
Udyoga Parva, Adhyāya 101: Bhogavatī-varṇana, Nāga-vaṃśa-kathana, and Sumukha-vivāha-prastāva
Upa-parva: Mātali–Nāgaloka Saṃvāda (Episode on Bhogavatī and the Nāga genealogy)
Nārada opens by describing Bhogavatī, the illustrious Nāga city governed by Vāsuki, likened to Amarāvatī in splendor. He identifies Śeṣa as the great serpent whose ascetic power and immense radiance uphold the earth, portraying cosmic stability as grounded in tapas and dhāraṇa (support). The narrative then surveys the inhabitants—Surasā’s Nāga offspring—marked by varied forms, ornaments, and symbolic insignia, including multi-headed serpents of diverse magnitudes. A long onomastic catalog follows, listing eminent Nāgas (e.g., Vāsuki, Takṣaka, Karkoṭaka, Dhanaṃjaya, Kāliya, Nahūṣa, Kambala, Aśvatara, and others), functioning as a genealogical index. The speaker frame shifts: Kaṇva reports that Mātali attentively observes the assembly and questions Nārada about a particularly radiant Nāga before him—asking his parentage, maternal line, and the clan for which he stands as a banner-like figure. Mātali further states that the Nāga’s composure, courage, beauty, and youth have drawn his mind, identifying him as a desirable husband for his daughter Guṇakeśī. Nārada then provides credentials: the Nāga prince is Sumukha, born in the Airāvata lineage, recognized as Āryaka’s grandson and Vāmana’s descendant; his father Cikura was killed by Vainateya (Garuḍa). Concluding, Mātali declares Sumukha his chosen son-in-law and requests Nārada’s assistance to formalize the marriage proposal—an episode that fuses cosmology, lineage authentication, and alliance-making.
Chapter Arc: देवताओं के सारथि मातलि वर की खोज में अद्भुत लोकों की ओर बढ़ते हैं—जहाँ पृथ्वी-सार से प्रकट सुरभि का क्षीर अनिर्वचनीय ‘एकरस’ होकर निरन्तर बहता है। → यात्रा साधारण नहीं रहती: क्षीरसागर के फेन से घिरे आश्रमों में ‘फेनप’ महर्षि उग्र तप में स्थित हैं, जिनसे देवता भी भय खाते हैं; साथ ही दिशाओं को धारण करने वाली सुरभि-पुत्री धेनुओं का रहस्य खुलता है—मानो सृष्टि का संतुलन स्वयं गौ-तत्त्व पर टिका हो। → सुरभि के क्षीर का त्रिविध रूप उद्घाटित होता है—सुधाभोजियों के लिए सुधा, पितरों के लिए स्वधा, और देवताओं के लिए अमृत; उसी के साथ गाथा का उच्चारण होता है कि रसातल-तल में जैसा सुख-निवास है वैसा नागलोक, स्वर्ग या त्रिविष्टप-विमानों में भी नहीं। → मातलि को उस लोक-व्यवस्था का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है: तपस्वियों का आहार-व्रत, दिशाओं का धारण, और क्षीर का दिव्य-परिवर्तन—ये सब वर-खोज के पथ पर संकेत-स्तम्भ बनते हैं, जिससे आगे की खोज के लिए दिशा निश्चित होती है। → वरान्वेषण की यात्रा अगले चरण में किस लोक/कुल/वीर तक पहुँचेगी—और कौन-सा गुण ‘योग्य वर’ का निर्णायक बनेगा—यह प्रश्न खुला रह जाता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०९ ॥/ अपना बछ। 2 द्र्याधेकशततमो< ध्याय: सुरभि और उसकी 80005 कक रसातलके सुखका व नारद उवाच इदं रसातलं नाम सप्तमं पृथिवीतलम् । यत्रास्ते सुरभिर्माता गवाममृतसम्भवा,नारदजी बोले--मातले! यह पृथ्वीका सातवाँ तल है, जिसका नाम रसातल है। यहाँ अमृतसे उत्पन्न हुई गोमाता सुरभि निवास करती हैं
ନାରଦ କହିଲେ— “ଏହା ପୃଥିବୀର ସପ୍ତମ ତଳ; ଏହାର ନାମ ରସାତଳ। ଏଠାରେ ଅମୃତଜାତ ଗୋମାତା ସୁରଭି ବସୋବାସ କରନ୍ତି।”
Verse 2
क्षरन्ती सततं क्षीरं पृथिवीसारसम्भवम् । षण्णां रसानां सारेण रसमेकमनुत्तमम्
ସେ ନିରନ୍ତର ପୃଥିବୀର ସାରରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କ୍ଷୀର ଝରାନ୍ତି—ଛଅ ରସର ସାର ମିଶି ହୋଇଥିବା ସେ ଏକ ଅନୁତ୍ତମ ରସ।
Verse 3
ये सुरभि पृथ्वीके सारतत्त्वसे प्रकट, छः रसोंके सारभागसे संयुक्त एवं सर्वोत्तम, अनिर्वचनीय एकरसरूप क्षीरको सदा अपने स्तनोंसे प्रवाहित करती रहती हैं ।। अमृतेनाभितृप्तस्य सारमुद्गिरत: पुरा । पितामहस्य वदनादुदतिष्ठ दनिन्दिता
ନାରଦ କହିଲେ— “ହେ ଅନିନ୍ଦିତେ! ପୁରାକାଳରେ ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମା ଅମୃତରେ ତୃପ୍ତ ହୋଇ ସୃଷ୍ଟିର ସାର ଉଦ୍ଗିରଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ତାଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏହା ଉଦ୍ଭବିତ ହେଲା। ସେହି ସୁରଭି ପୃଥିବୀର ସାରତତ୍ତ୍ୱରୁ ପ୍ରକଟ, ଛଅ ରସର ସାରରେ ସଂଯୁକ୍ତ—ଏକ ଅନିର୍ବଚନୀୟ ଓ ଅନୁତ୍ତମ ଏକରସ-ରୂପ କ୍ଷୀରକୁ ନିଜ ସ୍ତନରୁ ସଦା ପ୍ରବାହିତ କରନ୍ତି।”
Verse 4
पूर्वकालमें जब ब्रह्मा अमृतपान करके तृप्त हो उसका सारभाग अपने मुखसे निकाल रहे थे, उसी समय उनके मुखसे अनिन्दिता सुरभिका प्रादुर्भाव हुआ था ।। यस्या: क्षीरस्य धाराया निपतन्त्या महीतले । हृदः कृत: क्षीरनिधि: पवित्र परमुच्यते,पृथ्वीपर निरन्तर गिरती हुई उस सुरभिके क्षीरकी धारासे एक अनन्त हृद बन गया, जिसे 'क्षीरसागर” कहते हैं। वह परम पवित्र है
ନାରଦ କହିଲେ—ପ୍ରାଚୀନ କାଳରେ ବ୍ରହ୍ମା ଅମୃତ ପାନ କରି ତୃପ୍ତ ହୋଇ, ତାହାର ସାରଭାଗକୁ ମୁଖରୁ ବାହାର କରୁଥିବା ସମୟରେ, ସେଇ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ତାଙ୍କ ମୁଖରୁ ଅନିନ୍ଦିତା ସୁରଭି ପ୍ରାଦୁର୍ଭାବିତ ହେଲା। ତାଙ୍କର କ୍ଷୀରଧାରା ନିରନ୍ତର ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିବାରୁ ଏକ ଅପରିମେୟ ହ୍ରଦ ଗଠିତ ହେଲା—କ୍ଷୀରର ମହାନିଧି, ଯାହାକୁ ‘କ୍ଷୀରସାଗର’ କୁହାଯାଏ। ଏହା ପରମ ପବିତ୍ର ବୋଲି ଘୋଷିତ।
Verse 5
पुष्पितस्येव फेनेन पर्यन्तमनुवेष्टितम् पिबन्तो निवसन्त्यत्र फेनपा मुनिसत्तमा:,क्षीरसागरसे जो फेन उत्पन्न होता है, वह पुष्पके समान जान पड़ता है। वह फेन क्षीरसमुद्रके तटपर फैला रहता है, जिसे पीते हुए फेनपसंज्ञक बहुत-से मुनिश्रेष्ठ इस रसातलमें निवास करते हैं
କ୍ଷୀରସାଗରରୁ ଯେ ଫେନ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ, ସେ ପୁଷ୍ପିତ ଫୁଲ ପରି ଦିଶେ। ସେଇ ଫେନ କ୍ଷୀରସମୁଦ୍ରର ତଟଦେଶରେ ଚାରିଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ ରହେ। ସେଇ ରସାତଳରେ ‘ଫେନପ’ ନାମରେ ପରିଚିତ ଅନେକ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ଫେନ ପାନ କରି ବସବାସ କରନ୍ତି।
Verse 6
फेनपा नाम ते ख्याता: फेनाहाराश्न मातले । उग्रे तपसि वर्तन्ते येषां बिभ्यति देवता:,मातले! फेनका आहार करनेके कारण वे महर्षिगण “फेनप” नामसे विख्यात हैं। वे बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनसे देवतालोग भी डरते हैं
ହେ ମାତଲି! ଫେନକୁ ଆହାର କରୁଥିବାରୁ ସେ ମହର୍ଷିମାନେ ‘ଫେନପ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଗ୍ର ତପସ୍ୟାରେ ରତ; ସେମାନଙ୍କ ତପୋବଳକୁ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଭୟ କରନ୍ତି।
Verse 7
अस्याश्षतस्रो धेन्वो<न्या दिक्षु सर्वासु मातले । निवसन्ति दिशां पालयो धारयन्त्यो दिश: सम ता:,मातले! सुरभिकी पुत्रीस्वरूपा चार अन्य धेनुएँ हैं, जो सब दिशाओंमें निवास करती हैं। वे दिशाओंका धारण-पोषण करनेवाली हैं
ହେ ମାତଲି! ତାଙ୍କ ଛଡ଼ା ସୁରଭିଙ୍କ କନ୍ୟାସ୍ୱରୂପ ଆଉ ଶତ ଧେନୁ ଅଛନ୍ତି, ଯେମାନେ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ବସବାସ କରନ୍ତି। ସେମାନେ ଦିଗମାନଙ୍କୁ ଧାରଣ କରନ୍ତି, ପୋଷଣ କରନ୍ତି ଓ ରକ୍ଷା କରନ୍ତି—ଲୋକର ସମତୁଳନ ଧରି ରଖନ୍ତି।
Verse 8
पूर्वां दिशं धारयते सुरूपा नाम सौरभी । दक्षिणां हंसिका नाम धारयत्यपरां दिशम्,सुरूपा नामवाली धेनु पूर्वदिशाको धारण करती है तथा उससे भिन्न दक्षिणदिशाका हंसिका नामवाली धेनु धारण-पोषण करती है
ସୌରଭୀ ବଂଶର ‘ସୁରୂପା’ ନାମକ ଧେନୁ ପୂର୍ବ ଦିଗକୁ ଧାରଣ କରେ; ଏବଂ ତାହାଠାରୁ ଭିନ୍ନ ‘ହଂସିକା’ ନାମକ ଧେନୁ ଦକ୍ଷିଣ ଦିଗକୁ ଧାରଣ-ପୋଷଣ କରେ।
Verse 9
पश्चिमा वारुणी दिक् च धार्यते वै सुभद्रया । महानुभावया नित्यं मातले विश्वरूपया,मातले! महाप्रभावशालिनी विश्वरूपा सुभद्रा नामवाली सुरभिकन्याके द्वारा वरुणदेवकी पश्चिमदिशा धारण की जाती है
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ବରୁଣଙ୍କ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ନିତ୍ୟ ସୁଭଦ୍ରା ଧାରଣ କରନ୍ତି। ସେ ମହାନୁଭାବା, ବିଶ୍ୱରୂପା, ମହାପ୍ରଭାବଶାଳିନୀ—ସୁରଭିଙ୍କ କନ୍ୟା ‘ସୁଭଦ୍ରା’।
Verse 10
सर्वकामदुघा नाम धेनुर्धारयते दिशम् । उत्तरां मातले धर्म्या तथैलविलसंज्ञिताम्,चौथी धेनुका नाम सर्वकामदुघा है। मातले! वह धर्मयुक्त कुबेरसम्बन्धिनी उत्तरदिशाका धारण-पोषण करती है
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ‘ସର୍ବକାମଦୁଘା’ ନାମକ ଧେନୁ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ଧାରଣ କରେ। ସେ ଧର୍ମମୟୀ; ‘ଐଲବିଲ’ ନାମରେ ମଧ୍ୟ ପରିଚିତ, କୁବେର-ସମ୍ବନ୍ଧିତ।
Verse 11
आसां तु पयसा मिश्र पयो निर्मथ्य सागरे | मन्थानं मन्दरं कृत्वा देवैरसुरसंहितै:,देवसारथे! देवताओंने असुरोंसे मिलकर मन्दराचलको मथानी बनाकर इन्हीं धेनुओंके दूधसे मिश्रित क्षीरसागरकी दुग्धराशिका मन्थन किया और उससे वारुणी, लक्ष्मी एवं अमृतको प्रकट किया। तत्पश्चात् उस समुद्रामन्थनसे अश्वराज उच्चै:श्रवा तथा मणिरत्न कौस्तुभका भी प्रादुर्भाव हुआ था
ନାରଦ କହିଲେ—ସେଇ ଧେନୁମାନଙ୍କ ଦୁଧରେ ସାଗରଜଳ କ୍ଷୀରମିଶ୍ରିତ ହେଲା; ପରେ ଦେବମାନେ ଅସୁରମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ମନ୍ଦର ପର୍ବତକୁ ମଥନଦଣ୍ଡ କରି କ୍ଷୀରସାଗରକୁ ମନ୍ଥନ କଲେ। ସେଇ ମନ୍ଥନରୁ ବାରୁଣୀ, ଶ୍ରୀ (ଲକ୍ଷ୍ମୀ) ଓ ଅମୃତ ପ୍ରକଟ ହେଲା; ତାପରେ ଅଶ୍ୱରାଜ ଉଚ୍ଚୈଃଶ୍ରବା ଏବଂ କୌସ୍ତୁଭ ମଣିରତ୍ନ ମଧ୍ୟ ଉଦ୍ଭବିତ ହେଲା।
Verse 12
उद्धृता वारुणी लक्ष्मीरमृतं चापि मातले । उच्चै:श्रवाश्ना श्वराजो मणिरत्नं च कौस्तुभम्,देवसारथे! देवताओंने असुरोंसे मिलकर मन्दराचलको मथानी बनाकर इन्हीं धेनुओंके दूधसे मिश्रित क्षीरसागरकी दुग्धराशिका मन्थन किया और उससे वारुणी, लक्ष्मी एवं अमृतको प्रकट किया। तत्पश्चात् उस समुद्रामन्थनसे अश्वराज उच्चै:श्रवा तथा मणिरत्न कौस्तुभका भी प्रादुर्भाव हुआ था
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ମାତଲି! ସେଇ ମନ୍ଥନରୁ ବାରୁଣୀ, ଶ୍ରୀ (ଲକ୍ଷ୍ମୀ) ଓ ଅମୃତ ପ୍ରକଟ ହେଲା; ସେଇ ମନ୍ଥନରୁ ଅଶ୍ୱରାଜ ଉଚ୍ଚୈଃଶ୍ରବା ଏବଂ କୌସ୍ତୁଭ ମଣିରତ୍ନ ମଧ୍ୟ ଉଦ୍ଭବିତ ହେଲା।
Verse 13
सुधाहारेषु च सुधां स्वधाभोजिषु च स्वधाम् । अमृतं चामृताशेषु सुरभी क्षरते पय:
ନାରଦ କହିଲେ—ସୁଧା ଆହାର କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସୁଧା ହିଁ ଅଛି; ସ୍ୱଧା ଭୋଗ କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସ୍ୱଧା ହିଁ ଅଛି; ଏବଂ ଅମୃତରେ ନିର୍ଭର ଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅମୃତ ହିଁ—ସୁରଭୀ ସେହି ଅନୁସାରେ ଦୁଧ ଝରାଏ।
Verse 14
सुरभि अपने स्तनोंसे जो दूध बहाती है, वह सुधाभोजी लोगोंके लिये सुधा, स्वधाभोजी पितरोंके लिये स्वधा तथा अमृतभोजी देवताओंके लिये अमृतरूप है ।। अत्र गाथा पुरा गीता रसातलनिवासिभि: । पौराणी श्रूयते लोके गीयते या मनीषिभि:,यहाँ रसातलनिवासियोंने पूर्वकालमें जो पुरातन गाथा गायी थी, वह अब भी लोकमें सुनी जाती है और मनीषी पुरुष उसका गान करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ସୁରଭୀ ନିଜ ସ୍ତନରୁ ଯେ ଦୁଧ ପ୍ରବାହିତ କରେ, ସେହି ଦୁଧ ସୁଧାଭୋଜୀମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସୁଧା, ସ୍ୱଧାଭୋଜୀ ପିତୃମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସ୍ୱଧା, ଏବଂ ଅମୃତଭୋଜୀ ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅମୃତରୂପ ହୋଇଯାଏ। ଏହି ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ରସାତଳନିବାସୀମାନେ ପୁରାକାଳରେ ଯେ ପୁରାତନ ଗାଥା ଗାଇଥିଲେ, ସେହି ଗାଥା ଆଜି ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ଶୁଣନ୍ତି ଏବଂ ମନୀଷୀମାନେ ତାହାକୁ ଗାନ କରନ୍ତି।
Verse 15
न नागलोके न स्वर्गे न विमाने त्रिविष्टपे । परिवास: सुखस्तादृगू रसातलतले यथा,वह गाथा इस प्रकार है--“नागलोक, स्वर्गलोक तथा स्वर्गलोकके विमानमें निवास करना भी वैसा सुखदायक नहीं होता, जैसा रसातलमें रहनेसे सुख प्राप्त होता है”
ନାରଦ କହିଲେ—ନାଗଲୋକରେ ନୁହେଁ, ସ୍ୱର୍ଗରେ ନୁହେଁ, ତ୍ରିବିଷ୍ଟପର ଦିବ୍ୟ ବିମାନରେ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ରସାତଳତଳେ ଯେପରି ସୁଖଦ ନିବାସ, ସେପରି ସୁଖଦ ନିବାସ ଅନ୍ୟ କେଉଁଠି ନାହିଁ।
Verse 102
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे दयथधिकशततमो<्थध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ‘ମାତଲି-ବରାନ୍ୱେଷଣ’ ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକଶ ଦ୍ୱିତୀୟ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The ethical choice concerns criteria for alliance through marriage: Mātali weighs visible virtues (discipline, courage, demeanor) against genealogical legitimacy, seeking an option that is socially sanctioned and strategically stable.
The chapter teaches that order—cosmic and social—depends on sustaining forces: Śeṣa embodies dhāraṇa through tapas, while human-like institutions rely on verified lineage, credible testimony, and prudent alliance-making rather than impulse.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; its meta-function is archival and legitimizing—preserving cosmological claims (Śeṣa’s support) and genealogical data to ground subsequent relational decisions in recognized authority.