Adhyaya 116
Udyoga ParvaAdhyaya 11624 Verses

Adhyaya 116

गालवेन उशीनरराजसमागमः (Gālava’s Audience with King Uśīnara)

Upa-parva: Gālavākhyāna (Mādhavī–Gālava Episode) — within Udyoga Parva

Nārada continues the account of Mādhavī, who—having resumed maidenhood—accompanies the brāhmaṇa Gālava in his vow-bound mission. Gālava travels to Bhojanagara to meet King Uśīnara, described as steadfast in valor and truth. He proposes a reciprocal arrangement: Mādhavī will bear the king two sons of radiant qualities, and in return Gālava requests as bride-price four hundred horses characterized as moon-bright with dark ears (ekataḥśyāmakarṇa), required for his guru-dakṣiṇā. Gālava argues the urgency and gravity of his obligation and frames progeny as salvific for an heirless ruler, contrasting the fate of those without descendants. Uśīnara replies that he possesses only two hundred such horses, though he has many others; he nevertheless agrees to accept Mādhavī to beget a single son, emphasizing that giving another’s wealth for personal desire is not aligned with dharma or reputation. Gālava honors the king; after the union, a son named Śibi is born, renowned among rulers. Gālava then departs with Mādhavī, continuing the broader quest narrative.

Chapter Arc: मार्ग में गालव मुनि राजकन्या माधवी को धैर्य बँधाते हैं—धीरे चलो, शोक मत करो—और उसे काशी के धर्मात्मा नरेश दिवोदास के पास ले जाने का संकल्प प्रकट होता है। → नारद के कथनानुसार गालव दिवोदास के यहाँ पहुँचकर न्यायपूर्वक सत्कार पाते हैं, पर अपने कठोर व्रत-उद्देश्य के लिए राजा से ‘प्रसव’ की अपेक्षा रखते हुए माधवी को सौंपते हैं; राजधर्म, अतिथि-सत्कार और सत्य-प्रतिज्ञा के बीच राजा का निर्णय कथा को कसता है। → दिवोदास माधवी में अनुरक्त होकर उसके साथ दाम्पत्य-रति करते हैं—उपमाओं से उसकी दीप्ति और राजा की आसक्ति का उत्कर्ष रचा जाता है—और उसी संयोग से प्रतर्दन का जन्म होता है। → समय पूर्ण होने पर गालव पुनः आते हैं और स्पष्ट कहते हैं—‘मेरी कन्या मुझे लौटा दीजिए; घोड़े यहीं रहें, मैं अन्यत्र जाता हूँ’; धर्मात्मा दिवोदास सत्य में स्थित रहकर वचन निभाते हैं और माधवी को नियत समय पर गालव को लौटा देते हैं। → गालव अब माधवी को साथ लेकर अगले नरेश/अगले चरण की ओर बढ़ते हैं—व्रत-पूर्ति की यात्रा अभी शेष है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २४ “लोक हैं।] ऑपनआक्रात बछ। अ---छकऋज> सप्तदशाधिकशततमो< ध्याय: दिवोदासका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे प्रतर्दन नामक पुत्र उत्पन्न करना गालव उवाच महावीरयों महीपाल: काशीनामीश्वर: प्रभु: । दिवोदास इति ख्यातो भैमसेनिर्नराधिप:,मार्गमें गालवने राजकन्या माधवीसे कहा--भद्रे! काशीके अधिपति भीमसेनकुमार शक्तिशाली राजा दिवोदास महापराक्रमी एवं विख्यात भूमिपाल हैं। उन्हींके पास हम दोनों चलें। तुम धीरे-धीरे चली आओ। मनमें किसी प्रकारका शोक न करो। राजा दिवोदास धर्मात्मा, संयमी तथा सत्य-परायण हैं

ଗାଲବ କହିଲେ—“କାଶୀର ଅଧୀଶ୍ୱର, ପୃଥିବୀର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ରକ୍ଷକ, ମହାବୀର୍ୟବାନ୍ ନରାଧିପ—ଭୀମସେନପୁତ୍ର ‘ଦିବୋଦାସ’ ନାମେ ଖ୍ୟାତ।”

Verse 2

तत्र गच्छावहे भद्रे शनैरागच्छ मा शुच: । धार्मिक: संयमे युक्त: सत्ये चैव जनेश्वर:,मार्गमें गालवने राजकन्या माधवीसे कहा--भद्रे! काशीके अधिपति भीमसेनकुमार शक्तिशाली राजा दिवोदास महापराक्रमी एवं विख्यात भूमिपाल हैं। उन्हींके पास हम दोनों चलें। तुम धीरे-धीरे चली आओ। मनमें किसी प्रकारका शोक न करो। राजा दिवोदास धर्मात्मा, संयमी तथा सत्य-परायण हैं

“ଭଦ୍ରେ! ଆମେ ସେଠାକୁ ଯାଉ। ତୁମେ ଧୀରେ ଧୀରେ ଆସ; ଶୋକ କରନି। ସେଠାର ଜନେଶ୍ୱର ଧାର୍ମିକ, ସଂଯମୀ ଓ ସତ୍ୟନିଷ୍ଠ।”

Verse 3

नारद उवाच तमुपागम्य स मुनिर्न्यायतस्तेन सत्कृत: । गालव: प्रसवस्यार्थ त॑ं नृपं प्रत्यचोदयत्‌,नारदजी कहते हैं--राजा दिवोदासके यहाँ जानेपर गालव मुनिका उनके द्वारा यथोचित सत्कार किया गया। तदनन्तर गालवने पूर्ववत्‌ उन्हें भी शुल्क देकर उस कन्यासे एक संतान उत्पन्न करनेके लिये प्रेरित किया

ନାରଦ କହିଲେ—“ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ସେ ମୁନିଙ୍କୁ ରାଜା ନ୍ୟାୟାନୁସାରେ ସତ୍କାର କଲେ। ପରେ ସନ୍ତାନୋତ୍ପତ୍ତି ପାଇଁ ଗାଲବ ପୂର୍ବବତ୍ ସେ ନୃପଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରେରିତ କଲେ।”

Verse 4

दिवोदास उवाच श्रुतमेतन्मया पूर्व किमुक्‍्त्वा विस्तरं द्विज । काड्क्षितो हि मयैषोर्र्थ: श्रुत्वैव द्विजसत्तम,दिवोदास बोले--ब्रह्मन! यह सब वृत्तान्त मैंने पहलेसे ही सुन रखा है। अब इसे विस्तारपूर्वक कहनेकी क्या आवश्यकता है? द्विजश्रेष्ठ। आपके प्रस्तावको सुनते ही मेरे मनमें यह पुत्रोत्पादनकी अभिलाषा जाग उठी है

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—“ହେ ଦ୍ୱିଜ! ଏହା ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ଶୁଣିଛି; ତେବେ ବିସ୍ତାରେ କହିବାର କ’ଣ ଆବଶ୍ୟକ? ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ ପ୍ରସ୍ତାବ ଶୁଣିମାତ୍ରେ ମୋ ମନରେ ଏହି ଆକାଂକ୍ଷା ଜାଗ୍ରତ ହୋଇଛି—ପୁତ୍ରୋତ୍ପତ୍ତିର।”

Verse 5

एतच्च मे बहुमतं यदुत्सृज्य नराधिपान्‌ । मामेवमुपयातो5सि भावि चैतदसंशयम्‌,यह मेरे लिये बड़े सम्मानकी बात है कि आप दूसरे राजाओंको छोड़कर मेरे पास इस रूपमें प्रार्थी होकर आये हैं। नि:संदेह ऐसा ही भावी है

ଅନ୍ୟ ନରାଧିପମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଏହିପରି ଯାଚକ ହୋଇ ତୁମେ ମୋ ପାଖକୁ ଆସିଛ—ଏହା ମୋ ପାଇଁ ମହା ସମ୍ମାନ। ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ଭାବି।

Verse 6

स एव विभवो<स्माकमश्नानामपि गालव । अहमप्येकमेवास्यां जनयिष्यामि पार्थिवम्‌,गालव! मेरे पास भी दो ही सौ श्यामकर्ण घोड़े हैं; अतः मैं भी इसके गर्भसे एक ही राजकुमारको उत्पन्न करूँगा

ହେ ଗାଲବ, ଅଶ୍ୱସମ୍ପନ୍ନ ଆମ ପାଖରେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ପରିମାଣର ବିଭବ ଅଛି। ତେଣୁ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ତାହାର ଗର୍ଭରୁ କେବଳ ଗୋଟିଏ ରାଜପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେବି।

Verse 7

तथेत्युक्त्वा द्विजश्रेष्ठ: प्रादात्‌ कन्‍्यां महीपते: । विधिपूर्वा च तां राजा कनन्‍्यां प्रतिगृहीतवान्‌,तब “बहुत अच्छा” कहकर विप्रवर गालवने वह कन्या राजाको दे दी। राजाने भी उसका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया

“ତଥାସ୍ତୁ” ବୋଲି କହି ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ରାଜାଙ୍କୁ ଦେଲେ। ରାଜା ମଧ୍ୟ ବିଧିପୂର୍ବକ ପାଣିଗ୍ରହଣ କରି ତାକୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ।

Verse 8

रेमे स तस्यां राजर्षि: प्रभावत्यां यथा रवि: । स्वाहायां च यथा वदल्नलिरयथा शच्यां च वासव:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ରାଜର୍ଷି ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀରେ ଅନୁରକ୍ତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସହ ତେଣୁହି ରମଣ କଲେ—ଯେପରି ରବି ପ୍ରଭାବତୀ ସହ, ଅଗ୍ନି ସ୍ୱାହା ସହ, ଓ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଶଚୀ ସହ କରନ୍ତି।

Verse 9

यथा चन्द्रश्न रोहिण्यां यथा धूमोर्णया यम: । वरुणक्ष्‌ यथा गौर्या यथा चर्द्धयां धनेश्वर:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଯେପରି ଚନ୍ଦ୍ର ରୋହିଣୀରେ, ଯମ ଧୂମୋର୍ଣ୍ଣାରେ, ବରୁଣ ଗୌରୀରେ, ଓ ଧନେଶ୍ୱର (କୁବେର) ଋଦ୍ଧିରେ ଅନୁରକ୍ତ—ସେପରି ଦିବୋଦାସ ମଧ୍ୟ ମାଧବୀରେ ଆସକ୍ତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସହ ରମଣ କଲେ।

Verse 10

यथा नारायणो लक्ष्म्यां जाल्नव्यां च यथोदघि: । यथा रुद्रश्न रुद्राण्यां यथा वेद्यां पितामह:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ନାରାୟଣ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ସହ ରମଣ କରନ୍ତି, ଯେପରି ସମୁଦ୍ର ଜାହ୍ନବୀ (ଗଙ୍ଗା) ସହ ସଂଯୁକ୍ତ, ଯେପରି ରୁଦ୍ର ରୁଦ୍ରାଣୀ ସହ ଏକତ୍ର, ଏବଂ ଯେପରି ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମା ବେଦୀ ସହ ସମ୍ବଦ୍ଧ—ସେହିପରି ମୁଁ ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗ କରି ତାଙ୍କ ସହ କ୍ରୀଡ଼ା କଲି। ମୋର ବୀର୍ୟବଳରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 11

अदृश्यन्त्यां च वासिष्ठो वसिष्ठश्नाक्षमालया । च्यवनश्व सुकन्यायां पुलस्त्य: संध्यया यथा,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ଅଦୃଶ୍ୟନ୍ତୀ ସହ ବାସିଷ୍ଠ ଶକ୍ତି, ଯେପରି ଅକ୍ଷମାଳା (ଅରୁନ୍ଧତୀ) ସହ ବସିଷ୍ଠ, ଯେପରି ସୁକନ୍ୟା ସହ ଚ୍ୟବନ, ଏବଂ ଯେପରି ସନ୍ଧ୍ୟା ସହ ପୁଲସ୍ତ୍ୟ—ସେହିପରି ମୁଁ ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗ କରି ତାଙ୍କ ସହ କ୍ରୀଡ଼ା କଲି। ମୋର ବୀର୍ୟବଳରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 12

अगस्त्यश्वापि वैदर्भ्या सावित्र्यां सत्यवान्‌ यथा । यथा भृगु: पुलोमायामदित्यां कश्यपो यथा,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ଅଗସ୍ତ୍ୟ ବୈଦର୍ଭୀ (ଲୋପାମୁଦ୍ରା) ସହ ରମଣ କରନ୍ତି, ଯେପରି ସାବିତ୍ରୀ ସହ ସତ୍ୟବାନ, ଯେପରି ପୁଲୋମା ସହ ଭୃଗୁ, ଏବଂ ଯେପରି ଅଦିତି ସହ କଶ୍ୟପ—ସେହିପରି ମୁଁ ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗ କରି ତାଙ୍କ ସହ କ୍ରୀଡ଼ା କଲି। ମୋର ବୀର୍ୟବଳରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 13

रेणुकायां यथा<<र्चीको हैमवत्यां च कौशिक: । बृहस्पतिश्च तारायां शुक्रश्चन शतपर्वणा,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ରେଣୁକା ସହ ଜମଦଗ୍ନି, ଯେପରି ହୈମବତୀ ସହ କୌଶିକ (ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର), ଯେପରି ତାରା ସହ ବୃହସ୍ପତି, ଏବଂ ଯେପରି ଶତପର୍ବା ସହ ଶୁକ୍ର—ସେହିପରି ମୁଁ ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗ କରି ତାଙ୍କ ସହ କ୍ରୀଡ଼ା କଲି। ମୋର ବୀର୍ୟବଳରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 14

यथा भूम्यां भूमिपतिरुवश्यां च पुरूरवा: । ऋचीक: सत्यवत्यां च सरस्वत्यां यथा मनु:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ଭୂମିରେ ଭୂମିପତି ରମଣ କରନ୍ତି, ଯେପରି ଉର୍ବଶୀରେ ପୁରୂରବା, ଯେପରି ସତ୍ୟବତୀରେ ଋଚୀକ, ଏବଂ ଯେପରି ସରସ୍ୱତୀରେ ମନୁ—ସେହିପରି ମୁଁ ଦିବୋଦାସ ମାଧବୀ ପ୍ରତି ଗାଢ଼ ଅନୁରାଗ କରି ତାଙ୍କ ସହ କ୍ରୀଡ଼ା କଲି। ମୋର ବୀର୍ୟବଳରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 15

शकुन्तलायां दुष्यन्तो धृत्यां धर्मश्न शाश्वत: । दमयन्त्यां नलश्लैव सत्यवत्यां च नारद:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ଶକୁନ୍ତଳାରେ ଦୁଷ୍ୟନ୍ତ, ଧୃତିରେ ସନାତନ ଧର୍ମଦେବ, ଦମୟନ୍ତୀରେ ନଳ ଏବଂ ସତ୍ୟବତୀରେ ନାରଦ ରମଣ କରନ୍ତି—ସେପରି ମୁଁ ମାଧବୀରେ ଅନୁରକ୍ତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସହ ବିହାର କଲି; ଏବଂ ମୋର ବୀର୍ୟରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲା।

Verse 16

जरत्कारुर्जरत्कार्वा पुलस्त्यश्च प्रतीच्यया | मेनकायां यथोर्णायुस्तुम्बुरुश्वैव रम्भया,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ମୁନି ଜରତ୍କାରୁ ନାଗକନ୍ୟା ଜରତ୍କାରୁ ସହ, ପୁଲସ୍ତ୍ୟ ପ୍ରତୀଚ୍ୟା ସହ, ଊର୍ଣ୍ଣାୟୁ ମେନକା ସହ ଏବଂ ତୁମ୍ବୁରୁ ରମ୍ଭା ସହ ରମଣ କରନ୍ତି—ସେପରି ମୁଁ ମାଧବୀରେ ଗାଢ଼ ଅନୁରକ୍ତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସହ ବିହାର କଲି; ଏବଂ ମୋର ବୀର୍ୟରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲା।

Verse 17

वासुकि: शतशीर्षायां कुमार्या च धनंजय: । वैदेह्मां च यथा रामो रुक्मिण्यां च जनार्दन:,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଦିବୋଦାସ କହିଲେ—ଯେପରି ବାସୁକି ଶତଶୀର୍ଷାରେ, ଧନଞ୍ଜୟ ସେଇ କୁମାରୀରେ, ରାମ ବୈଦେହୀ (ସୀତା)ରେ ଏବଂ ଜନାର୍ଦନ (କୃଷ୍ଣ) ରୁକ୍ମିଣୀରେ ରମଣ କରନ୍ତି—ସେପରି ମୁଁ ମାଧବୀରେ ଅନୁରକ୍ତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ସହ ବିହାର କଲି।

Verse 18

तथा तु रममाणस्य दिवोदासस्य भूपते: । माधवी जनयामास पुत्रमेकं प्रतर्दनम्‌,राजर्षि दिवोदास माधवीमें अनुरक्त होकर उसके साथ रमण करने लगे। जैसे सूर्य प्रभावतीके, अग्नि स्वाहाके, देवेन्द्र शचीके, चन्द्रमा रोहिणीके, यमराज धूमोणाके, वरुण गौरीके, कुबेर ऋद्धिके, नारायण लक्ष्मीके, समुद्र गंगाके, रुद्रदेव रुद्राणीके, पितामह ब्रह्मा वेदीके, वसिष्ठनन्दन शक्ति अदृश्यन्तीके, वसिष्ठ अक्षमाला (अरुन्धती)-के, च्यवन सुकन्याके, पुलस्त्य संध्याके, अगस्त्य विदर्भराजकुमारी लोपामुद्राके, सत्यवान्‌ सावित्रीके, भगु पुलोमाके, कश्यप अदितिके, जमदग्नि रेणुकाके, कुशिकवंशी विश्वामित्र हैमवर्तीके, बृहस्पति ताराके, शुक्र शतपर्वाके, भूमिपति भूमिके, पुरूरवा उर्वशीके, ऋचीक सत्यवतीके, मनु सरस्वतीके, दुष्यन्त शकुन्तलाके, सनातन धर्मदेव धृतिके, नल दमयन्तीके, नारद सत्यवतीके, जरत्कारु मुनि नागकन्या जरत्कारुके, पुलस्त्य प्रतीच्याके, ऊर्णायु मेनकाके, तुम्बुरु रम्भाके, वासुकि शतशीर्षके, धनंजय कुमारीके, श्रीरामचन्द्रजी विदेहनन्दिनी सीताके तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण रुक्मिणी देवीके साथ रमण करते हैं, उसी प्रकार अपने साथ रमण करनेवाले राजा दिवोदासके वीर्यसे माधवीने प्रतर्दन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया

ଏହିପରି ରମଣରତ ଭୂପତି ଦିବୋଦାସଙ୍କ ଠାରୁ ମାଧବୀ ପ୍ରତର୍ଦନ ନାମକ ଏକମାତ୍ର ପୁତ୍ରକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲା।

Verse 19

अथाजगाम भगवान्‌ दिवोदासं स गालव: । समये समनुप्राप्ते वचनं चेदमब्रवीत्‌

ତାପରେ ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟରେ ଭଗବାନ୍ ଗାଲବ ଦିବୋଦାସଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ; ଏବଂ ସମୟ ଯଥାବିଧି ଉପସ୍ଥିତ ହେଲାବେଳେ ସେ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 20

तदनन्तर समय आनेपर भगवान्‌ गालव मुनि पुनः दिवोदासके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले-- ।। निर्यातयतु मे कन्यां भवांस्तिष्ठन्तु वाजिन: । यावदन्यत्र गच्छामि शुल्कार्थ पृथिवीपते,'पृथ्वीनाथ! अब आप मुझे राजकन्याको लौटा दें। आपके दिये हुए घोड़े अभी आपके ही पास रहें। मैं इस समय शुल्क प्राप्त करनेके लिये अन्यत्र जा रहा हूँ”

ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେବା ପରେ ଭଗବାନ୍ ଗାଲବ ମୁନି ପୁନର୍ବାର ରାଜା ଦିବୋଦାସଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସି ଏପରି କହିଲେ— “ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ଏବେ ମୋତେ ସେଇ ରାଜକନ୍ୟାକୁ ଫେରାଇ ଦିଅନ୍ତୁ। ଆପଣ ଦେଇଥିବା ଘୋଡ଼ାମାନେ ଏହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଆପଣଙ୍କ ପାଖରେ ରହୁନ୍ତୁ। ମୁଁ ଏବେ ଶୁଲ୍କ (ବଧୂମୂଲ୍ୟ) ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ ଅନ୍ୟତ୍ର ଯାଉଛି।”

Verse 21

धर्मात्मा राजा दिवोदास अपनी की हुई सत्य प्रतिज्ञा पर अटल रहनेवाले थे; अतः उन्होंने गालवको वह कन्या लौटा दी

ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜା ଦିବୋଦାସ ନିଜ କରା ସତ୍ୟ-ପ୍ରତିଜ୍ଞାରେ ଅଟୁଟ ରହିଲେ; ତେଣୁ ସେ ଗାଲବଙ୍କୁ ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ଫେରାଇ ଦେଲେ।

Verse 23

दिवोदासो<थ धर्मात्मा समये गालवस्य ताम्‌ | कन्यां निर्यातयामास स्थित: सत्ये महीपति:

ତାପରେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଦିବୋଦାସ, ସତ୍ୟରେ ଅଟୁଟ ସେଇ ମହୀପତି, ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟରେ ଗାଲବଙ୍କୁ ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ହସ୍ତାନ୍ତର କଲେ।

Verse 116

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ୍ରବିଷୟକ ଏକଶେ ଷୋଳତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 117

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते सप्तदशाधिकशततमो<ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ଗାଲବଚରିତ୍ରବିଷୟକ ଏକଶେ ସତରତମ ଅଧ୍ୟାୟ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to fulfill a binding guru-obligation without violating ethical constraints: Gālava must obtain rare horses, yet must do so through legitimate, consensual exchange rather than coercion or unethical acquisition.

Kingship is framed as responsibility to subjects and lineage, not private indulgence; additionally, dharmic reputation is treated as inseparable from the means by which wealth or benefits are obtained.

No explicit phalaśruti is provided in these verses; the chapter’s meta-lesson is conveyed implicitly through exemplification—vow-ethics, constrained desire, and lineage duty as interpretive keys within the larger embedded narrative.