Adhyaya 14
Udyoga ParvaAdhyaya 1418 Verses

Adhyaya 14

Upaśruti Guides Indrāṇī to Indra; Indrāṇī Reports Nahuṣa’s Misconduct (उपश्रुति-इन्द्राणी-इन्द्रदर्शन प्रसङ्गः)

Upa-parva: Nahuṣa–Indra Episode (Embedded Akhyāna within Udyoga Parva)

Śalya narrates an episode in which the divine figure Upaśruti approaches Indrāṇī (Śacī), who honors her and asks her identity. Upaśruti identifies herself and, noting Indrāṇī’s disciplined fidelity, offers to show her Indra (Śakra), the slayer of Vṛtra. They travel across divine forests, mountains, beyond Himavat, and to a vast ocean and great island, arriving at a luminous lake filled with multicolored lotuses and birds. Entering through a lotus stalk and its filaments, they behold Indra in an extremely subtle form; Upaśruti also assumes subtlety. Indrāṇī praises Indra, who then asks why she has come and how he was found. Indrāṇī recounts that Nahuṣa, having obtained Indra’s status, became intoxicated with power and arrogance, coercively commanding her attendance and setting a deadline. Distressed, she appeals to Indra to reveal himself, regain his splendor, resume governance, and neutralize Nahuṣa’s wrongful intent—an ethical appeal to restore legitimate order against abusive authority.

Chapter Arc: शल्य युधिष्ठिर को एक दिव्य प्रसंग सुनाते हैं—देवी उपश्रुति सत्य-भाव से इन्द्राणी के निकट आती हैं, मानो स्वर्ग के भीतर कोई गुप्त संकट दस्तक दे रहा हो। → इन्द्राणी प्रसन्न होकर उपश्रुति से उसका परिचय पूछती हैं। उपश्रुति अपना कारण बताती है: नहुष ने इन्द्र-पद पाकर अहंकार में अन्धा होकर इन्द्राणी को वश में करने का क्रूर आदेश दिया है; भय और अपमान का बादल स्वर्ग पर छा गया है। → उपश्रुति इन्द्र को पुकारती है—‘प्रकाशय आत्मानम्… तेजः समाप्नुहि… देवराज्यं प्रशाधि’—और नहुष के पाप-निश्चय को रोकने हेतु इन्द्र से अपने तेज को प्रकट कर पुनः देव-राज्य संभालने की निर्णायक विनती करती है। → इन्द्राणी-उपश्रुति का संवाद संकट की जड़ स्पष्ट कर देता है: स्वर्ग का सिंहासन अस्थायी हाथों में गया तो धर्म डगमगाता है; समाधान का संकेत इन्द्र के पुनः प्रकट होकर अधिकार ग्रहण करने में है। → इन्द्र क्या अपने सूक्ष्म/गुप्त रूप से प्रकट होकर नहुष के दर्प का दमन करेंगे, या स्वर्ग का अपमान और बढ़ेगा?

Shlokas

Verse 1

अफ्--छक+ चतुर्दशो 5 ध्याय: उपश्रुति देवीकी सहायतासे इन्द्राणीकी इन्द्रसे भेंट शल्य उवाच अथीैनां रूपिणी साध्वीमुपातिष्ठदुपश्रुति: । तां वयोरूपसम्पन्नां दृष्टवा देवीमुपस्थिताम्‌,शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर उपश्रुति देवी मूर्तिमती होकर साध्वी शचीदेवीके पास आयीं। नूतन वय तथा मनोहर रूपसे सुशोभित उपश्रुति देवीको उपस्थित हुई देख इन्द्राणीका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने उनका पूजन करके कहा--'सुमुखि! मैं आपको जानना चाहती हूँ, बताइये, आप कौन हैं?”

ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଉପାଶ୍ରୁତି ଦେବୀ ଦୃଶ୍ୟ ରୂପ ଧାରଣ କରି ସାଧ୍ବୀ ଶଚୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ। ନବଯୌବନ ଓ ମନୋହର ରୂପସମ୍ପନ୍ନ ଦେବୀଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖରେ ଦେଖି ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ।

Verse 2

इन्द्राणी सम्प्रहृष्टात्मा सम्पूज्यैनाम थाब्रवीत्‌ । इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं का त्वं ब्रूहि वरानने,शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर उपश्रुति देवी मूर्तिमती होकर साध्वी शचीदेवीके पास आयीं। नूतन वय तथा मनोहर रूपसे सुशोभित उपश्रुति देवीको उपस्थित हुई देख इन्द्राणीका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने उनका पूजन करके कहा--'सुमुखि! मैं आपको जानना चाहती हूँ, बताइये, आप कौन हैं?”

ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ତାଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ପୂଜା କରି କହିଲେ—‘ହେ ସୁନ୍ଦରମୁଖୀ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଜାଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି; କହ, ତୁମେ କିଏ?’

Verse 3

उपश्रुतिर्वाच उपश्रुतिरहं देवि तवान्तिकमुपागता । दर्शन चैव सम्प्राप्ता तव सत्येन भाविनि,उपश्रुति बोलीं--देवि! मैं उपश्रुति हूँ और तुम्हारे पास आयी हूँ। भामिनि! तुम्हारे सत्यसे प्रभावित होकर मैंने तुम्हें दर्शन दिया है

ଉପଶ୍ରୁତି କହିଲେ—ଦେବି! ମୁଁ ଉପଶ୍ରୁତି; ତୁମ ସନ୍ନିଧିକୁ ଆସିଛି। ହେ ସୁନ୍ଦରୀ, ତୁମ ସତ୍ୟର ପ୍ରଭାବରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ମୁଁ ତୁମକୁ ଦର୍ଶନ ଦେଇଛି।

Verse 4

पतिव्रता च युक्ता च यमेन नियमेन च । दर्शयिष्यामि ते शक्रं देवं वृत्रनिषूदनम्‌,तुम पतिव्रता होनेके साथ ही यम और नियमसे संयुक्त हो, अतः मैं तुम्हें वृत्रासुरनिषूदन इन्द्रदेवका दर्शन कराऊँगी

ତୁମେ ପତିବ୍ରତା ଓ ଯମ-ନିୟମର ସଂଯମରେ ଯୁକ୍ତ; ତେଣୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ବୃତ୍ରନିଷୂଦନ ଶକ୍ର—ଇନ୍ଦ୍ରଦେବଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରାଇବି।

Verse 5

क्षिप्रमन्वेहि भद् ते द्रक्ष्यसे सुरसत्तमम्‌ । ततस्तां प्रहितां देवीमिन्द्राणी सा समन्वगात्‌,तुम्हारा कल्याण हो। तुम शीघ्र मेरे पीछे-पीछे चली आओ। तुम्हें सुरश्रेष्ठ देवराजके दर्शन होंगे। ऐसा कहकर उपश्रुति देवी वहाँसे चल दीं; फिर इन्द्राणी भी उनके पीछे हो लीं

ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଶୀଘ୍ର ମୋ ପଛେ ପଛେ ଆସ; ତୁମେ ସୁରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦେବରାଜଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିବ। ଏହିପରି କହି ଦେବୀ ଉପଶ୍ରୁତି ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ; ଏବଂ ପ୍ରେରିତା ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଗଲେ।

Verse 6

देवारण्यान्यतिक्रम्य पर्वतांश्व बहुंस्‍तत: । हिमवन्तमत्तिक्रम्य उत्तरं पार्श्वमागमत्‌,देवताओंके अनेकानेक वन, बहुतसे पर्वत तथा हिमालयको लाँघकर उपश्रुति देवी उसके उत्तर भागमें जा पहुँचीं। तदनन्तर अनेक योजनोंतक फैले हुए समुद्रके पास पहुँचकर उन्होंने एक महाद्वीपमें प्रवेश किया, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित था

ଦେବତାମାନଙ୍କ ଅରଣ୍ୟ ଓ ଅନେକ ପର୍ବତ ଅତିକ୍ରମ କରି, ହିମବାନ୍‌କୁ ମଧ୍ୟ ଲଂଘି, ଉପଶ୍ରୁତି ଦେବୀ ଉତ୍ତର ଅଞ୍ଚଳକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 7

समुद्रं च समासाद्य बहुयोजनविस्तृतम्‌ । आससाद महाद्वीपं नानाद्रुमलतावृतम्‌,देवताओंके अनेकानेक वन, बहुतसे पर्वत तथा हिमालयको लाँघकर उपश्रुति देवी उसके उत्तर भागमें जा पहुँचीं। तदनन्तर अनेक योजनोंतक फैले हुए समुद्रके पास पहुँचकर उन्होंने एक महाद्वीपमें प्रवेश किया, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित था

ତାପରେ ବହୁ ଯୋଜନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ତୃତ ସମୁଦ୍ରତଟକୁ ପହଞ୍ଚି, ନାନା ପ୍ରକାର ଦ୍ରୁମ ଓ ଲତାରେ ଆବୃତ ଏକ ମହାଦ୍ୱୀପକୁ ସେ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ।

Verse 8

तत्रापश्यत्‌ सरो दिव्यं नानाशकुनिभिर्व॒तम्‌ । शतयोजनविस्तीर्ण तावदेवायतं शुभम्‌,वहाँ एक दिव्य सरोवर दिखायी दिया, जिसमें अनेक प्रकारके जल-पक्षी निवास करते थे। वह सुन्दर सरोवर सौ योजन लंबा और उतना ही चौड़ा था

ସେଠାରେ ସେ ଏକ ଦିବ୍ୟ ସରୋବର ଦେଖିଲେ, ଯାହା ନାନା ପ୍ରକାର ଜଳପକ୍ଷୀମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା। ସେଇ ଶୁଭ ଓ ସୁନ୍ଦର ସରୋବର ଶତ ଯୋଜନ ପ୍ରସ୍ତ ଏବଂ ତତ୍ତିକି ଦୀର୍ଘ ଥିଲା।

Verse 9

तत्र दिव्यानि पद्मानि पञ्चवर्णानि भारत । षट्पदैरुपगीतानि प्रफुल्लानि सहस्रश:,भारत! उसके भीतर सहस्रों कमल खिले हुए थे, जो पाँच रंगके दिखायी देते थे। उनपर मँडराते हुए भौंरे गुनगुना रहे थे

ହେ ଭାରତ! ସେଥିରେ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଦିବ୍ୟ ପଦ୍ମ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲିତ ଥିଲା, ପଞ୍ଚବର୍ଣ୍ଣରେ ଦୀପ୍ତ। ସେମାନଙ୍କ ଉପରେ ଭ୍ରମରମାନେ ଘୁରି ଘୁରି ଯେନେ ଗୀତ ଗାଉଥିଲେ।

Verse 10

सरसस्तस्य मध्ये तु पद्मिनी महती शुभा । गौरेणोन्नतनालेन पद्मेन महता वृता,उक्त सरोवरके मध्यभागमें एक बहुत बड़ी सुन्दर कमलिनी थी, जिसे एक ऊँची नालवाले गौर वर्णके विशाल कमलने घेर रखा था

ସେଇ ସରୋବରର ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଏକ ବିଶାଳ ଓ ଶୁଭ ପଦ୍ମିନୀ ଥିଲା; ଉଚ୍ଚ ନାଳ ଥିବା ଗୌରବର୍ଣ୍ଣ ଏକ ମହାପଦ୍ମ ତାହାକୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଘେରି ରଖିଥିଲା।

Verse 11

पद्मस्य भित्त्वा नालं च विवेश सहिता तया । बिसतन्तुप्रविष्टं च तत्रापश्यच्छतक्रतुम्‌,उपश्रुति देवीने उस कमलनालको चीरकर इन्द्राणी सहित उस कमलके भीतर प्रवेश किया और वहीं एक तन्‍्तुमें घुसकर छिपे हुए शतक्रतु इन्द्रको देखा

ସେ ପଦ୍ମର ନାଳକୁ ଭେଦି ତାହା ସହିତ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲା; ଏବଂ ସେଠାରେ ପଦ୍ମତନ୍ତୁରେ ପ୍ରବିଷ୍ଟ ହୋଇ ଲୁଚିଥିବା ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଦେଖିଲା।

Verse 12

त॑ दृष्टवा च सुसूक्ष्मेण रूपेणावस्थितं प्रभुम्‌ सूक्ष्मरूपधरा देवी बभूवोपश्रुतिश्चव सा,अत्यन्त सूक्ष्म रूपसे अवस्थित भगवान्‌ इन्द्रको वहाँ देखकर देवी उपश्रुति तथा इन्द्राणीने भी सूक्ष्म रूप धारण कर लिया

ସେଠାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ ରୂପରେ ଅବସ୍ଥିତ ପ୍ରଭୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଦେଖି ଦେବୀ ଉପଶ୍ରୁତି ମଧ୍ୟ ସୂକ୍ଷ୍ମ ରୂପ ଧାରଣ କଲେ; ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ସୂକ୍ଷ୍ମ ରୂପ ନେଲେ।

Verse 13

इन्द्रं तुष्टाव चेन्द्राणी विश्रुतै: पूर्वकर्मभि: । स्तूयमानस्ततो देव: शचीमाह पुरन्दर:,इन्द्राणीने पहलेके विख्यात कर्मोंका बखान करके इन्द्रदेवका स्‍्तवन किया। अपनी स्तुति सुनकर इन्द्रदेवने शचीसे कहा--

ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ପୂର୍ବକାଳର ବିଶ୍ରୁତ କର୍ମଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ମରଣ କରି ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କଲେ। ସେହି ସ୍ତୁତି ଶୁଣି ପୁରନ୍ଦର ଇନ୍ଦ୍ର ଶଚୀଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 14

किमर्थमसि सम्प्राप्ता विज्ञातश्न॒ कथं त्वहम्‌ । ततः सा कथयामास नहुषस्य विचेष्टितम्‌,::223/म*%7 आया: खो न “देवि! तुम किसलिये यहाँ आयी हो और तुम्हें कैसे मेरा पता लगा है?” तब इन्द्राणीने नहुषकी कुचेष्टाका वर्णन किया इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीन्द्रस्तवे चतुर्दशो 5ध्याय: ।। १४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत येनोट्रोगपर्वमें इन्द्राणीद्वारा इन्द्रका स्चुतिविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଇନ୍ଦ୍ର କହିଲେ—“କେଉଁ କାରଣରୁ ତୁମେ ଏଠାକୁ ଆସିଛ? ଏବଂ ମୋ ବିଷୟରେ କିପରି ଜାଣିଲ?” ତାପରେ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ନହୁଷଙ୍କ ଦୁଷ୍ଟ ଆଚରଣର କଥା କହିଲେ।

Verse 15

इन्द्रत्वं त्रिषु लोकेषु प्राप्प वीर्यसमन्वित: । दर्पाविष्ट श्न दुष्टात्मा मामुवाच शतक्रतो,“शतक्रतो! तीनों लोकोंके इन्द्रका पद पाकर नहुष बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो घमंडमें भर गया है। उस दुष्टात्माने मुझसे भी कहा है कि तू मेरी सेवामें उपस्थित हो। उस क्रूर नरेशने मेरे लिये कुछ समयकी अवधि दी है। प्रभो! यदि आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो वह पापी मुझे अपने वशमें कर लेगा

ହେ ଶତକ୍ରତୋ! ତିନି ଲୋକରେ ଇନ୍ଦ୍ରତ୍ୱ ପାଇ, ବଳ-ପରାକ୍ରମରେ ସମ୍ପନ୍ନ ସେଇ ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ଦର୍ପରେ ମତ୍ତ ହୋଇଛି। ସେ ମୋତେ କହିଛି—“ମୋ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେ।”

Verse 16

उपतिषछेति स क्रूर: कालं॑ च कृतवान्‌ मम । यदि न त्रास्यसि विभो करिष्यति स मां वशे,“शतक्रतो! तीनों लोकोंके इन्द्रका पद पाकर नहुष बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो घमंडमें भर गया है। उस दुष्टात्माने मुझसे भी कहा है कि तू मेरी सेवामें उपस्थित हो। उस क्रूर नरेशने मेरे लिये कुछ समयकी अवधि दी है। प्रभो! यदि आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो वह पापी मुझे अपने वशमें कर लेगा

ସେଇ କ୍ରୂର କହିଛି—“ମୋ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେ,” ଏବଂ ମୋ ପାଇଁ ସମୟସୀମା ମଧ୍ୟ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିଛି। ହେ ପ୍ରଭୁ! ଆପଣ ଯଦି ମୋତେ ରକ୍ଷା ନ କରିବେ, ସେ ମୋତେ ନିଜ ବଶରେ କରିଦେବ।

Verse 17

एतेन चाहं सम्प्राप्ता द्रुतं शक्र तवान्तिकम्‌ | जहि रौद्रं महाबाहो नहुषं पापनिश्चयम्‌,“महाबाहु इन्द्र! इसी कारण मैं शीघ्रतापूर्वक आपके निकट आयी हूँ। पापपूर्ण विचार रखनेवाले उस भयानक नहुषको आप मार डालिये

ହେ ମହାବାହୁ ଶକ୍ର! ଏହି କାରଣରୁ ମୁଁ ଶୀଘ୍ର ଆପଣଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଛି। ପାପନିଶ୍ଚୟରେ ଦୃଢ଼ ସେଇ ଉଗ୍ର ନହୁଷଙ୍କୁ ବଧ କରନ୍ତୁ।

Verse 18

प्रकाशयात्मना55त्मानं॑ दैत्यदानवसूदन । तेज: समाप्रुहि विभो देवराज्यं प्रशाधि च,'दैत्यदानवसूदन प्रभो! अब आप अपने आपको प्रकाशमें लाइये, तेज प्राप्त कीजिये और देवताओंके राज्यका शासन अपने हाथमें लीजिये”

ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବସୂଦନ ପ୍ରଭୁ! ଏବେ ଆପଣ ନିଜ ସ୍ୱରୂପ-ତେଜ ପ୍ରକାଶ କରନ୍ତୁ, ଶକ୍ତି ସଂଗ୍ରହ କରନ୍ତୁ; ହେ ସର୍ବବ୍ୟାପୀ, ଦେବରାଜ୍ୟର ଶାସନ ଗ୍ରହଣ କରି ପ୍ରଶାସନ କରନ୍ତୁ।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how a threatened individual responds when a newly empowered ruler uses status to issue coercive demands: whether to acquiesce under pressure or seek lawful protection and restoration of legitimate authority.

Authority without self-discipline becomes self-undermining; ethical governance requires restraint, respect, and protection, while arrogance and coercion are portrayed as deviations that justify corrective reassertion of order.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter operates as an exemplum, embedding a governance-ethics lesson within the larger pre-war discourse of Udyoga-parva.