
Vidurā–Putra Saṃvāda: Utsāha, Kīrti, and Kṣātra Resolve (Udyoga-parva 131)
Upa-parva: Strī-nīti Saṃvāda (Vidurā–Putra Saṃvāda) — Maternal Admonition on Pauruṣa
Kuntī introduces an ancient exemplum and recounts a dialogue in which Vidurā, described as truthful and far-sighted, rebukes her biological son after his defeat by the Sindhu ruler. She censures his collapse into despair, characterizing passivity as socially destructive and politically shameful. Through a sequence of striking analogies, she urges him to rise, embrace risk, and prefer brief, luminous exertion over prolonged, smoke-like existence without achievement. She frames personhood as validated by deeds—valor, generosity, austerity, learning, prosperity, and effective action—rather than mere survival or accumulation. She warns against degrading livelihoods and being a source of familial grief, and she insists that satisfaction without striving undermines success. The son questions the value of ornaments, pleasures, and life itself if he is not seen as worthy; the mother responds by prioritizing worlds (outcomes) associated with self-respect and the welfare of dependents. The discourse culminates in an ethic of self-reliant effort: one who lives by the strength of his own arms gains fame here and auspicious standing beyond.
Chapter Arc: श्रीकृष्ण कुन्ती के गृह में प्रवेश कर उनसे पाण्डवों के लिये संदेश माँगते हैं—ऐसा संदेश जो युद्ध के मुहाने पर खड़े पुत्रों के हृदय को स्थिर कर दे। → कुन्ती का वचन मातृत्व की करुणा और राजधर्म की कठोरता के बीच झूलता है; वह स्मरण कराती हैं कि समस्त क्षत्रिय-व्यवस्था, दण्डनीति और प्रजा-रक्षा का भार राजा पर है, और धर्म की रक्षा के लिये शस्त्र उठाना भी धर्म ही है। → कुन्ती का तीक्ष्ण आदेश: ‘राजधर्म के अनुसार युद्ध करो; कायर बनकर पितरों को मत डुबोओ; क्षीण-पुण्य होकर पापगति को मत जाओ’—यह मातृ-आशीर्वाद नहीं, धर्म-आज्ञा बनकर गिरता है। → संदेश का सार निश्चित होता है—पाण्डवों को दीनता नहीं, धर्म-प्रतिज्ञा चाहिए; राज्य-रक्षा, प्रजा-पालन और न्याय के लिये युद्ध अनिवार्य है। कृष्ण इस वाणी को लेकर पाण्डवों की ओर प्रस्थान का संकल्प करते हैं। → कृष्ण पाण्डवों के पास यह कठोर मातृ-संदेश लेकर जाते हैं—अब देखना है कि यह वाणी अर्जुन-युधिष्ठिर के संकल्प को कैसे रूप देती है।
Verse 1
अफ्-्#-क- द्वात्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णके पूछनेपर कुन्तीका उन्हें पाण्डवोंसे कहनेके लिये संदेश देना वैशम्पायन उवाच प्रविश्याथ गृहं तस्याश्वरणावभिवाद्य च । आचख्यौ तत् समासेन यद् वृत्तं कुरुसंसदि,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीके घरमें जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्णने कौरवसभामें जो कुछ हुआ था, वह सब समाचार उन्हें संक्षेपसे कह सुनाया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! କୁନ୍ତୀଙ୍କ ଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କରି ତାଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କରି, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କୁରୁସଭାରେ ଯାହା ଘଟିଥିଲା, ସେ ସବୁ କଥା ସଂକ୍ଷେପରେ ତାଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 2
वायुदेव उवाच उक्त बहुविध॑ वाक््यं ग्रहणीयं सहेतुकम् । ऋषिभिश्चैव च मया न चासौ तद् गृहीतवान्,भगवान् श्रीकृष्ण बोले--बूआजी! मैंने तथा महर्षियोंने भी नाना प्रकारके युक्तियुक्त वचन, जो सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य थे, सभामें कहे, परंतु दुर्योधनने उन्हें नहीं माना
ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ପିସିମା! ମୁଁ ଏବଂ ମହର୍ଷିମାନେ ସଭାରେ ନାନା ପ୍ରକାର ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ, ସର୍ବଥା ଗ୍ରହଣଯୋଗ୍ୟ ବଚନ କହିଥିଲୁ; କିନ୍ତୁ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମାନିଲା ନାହିଁ।
Verse 3
कालपक्वमिदं सर्व सुयोधनवशानुगम् । आपूृच्छे भवतीं शीघ्र प्रयास्ये पाण्डवान् प्रति,जान पड़ता है, दुर्योधनके वशमें होकर उसीके पीछे चलनेवाला यह सारा क्षत्रियसमुदाय कालसे परिपक्व हो गया है। (अतः शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है।) अब मैं तुमसे आज्ञा चाहता हूँ, यहाँसे शीघ्र ही पाण्डवोंके पास जाऊँगा
ସୁୟୋଧନଙ୍କ ବଶରେ ପଡ଼ି ତାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲୁଥିବା ଏହି ସମଗ୍ର କ୍ଷତ୍ରିୟସମୁଦାୟ କାଳବଳରେ ପରିପକ୍ୱ ହୋଇଯାଇଛି—ଅର୍ଥାତ୍ ଶୀଘ୍ର ନାଶମୁଖୀ। ଏବେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନୁମତି ଚାହୁଁଛି; ମୁଁ ତୁରନ୍ତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଯିବି।
Verse 4
कि वाच्या: पाण्डवेयास्ते भवत्या वचनान्मया । तद् ब्रूहि त्वं महाप्राज्ञे शुश्रेषे वचनं तव,महाप्राज्ञे! मुझे पाण्डवोंसे तुम्हारा क्या संदेश कहना होगा, उसे बताओ। मैं तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ
ମହାପ୍ରାଜ୍ଞେ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଆପଣଙ୍କ ସନ୍ଦେଶ ଭାବେ ମୁଁ କ’ଣ କହିବି? ଦୟାକରି କହନ୍ତୁ; ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ।
Verse 5
कुन्त्युवाच ब्रूया: केशव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । भूयांस्ते हीयते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथा:,कुन्ती बोली--केशव! तुम धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरके पास जाकर इस प्रकार कहना “बेटा! तुम्हारे प्रजापालनरूप धर्मकी बड़ी हानि हो रही है। तुम उस धर्मपालनके अवसरको व्यर्थ न खोओ
କୁନ୍ତୀ କହିଲେ—“କେଶବ! ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଏପରି କହ—‘ପୁଅ! ପ୍ରଜାପାଳନରୂପ ତୋର ଧର୍ମ ବହୁତ କ୍ଷୟ ପାଉଛି। ଏହି ଧର୍ମାବସରକୁ ବ୍ୟର୍ଥ କରିନେ।’”
Verse 6
श्रोत्रियस्थेव ते राजन् मन्दकस्याविपक्चित: । अनुवाकहता बुद्धिर्धर्ममेवैकमी क्षते,राजन! जैसे वेदके अर्थको न जाननेवाले अज्ञ वेदपाठीकी बुद्धि केवल वेदके मन्त्रोंकी आवृत्ति करनेमें ही नष्ट हो जाती है और केवल मन्त्रपाठमात्र धर्मपर ही दृष्टि रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि भी केवल शान्तिधर्मको ही देखती है
ରାଜନ! ଯେପରି ବେଦର ଅର୍ଥ ନ ଜାଣୁଥିବା ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ବେଦପାଠୀର ବୁଦ୍ଧି କେବଳ ପାଠର ପୁନରାବୃତ୍ତିରେ କ୍ଷୟ ପାଏ ଏବଂ ସେ ଧର୍ମକୁ ମାତ୍ର ମନ୍ତ୍ରପାଠ ଭାବେ ଦେଖେ, ସେହିପରି ଆପଣଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ମଧ୍ୟ କେବଳ ଶାନ୍ତିଧର୍ମକୁ ହିଁ ଦେଖୁଛି।
Verse 7
अड्जवेक्षस्व धर्म त्वं यथा सृष्ट: स्वयम्भुवा । बाहुभ्यां क्षत्रिया: सृष्टा बाहुवीयोपजीविन:,बेटा! ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये जैसे धर्मकी सृष्टि की है, उसीपर दृष्टिपात करो। उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे क्षत्रियोंकों उत्पन्न किया है, अतः क्षत्रिय बाहुबलसे ही जीविका चलानेवाले होते हैं
ହେ ପୁତ୍ର! ସ୍ୱୟଂଭୂ ସୃଷ୍ଟିକର୍ତ୍ତା ଯେପରି ଧର୍ମ ସୃଷ୍ଟି କରିଛନ୍ତି, ସେହି ଧର୍ମକୁ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖ। ତାଙ୍କର ଦୁଇ ଭୁଜାରୁ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଜନ୍ମିଛନ୍ତି; ତେଣୁ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଭୁଜବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଏ।
Verse 8
क्रूराय कर्मणे नित्यं प्रजानां परिपालने । शृणु चात्रोपमामेकां या वृद्धेभ्य: श्रुता मया,वे युद्धरूपी कठोर कर्मके लिये रचे गये हैं तथा सदा प्रजापालनरूपी धर्ममें प्रवृत्त होते हैं। मैं इस विषयमें एक उदाहरण देती हूँ, जिसे मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुँहले सुन रखा है
ତୁମେ ଯୁଦ୍ଧରୂପ କଠୋର କର୍ମ ପାଇଁ ନିର୍ମିତ ଏବଂ ସଦା ପ୍ରଜାପାଳନରୂପ ଧର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ। ଏହି ବିଷୟରେ ମୁଁ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କଠାରୁ ଶୁଣିଥିବା ଗୋଟିଏ ଉପମା ଶୁଣ।
Verse 9
मुचुकुन्दस्य राजर्षेरददात् पृथिवीमिमाम् | पुरा वैश्रवण: प्रीतो न चासौ तां गृहीतवान्,पूर्वकालकी बात है, धनाध्यक्ष कुबेर राजर्षि मुचुकुन्दपर प्रसन्न होकर उन्हें ये सारी पृथ्वी दे रहे थे; परंतु उन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया
ପୁରାତନ କାଳରେ ଧନାଧ୍ୟକ୍ଷ ବୈଶ୍ରବଣ (କୁବେର) ରାଜର୍ଷି ମୁଚୁକୁନ୍ଦଙ୍କ ଉପରେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଦେବାକୁ ଲାଗିଲେ; କିନ୍ତୁ ମୁଚୁକୁନ୍ଦ ତାହା ଗ୍ରହଣ କଲେ ନାହିଁ।
Verse 10
बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये । ततो वैश्रवण: प्रीतो विस्मित: समपद्यत,वे बोले--'देव! मेरी इच्छा है कि मैं अपने बाहुबलसे उपार्जित राज्यका उपभोग करूँ।” इससे कुबेर बड़े प्रसन्न और विस्मित हुए
ସେ କହିଲେ—“ଦେବ! ମୋର ଇଚ୍ଛା, ମୁଁ ନିଜ ଭୁଜବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ରାଜ୍ୟକୁ ହିଁ ଭୋଗ କରିବି।” ଏହା ଶୁଣି ବୈଶ୍ରବଣ (କୁବେର) ପ୍ରସନ୍ନ ଓ ବିସ୍ମିତ ହେଲେ।
Verse 11
मुचुकुन्दस्ततो राजा सोडन्वशासद् वसुन्धराम् | बाहुवीर्यार्जितां सम्यक् क्षत्रधर्ममनुव्रत:,तदनन्तर क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले राजा मुचुकुन्दने अपने बाहुबलसे प्राप्त की हुई इस पृथ्वीका न्यायपूर्वक शासन किया
ତାପରେ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଥିବା ରାଜା ମୁଚୁକୁନ୍ଦ ନିଜ ଭୁଜବଳ ଓ ପରାକ୍ରମରେ ଅର୍ଜିତ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ ନ୍ୟାୟପୂର୍ବକ ଶାସନ କଲେ।
Verse 12
यं॑ हि धर्म चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिता: । चतुर्थ तस्य धर्मस्य राजा विन्देत भारत,भारत! राजाके द्वारा सुरक्षित हुई प्रजा यहाँ जिस धर्मका अनुष्ठान करती है, उसका चौथाई भाग उस राजाको मिल जाता है
ହେ ଭାରତ! ଏହି ଲୋକରେ ରାଜାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ ପ୍ରଜା ଯେ ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରେ, ସେହି ଧର୍ମପୁଣ୍ୟର ଚତୁର୍ଥାଂଶ ରାଜା ପାଏ।
Verse 13
राजा चरति चेद् धर्म देवत्वायैव कल्पते । स चेदधर्म चरति नरकायैव गच्छति,यदि राजा धर्मका पालन करता है तो उसे देवत्वकी प्राप्ति होती है और यदि वह अधर्म करता है तो नरकमें ही पड़ता है
ରାଜା ଯଦି ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରେ, ତେବେ ସେ ଦେବତ୍ୱ ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ହୁଏ; ଯଦି ଅଧର୍ମ ଆଚରଣ କରେ, ତେବେ ସେ ନିଶ୍ଚୟ ନରକକୁ ଯାଏ।
Verse 14
दण्डनीति: स्वधर्मेण चातुर्वर्ण्य नियच्छति । प्रयुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यश्व॒ यच्छति,राजाकी दण्डनीति यदि उसके द्वारा स्वधर्मके अनुसार प्रयुक्त हुई तो वह चारों वर्णोौंको नियन्त्रणमें रखती और अधर्मसे निवृत्त करती है
ସ୍ୱଧର୍ମାନୁସାରେ ପ୍ରୟୋଗିତ ଦଣ୍ଡନୀତି ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ ରଖେ; ଏବଂ ରାଜା ଯଦି ଏହାକୁ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ଲାଗୁ କରନ୍ତି, ତେବେ ଲୋକଙ୍କୁ ଅଧର୍ମରୁ ମଧ୍ୟ ରୋକେ।
Verse 15
दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक् कार्त्स्न्येन वर्तते | तदा कृतयुगं नाम काल: श्रेष्ठ: प्रवर्तते,यदि राजा दण्डनीतिके प्रयोगमें पूर्णतः न्यायसे काम लेता है तो जगत्में 'सत्ययुग' नामक उत्तम काल आ जाता है
ଯେତେବେଳେ ରାଜା ଦଣ୍ଡନୀତିରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଏବଂ ସମ୍ୟକ୍ ନ୍ୟାୟରେ ଚାଲନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ‘କୃତଯୁଗ’ ନାମକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କାଳ ପ୍ରବର୍ତ୍ତିତ ହୁଏ।
Verse 16
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् | इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्,राजाका कारण काल है या कालका कारण राजा है, ऐसा संदेह तुम्हारे मनमें नहीं उठना चाहिये; क्योंकि राजा ही कालका कारण होता है
‘କାଳ ରାଜାଙ୍କର କାରଣ କି, ନା ରାଜା କାଳର କାରଣ?’—ଏପରି ସନ୍ଦେହ ତୁମ ମନରେ ଉଠୁ ନାହିଁ; କାରଣ ରାଜା ହିଁ କାଳର କାରଣ।
Verse 17
राजा कृतयुगस््रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च । युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम्
ବାୟୁ କହିଲେ—ରାଜା ହିଁ କୃତଯୁଗର ସ୍ରଷ୍ଟା, ତଥା ତ୍ରେତା ଓ ଦ୍ୱାପରର ମଧ୍ୟ; ଚତୁର୍ଥ ଯୁଗ କଳି ପ୍ରକଟ ହେବାର କାରଣ ମଧ୍ୟ ରାଜା ହୁଏ।
Verse 18
राजा ही सत्ययुग, त्रेता और द्वापरका स्रष्टा है। चौथे युग कलिके प्रकट होनेमें भी वही कारण है ।। कृतस्य करणादू राजा स्वर्गमत्यन्तमश्चुते । त्रेताया: करणादू राजा स्वर्ग नात्यन्तमश्लुते,अपने सत्कर्मोद्वारा सत्ययुग उपस्थित करनेके कारण राजाको अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होती है। त्रेताकी प्रवृत्ति करनेसे भी उसे स्वर्गकी ही प्राप्ति होती है, किंतु वह अक्षय नहीं होता
ବାୟୁ କହିଲେ—ରାଜା ହିଁ କୃତ (ସତ୍ୟ) ଯୁଗ, ତ୍ରେତା ଓ ଦ୍ୱାପରର ସ୍ରଷ୍ଟା; ଚତୁର୍ଥ ଯୁଗ କଳି ପ୍ରକଟ ହେବାର କାରଣ ମଧ୍ୟ ସେଇ। ସତ୍କର୍ମଦ୍ୱାରା କୃତଯୁଗ ସ୍ଥାପନ କଲେ ରାଜା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଅକ୍ଷୟ ସ୍ୱର୍ଗ ପାଏ; ତ୍ରେତାଯୁଗ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନ କଲେ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱର୍ଗ ମିଳେ, କିନ୍ତୁ ସେ ଅକ୍ଷୟ ନୁହେଁ।
Verse 19
प्रवर्तनाद् द्वापरस्य यथाभागमुपाश्षुते । कले: प्रवर्तनादू राजा पापमत्यन्तमश्लुते,द्वापर उपस्थित करनेसे उसे यथाभाग पुण्य और पापका फल प्राप्त होता है; परंतु कलियुगकी प्रवृत्ति करनेसे राजाको अत्यन्त पाप (कष्ट) भोगना पड़ता है
ଦ୍ୱାପରଯୁଗ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନ କଲେ ରାଜା ଯଥାଭାଗ ପୁଣ୍ୟ-ପାପର ଫଳ ପାଏ; କିନ୍ତୁ କଳିଯୁଗ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନ କଲେ ରାଜା ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପର ଭାଗୀ ହୁଏ।
Verse 20
ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वती: समा: । राजदोषेण हि जगत् स्पृश्यते जगत: स च,ऐसा करनेसे वह दुष्कर्मी राजा अनेक वर्षोतक नरकमें ही निवास करता है। राजाका दोष जगत्को और जगतका दोष राजाको प्राप्त होता है
ତେବେ ସେ ଦୁଷ୍କର୍ମୀ ରାଜା ଶାଶ୍ୱତ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ନରକରେ ବାସ କରେ। କାରଣ ରାଜଦୋଷରେ ଜଗତ୍ ଦୂଷିତ ହୁଏ, ଏବଂ ଜଗତର ଦୋଷରେ ରାଜା ମଧ୍ୟ ସ୍ପୃଷ୍ଟ ହୁଏ।
Verse 21
राजधर्मानवेक्षस्व पितृपैतामहोचितान् । नैतद् राजर्षिवत्तं हि यत्र त्वं स्थातुमिच्छसि,बेटा! तुम्हारे पिता-पितामहोंने जिनका पालन किया है, उन राजधर्मोंकी ओर ही देखो। तुम जिसका आश्रय लेना चाहते हो, वह राजर्षियोंका आचार अथवा राजवधर्म नहीं है
ବାୟୁ କହିଲେ—ପୁତ୍ର! ତୁମ ପିତା ଓ ପିତାମହମାନେ ଯେ ରାଜଧର୍ମ ପାଳନ କରିଥିଲେ, ସେହି ରାଜଧର୍ମକୁ ଦେଖ। ତୁମେ ଯେ ପଥରେ ଦଢ଼ିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ସେ ରାଜର୍ଷିମାନଙ୍କ ଆଚାର ନୁହେଁ; ସେ ରାଜଧର୍ମ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 22
न हि वैक्लव्यसंसृष्ट आनृशंस्ये व्यवस्थित: । प्रजापालनसम्भूतं फलं किंचन लब्धवान्,जो सदा दयाभावमें ही स्थित हो विह्लल बना रहता है, ऐसे किसी भी पुरुषने प्रजापालनजनित किसी पुण्यफलको कभी नहीं प्राप्त किया है
ଯେ ଅସହାୟତାରେ ମିଶି କେବଳ କୋମଳ କରୁଣାରେ ନିଶ୍ଚଳ ରହେ, ସେ ପ୍ରଜାପାଳନଧର୍ମଜନିତ କୌଣସି ଫଳ ପାଏ ନାହିଁ; ଅସମର୍ଥତାରେ ଭାଙ୍ଗିପଡ଼ୁଥିବା ଦୟାରୁ ରାଜଧର୍ମର ପୁଣ୍ୟ କେବେ ମିଳେ ନାହିଁ।
Verse 23
न होतामाशिषं पाण्डुर्न चाहं न पितामह: । प्रयुक्तवन्त: पूर्व ते यया चरसि मेधया,तुम जिस बुद्धिके सहारे चलते हो, उसके लिये न तो तुम्हारे पिता पाण्डुने, न मैंने और न पितामहने ही पहले कभी आशीर्वाद दिया था (अर्थात् तुममें वैसी बुद्धि होनेकी कामना किसीने नहीं की थी)
ତୁମେ ଯେ ମେଧାର ଭରସାରେ ଚାଲ, ସେଥିପାଇଁ ପୂର୍ବେ ନ ତୁମ ପିତା ପାଣ୍ଡୁ, ନ ମୁଁ, ନ ପିତାମହ—କେହି ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଇନଥିଲେ; ଅର୍ଥାତ୍ ଏପରି ବୁଦ୍ଧି ତୁମେ ପାଉ—ଏ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କାହାରି ଥିଲା ନାହିଁ।
Verse 24
यज्ञो दानं तप: शौर्य प्रज्ञा संतानमेव च । माहात्म्यं बलमोजश्न नित्यमाशंसितं मया,मैं तो सदा यही मनाती रही हूँ कि तुम्हें यज्ञ, दान, तप, शौर्य, बुद्धि, संतान, महत्त्व, बल और ओजकी प्राप्ति हो
ମୁଁ ସଦା ଏହି ଆଶୀର୍ବାଦ ମାଗିଛି—ତୁମେ ଯଜ୍ଞ, ଦାନ, ତପ, ଶୌର୍ୟ, ପ୍ରଜ୍ଞା, ସନ୍ତାନ, ମାହାତ୍ମ୍ୟ, ବଳ ଓ ଓଜ ପାଉ।
Verse 25
नित्यं स्वाहा स्वधा नित्यं दद्युर्मानुषदेवता: । दीर्घमायुर्धन॑ पुत्रान् सम्यगाराधिता: शुभा:,कल्याणकारी ब्राह्मणोंकी भलीभाँति आराधना करनेपर वे भी सदा देवयज्ञ, पितृयज्ञ, दीर्घायु, धन और पुत्रोंकी प्राप्तिके लिये ही आशीर्वाद देते थे
ମାନବକାର୍ଯ୍ୟର ଦେବତାମାନେ ସଦା ‘ସ୍ୱାହା’ ଓ ସଦା ‘ସ୍ୱଧା’ ଉଚ୍ଚାରଣ କରନ୍ତି; ଶୁଭ ଦେବତାମାନେ ସମ୍ୟକ୍ ଆରାଧିତ ହେଲେ ଦୀର୍ଘାୟୁ, ଧନ ଓ ପୁତ୍ର—ଏହି ଆଶୀର୍ବାଦ ଦିଅନ୍ତି।
Verse 26
पुत्रेष्वाशासते नित्यं पितरो दैवतानि च । दानमध्ययन यज्ञ प्रजानां परिपालनम्,देवता और पितर अपने उपासकों तथा वंशजोंसे सदा दान, स्वाध्याय, यज्ञ तथा प्रजापालनकी ही आशा रखते हैं
ପିତୃମାନେ ଓ ଦେବତାମାନେ ନିଜ ସନ୍ତାନ-ବଂଶଜ ଓ ଉପାସକମାନଙ୍କଠାରୁ ସଦା ଦାନ, ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ, ଯଜ୍ଞ ଓ ପ୍ରଜାମାନଙ୍କର ପରିପାଳନ—ଏହି କର୍ତ୍ତବ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ହିଁ ଆଶା କରନ୍ତି।
Verse 27
एतदू धर्म्यमधर्म्य वा जन्मनैवाभ्यजायथा: । ते तु वैद्या: कुले जाता अवृत्त्या तात पीडिता:,श्रीकृष्ण! मेरा यह कथन धर्मसंगत है या अधर्मयुक्त, यह तुम स्वभावसे ही जानते हो। तात! वे पाण्डव उत्तम कुलमें उत्पन्न और विद्वान् होकर भी इस समय जीविकाके अभावसे पीड़ित हैं
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ! ମୋର ଏହି କଥା ଧର୍ମସଙ୍ଗତ କି ଅଧର୍ମ—ତୁମେ ନିଜ ସ୍ୱଭାବରୁ ହିଁ ଜାଣ। ତାତ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମି ଓ ବିଦ୍ୱାନ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଏବେ ଜୀବିକାର ଅଭାବରେ ପୀଡିତ।
Verse 28
यत्र दानपतिं शूर॑ क्षुधिता: पृथिवीचरा: । प्राप्य तुष्टा: प्रतिष्ठन्ते धर्म: को5भ्यधिकस्तत:,भूतलपर विचरनेवाले भूखे मानव जहाँ दानपति, शूरवीर क्षत्रियके समीप पहुँचकर अन्न-पानसे पूर्णतः संतुष्ट हो अपने घरको जाते हैं, वहाँ उससे बढ़कर दूसरा धर्म क्या हो सकता है?
ଯେଉଁଠାରେ ଭୂମିତଳରେ ଘୁରୁଥିବା ଭୁଖା ଲୋକେ ଦାନପତି, ଶୂର କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ଅନ୍ନ-ପାନରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ତୃପ୍ତ ହୋଇ ନିଜ ଘରକୁ ଫେରନ୍ତି—ସେଠାରୁ ବଡ଼ ଧର୍ମ ଆଉ କ’ଣ?
Verse 29
दानेनान्यं बलेनान्यं तथा सूनृतया परम् । सर्वतः प्रतिगृह्नीयादू राज्यं प्राप्पेह धार्मिक:,धर्मात्मा पुरुष यहाँ राज्य पाकर किसीको दानसे, किसीको बलसे और किसीको मधुर वाणीद्वारा संतुष्ट करे। इस प्रकार सब ओरसे आये हुए लोगोंको दान, मान आदिसे संतुष्ट करके अपना ले
ଧର୍ମାତ୍ମା ପୁରୁଷ ଏଠାରେ ରାଜ୍ୟ ପାଇଲେ କାହାକୁ ଦାନରେ, କାହାକୁ ବଳରେ, ଆଉ କାହାକୁ ମଧୁର ବାଣୀରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରୁ; ଏଭଳି ସବୁ ଦିଗରୁ ଆସିଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ଦାନ, ମାନ ଆଦି ଦେଇ ନିଜ ପକ୍ଷରେ ଆଣୁ।
Verse 30
ब्राह्मण: प्रचरेद् भैक्षे क्षत्रिय: परिपालयेत् । वैश्यो धनार्जन कुर्याच्छूद्र: परिचरेच्च तान्,ब्राह्मण भिक्षावृत्तिसे जीविका चलावे, क्षत्रिय प्रजाका पालन करे, वैश्य धनोपार्जन करे और शाूद्र उन तीनों वर्णोकी सेवा करे
ବ୍ରାହ୍ମଣ ଭିକ୍ଷାବୃତ୍ତିରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଉ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ପ୍ରଜାକୁ ପାଳନ କରୁ, ବୈଶ୍ୟ ଧନାର୍ଜନ କରୁ, ଏବଂ ଶୂଦ୍ର ସେଇ ତିନି ବର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସେବା କରୁ।
Verse 31
भैक्ष॑ विप्रतिषिद्ध ते कृषिनैवोपपद्यते । क्षत्रियोउसि क्षतात् त्राता बाहुवीयोपजीविता,युधिष्ठिर! तुम्हारे लिये भिक्षावृत्तिका तो सर्वथा निषेध है और खेती भी तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम तो दूसरोंको क्षतिसे त्राण देनेवाले क्षत्रिय हो। तुम्हें तो बाहुबलसे ही जीविका चलानी चाहिये
ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁମ ପାଇଁ ଭିକ୍ଷାବୃତ୍ତି ସର୍ବଥା ନିଷିଦ୍ଧ, ଏବଂ କୃଷିକାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ତୁମକୁ ଶୋଭେ ନାହିଁ। ତୁମେ କ୍ଷତ୍ରିୟ—ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ କ୍ଷତିରୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିବା; ତେଣୁ ତୁମ ଜୀବିକା ବାହୁବଳରେ, ଅର୍ଥାତ୍ ରାଜଧର୍ମର ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ପ୍ରୟୋଗରେ, ନିର୍ଭର କରିବା ଉଚିତ।
Verse 32
पित्रयमंशं महाबाहो निमग्नं पुनरुद्धर । साम्ना भेदेन दानेन दण्डेनाथ नयेन वा,महाबाहो! तुम्हारा पैतृक राज्य-भाग शत्रुओंके हाथमें पड़कर लुप्त हो गया है। तुम साम, दान, भेद अथवा दण्डनीतिसे पुनः उसका उद्धार करो
ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ମହାବାହୁ! ତୁମ ପୈତୃକ ରାଜ୍ୟାଂଶ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ହାତକୁ ପଡ଼ି ନିମଜ୍ଜିତ ହୋଇଛି। ସାମ, ଭେଦ, ଦାନ, ଦଣ୍ଡ କିମ୍ବା ଯେକୌଣସି ନୀତିଦ୍ୱାରା ତାହାକୁ ପୁନଃ ଉଦ୍ଧାର କର।
Verse 33
इतो दुःखतरं कि नु यदहं हीनबान्धवा । परपिण्डमुदीक्षे वै त्वां सूत्वामित्रनन्दन,शत्रुओंका आनन्द बढ़ानेवाले पाण्डव! इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है कि मैं तुम्हें जन्म देकर भी बन्धु-बान्धवोंसे हीन नारीकी भाँति जीविकाके लिये दूसरोंके दिये हुए अन्न-पिण्डकी आशा लगाये ऊपर देखती रहती हूँ
ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଆନନ୍ଦ ବଢ଼ାଉଥିବା ପାଣ୍ଡବ! ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ ଦୁଃଖ କ’ଣ—ତୁମକୁ ଜନ୍ମ ଦେଇ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବହୀନ ନାରୀ ପରି ଜୀବିକା ପାଇଁ ପରର ଅନ୍ନପିଣ୍ଡର ଆଶାରେ ଉପରକୁ ଚାହିଁ ରହୁଛି।
Verse 34
युद्धयस्व राजधर्मेण मा निमज्जी: पितामहान् । मा गम: क्षीणपुण्यस्त्वं सानुज: पापिकां गतिम्,अतः तुम राजधर्मके अनुसार युद्ध करो। कायर बनकर अपने बाप-दादोंका नाम मत डुबाओ और भाइयोंसहित पुण्यसे वंचित होकर पापमयी गतिको न प्राप्त होओ
ବାୟୁ କହିଲେ—ରାଜଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ଯୁଦ୍ଧ କର। କାୟରତାରେ ପିତାମହମାନଙ୍କ ନାମ ଡୁବାଇ ଦିଅନି; ଏବଂ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ପୁଣ୍ୟହୀନ ହୋଇ ପାପମୟ ଗତିକୁ ଯାଅନି।
Verse 132
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीवाक्ये द्वात्रिशधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ‘କୁନ୍ତୀବାକ୍ୟ’ ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶ ତିରିଶି ଦ୍ୱିତୀୟ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
The ethical choice is between surrendering to despair after defeat (a life of dependency and social contempt) versus reasserting agency through disciplined effort, risk acceptance, and duty-oriented action that restores honor and protects communal welfare.
Personhood and legitimacy are established by effective deeds: rise from inertia, pursue purposeful exertion even under uncertainty, avoid degrading dependence, and measure life by the capacity to sustain kin, allies, and social obligations through one’s strength and conduct.
No formal phalaśruti is provided in this passage. The chapter’s internal valuation of results is pragmatic and ethical: fame (kīrti), social standing, and an auspicious posthumous trajectory are presented as consequences of self-reliant, duty-aligned action.