Gaṅgā-tīra Udaka-kriyā and Kuntī’s Disclosure of Karṇa’s Maternity
Strī-parva, Adhyāya 27
एवं विलप्य बहुलं धर्मराजो युधिष्ठिर:,अभितो या: स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि । राजन! इस प्रकार बहुत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर फ़ूट-फूटकर रोने लगे। रोते- ही-रोते उन्होंने धीरे-धीरे कर्णके लिये जलदान किया। यह सब सुनकर वहाँ एकत्र हुई सारी स्त्रियाँ, जो वहाँ जलांजलि देनेके लिये सब ओर खड़ी थीं, सहसा जोर-जोरसे रोने लगीं
evaṃ vilapya bahulaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ, abhito yāḥ sthitās tatra tasminn udakakarmaṇi |
ଏଭଳି ଅଧିକ ବିଲାପ କରି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ଉଦକକର୍ମରେ ଅଶ୍ରୁରେ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିଲେ। କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ପାଇଁ ଜଳାଞ୍ଜଳି ଦେବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେଠାରେ ଚାରିପାଖେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା ଶୁଣି ହଠାତ୍ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ କାନ୍ଦି ଉଠିଲେ।
वैशम्पायन उवाच