମୋ ପାଇଁ କ’ଣ କରିପାରିଥାନ୍ତା?

Verse 7

क्रियाकाले त्वनुक्रोशमकृत्वा त्वमिमं मम | हीनसंस्कारसमयमद्य मां समचूचुद:,जब मेरे लिये कुछ करनेका अवसर था, उस समय तो तुमने यह दया नहीं दिखायी और आज जब मेरे संस्कारका समय बीत गया है, ऐसे समयमें तुम मुझे क्षात्रधर्मकी ओर प्रेरित करने चली हो

ମୋ ପାଇଁ କିଛି କରିବାର ସମୟ ଥିଲାବେଳେ ତୁମେ କରୁଣା କଲ ନାହିଁ। ଆଜି—ମୋର ସଂସ୍କାରର ସମୟ ଅତୀତ ହୋଇଗଲା ପରେ—ତୁମେ ମୋତେ କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମ ପଥେ ପ୍ରେରିତ କରିବାକୁ ଆସିଛ।

Verse 8

नवै मम हित पूर्व मातृवच्चेष्टितं त्वया । सा मां सम्बोधयस्यद्य केवलात्महितैषिणी,पूर्वकालमें तुमने माताके समान मेरे हितकी चेष्टा कभी नहीं की और आज केवल अपने हितकी कामना रखकर मुझे मेरे कर्तव्यका उपदेश दे रही हो

ପୂର୍ବେ ତୁମେ କେବେ ମାଆ ପରି ମୋ ହିତ ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କରିନାହ। ଆଜି କିନ୍ତୁ କେବଳ ନିଜ ସ୍ୱାର୍ଥ ଚାହିଁ ମୋତେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ଉପଦେଶ ଦେଉଛ।

Verse 9

कृष्णेन सहितात्‌ को वै न व्यथेत धनंजयात्‌ | कोउ्दय भीतं न मां विद्यात्‌ पार्थानां समितिं गतम्‌,श्रीकृष्णके साथ मिले हुए अर्जुनसे आज कौन वीर भय मानकर पीड़ित नहीं होता? यदि इस समय मैं पाण्डवोंकी सभामें सम्मिलित हो जाऊँ तो मुझे कौन भयभीत नहीं समझेगा?

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସହିତ ଥିବା ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଦେଖି ଆଜି କେଉଁ ବୀର ଅସ୍ଥିର ହେବ ନାହିଁ? ଏବଂ ଏହି ସମୟରେ ମୁଁ ପାର୍ଥମାନଙ୍କ ସଭାରେ ଯାଇ ଯୋଗ ଦେଲେ, ମୋତେ ଭୟଭୀତ ବୋଲି କେଉଁଜଣ ଭାବିବେ ନାହିଁ?

Verse 10

अभ्राता विदितः: पूर्व युद्धकाले प्रकाशित: । पाण्डवान्‌ यदि गच्छामि किं मां क्षत्रं वदिष्यति,आजसे पहले मुझे कोई नहीं जानता था कि मैं पाण्डवोंका भाई हूँ। युद्धके समय मेरा यह सम्बन्ध प्रकाशमें आया है। इस समय यदि पाण्डवोंसे मिल जाऊँ तो क्षत्रियसमाज मुझे क्या कहेगा?

ଆଗରୁ କେହି ଜାଣିନଥିଲେ ଯେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଭାଇ; ଯୁଦ୍ଧକାଳରେ ମୋର ଏହି ସମ୍ବନ୍ଧ ପ୍ରକାଶ ପାଇଛି। ଏବେ ଯଦି ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଏ, ତେବେ କ୍ଷତ୍ରିୟସମାଜ ମୋତେ କ’ଣ କହିବ?

Verse 11

सर्वकामै: संविभक्तः पूजितश्न॒ यथासुखम्‌ । अहं वै धार्तराष्ट्राणां कुर्या तदफलं कथम्‌,धृतराष्ट्रके पुत्रोंने मुझे सब प्रकारकी मनोवांछित वस्तुएँ दी हैं और मुझे सुखपूर्वक रखते हुए सदा मेरा सम्मान किया है। उनके उस उपकारको मैं निष्फल कैसे कर सकता हूँ?

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମୋତେ ସମସ୍ତ ମନୋବାଞ୍ଛିତ ଭୋଗ ଦେଇଛନ୍ତି, ସମ୍ମାନ କରିଛନ୍ତି ଏବଂ ସୁଖରେ ରଖିଛନ୍ତି। ସେମାନଙ୍କ ଉପକାରକୁ ମୁଁ କିପରି ନିଷ୍ଫଳ କରିପାରିବି?

Verse 12

उपनहा परैवरं ये मां नित्यमुपासते । नमस्कुर्वन्ति च सदा वसवो वासवं यथा,शत्रुओंसे वैर बाँधकर जो नित्य मेरी उपासना करते हैं तथा जैसे वसुगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार जो सदा मुझे मस्तक झुकाते हैं, मेरी ही प्राणशक्तिके भरोसे जो शत्रुओंके सामने डटकर खड़े होनेका साहस करते हैं और इसी आशासे जो मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथको मैं छिन्न-भिन्न कैसे करूँ?

ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧି ଯେମାନେ ନିତ୍ୟ ମୋର ଉପାସନା କରନ୍ତି, ଏବଂ ବସୁଗଣ ଯେପରି ବାସବ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରନ୍ତି ସେପରି ସଦା ମୋତେ ମସ୍ତକ ନମାନ୍ତି; ମୋର ପ୍ରାଣବଳର ଭରସାରେ ଶତ୍ରୁମୁଖେ ଅଡ଼ି ରହିବାକୁ ସାହସ କରନ୍ତି ଓ ସେଇ ଆଶାରେ ମୋତେ ସମ୍ମାନ କରନ୍ତି—ସେମାନଙ୍କ ମନୋରଥକୁ ମୁଁ କିପରି ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ କରିବି?

Verse 13

मम प्राणेन ये शत्रूज्शक्ता: प्रतिसमासितुम्‌ । मन्यन्ते ते कथं तेषामहं छिन्द्यां मनोरथम्‌,शत्रुओंसे वैर बाँधकर जो नित्य मेरी उपासना करते हैं तथा जैसे वसुगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार जो सदा मुझे मस्तक झुकाते हैं, मेरी ही प्राणशक्तिके भरोसे जो शत्रुओंके सामने डटकर खड़े होनेका साहस करते हैं और इसी आशासे जो मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथको मैं छिन्न-भिन्न कैसे करूँ?

ଯେମାନେ ଭାବନ୍ତି ଯେ ମୋର ପ୍ରାଣବଳ ଓ ଶକ୍ତିର ଭରସାରେ ସେମାନେ ଶତ୍ରୁମୁଖେ ଟିକି ରହିପାରିବେ—ସେମାନଙ୍କ ଆଶାକୁ ମୁଁ କିପରି ଭାଙ୍ଗିଦେବି?

Verse 14

मया प्लवेन संग्राम तितीर्षन्ति दुरत्ययम्‌ । अपारे पारकामा ये त्यजेयं तानहं कथम्‌,जो मुझको ही नौका बनाकर उसके सहारे दुर्लड्घ्य समरसागरको पार करना चाहते हैं और मेरे ही भरोसे अपार संकटसे पार होनेकी इच्छा रखते हैं, उन्हें इस संकटके समयमें कैसे त्याग दूँ?

ଯେମାନେ ମୋତେ ନୌକା କରି ଏହି ଦୁରତିକ୍ରମ୍ୟ ସଂଗ୍ରାମ-ସାଗର ପାର କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି, ଏବଂ ମୋର ଭରସାରେ ତୀରହୀନ ମହାସଙ୍କଟରୁ ପାର ହେବାକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରନ୍ତି—ଏହି ସଙ୍କଟବେଳେ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ କିପରି ତ୍ୟାଗ କରିବି?

Verse 15

अयं हि काल: सम्प्राप्तो धार्तराष्ट्रीपजीविनाम्‌ । निर्वेष्टव्यं मया तत्र प्राणानपरिरक्षता,दुर्योधनके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंके लिये यही उपकारका बदला चुकानेके योग्य अवसर आया है। इस समय मुझे अपने प्राणोंकी रक्षा न करते हुए उनके ऋणसे उऋण होना है

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁଅମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ଯେମାନେ ଜୀବିକା ଚାଲାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ଉପକାରର ଋଣ ଶୋଧିବାକୁ ଏହି ସମୟଟି ଯଥାଯଥ ଭାବେ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି। ଏବେ ପ୍ରାଣରକ୍ଷାକୁ ଅବହେଳା କରି ମୋତେ ସେଇ ଋଣ ଉତାରିବାକୁ ହେବ।

Verse 16

कृतार्था: सुभृता ये लक व वस्थिता कृत्यकाले हाुपस्थिते । अनवेक्ष्य कृतं पापा न्त्यनवस्थिता:

ଯେମାନେ କୃତାର୍ଥ ଓ ସୁପାଳିତ, କର୍ତ୍ତବ୍ୟର ସମୟ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ ନୀତିରେ ସ୍ଥିର ରହନ୍ତି, ସେମାନେ କଦାପି ଡଗମଗାନ୍ତି ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ପାପୀ ଓ ଅସ୍ଥିରଚିତ୍ତ ଲୋକେ ପୂର୍ବକୃତ ଉପକାର ଓ ଧର୍ମକୁ ନ ଦେଖି ହଠକାରୀ ହୋଇ ପଡନ୍ତି।

Verse 17

राजकिल्बिषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम्‌ | नैवायं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम्‌

ଯେମାନେ ରାଜାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅପରାଧ କରନ୍ତି ଓ ନିଜ ସ୍ୱାମୀଙ୍କ ଅନ୍ନ-ଜୀବିକା ଅପହରଣ କରନ୍ତି, ସେହି ପାପକର୍ମୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନ ଏହି ଲୋକରେ, ନ ପରଲୋକରେ—କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ କଲ୍ୟାଣ ନାହିଁ।

Verse 18

जो किसीके द्वारा अच्छी तरह पालित-पोषित होकर कृतार्थ होते हैं; परंतु उस उपकारका बदला चुकाने-योग्य समय आनेपर जो अस्थिरचित्त पापात्मा पुरुष पूर्वकृत उपकारोंको न देखकर बदल जाते हैं, वे स्वामीके अन्नका अपहरण करनेवाले तथा उपकारी राजाके प्रति अपराधी हैं। उन पापाचारी कृतघ्नोंके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही ।। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामर्थे योत्स्यामि ते सुतैः । बलं॑ च शक्ति चास्थाय न वै त्वय्यनृतं वदे,मैं तुमसे झूठ नहीं बोलता। धृतराष्ट्रके पुत्रोंक लिये मैं अपनी शक्ति और बलके अनुसार तुम्हारे पुत्रोंके साथ युद्ध अवश्य करूँगा

ଯେମାନେ କାହାରୋ ଦ୍ୱାରା ଭଲଭାବେ ପାଳିତ-ପୋଷିତ ହୋଇ କୃତାର୍ଥ ହୁଅନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ଉପକାରର ପ୍ରତିଦାନ ଦେବା ସମୟ ଆସିଲେ ଅସ୍ଥିରଚିତ୍ତ ପାପାତ୍ମା ହୋଇ ପୂର୍ବକୃତ ଉପକାରକୁ ନ ଦେଖି ପଲଟିଯାଆନ୍ତି—ସେମାନେ ସ୍ୱାମୀଙ୍କ ଅନ୍ନ ଅପହରଣକାରୀ ଓ ଉପକାରୀ ରାଜାଙ୍କ ପ୍ରତି ଅପରାଧୀ। ଏମିତି କୃତଘ୍ନ ପାପୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନ ଏହି ଲୋକ ସୁଖଦ, ନ ପରଲୋକ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁଅମାନଙ୍କ ନିମିତ୍ତେ ମୁଁ ତୁମ ପୁଅମାନଙ୍କ ସହ ନିଶ୍ଚୟ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି—ମୋର ବଳ ଓ ଶକ୍ତିକୁ ଆଧାର କରି। ମୁଁ ତୁମକୁ ମିଥ୍ୟା କହୁନାହିଁ।

Verse 19

आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन्‌ सत्पुरुषोचितम्‌ । अतोडर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वच:,परंतु उस दशामें भी दयालुता तथा सज्जनोचित सदाचारकी रक्षा करता रहूँगा। इसीलिये लाभदायक होते हुए भी तुम्हारे इस आदेशको आज मैं नहीं मानूँगा

ତଥାପି ସେହି ଦଶାରେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଦୟା ଓ ସତ୍ପୁରୁଷୋଚିତ ସଦାଚାରକୁ ରକ୍ଷା କରିବି। ଏହିକାରଣରୁ ଲାଭଦାୟକ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଆଜି ମୁଁ ତୁମ ଆଦେଶ ପାଳନ କରିବି ନାହିଁ।

Verse 20

न च ते5यं समारम्भो मयि मोघो भविष्यति । वध्यान्‌ विषदह्ाान्‌ संग्रामे न हनिष्यामि ते सुतान्‌,परंतु मेरे पास आनेका जो कष्ट तुमने उठाया है, वह भी व्यर्थ नहीं होगा। संग्राममें तुम्हारे चार पुत्रोंको काबूके अंदर तथा वधके योग्य अवस्थामें पाकर भी मैं नहीं मारूँगा। वे चार हैं, अर्जुनको छोड़कर युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव। युधिष्ठिरकी सेनामें अर्जुनके साथ ही मेरा युद्ध होगा

ମୋ ପାଖକୁ ଆସି ତୁମେ କରିଥିବା ଏହି ପ୍ରୟାସ ବ୍ୟର୍ଥ ହେବ ନାହିଁ। ଯୁଦ୍ଧରେ ଯଦି ତୁମ ପୁଅମାନେ ମୋ ବଶରେ ପଡ଼ନ୍ତି ଏବଂ ବଧଯୋଗ୍ୟ ଅବସ୍ଥାରେ ଥାଆନ୍ତି, ତଥାପି ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ମାରିବି ନାହିଁ। ମୋର ସମର କେବଳ ଅର୍ଜୁନ ସହିତ; ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ, ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ—ଏହି ଚାରିଜଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଛାଡ଼ିଦେବି।

Verse 21

युधिष्ठिरं च भीम॑ं च यमौ चैवार्जुनादते । अर्जुनेन समं॑ युद्धमपि यौधिष्िरे बले,परंतु मेरे पास आनेका जो कष्ट तुमने उठाया है, वह भी व्यर्थ नहीं होगा। संग्राममें तुम्हारे चार पुत्रोंको काबूके अंदर तथा वधके योग्य अवस्थामें पाकर भी मैं नहीं मारूँगा। वे चार हैं, अर्जुनको छोड़कर युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव। युधिष्ठिरकी सेनामें अर्जुनके साथ ही मेरा युद्ध होगा

ଅର୍ଜୁନକୁ ଛାଡ଼ି ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ ଓ ଯମଜ ଭାଇ ନକୁଳ-ସହଦେବ—ଏମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ଆଘାତ କରିବି ନାହିଁ; ଯୁଦ୍ଧର ଭିଡ଼ରେ ସେମାନେ ମୋ ବଶରେ ପଡ଼ିଲେ ମଧ୍ୟ। ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେନାରେ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋର ଯୁଦ୍ଧ ଅର୍ଜୁନ ସହିତ ହିଁ ହେବ।

Verse 22

अर्जुन हि निहत्याजौ सम्प्राप्तं स्थात्‌ फलं मया | यशसा चापि युज्येयं निहतः सव्यसाचिना,अर्जुनको युद्धमें मार देनेपर मुझे संग्रामका फल प्राप्त हो जायगा अथवा स्वयं ही सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारा जाकर मैं यशका भागी बनूँगा

ଯୁଦ୍ଧରେ ମୁଁ ଅର୍ଜୁନକୁ ନିହତ କରିଲେ ଏହି ସମରର ସତ୍ୟ ଫଳ ମୋତେ ମିଳିବ; ଅଥବା ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ହାତରେ ମୁଁ ନିହତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଯଶର ସହିତ ଯୁକ୍ତ ହେବି।

Verse 23

नते जातु न शिष्यन्ति पुत्रा: पजच यशस्विनि । निरर्जुना: सकर्णा वा सार्जुना वा हते मयि,यशस्विनि! किसी भी दशामें तुम्हारे पाँच पुत्र अवश्य शेष रहेंगे। यदि अर्जुन मारे गये तो कर्णसहित और यदि मैं मारा गया तो अर्जुनसहित तुम्हारे पाँच पुत्र रहेंगे

ହେ ଯଶସ୍ବିନୀ! କେବେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ପାଞ୍ଚ ପୁଅ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନଷ୍ଟ ହେବେ ନାହିଁ। ଯଦି ଅର୍ଜୁନ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ କର୍ଣ୍ଣ ସହିତ ତୁମ ପାଞ୍ଚ ପୁଅ ରହିବେ; ଯଦି ମୁଁ ନିହତ ହୁଏ, ତେବେ ଅର୍ଜୁନ ସହିତ ତୁମ ପାଞ୍ଚ ପୁଅ ରହିବେ।

Verse 24

इति कर्णवच: श्रुत्वा कुन्ती दुःखात्‌ प्रवेपती । उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्ण धैर्यादकम्पनम्‌,कर्णकी यह बात सुनकर कुन्ती धैर्यसे विचलित न होनेवाले अपने पुत्र कर्णको हृदयसे लगाकर दुःखसे काँपती हुई बोली--

କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଏହି କଥା ଶୁଣି କୁନ୍ତୀ ଦୁଃଖରେ କମ୍ପିତ ହେଲେ। ଧୈର୍ୟରେ ଅଚଳ ନିଜ ପୁଅ କର୍ଣ୍ଣକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ସେ କହିଲେ।

Verse 25

एवं वै भाव्यमेतेन क्षयं यास्यन्ति कौरवा: । यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु बलवत्तरम्‌

ନିଶ୍ଚୟ ଏହିପରି ହେବ—ଏହି ପଥରେ କୌରବମାନେ କ୍ଷୟକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବେ। ଯେପରି ତୁମେ କହୁଛ, କର୍ଣ୍ଣ; କିନ୍ତୁ ଦୈବ ଅଧିକ ବଳବାନ।

Verse 26

“कर्ण! दैव बड़ा बलवान है। तुम जैसा कहते हो वैसा ही हो। इस युद्धके द्वारा कौरवोंका संहार होगा ।। त्वया चतुर्णा भ्रातृणामभयं शत्रुकर्शन । दत्त तत्‌ प्रतिजानीहि संगरप्रतिमोचनम्‌

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ଦୈବ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଳବାନ; ତୁମେ ଯେପରି କହୁଛ, ସେପରି ହେଉ। ଏହି ଯୁଦ୍ଧ ଦ୍ୱାରା କୌରବମାନଙ୍କର ବିନାଶ ହେବ। ହେ ଶତ୍ରୁକର୍ଷଣ! ତୁମେ ଚାରି ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ଅଭୟ ଦେଇଛ; ତେଣୁ ସେହି ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଦୃଢ଼ ରୁହ, ରଣସଙ୍କଟରୁ ସେମାନଙ୍କୁ ମୁକ୍ତ କର।”

Verse 27

'शत्रुसूदन! तुमने अपने चार भाइयोंको अभयदान दिया है। युद्धमें उन्हें छोड़ देनेकी प्रतिज्ञापर दृढ़ रहना ।। अनामयं स्वस्ति चेति पृथाथो कर्णमत्रवीत्‌ । तां कर्णो5थ तथेत्युक्त्वा ततस्तौ जग्मतु: पृथक्‌,“तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें किसी प्रकारका कष्ट न हो।” इस प्रकार जब कुन्तीने कर्णसे कहा, तब कर्णने भी “तथास्तु” कहकर उसकी बात मान ली। फिर वे दोनों पृथक्‌-पृथक्‌ अपने स्थानको चले गये

କର୍ଣ୍ଣ କହିଲେ—“ହେ ଶତ୍ରୁସୂଦନ! ତୁମେ ନିଜ ଚାରି ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ଅଭୟ ଦେଇଛ; ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ିଦେବା ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଦୃଢ଼ ରୁହ।” ତାପରେ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) କର୍ଣ୍ଣକୁ କହିଲେ—“ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ; ତୁମକୁ କୌଣସି ରୋଗ-କଷ୍ଟ ନ ହେଉ।” କର୍ଣ୍ଣ “ତଥାସ୍ତୁ” କହି ତାଙ୍କ କଥା ଗ୍ରହଣ କଲେ; ତା’ପରେ ଦୁହେଁ ନିଜ ନିଜ ସ୍ଥାନକୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଚାଲିଗଲେ।

Verse 145

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवशद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णकी भेंटके प्रसंगें एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କୁନ୍ତୀ ଓ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସମାଗମ-ପ୍ରସଙ୍ଗ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଏକଶେ ପଞ୍ଚଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 146

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे षट्चत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णका भेंटविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ କୁନ୍ତୀ ଓ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସମାଗମ-ବିଷୟକ ଏକଶେ ଛୟାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a ruler, when offered truthful and welfare-oriented counsel, will restrain personal ambition and accept a just settlement (including sharing sovereignty) or reject counsel and risk self-destruction and societal harm—an explicit dharma-sankat of governance under temptation.

The chapter teaches that legitimacy is sustained by listening to elders and prioritizing public and dynastic welfare over ego; counsel must be satya–pathya–hita, but its efficacy depends on the recipient’s discipline and willingness to subordinate desire to dharma.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-level function is structural—recording a normative archive of counsel and refusal, so the listener understands how ethical options were articulated before escalation and how institutional advice was procedurally exhausted.